यरुशलम में यहूदी राष्ट्रवादियों के मंगलवार को निकलने जा
रहे मार्च से पहले 2,000 अतिरिक्त पुलिस बलों को पूर्वी यरुशलम में तैनात किया गया
है.
इसराइल की नई सरकार ने सोमवार को मार्च के नए रूट को अनुमति
दे दी थी. यह मार्च अब शहर के मुस्लिम क्वार्टर से नहीं गुज़रेगा लेकिन अरब
मार्केट से गुज़रेगा.
सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री ओमेर बार-लेव का कहना है कि जुलूस
निकालना एक लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन फ़लस्तीनी प्रधानमंत्री मोहम्मद शतायैह ने
कहा है कि मार्च के ‘खतरनाक नतीजे’ होंगे.
हमास और अन्य फ़लस्तीनी समूह इसे पहले ही ‘क्रोध का दिन’घोषित कर चुके हैं. इस मार्च को इसराइल के नए प्रधानमंत्री नेफ़्टाली
बैनेट के नए गठबंधन के लिए शुरुआती परीक्षा बताया जा रहा है.
ये मार्च गुरुवार नौ जून को होना था लेकिन सुरक्षा कारणों से पुलिस ने इसकी
अनुमति नहीं दी थी.
ग़ज़ा का नियंत्रण करने वाले फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट हमास ने धमकी दी थी कि अगर
मार्च निकलता है तो आगे टकराव होगा.
वैसे तो इस
मार्च का आयोजन महीने भर पहले ही होना था लेकिन संघर्ष के कारण इसे टाल दिया गया
था.
बीते महीने
इसराइल और ग़ज़ा के बीच 11 दिनों तक चले संघर्ष में कम से कम 242 फ़लस्तीनियों की
और इसराइल में 13 लोगों की मौत
हुई थी.
यरुशलम मार्च को लेकर विवाद क्यों?
इस साल का
यरुशलम दिवस पर मार्च रमज़ान महीने के आख़िरी दिनों में यानी 10 मई को निकाला जाना था जो कि ग़ज़ा
संघर्ष के कारण नहीं निकाला जा सका.
सालों से इसराइल और फ़लस्तीनियों की आलोचना करने वाले मानते
रहे हैं कि मार्च का ये रूट भड़काने वाला है. मार्च से पहले स्थानीय अरब लोगों को
अपनी दुकानें बंद करनी पड़ती हैं ताकि मार्च के दौरान किसी तरह के विवाद को रोका
जा सके.
यहूदी इस रूट में किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते. लेकिन
फ़लस्तीनी इसका विरोध में करते हैं.
यरुशलम दिवस के
दिन हर साल इसराइलियों और फ़लस्तीनियों में विवाद होता है और अमूमन हर साल थोड़ी
बहुत हिंसा भी होती है.
क्यों अहम है यरुशलम दिवस?
5 जून 1967 को अरब-इसराइल के बीच छह दिनों का युद्ध हुआ
था जिसके बाद उसने पूर्वी यरुशलम पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
इस युद्ध के लिए इसराइल ने पहले से काफी तैयारी की थी. वो
परमाणु हथियार हासिल करने के क़रीब पहुंच गया था और उसने फ़्रांस से विमान और
ब्रिटेन से टैंक हासिल किए थे.
युद्ध के पांच दिनों में इसराइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की सेनाओं को उखाड़
फेंका. उसने मिस्र से गज़ा पट्टी और सिनाई, सीरिया से गोलन पहाड़ियों और जॉर्डन से वेस्ट बैंक और
पूर्वी यरूशलम के इलाक़े छीन लिए.
इस युद्ध के बाद दो हज़ार साल में पहली बार यहूदियों के
पवित्र स्थान यरूशलम पर यहूदियों का कब्ज़ा हुआ था. इसके बाद इसराइल ने पूरे शहर
को अपनी राजधानी माना और यहां से फ़लस्तीनियों को बड़े पैमाने पर यहां से बेदखल
होना पड़ा.
इसी दिन की याद में यहूदी हर साल यरुशलम दिवस के तौर पर
मनाते हैं.हिब्रू कैलेंडर के अनुसार ये दिन अय्यार कैलेंडर के 28वें दिन पर पड़ता है. यहूदी मानते हैं
कि इस दिन पश्चिमी यरुशलम और पूर्वी यरुशलम एक हो गए थे.
इस दिन हज़ारों की संख्या में इसराइली युवा झंडा मार्च
(फ्लैग मार्च) निकालते हैं. वो हाथों में झंडे लिए राष्ट्रवादी गीत गाते हुए
दमिश्क गेट से दाख़िल होते हैं और यरुशलम की पुरानी गलियों से होते हुए वेस्टर्न
वॉल तक पहुंचते हैं.
इस सालाना मार्च
में हज़ारों यहूदी यरुशलम के मुसलमान बहुल इलाक़ों से होते हुए वेस्टर्न वॉल की
तरफ जाते हैं. वेस्टर्न वॉल यहूदियों की सबसे पवित्र मानी जाने वाले माउंट मंदिर
की दीवार है.
यहूदी मानते हैं
कि यह मंदिर उस पवित्र पत्थर (डोम ऑफ़ रॉक) की जगह है जहां से दुनिया की शुरुआत
हुई थी.
अंग्रेज़ी
कैलेंडर के अनुसार ये तारीख़ हर साल बदलती है. इस साल यरुशलम दिवस 10 मई को मनाया जाना था.
पूर्वी यरुशलम पर कब्ज़ा करने के बाद साल 1980 में इसराइल ने
यरुशलम क़ानून पारित कर दोनों जगहों के एक होने को क़ानूनी तौर पर वैध बनाया.
हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसका समर्थन नहीं करता.
फ़लस्तीनी पूर्वी यरुशलम को भविष्य के एक आज़ाद मुल्क की राजधानी के तौर पर देखते
हैं.