डायनासोरों के रंग

अभी तक उनके रंगों के बारे में महज़ अंदाज़ा ही लगाया जाता रहा था लेकिन गहन शोध के बाद वैज्ञानिक उनके रंगों के बारे में पता लगाने में कामयाब हुए हैं.

कलाकार की परिकल्पना और सायनासोरोपटेरिक्स का जीवाश्म साक्ष्य. जिम रॉबिन्स/आईवीपीपी
इमेज कैप्शन, गर्मियों में होने वाले रॉयल सोसायटी की वार्षिक प्रदर्शनी में वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि डायनासोरों के रंगों को दोबारा किस तरह से गढ़ा जा सकता है. एकदम सटीक उदाहरण जैसे कि जीवाश्म के साक्ष्यों के सूक्ष्मता से अध्ययन किए जाने के बाद इस सायनोसोरोपटेरिक्स के साथ संभव हो पाया.
चीन के जेहोल बायोटा में सायनासोरोपटेरिक्स डायनासोर का 125 मीलियन वर्ष पुराना जीवाश्म नमूना. आईवीपीपी
इमेज कैप्शन, चीन के जेहोल बायोटा में सायनासोरोपटेरिक्स डायनासोर के लाखों साल पुराने (125 मीलियन वर्ष) इस जीवाश्म नमूने ने लंबे समय से अनसुलझी पड़ी इस पहेली को सुलझाने का रास्ता दिखाया है. तस्वीर में दिख रही भूरे रंग की इस चीज़ में मेलानोसोम संरक्षित है.
चीन के जेहोल बायोटा में 125 मीलियन साल पुराने जीवाश्म अवशेष में संरक्षित यूमेलानोसोम की छड़ सरीखी आकृति की स्कैन की हुई इलेक्ट्रॉन इमेज . स्टू कियर्न्स
इमेज कैप्शन, डॉक्टर मारिया मैकनमारा युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल से जुड़ी हुई है और उन्होंने डायनासोरों के रंगों के अध्ययन की परियोजना पर काम किया है. वह कहती हैं कि त्वचा के रंगों के लिए जिम्मेदार मेलेनिन के सूक्ष्म अवयवों को मेलानोसोम कहते हैं. ये अवयव गेंद या मांस आदि भरे हुए टुकड़ों की तरह लगते हैं. ये अमूमन एक माइक्रोन लंबे होते हैं जोकि मनुष्य के बाल के सौवें हिस्से की मोटाई के बराबर होता है.
मौजूदा समय के एक कबूतर के मेलानोसोम की स्कैन की हुई इलेक्ट्रॉन इमेज. मारिया मैकनमारा
इमेज कैप्शन, स्कैन की गई गई इलेक्ट्रॉन तस्वीरों से इस इस बात का पता चला कि पुराने समय के मेलानोसोम और आज के दौर के जानवरों के बीच क्या समानताएं और किस तरह के अंतर हैं. जैसे कि कबूतर के पंखों को लें. इन सूक्ष्म आकृतियों के आकार एवं स्थिति के अध्ययन के बाद वैज्ञानिक जीवाश्म नमूनों के रंगों का अनुमान लगाने में कामयाब हो पाए हैं.
सायनासोरोपटेरिक्स डायनासोर के वास्तविक रंगों को लेकर आर्टिस्ट का अनुमान. जिम रॉबिन्स/आईवीपीपी
इमेज कैप्शन, डायनासोरों के रंगों के बारे में पहले जो अनुमान लगाए गए थे उनमें वैज्ञानिकता कम और अटकलों का ज्यादा सहारा लिया गया था. मौजूदा समय के सरीसृप वर्ग के दूसरे प्राणियों और पक्षियों के अंदाज़े के आधार पर किसी नतीजे पर पहुँचने की कोशिश की गई थी. लेकिन उनकी तकनीक के आधार पर डॉक्टर मारिया और विशेषज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम इस बात का अनुमान लगाने में कामयाब हो पाई कि सायनोसोरोपटेरिक्स के सफ़ेद और लाल अदरक के रंग के रहे होंगे.
जर्मनी के मेसेल में मिला चार करोड़ 90 लाख साल पुराना यह जीवाश्म. एम मैकनमारा/फॉरशुंगसिनस्टियूट सेंकेनबर्ग
इमेज कैप्शन, ऐसा नहीं है कि सभी जीवाश्मों में रंग नहीं होते जैसा कि जर्मनी के मेसेल में पाए गए 490 लाख पुराने इस नीले रंग के चमकदार जीवाश्म में देखा जा सकता है. लेकिन बहुत ज्यादा गर्मी और दबाव से इस बात की संभावना रहती है कि जीवाश्म बनने की प्रक्रिया में उसके रंग और उसकी वास्तविक आकृति में बदलाव आ सकता है.
क्राइसोकरोआ रजा का ज्वेल बीटल. मारिया मैकनमारा.
इमेज कैप्शन, तस्वीर में दिख रहे कीड़े की बनावट ही कुछ ऐसी है कि उसकी बाहरी संरचना प्रकाश को परावर्तित कर देती है. जीवाश्म बनने की प्रक्रिया में इसकी संरचना में बदलाव होता है जिससे ये प्रकाश का परावर्तन अलग अलग तरीक़े से करते हैं. इससे इनके स्वरूप में भी बदलाव होता है.
जीवाश्म बनने की प्रक्रिया में रंगों का किस तरह से नुक़सान होता है. मारिया मैकनमारा.
इमेज कैप्शन, गहन शोध से इस नतीजे पर पहुँचा जा सका है कि जीवाश्म बनने की प्रक्रिया में रंगों का नुकसान किस तरह से होता है. यह कीड़े मकौड़ों से लेकर बड़े आकार वाले डायनासोरों तक में होता है. और रंगों का उद्भव भी किस तरह से हुआ है. रॉयल सोसायटी की ग्रीष्मकालीन विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन मंगलवार दो जुलाई से लेकर रविवार सात जुलाई तक लंदन में किया जा रहा है.