महिलाओं पर तालिबान के नए फरमान के ख़िलाफ़ विरोध में उठती आवाज़ें
महिलाओं को लेकर तालिबान के नए फरमान की कड़ी आलोचना हो रही है. मानवाधिकारों और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले कई संगठनों ने अफ़ग़ान तालिबान की ओर से महिलाओं की यात्रा पर लगाई गई पाबंदी को ग़लत बताया है और इसे महिलाओं की आज़ादी पर हमला बताया है.
कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे लेकर तालिबान से बात कर रहे देशों पर भी सवाल खड़े किए हैं. पाकिस्तान ने भी तालिबान के आदेश पर सवाल उठाए हैं और इसे अपने देश के लिए ख़तरा बताया है.
अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली वाज़्मा फ्रोग कहती हैं, "मैंने ऐसा कोई अंतरराष्ट्रीय या विदेशी राजनयिक नहीं देखा जो तालिबान से उनकी शर्तों को लेकर बात करता हो. आप जानते हैं कि काबुल आने वाले तमाम विदेश प्रतिनिधिमंडल हमारी महिलाओं से मिलते तक नहीं हैं, क्योंकि वो तालिबान से डरते हैं. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसिया भी अपने कम उम्र के कर्मचारियों से ऐसा बर्ताव करने को कहती हैं जिससे तालिबान नाराज़ न हों. हमने अब तक ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिकी प्रशासन को जितना देखा है वो तालिबान के दावों और उनकी मांग को लेकर उदार नज़र आते हैं."
अफ़ग़ान तालिबान के नए आदेश को लेकर लेकर वाज़्मा कहती हैं कि इससे उन्हें कोई हैरत नहीं हुई है. हालांकि, ह्यूमन राइट्स वॉच समेत कई मानवाधिकार संगठनों और पाकिस्तान समेत कई देशों ने तालिबान के नए आदेश की आलोचना की है.
अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं लंबी दूरी यानी 72 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी की यात्राएं तभी कर पाएंगी जब उनके साथ कोई करीबी पुरुष रिश्तेदार हो. ऐसा नहीं होने पर उन्हें ट्रांसपोर्ट की सुविधा यानी यात्रियों को ले जाने वाले वाहन में जगह नहीं मिलेगी.
तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्ज़ा किया. उसके बाद से अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं पर कई पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं. मानवाधिकार के लिए काम करने वाले संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि नई पाबंदियों के जरिए तालिबान ने महिलाओं की क़ैद करने की दिशा में कुछ और कदम बढ़ा दिए हैं.
ह्यूमन राइट्स वॉच की महिला अधिकार मामलों की एसोसिएट डायरेक्टर हैदर बार ने कहा है कि ये आदेश महिलाओं के आज़ादी के साथ घूमने फिरने पर रोक लगाता है. अगर घर पर उन पर कोई जुल्म या हिंसा होती है तो वो भाग नहीं पाएंगी.
काबुल की एक नर्स फातिमा ने तालिबान ने उनके देश की महिलाओं की ख़ुशियां और आज़ादी दोनों छीन ली हैं. ब्रिटेन में रहने वाली एक अफ़ग़ान छात्रा मारवा कोफी कहती हैं. "अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियों के ज़्यादातर सेकेंड्री स्कूल बंद हैं. टीचर्स समेत अधिकतर महिलाओं काम करने पर रोक लगा दी गई है. मज़ार-ए- शरीफ समेत कुछ जगह छात्राएं स्कूल जा रही हैं लेकिन हालात वहां भी आसान नहीं."
एक छात्रा ने बताया, "अपने नए आदेश में तालिबान ने वाहन चालकों को आदेश दिया है कि वो किसी ऐसी महिला को अपनी गाड़ी में न बिठाएं जिन्होंने हिजाब न पहना हो. अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादातर महिलाएं स्कार्फ से अपना सिर ढके रहती हैं."
तालिबान ने लोगों से ये भी कहा है कि वो अपनी गाड़ियों में संगीत न बजाएं. इसके पहले टीवी चैनलों को निर्देश दिया गया था कि वो ऐसे ड्रामा और सीरियल ना दिखाएं जिनमें महिला कलाकारों ने भूमिका निभाई हों. तालिबान महिलाओं पर लगाई गई ऐसी पाबंदियों को अस्थाई बताते रहे हैं.
उनका कहना है जब काम करने की तमाम जगह और शिक्षण संस्थान महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाएंगे तब पाबंदियां हटा ली जाएंगी.
लेकिन यूएन वूमेन की राय कुछ और है. संगठन की डिप्टी एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर अनीता भाटिया कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है. संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों ने अफ़ग़ानिस्तान की बड़ी आबादी के भुखमरी के ख़तरे से घिरे होने की चेतावनी दी है. लेकिन वहां की महिलाओं के लिए अपने हक की लड़ाई भी अहम है."
पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने तालिबान के नए फ़रमान की करते हुए इसे पाकिस्तान के लिए ख़तरा बताया है. चौधरी ने कहा है कि उनके देश की सबसे बड़ी और सबसे अहम जंग अतिवादी विचारों के ख़िलाफ़ है, साथ ही उन्होंने ये भी कहा है कि पाकिस्तान अफ़ग़ान लोगों की मदद करना चाहता है.
लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान की महिला कार्यकर्ता महबूबा सिराज कहती हैं कि महिला कार्यकर्ताओं को अपनी आवाज़ खुद बुलंद करनी होगी.
महबूबा कह रही थीं कि अगर हम अपनी आवाज़ नहीं उठाते हैं या सही वक़्त पर सही सवाल नहीं पूछते हैं और अगर तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान के लोगों, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और पड़ोसियों समेत इस मामले से जुड़े तमाम लोगों का ध्यान अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं की तरफ नहीं खींचते हैं तो स्थिति और बदतर हो सकती हैं.
और अफ़ग़ानिस्तान की महिलाएं लगातार ऐसी कोशिश करती नज़र आती हैं.
























