उन्होंने कहा, "मैंने एक बहुत लंबी लड़ाई लड़ी और उसमें जीत हासिल करके मैं
एक बार फिर खेलों में लौट आई हूँ.""मैं जब बच्ची थी, उस टाइम रनिंग क्या होती थी, मुझे मालूम नहीं था. मेरे परिवार में छह बहनें और एक भाई है. माँ और पिता को मिलाकर घर में कुल 9 सदस्य हैं. मैं एक बहुत ही ग़रीब परिवार से आती हैं. मेरे पिता बुनकर का काम करते थे. वो महीने में सिर्फ दो सौ रुपये कमाते थे. और ये दो सौ रुपये कमाने के लिए घर के सारे सदस्य काम करते थे क्योंकि एक कपड़ा बनाने में बहुत सारे लोगों के सहयोग की ज़रूरत होती है.""ऐसे परिवार में अच्छी पढ़ाई करने के लिए पैसा भी नहीं था. मेरी बड़ी बहन पहले स्पोर्ट्स पर्सन बनी थीं पहले. उन्होंने ही मुझे रनिंग करने के लिए कहा. लेकिन मुझे रनिंग के बारे में कुछ भी नहीं पता था. दीदी को स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी मिली थी. दीदी ने कहा कि तू भागेगी तो हमारे घर की हालत बदल जाएगी. क्योंकि हमारे घर में कोई नौकरी या लड़का नहीं है तो हमारे घर के हालात कैसे बदलेंगे. हम दोनों चाहेंगे तो घर की हालत बदल सकेंगे. इसके बाद दीदी के कहने पर मैंने रनिंग करना शुरू किया. रनिंग के दौरान मुझे कई दिक्कतें आईं. एक तो रनिंग के बारे में कुछ मालूम नहीं था और आसपास कोई मैदान भी नहीं था. इस हालत में मैंने गांव में रनिंग करना शुरू किया. गांव में जब लोगों ने मुझे रनिंग करते हुए देखा तो एक लड़की होने की वजह से मेरी आलोचना करना शुरू कर दिया कि हमारे गांव में लड़कियां ऐसे नहीं भागती हैं. लोगों ने मुझे बहुत ही बुरी - बुरी बातें कहीं.""इस पर जब मैंने माँ को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है, दीदी ने कहा है कि तुम भागोगी तो तुम भागो. इसके बाद मैंने माँ से कहा कि मैं गांव में नहीं भागूंगी, आप मुझे कोई दूसरी जगह बताओ. इस पर माँ मुझे नदी के किनारे ले गईं और कहा कि यहां नदी के किनारे भागो, यहां कोई नहीं आएगा. क्योंकि लोग सुबह सात-आठ बजे तक नदी पर आते हैं और तुम सुबह चार बजे से रनिंग करना शुरू करो. इसके बाद मैंने नदी के किनारे भागना शुरू किया."दुती चंद बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्स वुमन ऑफ़ द ईयर की नॉमिनी हैं.