पंजाब की राजनीति पर ऑपरेशन ब्लू स्टार का साया

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- Author, जगतार सिंह
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
जून 1984 की एक तपती दोपहर. जब चंडीगढ़ से पत्रकारों का एक दल दरबार साहिब यानी हरिमंदिर साहिब पहुँचा तो वहाँ एक अजीब ख़ामोशी थी.
हरिमंदिर साहिब सिख समुदाय का सबसे पावन स्थल है. सिख गुरुओं ने अमृतसर शहर को इसी स्थल के चारों ओर बनवाया था.
स्वर्ण मंदिर परिसर से चरमपंथियों को निकालने के लिए भारतीय सेना ने चार जून को कार्रवाई शुरू की और ये तीन दिन तक चलती रही. यह वह स्थल है जहाँ सुबह से आधी रात तक गुरुबानी का कीर्तन होता है और हज़ारों लोग माथा टेकने आते हैं.
उस जून की दोपहर वहाँ का दृश्य दिल कंपा देने वाला था. बाहर से देखने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे पूरा परिसर दूसरे विश्व युद्ध की गवाही दे रहा हो. अंदर चारों ओर सैनिक तैनात थे. सेना के अधिकारी पत्रकारों को इस कार्रवाई की जानकारी दे रहे थे.
दरबार साहिब
दरबार साहिब की पहली मंज़िल पर पावन गुरु ग्रंथ साहिब की हस्तलिखित बीड़ का प्रकाश होता है. जब हम वहां पहुँचे तो वहां पर सब कुछ अस्त-व्यस्त था. बीड़ के एक हिस्से पर खून से सनी चादर पड़ी हुई थी.
जब मैं बीड़ को ठीक ढंग से रखने के लिए बैठा तो बहुत अजीब अहसास हुआ. लगा कि आने वाले दिनों में हालात और भी बिगड़ेंगे. दरबार साहिब इतिहास में पहले भी दो बार ध्वस्त किया जा चुका था, लेकिन दोनों बार ही आक्रमण विदेशियों ने किया था.
सिखों के छठे गुरु - गुरु हरगोबिंद ने अकाल तख़्त की स्थापना राजनीतिक नज़रिए से दिल्ली के मुग़ल शासकों को टक्कर देने के लिए की थी. अकाल तख़्त सिखों की सर्वोच्च राजनीतिक और धार्मिक मामलों की संस्था है.
अकाल तख़्त की इमारत जल चुकी थी और वहाँ से लाशों की बदबू आ रही थी.
देश में उस समय काँग्रेस का शासन था. सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों के लिए काँग्रेस आज भी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है.
शिरोमणि अकाली दल की लगातार यह माँग रही है कि सिखों के काँग्रेस के साथ संबंध तभी ठीक हो सकते हैं जब वह इस कार्रवाई के लिए सिखों से स्पष्ट क्षमायाचना करे.
काँग्रेस से नाराज़गी
1984 के बाद पंजाब की राजनीति, विशेष तौर पर विधानसभा और संसदीय चुनावों में ऑपरेशन ब्लू स्टार का साया नज़र आता है. इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. उनके बेटे राजीव गाँधी ने सिखों की भावनाओं को भाँपते हुए शिरोमणि अकाली दल से बातचीत शुरू की और जुलाई 1985 में हरचंद सिहं लोंगोवाल के साथ ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

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आज़ाद भारत में पंजाब के बँटवारे के बाद भी अकाली दल को इतना भारी बहुमत नहीं मिला था.
लेकिन ज़्यादा महत्वपूर्ण बात शायद यह थी कि पहली बार वोटों का सांप्रदायिकरण हुआ - अकाली दल को लगभग सभी सीटें सिख बहुल इलाक़ों से मिलीं. इंदिरा गाँधी के हत्यारे बेअंत सिंह की विधवा बिमल कौर ख़ालसा को कट्टरपंथियों ने प्रत्याशी बनाया और वो अकाली दल के सुजान सिंह से सिर्फ़ 400 वोट से हारीं.
संसदीय चुनावों में अकाली दल ने 13 में से 7 सीटें जीतीं. जब काँग्रेस राजीव-लोंगोवाल समझौते की कुछ शर्तों से पाँव वापस खींचने लगी तो उससे भी सिखों की नाराज़गी बढ़ी और चरमपंथी गतिविधियाँ बढ़ीं और केंद्र ने अकाली सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया.
कट्टरपंथी की जीत
1989 के संसदीय चुनावों में पहली बार हुआ कि कट्टरपंथी सिख एक राजनीतिक ताक़त के रूप में उभरे. परंपरागत रूप से सिखों की पार्टी मानी जानेवाली उदारवादी अकाली दल के पाँव उखड़ गए. काँग्रेस सिर्फ़ होशियारपुर और गुरदासपुर की सीटें जीत सकी.
जेल से तरन तारन का चुनाव लड़ रहे सिमरनजीत सिंह मान रिकॉर्ड 4 लाख 80 हज़ार वोट से जीते. इस बार न केवल बेअंत सिंह की विधवा बिमल कौर जीतीं बल्कि बेअंत के पिता सुच्चा सिंह मलोया भी संसद में पहुँच गए.
हालत ऐसी थी कि राजिंदर कौर बुलारा जैसी प्रत्याशी जिन्हें कोई नहीं जानता था, इसीलिए जीत गईं क्योंकि चरमपंथी ताकतें उन्हें अपना प्रत्याशी बता रही थीं.
दमन

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1992 के संसदीय और विधानसभा चुनावों का सिख कट्टरपंथियों और अकाली दल ने बायकॉट किया. चुनाव में बीस प्रतिशत से भी कम वोट पड़े. काँग्रेस की सरकार बनी. जल्दी ही ये सरकार बड़े पैमाने पर दमन और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों में घिरने लगी. इससे अकाली दल को नई ताकत मिली.
काँग्रेस से नाराज़ सिखों ने 1996 के संसदीय चुनाव में अकाली दल-बहुजन समाज पार्टी गठजोड़ को भारी जीत दिलाई.
काँग्रेस सिर्फ़ अमृतसर और गुरदासपुर की सीटें जीत सकी. 1997 में विधानसभा के चुनाव में अकाली दल ने भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिलाया.
जिस अकाली दल को पिछले चुनावों में विपक्षी दल 'चरमपंथियों की पार्टी' के रूप में पेश कर रहे थे वह एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के साथ जुड़कर फिर राजनीतिक मुख्यधारा में पहुँची.
काँग्रेस पंजाब में बुरी तरह हारी और उसे 117 में से केवल 14 सीटें मिलीं. इस गठजोड़ ने 1998 के संसदीय चुनावों में भी जीत हासिल की.
अकाली दल का चुनावी वादा था कि वो राज्य में चरमपंथ की शुरुआत की जाँच करवाएगी और साथ ही मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी.
ऑपरेशन ब्लूस्टार 'दुर्भाग्यपूर्ण'

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अपने इन चुनावी वादों पर अकाली दल अमल नहीं कर पाया और संसदीय चुनाव में उसे मुँह की खानी पड़ी.
वर्ष 2004 के संसदीय चुनावों में पंजाब में काँग्रेस को झटका लगा और अकाली दल-भाजपा गठजोड़ को 13 में से 11 सीटें मिलीं. इन चुनावों में भी अकाली दल ने काँग्रेस पर सिख विरोधी पार्टी होने का आरोप लगाया था.
भारत में पंजाब के बाहर सिखों ने भले ही काँग्रेस को माफ़ कर दिया हो, लेकिन पंजाब में ऑपरेशन ब्लू स्टार की यादें आज भी ताज़ा हैं.
काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कहा है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार 'दुर्भाग्यपूर्ण' था, लेकिन सिख इससे संतुष्ट नहीं हैं और आज भी उनकी माँग है कि काँग्रेस उस कार्रवाई के लिए माफ़ी माँगे.
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