उत्तर कोरिया ने पूरे खेल को अपने पक्ष में कैसे किया

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- Author, लॉरा बिकर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सोल (दक्षिण कोरिया) से
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन साल 2018 में बड़ी तेज़ी से अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में आए हैं. लोग ये मानने लगे हैं कि राजनीतिक वर्ग में किम जोंग-उन की एक हैसियत तो है.
वर्षों तक बाहरी दुनिया से कटे रहे किम जोंग-उन, अब एक शक्तिशाली खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं.
चीन, रूस, सीरिया, दक्षिण कोरिया और अमरीका के नेताओं की किम जोंग-उन से इस साल मुलाक़ातें तय हो चुकी हैं.
कई बड़े नेता उनसे वाक़ई मुलाक़ात करना चाहते हैं. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किम जोंग-उन को सितंबर में व्लादिवोस्टॉक (चीन की सीमा से सटा एक शहर) में मिलने का न्योता भेजा है.
प्योंगयांग में समाचार एजेंसी असोसिएटेड प्रेस के पूर्व ब्यूरो चीफ़ जीन ली ने कहा कि दुनिया किम जोंग-उन को अंतरराष्ट्रीय राजनेता बनते देख रही है. हम सभी इसके साक्षी हैं.
उत्तर कोरिया का आत्मविश्वास
उन्होंने कहा, "यह शो साल 2010 से एकदम अलग है, जब किम जोंग-उन को बच्चे की तरह दिखने वाले एक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था. लेकिन अब उनका आत्मविश्वास अलग स्तर पर है. उनके पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं और किम ख़ुद को अमरीका जैसे दुनिया के बाक़ी परमाणु शक्ति संपन्न देशों से कहीं कम नहीं समझते हैं."

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नॉर्थ कोरियन हाउस ऑफ़ कार्ड्स नाम की क़िताब लिखने वाले केन गौज़ ने अपने सबसे ताज़ा निबंध में लिखा है कि साल 2017 में अपने मिसाइल परीक्षण कार्यक्रम में तेज़ी लाते वक़्त किम जोंग-उन ने शायद ऐसे नतीज़ों की ही उम्मीद की होगी.
हालांकि एक राय ये भी है कि किम जोंग-उन को इस बात का बहुत कम अंदाज़ा था कि मिसाइल परीक्षण कार्यक्रम के बाद उन्हें अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के साथ शिखर सम्मेलन का मौक़ा मिलेगा.
नए राजनयिक दायरे
जीन ली कहते हैं, "किम ने ख़ुद को बड़े लंबे वक़्त तक बाहरी दुनिया से दूर रखा है. यही एक वजह है कि दुनिया भर के विदेशी अधिकारी उनसे मिलने का मौक़ा नहीं गंवाना चाहते, क्योंकि वो किम जोंग-उन के बारे में जानना चाहते हैं. वो समझना चाहते हैं कि किम अपने देश के लिए क्या चाहते हैं."
दो अन्य चीज़ें भी हैं जिन्होंने किम जोंग-उन को अपने नए राजनयिक दायरे तय करने में मदद की है.

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मसलन, दक्षिण कोरिया ने एक उदार राष्ट्रपति को चुना जिन्होंने अपने प्रचार के दौरान ही ये वादा किया था कि वो उत्तर कोरिया के साथ रिश्ते बेहतर करने का प्रयास करेंगे.
इससे दोनों देशों को संवाद करने और अपने रिश्ते स्थापित करने में मदद मिली.
इसके बाद आया अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का निमंत्रण. हालांकि, पिछले कमांडर इन चीफ़ ने कहा था कि वो कुछ शर्तें पूरी होने के बाद ही शिखर सम्मेलन के लिए आगे बढ़ेंगे.
उत्तर कोरिया ने बदले लक्ष्य
लेकिन डोनल्ड ट्रंप, जो कि एक साल से उत्तर कोरिया को धमकियां दे रहे थे, वो बिना किसी शर्त के आमने-सामने की मुलाक़ात को तैयार हो गए.
सिंगापुर में जब किम जोंग-उन और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की मुलाक़ात होगी, तो ये याद रखने वाली बात होगी कि कैसे छह महीने पहले तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग रहने वाले किम जोंग उन, उन दो नेताओं में शुमार होंगे, जो दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक के केंद्र में होंगे.

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इस शिखर सम्मेलन ने ख़ुद किम जोंग-उन को एक राजनीतिक लाभ दिया है.
ये नई राजनयिक रणनीति सिर्फ़ ताक़त के आधार पर नहीं, बल्कि कई ज़रूरतों से भी पैदा हुई है.
यह घोषणा करते हुए कि उनका परमाणु कार्यक्रम अब पूरा हो चुका है, किम जोंग-उन ने कहा कि अब उनका सारा ध्यान देश की अर्थव्यवस्था पर रहेगा. और ऐसा करने के लिए उन्हें गठबंधन बनाने की और पुराने दोस्तों की ज़रूरत होगी.
चीन और उत्तर कोरिया के रिश्ते
ऐसे में चीन, किम जोंग-उन के लिए सबसे अहम है. वो उत्तर कोरिया का सबसे मुख्य व्यापारिक साझेदार रहा है.

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किम बीते कुछ वक़्त में चीनी राष्ट्रपति से दो बार मुलाक़ात कर चुके हैं. दोनों बार चर्चा का प्रमुख मुद्दा व्यापार ही रहा.
चीन चाहता है कि अगर उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को रद्द कर रहा है तो उनपर लगे प्रतिबंध भी हटाए जाने चाहिए, ताकि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाया जा सके.
साथ ही अमरीका के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ बने रहने के लिए किम जोंग-उन को चाहिए कि वो कह सकें कि चीन उनके साथ खड़ा है.
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन से भी किम की मुलाक़ात हुई. दोनों ने कोरियाई प्रायद्वीप के भविष्य को लेकर वार्ता की.

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लेकिन जो चीज़ सबसे अलग दिखी, वो था किम जोंग-उन का ख़ुशमिजाज़ रवैया. उन्हें देखकर लगा कि वो संवाद करना चाहते हैं, वो रिश्ते बेहतर करना चाहते हैं, जैसा उनके पिता और दादा को देखकर कभी नहीं लगा.
रूस और सीरिया से भी संबंध
कुछ इसी तरह एक दशक से भी अधिक समय बाद किसी वरिष्ठ रूसी राजनयिक ने पहली बार उत्तर कोरिया की यात्रा की.
हालांकि डोनल्ड ट्रंप रूसी राजनयिकों से उत्तर कोरिया की मुलाक़ात से ज़रा नाराज़ दिखे.
किम जोंग-उन ये जताना चाहते हैं कि उत्तर कोरिया किसी भी तरह से घिरा नहीं है. रूस से उत्तर कोरिया बॉर्डर जुड़ा है. वो अपने आर्थिक हितों के लिए उनसे बात कर सकता है. इसलिए वो उनसे संवाद भी रखना चाहता है.

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इन सभी बातों में अमरीका के लिए संदेश छिपे हैं और कहीं न कहीं उत्तर कोरिया ये भी कहने की कोशिश कर रहा है कि वो किसी दबाव में नहीं है.
वहीं उत्तर कोरिया से सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के रिश्ते अमरीका समेत संयुक्त राष्ट्र के लिए भी चिंता का विषय हैं.
उत्तर कोरिया की सरकारी न्यूज़ एजेंसी ने कहा है कि राष्ट्रपति बशर अल-असद जल्द ही उत्तर कोरिया का दौरा करने को तैयार हैं.
सीरिया, उत्तर कोरिया का पुराना सहयोगी दोस्त है. दोनों देशों के 1966 से राजनयिक संबंध हैं. उत्तर कोरिया ने अक्तूबर, 1973 में हुए अरब-इसराइल युद्ध के दौरान सीरिया को हथियार भी दिए थे.
फ़रवरी में लीक हुई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में ये भी आरोप लगाए गए थे कि उत्तर कोरिया ने साल 2012 से 2017 के बीच सीरिया को कुछ ऐसी संदिग्ध सामग्री सप्लाई की जिनका इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने में किया जा सकता है.

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ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र अब इन दोनों देशों के रिश्तों पर और भी ज़्यादा होगी.
इन चीज़ों पर है नज़र
लेकिन ऐसा नहीं है कि इस दौरान सभी कुछ उत्तर कोरिया के पक्ष में रहा है. एक वक़्त आया जब अमरीका के उप-राष्ट्रपति माइक पेंस पर उत्तर कोरिया के उप-विदेश मंत्री की टिप्पणी के कारण शिखर सम्मेलन रद्द करने तक की बातें हुईं.
फिर किम जोंग-उन की टीम ने चीज़ों को वापस पटरी पर लाने के लिए सारे ज़ोर लगा दिए.
बहरहाल, किम जोंग-उन ने खेल के सारे नियमों को बदलकर रख दिया है. पिछले साल तक परमाणु शक्ति का जो जखीरा उत्तर कोरिया के लिए एक बड़ा उत्तरदायित्व बनता जा रहा था, उसे अब उत्तर कोरिया ने एक राजनयिक हथियार बना लिया है.
लेकिन उत्तर कोरिया का अंतिम खेल क्या होगा? और उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच तय शिखर सम्मेलन के बाद क्या होना है? ये दो बड़े और बेहद अहम सवाल हैं.
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