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1962 में क्या नेहरू की वजह से चीन से हारा था भारत?
जवाहरलाल नेहरू ने भी ख़ुद संसद में खेदपूर्वक कहा था, "हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे और हम एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था."
इस तरह उन्होंने इस बात को लगभग स्वीकार कर लिया था कि उन्होंने ये भरोसा करने में बड़ी ग़लती की कि चीन सीमा पर झड़पों, गश्ती दल के स्तर पर मुठभेड़ और तू-तू मैं-मैं से ज़्यादा कुछ नहीं करेगा.
हालाँकि चीन के साथ लगातार चल रहा संघर्ष नवंबर 1959 के शुरू में हिंसक हो गया था, जब लद्दाख के कोंगकाला में पहली बार चीन ने ख़ून बहाया था. इसके बाद ग़लतियाँ होती गईं.
इसके लिए हमारे प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. लेकिन उनके सलाहकार, अधिकारी और सेना भी बराबर के दोषी हैं, क्योंकि इनमें से किसी ने भी नेहरू से ये कहने की हिम्मत नहीं दिखाई कि वे ग़लत थे. उनका बहाना वही पुराना था यानी नेहरू सबसे बेहतर जानते थे. चीन के एकतरफ़ा युद्धविराम के बाद सेना प्रमुख बने जनरल जेएन 'मुच्छू' चौधरी का विचार था- हमने ये सोचा था कि हम चीनी शतरंज खेल रहे हैं, लेकिन वो रूसी रोले निकला. गलवान घाटी के बीच 1962 के युद्ध पर नज़र डाल रहे हैं रेहान फ़ज़ल.
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