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चुनाव के विभिन्न चरण और अहम राज्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में लोकसभा चुनाव 16 अप्रैल से 13 मई तक पाँच चरणों में संपन्न हुआ और परिणाम की घोषणा 16 मई को मतगणना के साथ हो रही है. आप नीचे दिए गए बटनों पर क्लिक कर जानें कि हर चरण में चुनाव कहाँ कहाँ संपन्न हुआ. अहम राज्यों का चुनावी गणित जानने के लिए राज्य पर क्लिक करें: ![]() ![]() ![]() ![]() ![]() ![]() ![]() उत्तर प्रदेश ये आबादी के हिसाब से देश का सबसे बड़ा राज्य है जो कि एक समय कांग्रेस पार्टी का गढ़ रहा है. लेकिन फ़िलहाल यहां दो जाति-आधारित पार्टियों बहुजन समाज (बसपा) पार्टी और समाजवादी पार्टी (सपा) का प्रभाव है. जहां बसपा की नेता मायवती हैं वहीं सपा के नेता मुलायम सिंह यादव हैं. दोनों पार्टियों का जनाधार पिछड़ी और दलित जातियों समेत मुसलमानों के बीच है. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में इन दोनों पार्टियों ने राज्य की 80 सीटों में 54 सीटों पर क़ब्ज़ा किया था जबकि देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियाँ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी केवल 19 सीटें जीत सकी थीं. सपा को 35, बसपा को 19, भाजपा को 10 और कांग्रेस को नौ सीटें मिली थीं. भीषण ग़रीबी, बढ़ती हुई अपराध दर, ख़राब आधारभूत ढाँचा और ख़स्ताहाल स्वास्थ्य सेवा इस राज्य की बड़ी समस्याएँ है. मायावती वर्ष 2007 में राज्य में हुए विधानसभा चुनावों की जीत को दोहराना चाहेंगी. अगड़ी जात के हिंदुओं को अपने पाले में लाने के लिए पार्टी की छवि को बदल कर इसे सवर्ण और दलित वर्ग की संयुक्त पार्टी के रुप में पेश किया जा रहा है. मायावती की आकांक्षा एक ऐसी नेता बनने की है जिसकी पहचान पूरे भारत में हो और वह 15वीं लोकसभा के जनादेश के बाद सरकार के गठन में एक अहम भूमिका अदा करें. देखना ये है कि क्या वे वामपंथी पार्टियों और तीसरे मोर्चे के नेता के रुप में भारत की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती हैं? बिहार पिछले कुछ दशकों में बिहार भारत के ग़रीब और ख़राब क़ानून व्यवस्था वाले राज्यों में से एक के रुप में सुर्खियों में रहा है. बिहार में एक समय कांग्रेस का बोलबाल हुआ करता था, लेकिन फ़िलहाल दो क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) सियासी बिसात पर हावी हैं. दोनों पार्टियों का संबंध देश के मुख्य राजनीतिक दलों से है. आरजेडी पिछली लोकसभा में कांग्रेस से जुड़ी रही है तो जेडीयू भारतीय जनता पार्टी के साथ है. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में लालूप्रसाद यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी ने राज्य की 40 सीटों में से 22 पर जीत दर्ज की थी जबकि जेडीयू केवल छह सीटें जीत सकी थी. लेकिन 2004 के चुनावों के बाद स्थिति बदल गई हैं. वर्ष 2005 के विधानसभा चुनावों में जेडीयू और भाजपा गठबंधन ने जीत दर्ज की और नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार का गठन किया. राजनीतिक पर्यवेक्षक योगेंद्र यादव के अनुसार जेडीयू-भाजपा राज्य में अपने शासन के दम पर चुनाव लड़ रहा है लेकिन इस बार उसका सामना आरजेडी-लोक जनशक्ति पार्टी के गठबंधन से है जो पिछड़ों-दलितों का मज़बूत गठजोड़ माना जाएगा. पश्चिम बंगाल वामंपथी पार्टियों का गठबंधन पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से राज्य में सत्तासीन है. 2004 के लोकसभा चुनावों में वामपंथी पार्टियों ने 35 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि कांग्रेस को छह और तृणमूल कांग्रेस को एक सीट पर विजय मिली थी. राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की नज़र में 1984 के चुनाव को छोड़ कर, यह चुनाव पिछले लगभग चार दशकों में वामदलों के गठबंधन के लिए सबसे कठिन चुनाव माना जा रहा है. जब से मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने बड़े औद्योगिक कारख़ानों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण करने का फ़ैसला किया, तो कभी वफ़ादार रही ग्रामीण, ग़रीब जनता के बीच वामदलों के लिए समर्थन घटने लगा. उधर ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों के प्रदर्शनों को तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन दिया और यही वामदलों की मुश्किल का कारण है. मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य अपने रुख में कायम हैं कि लाखों बेरोज़गार पुरुषों और महिलाओं को रोज़गार देने के लिए राज्य को तेज़ी के साथ औद्योगीकरण की राह पर चलना होगा. राजस्थान राजस्थान में पिछले कई चुनावों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर रही है. दोनों ही पार्टियों की जड़ें पूरे राज्य में गाँव-गाँव तक फैली हुई हैं. वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस के खाते में मात्र चार सीटें आई थीं जबकि भाजपा को 21 सीटें मिली थीं. लेकिन वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने काफ़ी बढ़त हासिल की और 200 सीटों में से 96 सीटों पर कामयाबी पाकर राज्य में सरकार बनाई. भारतीय जनता पार्टी को 78 सीटें मिली थीं. हाल में हुए इस चुनाव के बाद इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस काफ़ी उत्साहित है और भाजपा से वर्ष 2004 का बदला लेने के प्रयास में है. केरल केरल के राजनीतिक मैदान में दशकों से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेतृत्व में लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एलडीएफ़) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (यूडीएफ़) के बीच चुनावी दंगल लड़ा गया है. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में केरल की 20 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस के हाथ एक भी सीट नहीं लगी थी जबकि सीपीएम और उसके सहयोगियों को राज्य में 19 सीटें मिली थी. वर्ष 2005 में हुए विधानसभा चुनावों में भी लेफ़्ट फ़्रंट को भारी कामयाबी मिली थी. उसे 140 सीटों वाली विधानसभा में भारी बहुमत मिला था जबकि कांग्रेस को मात्र 24 सीटों पर संतोष करना पड़ा था. लेकिन सीपीएम के भीतर मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन और पार्टी की बागडोर संभालने वाले पिनियारी विजयन के बीच खींचतान चल रही है. भारत-अमरीका परमाणु मुद्दे पर कांग्रेस और वामदलों के बीच मतभेद बढ़ने के बाद इस बार केरल का लोकसभा चुनाव दिलचस्प है. सीपीएम के भीतर मतभेदों के चलते कांग्रेस के नेतृत्व में यूडीएफ़ उम्मीद कर रहा है कि उसे लोकसभा चुनाव में बढ़त हासिल होगी. तमिलनाडु यह आर्थिक रुप से भारत के सबसे उन्नत और राजनीतिक रूप से सबसे अस्थिर राज्यों में से एक है. मोटर कार बनाने के लिए भारत के डेट्राइट के तौर पर प्रसिद्ध इस राज्य में मज़बूत सर्विस सेक्टर और ज़ोरों पर कारोबार करने वाला फ़िल्म उद्योग है. यहां भारत की सबसे प्रबल क्षेत्रीय पार्टी डीएमके और ऐआईएडीएमके में कांटे का मुक़ाबला है. 1960 के दशक से यह क्षेत्रीय पार्टियाँ नवजात तमिल राष्ट्रवाद और पिछड़ी जाति की आशाओं को अपनी ओर करने में लगी हुई हैं. जानेमाने पटकथा लेखक एम करुणानिधि राज्य में फ़िलहाल सत्तारूढ़ डीएमके के प्रमुख हैं. विपक्ष में एआईडीएमके की विवादास्पद नेता पूर्व अभिनेत्री जयललिता हैं. व्यक्तिवाद से प्रेरित इन दोनों पार्टियों का राज्य में इस क़दर दबदबा रहा है कि पिछले तीन दशक में कोई भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी तमिलनाडु में क़दम जमाने में सफल नहीं हुई है. वर्ष 2004 के चुनाव में डीएमके गठबंधन ने सारी सीटें जीत लीं. जयललिता की पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी. यहां जो भी जीत हासिल करता है वह भारत की नई गठबंधन सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में होगा. आंध्र प्रदेश आंध्र प्रदेश में अगर एक ओर अपार संपन्नता है तो दूसरी ओर भीषण ग़रीबी है. यहां एक ओर सूचना टेक्नॉलोजी और सर्विस उद्योग हैं तो दूसरी और ग़रीबी से ग्रसित तेलंगाना क्षेत्र अलगाववादी आंदोलन का सामना कर रहा है. यहां विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव हो रहे हैं और मुक़ाबला सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी और तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के बीच है, जिसे कम्युनिस्टों का समर्थन प्राप्त है. आंध्र प्रदेश में 1980 के दशक तक कांग्रेस की गहरी पकड़ थी जब तक कि टीडीपी का उदय नहीं हुआ था. वर्ष 2004 में कांग्रेस गठबंध ने 37 सीटों पर चुनाव जीता. उससे पांच साल पहले टीडीपी और बीजेपी गठबंधन ने वहां 36 सीटें जीती थीं. कांग्रेस इस बार सस्ते चावल, किसानों को मुफ़्त बिजली, ग़रीब परिवारों के लिए मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा और महिलाओं के लिए सस्ते दरों पर क़र्ज़ देने का वादा कर रही है. उधर टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू भी मुफ़्त बिजली, टीवी और बेरोज़गारी भत्ता दिलाने का वादा कर रहे हैं. इस राज्य में सिनेस्टार चिरंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी की भूमिका दिलचस्प रहने की संभावना है. उड़ीसा उड़ीसा में राज्य और संसदीय दोनों चुनाव हो रहे हैं. इस साल मार्च में भाजपा और बीजू जनता दल (बीजेडी) के अलग-अलग रास्ते पर चले जाने से अनेक क्षेत्रों में त्रिकोणीय टक्कर होने की संभावना है. इस बार जहां दोनों पार्टियाँ एक दूसरे के विरूद्ध चुनाव में होंगी. उड़ीसा में पार्टी का अच्छा ढांचा लिए लेकिन करिश्माई नेता से रहित विपक्षी दल कांग्रेस इस बार अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. बीजेडी की हाल की घोषणाओं में ग़रीबों के लिए सस्ते चावल, सरकारी कर्मचारियों के लिए बेहतर वेतन और वृद्धों के लिए बेहतर पेंशन आदि शामिल हैं. कांग्रेस का कहना है कि वह प्रचार में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने जा रही है और पार्टी के अनुसार इस दिशा में पिछले नौ साल में भारी बढ़ौतरी हुई है. दूसरी ओर भाजपा का कहना है क़ानून व्यवस्था की लगातार बिगड़ती स्थिति का मामला उनके चुनावी मुद्दों में शामिल होगा. महाराष्ट्र नवंबर में मुंबई पर हुए हमले के बाद भारत की वाणिज्यिक राजधानी वाले इस राज्य में सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. मुंबई हमले को रोकने में विफल होने के कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के विलासराव देशमुख को गृहमंत्री आरआर पाटिल के साथ अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. कांग्रेस ने शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से पहले ही चुनाव-पूर्व गठबंधन बना लिया है. दक्षिणपंथी हिंदू संगठन शिव सेना के प्रमुख बाल ठाकरे अस्वस्थ हैं, इसलिए वे जनता के सामने नहीं आए हैं. उनके भतीजे राज ठाकरे ने उसी दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी विचाधारा पर अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन कर लिया है लेकिन लगता नहीं कि वह राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभाव डालने में सफल रहेंगे. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 सीटों में से कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 22 सीटें और भाजपा-शिव सेना गठबंधन को 25 सीटें मिली थीं. लेकिन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन काफ़ी आगे निकल गया था और उसने राज्य में सरकार बनाई थी. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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