मोदी इस चुनाव में कितना खर्च करेंगे

वीडियो कैप्शन, धंधा पानी

चुनाव क्या आता है, तकरीबन एक साल पहले से ही सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियां अपनी तैयारियों में जुट जाती हैं. सरकारें मतदाताओं को लुभाने के लिए लोकलुभावन घोषणाएं करती हैं और विपक्षी दल भी लंबे-चौड़े वादे करने लग जाते हैं.

एक अध्ययन बताता है कि पिछले 30 सालों में जब भी आम चुनाव होते हैं, उस साल आर्थिक गतिविधियों में धीमापन आ जाता है. आज धंधा पानी में बात चुनावी साल में अर्थव्यवस्था के हाल की.

सेंटर फार मीडिया स्टडीज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार जहां भारत में 1999 की चुनावी प्रक्रिया पर 880करोड़ रुपए का खर्चा आया था, वहीं 2004 में ये खर्च बढ़कर 1200 करोड़ रुपए हो गया.स्टडीज के आकलन के मुताबिक भारत में 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान पर करीब 5अरब डॉलर यानी 33 हज़ार करोड़ रुपये खर्च किए गए.

जो अमरीका में 2012 के राष्ट्रपति चुनाव की कैंपेनिंग से ज़्यादा थे, जिसमें 4 अरब डॉलर यानी 27 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए थे.

इसमें कोई शक नहीं कि चुनावी साल में सरकारी खर्च बहुत अधिक बढ़ जाता है, इसका नतीजा ये होता है कि महंगाई बढ़ जाती है और इसका निगेटिव असर ग्रोथ पर दिखाई देता है. अधिकतर देशी विदेशी निवेशक भी अपना हाथ रोके हुए रखते हैं और इकोनॉमिक मूव्स से अधिक पॉलिटिकिल मूव्स पर नज़र रखते हैं.