क्या भारत तिब्बत को लेकर नीति बदल रहा है?

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भारत-चीन के बीच लद्दाख से लगी सीमा पर 29-30 अगस्त से ही स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है. सोमवार को 45 साल बाद वहां गोली चली. दोनों देश दावे कर रहे हैं कि पहले गोली उनकी सेना की ओर से नहीं चलाई गई.

इन सबके बीच भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के एक कदम ने भारत की तिब्बत नीति की ओर ध्यान खींचा है.

30 अगस्त को लद्दाख के पैंगोंग झील के दक्षिणी तट से लगे इलाके में भारत के 'स्पेशल फ्रंटियर फोर्स' (एसएफ़एफ़) के कंपनी लीडर नीमा तेंज़िन की मौत हो गई थी.

सोमवार को उनके अंतिम संस्कार में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव भी शामिल हुए. राम माधव आरएसएस से भाजपा में आए हैं और जम्मू-कश्मीर में उनकी रूचि किसी से छिपी नहीं है.

लेकिन तिब्बत और विकास एसएफएफ जिसे विकास रेजिमेंट भी कहा जाता है, एक बेहद पेचीदा मसला है.

भारत तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है और विकास रेजिमेंट के बारे में कभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आता है.

ऐसे में भारत की सत्तारूढ़ पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की एक तिब्बती सैनिक के अंतिम संस्कार में मौजूदगी के निहितार्थ ढूंढे जा रहे हैं.

क्या राम माधव का नीमा तेंज़िन के अंतिम संस्कार में पहुंचना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ था या किसी बड़े नीति परिवर्तन की ओर एक छोटा संदेश?

स्टोरी: सरोज सिंह

आवाज़: सर्वप्रिया सांगवान

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