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'देख बहारें होली की...' नज़ीर अकबराबादी की मशहूर नज़्म के कुछ अंश
होली, एक ऐसा त्योहार जिसके कई रंग हैं. इसमें प्रेम है, दोस्ती है, मदहोशी है, ठंडक है, रिश्तों की गर्माहट है, रंगीन नज़ारे हैं, अल्हड़पन है, सादगी है, ख़ासियत है...इसी होली को नज़ीर अकबराबादी (1735-1830) ने अपनी मशहूर नज़्म “देख बहारें होली की” में कुछ ऐसे बयां किया है कि इतने बरस गुज़रने के बावजूद ये शब्द कानों के रास्ते आज भी रूह तक उतर जाते हैं. पेश हैं इसी नज़्म के कुछ अंश, रूपा झा की आवाज़ में. वीडियो प्रोडक्शन का ज़िम्मा संभाला देवाशीष कुमार ने.
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