चीन से जुड़े विवादित मुद्दों पर क्यों रहती है भारत की चुप्पी?

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दो देशों के बीच टकराव में एक-दूसरे के विवादित मामलों का रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल होना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा रहा है. भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर, गिलगित-बलतिस्तान और बलूचिस्तान को लेकर अक्सर ऐसा देखने को मिलता है. दोनों देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मुद्दे उठाते हैं और उस पर अन्य देशों का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं. ऐसा अमरीका और चीन के बीच भी देखा गया है. लेकिन, भारत और चीन के बीच ऐसे मुद्दों के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश बहुत कम होती है.

हॉन्ग-कॉन्ग में विरोध प्रदर्शन हो, ताइवान के साथ विवाद हो या तिब्बत की निर्वासित सरकार हो, ये मामले लंबे समय से चीन के लिए फांस बने हुए हैं. इसके अलावा मानवाधिकार उल्लंघन से लेकर कोरोना वायरस की उत्पत्ति के लिए भी चीन पर सवाल उठाए जाते रहे हैं. भारत-चीन के बीच इस समय सीमा विवाद गरमाया हुआ है. दोनों देश टकराव की स्थिति में हैं. 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो चुकी है. लेकिन, फिर भी भारत चीन से जुड़े ऐसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुल कर नहीं बोल रहा है. वह इनका रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल नहीं करता. हाल ही में चीन ने हॉन्ग-कॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू करने जा रहा है जिसका अमरीका ने भी विरोध किया लेकिन, भारत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. 1962 का युद्ध हो, चीन-पाकिस्तान की नज़दीकी या डोकलाम जैसा गतिरोध, भारत ने समाधान के लिए बातचीत से लेकर व्यापार प्रतिबंध तक के रास्ते अपनाए हैं लेकिन चीन से जुड़े विवादित मुद्दों को नहीं छेड़ा. चीन को लेकर भारत की इस नीति की वजह क्या है और क्या इसमें बदलाव संभव है?

स्टोरी: कमलेशआवाज़: शुभम किशोर

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