डोंगरिया कोंध आदिवासियों का जीवन

ओडिशा के नियमगिरी की पहाड़ियों में रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासियों के जीवन की झलक कैमरे की नज़र से.

 डोंगरिया कोंध के आदिवासी- ख़ासतौर पर युवक आधुनिक जीवन शैली से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं हैं. एक डोंगरिया कोंध बैठक की तस्वीरें लेता हुआ. एक-दो युवाओं के पास मोबाइल फोन भी हैं. उस पर वे वीडियो फ़िल्में भी बनाते हैं. हालांकि इनके गांव अब भी मोबाइल के नेटवर्क से बाहर हैं.
इमेज कैप्शन, डोंगरिया कोंध के आदिवासी- ख़ासतौर पर युवक आधुनिक जीवन शैली से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं हैं. एक डोंगरिया कोंध बैठक की तस्वीरें लेता हुआ. एक-दो युवाओं के पास मोबाइल फोन भी हैं. उस पर वे वीडियो फ़िल्में भी बनाते हैं. हालांकि इनके गांव अब भी मोबाइल के नेटवर्क से बाहर हैं.
मर्द और औरतें दोनों हेयरक्लिप लगाते हैं. औरतों के बालों में क्लिप के साथ पीछे खुरपी की तरह दिखने वाला एक छोटा सा हथियार भी गुँथा होता है.
इमेज कैप्शन, मर्द और औरतें दोनों हेयरक्लिप लगाते हैं. औरतों के बालों में क्लिप के साथ पीछे खुरपी की तरह दिखने वाला एक छोटा सा हथियार भी गुँथा होता है.
महिलाएं जेवरों के अलावा फूलों से भी अपने बालों को सजाती हैं. नियमगिरी की पहाड़ियों के पास के जंगलों में गुड़हल, काठचंपा और दूसरे फूल ख़ूब मिलते हैं.
इमेज कैप्शन, महिलाएं जेवरों के अलावा फूलों से भी अपने बालों को सजाती हैं. नियमगिरी की पहाड़ियों के पास के जंगलों में गुड़हल, काठचंपा और दूसरे फूल ख़ूब मिलते हैं.
महिलाओं से अलग पुरुष नाक में सिर्फ दो नथ पहनते हैं. पुरुष भी हेयरक्लिप लगाते हैं. बाहर जाते समय पुरुष अपने कंधे पर कुल्हाड़ी लटका लेते हैं. महिलाओं और पुरुषों को हाथों में डंडे लेकर चलते भी देखा जा सकता है.
इमेज कैप्शन, महिलाओं से अलग पुरुष नाक में सिर्फ दो नथ पहनते हैं. पुरुष भी हेयरक्लिप लगाते हैं. बाहर जाते समय पुरुष अपने कंधे पर कुल्हाड़ी लटका लेते हैं. महिलाओं और पुरुषों को हाथों में डंडे लेकर चलते भी देखा जा सकता है.
ज़्यादातर औरतें लुंगी की तरह के एक कपड़े का इस्तेमाल शरीर के निचले हिस्से को ढंकने के लिए करती हैं. वे शरीर के ऊपरी हिस्से में गमछा लपेटती हैं लेकिन आजकल यहां की कुछ महिलाएं साड़ी-ब्लाउज़ भी पहनने लगी हैं. टिन या फूस की छतों वाली झोपड़ियाँ गाँव के बीच से जाने वाले रास्ते के दोनों तरफ बनी होती है. एक दूसरे से बिल्कुल सटी हुई.
इमेज कैप्शन, ज़्यादातर औरतें लुंगी की तरह के एक कपड़े का इस्तेमाल शरीर के निचले हिस्से को ढंकने के लिए करती हैं. वे शरीर के ऊपरी हिस्से में गमछा लपेटती हैं लेकिन आजकल यहां की कुछ महिलाएं साड़ी-ब्लाउज़ भी पहनने लगी हैं. टिन या फूस की छतों वाली झोपड़ियाँ गाँव के बीच से जाने वाले रास्ते के दोनों तरफ बनी होती है. एक दूसरे से बिल्कुल सटी हुई.
इस इलाके में शिक्षा की बहुत कमी है. ज़्यादातर लोग अशिक्षित हैं. मुनिगुड़ा क़स्बे से महज़ 10 किलोमीटर दूर बसे बातुड़ी गांव में स्कूल का भवन नहीं है. कभी-कभार चलने वाला पांचवी कक्षा तक का स्कूल एक ग्रामीण के घर में चलता है. इस स्कूल में बच्चों को उड़िया, गणित, अंग्रेज़ी और सोशल स्टडीज़ पढ़ाया जाता है.
इमेज कैप्शन, इस इलाके में शिक्षा की बहुत कमी है. ज़्यादातर लोग अशिक्षित हैं. मुनिगुड़ा क़स्बे से महज़ 10 किलोमीटर दूर बसे बातुड़ी गांव में स्कूल का भवन नहीं है. कभी-कभार चलने वाला पांचवी कक्षा तक का स्कूल एक ग्रामीण के घर में चलता है. इस स्कूल में बच्चों को उड़िया, गणित, अंग्रेज़ी और सोशल स्टडीज़ पढ़ाया जाता है.
अधिकतर ग्रामीण पारंपरिक लिबास में रहना पसंद करते हैं. लेकिन युवाओं में जींस, टी-शर्ट, शर्ट भी प्रचिलित है. ग्रामसभा की बैठक में शामिल होने आए आदिवासी. ग्राम सभाएं सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित की गई हैं. इन्हें तय करना है कि नियमगिरी पर्वत में खनन की इजाज़त दी जाए या नहीं.
इमेज कैप्शन, अधिकतर ग्रामीण पारंपरिक लिबास में रहना पसंद करते हैं. लेकिन युवाओं में जींस, टी-शर्ट, शर्ट भी प्रचिलित है. ग्रामसभा की बैठक में शामिल होने आए आदिवासी. ग्राम सभाएं सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित की गई हैं. इन्हें तय करना है कि नियमगिरी पर्वत में खनन की इजाज़त दी जाए या नहीं.
दूसरी आदिवासी जातियों की तरह डोंगरिया कोंध भी क़तार बनाकर चलते हैं. ग्राम सभाओं की बैठकों में औरतें भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं.
इमेज कैप्शन, दूसरी आदिवासी जातियों की तरह डोंगरिया कोंध भी क़तार बनाकर चलते हैं. ग्राम सभाओं की बैठकों में औरतें भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं.
एक ग्रामसभा में अपनी बात रखती एक डोंगरिया कोंध महिला. कई ग्राम सभाओं ने ब्रितानी कंपनी वेदांत के प्रोजेक्ट को नकार दिया है. स्थानीय भाषा में डंगर का मतलब है पहाड़, डंगरिया उन्हें कहा जाता है जो पहाड़ों पर रहते हैं. आदिवासियों की यह जाति दक्षिणी ओडिशा के दो जिलों, रायगढ़ा और कलाहांड़ी में पाई जाती है.राज्य में 60 से अधिक आदिवासी जातियां निवास करती हैं. इनमें 22 प्रिमिटिव ट्राइब हैं. डोंगरिया कोंध इनमें से एक हैं. डोंगरिया के अलावा कुटिया आदिवासी भी वेदांत के प्रोजेक्ट से प्रभावित हो रहे हैं.
इमेज कैप्शन, एक ग्रामसभा में अपनी बात रखती एक डोंगरिया कोंध महिला. कई ग्राम सभाओं ने ब्रितानी कंपनी वेदांत के प्रोजेक्ट को नकार दिया है. स्थानीय भाषा में डंगर का मतलब है पहाड़, डंगरिया उन्हें कहा जाता है जो पहाड़ों पर रहते हैं. आदिवासियों की यह जाति दक्षिणी ओडिशा के दो जिलों, रायगढ़ा और कलाहांड़ी में पाई जाती है.राज्य में 60 से अधिक आदिवासी जातियां निवास करती हैं. इनमें 22 प्रिमिटिव ट्राइब हैं. डोंगरिया कोंध इनमें से एक हैं. डोंगरिया के अलावा कुटिया आदिवासी भी वेदांत के प्रोजेक्ट से प्रभावित हो रहे हैं.
गांवों में हैंडपंप लगे हैं.लेकिन औरतें झरनों से पानी भरकर उसका इस्तेमाल खाना बनाने और अन्य कामों में करती हैं.
इमेज कैप्शन, गांवों में हैंडपंप लगे हैं.लेकिन औरतें झरनों से पानी भरकर उसका इस्तेमाल खाना बनाने और अन्य कामों में करती हैं.
डोंगरिया आदिवासी गाय, सुअर, बकरी और मुर्गियां पालते हैं. गायों को बाड़ों में रखा जाता है. इन बाड़ों में नीचे बांस और लकड़ियों का प्लेटफार्म बना होता है, रात में गायों को इनमें बंद कर दिया जाता है.
इमेज कैप्शन, डोंगरिया आदिवासी गाय, सुअर, बकरी और मुर्गियां पालते हैं. गायों को बाड़ों में रखा जाता है. इन बाड़ों में नीचे बांस और लकड़ियों का प्लेटफार्म बना होता है, रात में गायों को इनमें बंद कर दिया जाता है.
डोंगरिया आदिवासी शिफ्टिंग कल्टीवेशन करते हैं, यानी एक जगह पर कुछ साल तक खेती कर उस जगह को जंगल उगने के लिए छोड़ दिया जाता है. आजकल बुआई का मौसम है. खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए चारों तरफ से घेर दिया जाता है.
इमेज कैप्शन, डोंगरिया आदिवासी शिफ्टिंग कल्टीवेशन करते हैं, यानी एक जगह पर कुछ साल तक खेती कर उस जगह को जंगल उगने के लिए छोड़ दिया जाता है. आजकल बुआई का मौसम है. खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए चारों तरफ से घेर दिया जाता है.
अपनी झोपड़ी के पीछे बांस का बना घेर लगाता एक आदिवासी.
इमेज कैप्शन, अपनी झोपड़ी के पीछे बांस का बना घेर लगाता एक आदिवासी.
हर गांव के बाहर धरनी पेनू का मंदिर होता है. आम और काठचंपा के पेड़ इन्हें छाया देते हैं. आदिवासियों के जीवन की तरह मंदिर में भी सादगी होती है. इन मंदिरों के पुजारी और ओझा यह काम पीढ़ियों से करते आ रहे हैं.
इमेज कैप्शन, हर गांव के बाहर धरनी पेनू का मंदिर होता है. आम और काठचंपा के पेड़ इन्हें छाया देते हैं. आदिवासियों के जीवन की तरह मंदिर में भी सादगी होती है. इन मंदिरों के पुजारी और ओझा यह काम पीढ़ियों से करते आ रहे हैं.
दक्षिण ओडिशा का यह इलाक़ा बहुत सुंदर है. गैर आदिवासियों का भी कहना है कि अगर नियमगिरी पर्वत श्रृंखला को नुक़सान पहुंचता है तो इलाक़े में सूखा पड़ जाएगा, क्योंकि दो प्रमुख नदियों और कई झरनों का स्रोत यही पर्वत है.
इमेज कैप्शन, दक्षिण ओडिशा का यह इलाक़ा बहुत सुंदर है. गैर आदिवासियों का भी कहना है कि अगर नियमगिरी पर्वत श्रृंखला को नुक़सान पहुंचता है तो इलाक़े में सूखा पड़ जाएगा, क्योंकि दो प्रमुख नदियों और कई झरनों का स्रोत यही पर्वत है.