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कश्मीर में जनमत संग्रह के पेंच
1947 में जम्मू कश्मीर के महाराज ने जब भारत के साथ रहने का फ़ैसला किया तो गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत और पाकिस्तान- दोनों के राज्य पर दावे को देखते हुए जनमत संग्रह या चुनाव के ज़रिए इसे तय करने का सुझाव दिया.
1949 में भारत और पाकिस्तान की फ़ौजों के बीच संघर्ष के बाद राज्य का दो तिहाई हिस्सा भारत के पास रहा. इसमें जम्मू, लद्दाख और कश्मीर घाटी शामिल थे. एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के पास रहा.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और भारत तथा पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र आयोग ने तीन प्रस्तावों में कहा कि जैसा भारत और पाकिस्तान के नेता तय कर चुके हैं, पूरा राज्य किसके पास रहेगा इसका फ़ैसला जनमत संग्रह से होगा. इसके लिए एक शर्त तय की गई थी कि कश्मीर में लड़ने के लिए जो पाकिस्तानी नागरिक या क़बायली लोग आए थे वे वापस जाएँ.
1950 के दशक में भारत ने ये कहते हुए इससे दूरी बना ली कि पाकिस्तानी सेना पूरी तरह राज्य से नहीं हटी और साथ ही राज्य के भारतीय राज्य का दर्जा तो वहाँ हुए चुनाव के साथ ही तय हो गया.
1980 के दशक में कश्मीर घाटी में उग्रवाद पढ़ने के साथ ही चरमपंथियों और कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि वे कभी भी आत्मनिर्णय के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके. इस तरह जनमत संग्रह की माँग फिर उठी.
आगे चलकर भारत या पाकिस्तान के साथ जाने के अलावा एक तीसरे विकल्प- राज्य की पूरी आज़ादी की माँग भी उठने लगी. पाकिस्तान लगातार जनमत संग्रह की माँग करता रहा है और भारत से वादे से पीछे हटने का आरोप लगाता है.मगर भले ही वो कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करता हो उसने पूर्ण स्वतंत्रता के तीसरे विकल्प को स्वीकार नहीं किया है.
वैसे जनमत संग्रह को लेकर राज्य के तीनों हिस्सों के सुर भी अलग रहे हैं. जम्मू कश्मीर में घाटी में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और उनकी माँग को राज्य के दूसरे हिस्सों में उतना समर्थन नहीं मिलता.
लद्दाख की बौद्ध जनसंख्या ने कभी भी इस आंदोलन का समर्थन नहीं किया है और न ही जम्मू के हिंदुओं ने. अब चूँकि राज्य में एक राय नहीं है इसलिए एक सुझाव ये भी दिया गया कि क्षेत्रीय आधार पर जनमत संग्रह किया जाए. जो लोग पूरे राज्य की आज़ादी का समर्थन करते हैं वे इस माँग को ख़ारिज करते हैं क्योंकि इस तरह राज्य का औपचारिक विभाजन हो जाएगा जबकि वे पूरे राज्य को एक स्वतंत्र क्षेत्र बनाना चाहते हैं.
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