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पाकिस्तान का वो पोर्ट जिस पर भारत की थी नज़र
टाइम मैनज़ीन ने सितंबर 1958 के अपने अंक में लिखा था कि ग्वादर में पाकिस्तान एक बड़ा हवाई अड्डा और नौसेना का बेस बनाना चाहता है. इतिहास में केवल दो ताक़तें हुई हैं जिन्होंने ग्वादर के महत्व को पहचाना है- पहला ब्रिटेन और फिर उसके बाद पाकिस्तान.
ब्रिटेन की दिलचस्पी वाली बात तो अब पुरानी हो गई है, क्योंकि उसका संबंध 19वीं सदी के पहले हिस्से से है, जब अफ़ग़ानिस्तान ने 1839 में इस क्षेत्र पर हमला किया था. उस समय, ब्रिटिश सरकार को यह ज़रूरत महसूस हुई कि तुर्बत और ईरान के बीच के पूरे क्षेत्र के बारे में जानकारी प्राप्त करे. और ग्वादर के ऐतिहासिक, राजनीतिक और रक्षा महत्व के बारे में भी जानकारी जुटाए.
भारत के विभाजन के तुरंत बाद ही पाकिस्तान का ध्यान ग्वादर की ओर आकर्षित हो गया था. अपनी स्थापना के लगभग दो साल बाद ही इसने इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेने के गंभीर प्रयास करने शुरू कर दिए.
अरब सागर के तट पर स्थित इस क्षेत्र में पाकिस्तान की दिलचस्पी के दो कारण थे, पहला, अर्थव्यवस्था और दूसरा, एक मजबूत रक्षा कवच. इन दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के रास्ते में ग्वादर एक बड़ी दीवार की तरह रुकावट बन कर खड़ा था.
स्टोरी: फ़ारुक़ आदिल, लेखक और स्तंभकार
आवाज़: नवीन नेगी
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