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इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ विजेता डेज़ी रॉकवेल ने रेत समाधि के अनुवाद की कहानी बताई
जे सुशील
बीबीसी के लिए
''अनुवाद के मामले में मेरी स्थिति किसी जगलर जैसी है. जगलर को क्या कहते हैं आप हिंदी में...''
ये कहते हुए डेज़ी हंस पड़ती हैं और फिर बताती हैं कि इस समय वो कई किताबों के अनुवाद में उलझी हुई हैं जिसमें पब्लिशर की समस्या, कॉपीराइट की समस्या और तमाम बाकी चुनौतियां शामिल हैं और इन्हीं चुनौतियों के बीच उन्होंने उषा प्रियवंदा के उपन्यास 'रुकोगी नहीं राधिका' का अस्सी प्रतिशत अनुवाद पूरा कर लिया है.
और गीतांजलि श्री का कोई और उपन्यास? इस सवाल पर वो ज़ोर से हंसते हुए बताती हैं कि गीतांजलि श्री ने अपना नया उपन्यास पूरा किया है मगर उसे किसी को पढ़ने नहीं दिया है.
हिंदी में गीताजंलि श्री के साथ इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ से सम्मानित डेज़ी रॉकवेल बताती हैं कि पुरस्कार के बाद सबसे बड़ी चीज़ यही बदली है कि उनका मेलबॉक्स भर गया है. वो कहती हैं- ''लंदन में इतने लोगों ने बुलाया था कि अगर मैं सारे कार्यक्रमों में जाती तो अमेरिका आ ही नहीं पाती और यहां मेरी बिल्लियां परेशान हो जातीं.''
बिल्लियां... एक नहीं, दो नहीं, तीन बिल्लियां. डेज़ी ने अपने बुकर पुरस्कार से जुड़े भाषण में भी बिल्लियों का ज़िक्र किया है. वो कहती हैं- ''बिल्लियां आपको तंग नहीं करतीं. लेखक, अनुवादक अपना काम करते हुए अकेले होते हैं और ऐसे में बिल्ली उनकी सबसे अच्छी साथी होती हैं. वो कभी कीबोर्ड पर लेट जाती हैं तो कभी कुछ और करने लगती हैं.''
अनुवाद का लंबा सफर
बिल्लियां डेज़ी रॉकवेल के संसार का एक अटूट हिस्सा हैं. बिल्लियों के बीच रहने वाली डेज़ी का अनुवाद का सफर बहुत लंबा रहा है. शिकागो यूनिवर्सिटी से दक्षिण एशिया मामलों में पीएचडी करने के दौरान हिंदी सीखते हुए डेज़ी के कदम अनुवाद की तरफ एक सेमिनार के दौरान मुड़े. ये सेमिनार था, एके रामानुजम का, जिसमें वो अनुवाद की बारीकियां समझा रहे थे.
सेमिनार के बाद डेज़ी ने तय किया कि वो भी हिंदी से अनुवाद करेंगी और इसके लिए उन्होंने लेखक चुना उपेन्द्रनाथ अश्क और उनकी रचनाओं को. वो अश्क के सात किश्तों में लिखे उपन्यास का अनुवाद करना चाहती थीं लेकिन दो किश्तों के अनुवाद के बाद उन्होंने दक्षिण एशिया की लेखिकाओं के लेखन का रूख किया.
इस महत्वपूर्ण मोड़ के बाद उन्होंने उर्दू भाषा से खदीज़ा मस्तूर की किताब का अंग्रेजी मे अनुवाद किया और उसके बाद उषा प्रियंवदा की 'पचपन खंभे लाल दीवारें' का भी. इस बीच भीष्म साहनी के कालजयी उपन्यास 'तमस' का भी अनुवाद उन्होंने किया जिसका अनुवाद पहले भी हो चुका था.
रेत समाधि के अनुवाद के बारे में वो बताती हैं, "इसमें बांग्ला से अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले अरुणाभ सिन्हा का हाथ है. लंदन के पब्लिशर टिल्टेड एक्सिस की संपादक डेबोरा स्मिथ ने गीतांजलि श्री का माई या खाली जगहें अंग्रेजी में पढ़ा था और गीतांजलि श्री के किसी और उपन्यास का अनुवाद करवाना चाहती थीं. उन्होंने अरुणाभ से कहा और अरुणाभ ने उन्हें मुझसे मिलवाया यानी मैचमेकिंग की."
'रेत समाधि' का अनुवाद आसान नहीं था
डेज़ी रॉकवेल पहले भी कह चुकी हैं कि रेत समाधि का अनुवाद आसान नहीं था और वो चाहती थीं कि इसके लिए वो भारत जाकर गीतांजलि श्री के साथ समय बिताएं लेकिन कोविड के कारण ऐसा न हो पाया. इसकी भरपाई सैकड़ों ईमेल्स ने की है जिसके ज़रिए डेज़ी और गीतांजलि श्री ने किताब के अनुवाद पर काम किया है.
लेकिन डेज़ी रॉकवेल सिर्फ अनुवादक ही नहीं हैं. वो लंबे समय तक बर्कले यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ा चुकी हैं और पंद्रह साल की लंबी नौकरी के बाद उन्होंने तय किया कि अब वो पूरा समय अनुवाद को ही देंगी और साथ में अपनी पेंटिंग्स को भी. हां डेज़ी रॉकवेल एक बेहतरीन पेंटर भी हैं और ये कला उन्हें विरासत में मिली है.
डेज़ी रॉकवेल के दादा जी नॉर्मन रॉकवेल अमेरिका के शीर्ष दस कलाकारों में गिने जाते हैं और उनके बनाई पेंटिंग अमेरिका की प्रतिनिधि पेंटिंगों में शुमार होती है. उनके पिता और मां भी कला से जुड़े रहे हैं.
संभवत डेज़ी इन सबसे दूर भागते हुए अकादमिक दुनिया में गईं लेकिन जैसा कि फिल्मी डायलॉग की शक्ल में कहें तो लहू लहू को पुकारता है.....डेज़ी ने लंबे समय तक कला को छोड़ा मगर कला ने उन्हें नहीं छोड़ा.
उन्होंने जब दोबारा पेंटिंग शुरू की तो उन पेंटिंग्स में बिल्लियां भी आईं और आसपास का जीवन भी. साथ ही रेत समाधि किताब का कवर भी. डेज़ी ने इस किताब के दो कवर बनाए हैं जिनके लिए उनकी मॉडल रहीं कृष्णा सोबती. एक कवर हिंदी के नए संस्करण पर है जबकि दूसरा अंग्रेजी संस्करण का कवर पेज है.
इन दिनों अमेरिकी शहर वरमांट में डेज़ी के बनाए सत्तर चित्रों की प्रदर्शनी भी चल रही है जिसका नाम है ध्वनि/रेसोनैंस. इन तस्वीरों में उर्दू की कैलिग्राफी है, एब्स्ट्रैक्ट डिज़ाइन्स हैं साथ ही कई फिगरेटिव चित्र भी.
बुकर पुरस्कार के बाद क्या हिंदी के साहित्य जगत में कोई आमूलचूल बदलाव होगा. इसके जवाब में डेज़ी कहती हैं- ''हिंदी तो नहीं लेकिन भारतीय साहित्य में कुछ होना चाहिए क्योंकि अब दुनिया को पता है कि उस इलाके में कुछ नया हो रहा है. वहां कुछ बढ़िया लिखा जा रहा है. वहां यानी दक्षिण एशिया से कुछ नया मिल सकता है तो संभव है कि भारतीय भाषाओं से अनुवाद अधिक हों.''
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