म्यांमार में सैन्य तख्तापलट का विरोध कर रहे आम नागरिकों का दमन जारी है. विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने की कोशिश और नागरिकों की मौतों के लिहाज़ से यह सबसे बुरा हफ़्ता रहा है.
हालांकि, इसके बावजूद नागरिक पीछे हटने के लिए राज़ी नहीं हैं.
म्यांमार के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से देश में लोकतंत्र को बहाल कराने की अपील की है.
शुक्रवार को न्यूयॉर्क में बंद दरवाज़े के भीतर हुई एक बैठक में सदस्य देशों को बताया गया कि किस तरह से विरोध-प्रदर्शन कर रहे नागरिकों का भरोसा संयुक्त राष्ट्र से उठने लगा है.
एक महीने पहले सुरक्षा परिषद ने म्यांमार के सैन्य शासन से कहा था कि देश में तत्काल लोकतंत्र बहाल किया जाये और आंग सान सू ची समेत सभी गिरफ़्तार लोगों को रिहा किया जाए.
इसके बाद 5 मार्च को यूएन सुरक्षा परिषद की इसी मसले पर एक बार फिर से बैठक हुई.
बंद दरवाज़े के भीतर हुई इस बैठक में म्यांमार के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत क्रिस्टीन श्रेनर बर्गनर ने 15 सदस्यीय परिषद में कहा, “एक सामूहिक फ़ैसला लेने की तत्काल ज़रूरत है. हम म्यांमार की सेना को आख़िर कितनी छूट दे सकते हैं?”
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र में यूके की स्थायी प्रतिनिधि बारबरा वुडवर्ड ने कहा कि “म्यांमार में बिगड़ते हालात को देखते हुए हमने इस मीटिंग का अनुरोध किया था. सैन्य तख्तापलट होने के दिन से अब तक 50 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और कई अन्य घायल हैं. एक हजार से ज़्यादा लोग ग़ायब हैं या उनका पता नहीं है. अर्थव्यवस्था गिर रही है और करीब 10 लाख लोग एक मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं.”
"हालांकि, कूटनीति में वक़्त लगता है और यह अहम है कि सुरक्षा परिषद के सदस्य और म्यांमार के पड़ोसी मुल्क़ और व्यापर में उनके सहयोगी चीन, रूस, भारत और वियतनाम इस बैठक के लिए सहमत हुए थे."
"लेकिन जब तक एक संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं होता, तब तक हम नहीं कह सकते कि ये देश किस हद तक जाने के लिए तैयार होंगे."
बारबरा वुडवर्ड ने कहा, “अगर हालात और बिगड़ते हैं तो हम और प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहे हैं और यूएन चार्टर के तहत अन्य उपायों के लिए तैयार हैं.”
इसका मतलब है कि सैन्य शासन को काबू करने के लिए संपत्तियों को फ्रीज़ करने, ट्रैवल बैन और यहाँ तक कि हथियारों की आपूर्ति पर भी प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं.
लेकिन, मीटिंग में म्यांमार के लिए यूएन की विशेष दूत क्रिस्टीन श्रेनर बर्गनर ने चेतावनी दी कि अगर कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो इसके दुष्परिणाम हो सकते हैं.
उन्होंने कहा, “सरकारी कर्मचारियों समेत म्यांमार की जनता ही असली हीरो है और ये ही देश की लोकतांत्रिक प्रगति को बचा रहे हैं. लेकिन, उन्होंने चेतावनी दी कि इन लोगों का यूएन में मौजूद भरोसा घट रहा है.”
हालांकि, इस बात की उम्मीद कम ही है कि चीन और रूस प्रतिबंधों को लागू होने देंगे.
दूसरे आसियान देश, जिनमें वियतनाम और म्यांमार दोनों ही सदस्य हैं, वो भी अपने तरीके से उपायों पर विचार कर रहे हैं.
इस सब के बावजूद इस बात में कोई शक़ नहीं है कि म्यांमार की सेना द्वारा अपनाये जा रहे हिंसक तौर-तरीकों के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में एक माहौल तैयार हो रहा है.