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हिमाचल के ख़ूबसूरत पहाड़ों के ख़ौफ़नाक बनने की कहानी
किन्नौर... तिब्बत के साथ भारत की सीमा पर हिमाचल प्रदेश के उत्तर पूर्वी भाग में एक ऐसी जगह जिसे "परिकथाओं की भूमि" भी कहा जाता है.
बर्फ से ढके पहाड़, गहरी घाटियां, गरजती सतलुज नदी और सेब के बाग़ किन्नौर की पहचान हैं.
लेकिन हर साल मॉनसून आते ही लैंड-स्लाइड्स या भूस्खलन की घटनाएं इस जगह को बेहद खतरनाक बना देती हैं.
इसी साल, दो बड़े लैंड-स्लाइड्स में 37 लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए. कुछ दिनों बाद कई और लैंड-स्लाइड्स भी हुए.
इन हादसों ने इस इलाके को झकझोड़ कर रख दिया है.
हिमाचल प्रदेश को उत्तर भारत का हाइड्रो-इलेक्ट्रिसिटी पावरहाउस माना गया है. उत्तर भारत में बनने वाली कुल पनबिजली का करीब 50 प्रतिशत इस छोटे से पहाड़ी राज्य में ही बनता है. दिलचस्प बात यह है कि हिमाचल प्रदेश में बनने वाली करीब 10000 मेगावाट हाइड्रो-पावर का 30 प्रतिशत किन्नौर में बनता है.
किन्नौर के लोग "बम्पर टू बम्पर" या बहुत कम दूरी पर एक के बाद एक पनबिजली संयंत्र बनाए जाने को इस इलाके में आ रही प्राकृतिक आपदाओं की एक बड़ी वजह मानते हैं. पिछले कुछ सालों से यहां के स्थानीय लोग इस क्षेत्र में हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट्स और तेज़ी से की जा रहीं सड़क विस्तार परियोजनाओं के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं लेकिन हालिया हादसों ने इन आवाज़ों को मानो एक आंदोलन की शक्ल दे दी है.
पर्यावरणविदों ने भी इस इलाके की नाज़ुक टोपोग्राफी पर हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट्स और अन्य निर्माण गतिविधियों के असर के बारे में चिंता जतानी शुरू कर दी है.
इस बात में कोई शक नहीं की भारत को स्वच्छ ऊर्जा की ज़रुरत है और हाइड्रो-पावर उस स्वच्छ ऊर्जा का एक अच्छा ज़रिया है. तो फिर क्यों इन प्रोजेक्ट्स का विरोध हो रहा है? यही जानने के लिए बीबीसी संवाददाता राघवेंद्र राव और विडियो जर्नलिस्ट शुभम कौल किन्नौर के सुदूर इलाकों में गए.
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