म्यांमार तख्तापलट: आंग सान सू ची पर कई आरोप, 15 फ़रवरी तक हिरासत में

आंग सान सू ची

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इमेज कैप्शन, आंग सान सू ची की सितंबर 2020 की तस्वीर

म्यांमार में सोमवार को हुए तख्तापलट के बाद वहां की पुलिस ने नेता आंग सान सू ची पर कई आरोप लगाए हैं.

पुलिस के दस्तावेज़ों के अनुसार उन्हें 15 फरवरी तक के लिए कस्टडी में भेज दिया गया है. आंग सान सू ची पर आयात निर्यात के नियमों के उल्लंघन करने और ग़ैर-क़ानूनी ढंग से दूरसंचार यंत्र रखने के आरोप लगाए गए हैं.

हालांकि उन्हें कहां रखा गया है इस पर अभी अधिक जानकारी नहीं मिल पाई है. लेकिन खबरें हैं कि उन्हें राजधानी नेपीडाव में उनके घर में बंद रखा गया है.

अपदस्त राष्ट्रपति विन मिन पर भी कई आरोप लगाए गए हैं. दस्तावेज़ों के अनुसार उन पर कोविड-19 महामारी के दौरान लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाने के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है. उन्हें भी दो सप्ताह के लिए पुलिस कस्टडी में भेजा गया है.

एक फरवरी को सेना के सत्ता अपने हाथों में लेने के बाद से न तो आंग सान सू ची की तरफ से और न ही राष्ट्रपति विन मिन की तरफ से कोई बयान आया है और न ही उन्हें सार्वजनिक तौर पर कहीं देखा गया है.

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तख्तापलट की अनुवाई करने वाले सेना के जनरल मिन ऑन्ग ह्लाइंग ने देश में एक साल का आपातकाल लगा दिया है. इस दौरान देश का कामकाज देखने के लिए ग्यारह सदस्यों की एक सैन्य सरकार चुनी गई है.

सेना ने तख्तापलट को ये कहते हुए सही ठहराया है कि बीते साल हुए चुनावों में धांधली हुई थी. इन चुनावों में आंग सान सू ची का पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने एकतरफ़ा जीत हासिल की.

आंग सान सू ची पर लगाए गए आरोप

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इमेज कैप्शन, आंग सान सू ची पर लगाए गए आरोप, पुलिस के दस्तावेज़ की 3 फरवरी 2021 की तस्वीर

आंग सान सू ची पर लगे आरोप कितने गंभीर?

कोर्ट के समक्ष पुलिस ने 'फर्स्ट इनिशियल रिपोर्ट' यानी प्राथमिक रिपोर्ट के नाम से एक रिपोर्ट पेश की है जिसमें आंग सान सू ची पर लगाए गए आरोपों के बारे में लिखा गया है.

रिपोर्ट के अनुसार सू ची ने ग़ैर-क़ानूनी तरीके से वॉकी-टॉकी जैसे दूरसंचार यंत्रों का आयात करने का आरोप है. नेपीडाव में उनके घर पुलिस को ये यंत्र मिले हैं.

रिपोर्ट के अनुसार उन्हें कस्टडी में लेकर, "गवाहों से पूछताछ की जाएगी, सबूत जुटाए जाएंगे और उनसे पूछताछ करने के बाद क़ानूनी राय ली जाएगी."

विन मिन पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन क़ानून के तहत आरोप लगाए गए हैं. उन पर कोविड महामारी के दौरान लगाई गई पाबंदियों का उल्लंघन कर 220 गाड़ियों के काफ़िले के साथ अपने समर्थकों से मिलने जाने का आरोप है.

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दक्षिणपूर्ण एशिया संवाददाता, जॉनथन हेड का विश्लेषण

जिस तरह अचानक म्यांमार में सेना ने सत्ता अपने हाथों में ली और दावा किया कि म्यामांर की राष्ट्रीय एकता को ख़तरा है और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले की आलोचना हो रही है उसे देखते हुए ये आरोप हास्यास्पद ही लगते हैं.

लेकिन इस बात से उइनकार नहीं किया जा सकता कि आंग सान सू ची को सरकार का नेतृत्व करने देने के अपने उद्देश्य में सेना कामयाब हो सकती है. जिस पर किसी तरह के आपराधिक मामले हों वो म्यांमार में संसद का सदस्य नहीं बन सकते.

बीते 32 सालों से म्यांमार की सेना ने लगातार कोशिश की कि वो आंग सान सूची के कारण पैदा हुए ख़तरे को कम कर सके. लेकिन उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई और सेना अपना कोशिशों में नाकाम होती रही. जब भी उन्हें चुनावों में उतरने का मौक़ा मिला उन्होंने भारी बहुमत से चुनाव जीता.

अब तक एक ही बार वो चुनाव जीत नहीं पाईं. ये वो चुनाव थे जो दस साल पहले सैन्य सरकार ने कराए थे. उस वक्त उन्हें चुनाव लड़ने की इजाज़त नहीं दी गई थी क्योंकि उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज था.

यंगौन में उन्हें अपने घर पर ही नज़रबंद किया गया था. तैर कर झील पार कर एक अमेरिकी व्यक्ति उमके घर पहुंच गया था. इसके बाद उन पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया था.

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क्या तख़्तापलट का हो रहा विरोध?

कैद में रखी गई आंग सान सू ची के समर्थकों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का ऐलान किया है. कई अस्पतालों में डाक्टरों ने हड़ताल की है या सेना के इस कदम के विरोध में वो ख़ास लाल, काले रंग के रिबन लगाकर विरोध जता रहे हैं.

उनका कहना है कि वो सेना के साथ सहयोग नहीं करेंगे. ये लोग आंग सान सू ची को तुरंत रिहा किए जाने की मांग कर रहे हैं.

यंगून यूथ नेटवर्क के संस्थापक तिनज़ार शुनले ने बीबीसी को बताया, "पूरे देश में युवा सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ रहे हैं. ये लोग सरकारी कर्मचारियों से फ़ैसला लेने की अपील कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वो सैन्य सरकार के लिए काम करना बंद करें."

म्यांमार में सविनय अवज्ञा आंदोलन के समन्वय के लिए फ़ेसबुक पर भी एक ग्रुप बनाया गया है.

लेकिन देश के भीतर बड़े पैमान पर विरोध प्रदर्शन होते नहीं दिख रहे. मंगलवार की रात यंगून के नागरिकों ने विरोध में कार के हार्न बजाकर शोर किया. साथ ही यहां रहने वालों से बर्तनों को बजा कर अपना विरोध जताया.

म्यांमार में सैन्य सत्ता का विरोध

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म्यांमार में तख्तापलट के बाद से ही सेना ने रात का कर्फ्यू लगा दिया है. यहां सड़कों पर बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं और सड़कें अधिकतर सुनसान ही दिख रही हैं.

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार सेना के समर्थन में भी यहां एक प्रदर्शन हुआ जिसमें 3,000 लोग शामिल हुए.

सेना ने यहां कई राजनेताओं को भी हिरासत में ले लिया था. हालांकि उन्हें मगलवार को कहा गया कि राजधानी में जिस गेस्टहाउस में वो बंद हैं वहां से बाहर जा सकते हैं.

इन नेताओं में ज़िन मार भी शामिल हैं जिन्होंने बीबीसी बर्मा सेवा को बताया कि उन्हें जाने के लिए 24 घंटों का वक्त दिया गया है.

उन्होंने कहा कि "मौजूदा वक्त में हालात बेहद मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हैं. सैन्य तख्तापलट के बीच हमारा अगला कदम क्या होगा, इस बारे में कहना भी हमारे लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. लेकिन मैं आपको एक बात ज़रूर कह सकती हूं कि हमारे सांसद लोगों के लिए ज़रूर खड़े होंगे और गणतंत्र का समर्थन करेंगे."

आंग सान सू ची

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कौन हैं आंग सान सू ची?

  • आंग सान सू ची म्यांमार की आज़ादी के नायक रहे जनरल आंग सान की बेटी हैं. 1948 में ब्रिटिश राज से आज़ादी से पहले ही जनरल आंग सान की हत्या कर दी गई थी. सू ची उस वक़्त सिर्फ दो साल की थीं.
  • 1990 के दशक में सू ची को दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली महिला के रूप में देखा गया जिन्होंने म्यांमार के सैन्य शासकों को चुनौती देने के लिए अपनी आज़ादी त्याग दी.
  • 1989 से 2010 तक सू ची ने लगभग 15 साल नज़रबंदी में गुजारे.
  • साल 1991 में नजरबंदी के दौरान ही सू ची को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया.
  • साल 2015 के नवंबर महीने में सू ची के नेतृत्व में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने एकतरफा चुनाव जीत लिया. ये म्यांमार के इतिहास में 25 सालों में हुआ पहला चुनाव था जिसमें लोगों ने खुलकर हिस्सा लिया.
  • म्यांमार की स्टेट काउंसलर बनने के बाद से आंग सान सू ची ने म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में जो रवैया अपनाया उसकी काफ़ी आलोचना हुई. लाखों रोहिंग्या ने म्यांमार से पलायन कर बांग्लादेश में शरण ली.
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म्यांमार के तख्तापलट पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

दुनिया के सात अमीर मुल्कों ने म्यांमार में तख्तापलट को लेकर 'गंभीर चिंता' ज़ाहिर की है और वहां गणतंत्र की बहाली की मांग की है.

जी7 देशों (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका) ने एक बयान जारी कर कहा है, "हम म्यांमार के सेना से अपील करते हैं कि वो तुरंत अपातकाल ख़त्म करें और गणतांत्रिक रूप से चुनी सरकार को बहाल करें. साथ ही वो मानवाधिकार का सम्मान करें और जिन नेताओं को हिरासत में लिया गया है उन्हें रिहा करें."

इस मामले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भी अहम बैठक हुई लेकिन इस इमरजेंसी बैठक में 15-सदस्यों वाली काउंसिल को चीन की सहमति हासिल नहीं हो पाई. चीन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों में से एक है जिसके पास वीटो का अधिकार है.

चीन का कहना है कि तख्तापलट के बाद यदि म्यांमार पर पाबंदियां लगाईं गईं या अंतरराष्ट्रीय दवाब बनाया गया तो हालात बिगड़ सकते हैं.

म्यांमार को अंतरराष्ट्रीय स्तर के दवाब से बचाने के लिए चीन पहले भी कोशिश करता रहा है. वो न केवल म्यांमार का मित्र देश है बल्कि आर्थिक तौर पर म्यांमार को बेहद अहम मानता है.

अल्पसंख्यक रोहिंग्या पर हमलों और उनके पलायन को लेकर रूस और चीन ने पहले भी संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार का बचाव किया था. चीन का कहना है कि उसे उम्मीद है सभी पक्ष आपसी सहमति से मामले को सुलझा लेंगे.

म्यांमार पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि क्रिस्टीन श्राना ने सुरक्षा परिषद से आग्रह किया था कि वो सेना के क़दम की निंदा करे. संयुक्त राष्ट्र ने अब औपचारिक तौर पर फौज द्वारा सत्ता हासिल करने को तख्तापलट करार दे दिया है.

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