पंजाब में मनरेगा के 'शिकार'

बिहार के मज़दूर की सहूलियत बन गई है पंजाब में किसान के दुख की वजह. मनरेगा ने मज़दूरों का पलायन रोका तो पंजाब में खेती की तस्वीर धुंधलाने लगी. देखिए तस्वीरें.

पंजाब, मनरेगा, किसान, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, ‘‘पहले हम खेती करते थे, तो बिहार का मज़दूर आता था तो बेशुमार घूमता था और पूछता था हमको काम दो काम दो. अब ज़माना पलट गया है. अब हम उनके पीछे घूमते हैं कि हमारा काम कर दो. ऐसे में महंगाई तो बढ़ेगी ही.’’ पंजाब के किसानों का दुख है कि उन्हें खेती के लिए ज़रूरी मज़दूर नहीं मिल रहे.
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इमेज कैप्शन, पंजाब के होशियारपुर ज़िले की सीमा पर बसे गांव भंगुरनी के रहने वाले किसान निर्मलजीत कभी सात खेत यानी सात एकड़ ज़मीन के मालिक थे. आज उनके पास सिर्फ़ दो खेत बचे हैं. मज़दूरों की कमी और बढ़ती दिहाड़ी ने उन्हें मज़दूरी के कगार पर ला खड़ा किया है.
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इमेज कैप्शन, निर्मलजीत के मुक़ाबले जालंधर के संगवाल गांव के किसान मिजे सिंह के पास ज़्यादा खेत हैं. पर ख़ुश वह भी नहीं हैं क्योंकि उन्हें भी खेत मज़दूरों की समस्या से दो चार होना पड़ रहा है. मिजे सिंह कहते हैं कि खेती से सिर्फ़ उनका गुज़ारा हो पा रहा है.
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इमेज कैप्शन, मिजे सिंह के पड़ोसी और संगवाल के ही किसान अजायब सिंह कहते हैं कि पिछले दो साल में बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले किसानों की मज़दूरी दो गुना से ज़्यादा बढ़ गई है. इसने खेती को नुक़सान का सौदा बना दिया है.
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इमेज कैप्शन, संगवाल में ही रहते हैं किसान भजन सिंह, जो कभी पहलवान हुआ करते थे और अब पॉल्ट्री फ़ार्म चलाते हैं. भजन सिंह का कहना है कि उनके भाई को अगर खेती के लिए मज़दूर नहीं मिलते तो उन्हें पॉल्ट्री फ़ार्म में ज़रूरत के लायक मज़दूर नहीं मिलते. इस वजह से कई बार नुक़सान उठाना पड़ता है.
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इमेज कैप्शन, किसान आयोग के चेयरमैन बीएस कालकट ने बीबीसी को बताया, ''मनरेगा की वजह से यह फ़र्क पड़ा कि लेबर कम होने से चार्जेज़ बढ़ गए. पर हमारी खेती का एरिया कम नहीं हुआ. उपज पर कोई असर नहीं पड़ा. उपज बढ़ी है. उपज का लेबर से कोई सीधा संबंध नहीं है.''
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इमेज कैप्शन, मनरेगा सिर्फ़ 100 दिन काम की गारंटी देती है. उधर गेहूं और धान की बिजाई और कटाई के महीने भी तय हैं. अगर मज़दूर इन्हीं फ़सल के महीनों में मनरेगा का काम ले लेते हैं, तो वो पंजाब नहीं जाते और वहां के किसानों को मज़दूरों की किल्लत का सामना करना पड़ता है.
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इमेज कैप्शन, दोआब बेल्ट के किसानों का कहना है, ''जो हम 100 रुपए दिहाड़ी पर मजदूर खरीदते थे, आज हमें ढाई सौ से तीन सौ रुपए में मिलता है, वह भी कभी-कभी नहीं मिलता. जब हमें काम की ज़रूरत होती है तो ज़्यादा पैसा देना पड़ता है. वो सारी ज़मींदार की कमाई है जो अब उसे नहीं मिलती.''
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इमेज कैप्शन, पंजाब मंडी बोर्ड के चेयरमैन अजमेर सिंह लक्खोवाल ने कहा, ''यूपी और बिहार में जब रोजगार नहीं था तब मज़दूर पंजाब आते थे. मनरेगा के तहत रोजगार मिलने के बाद उन्होंने पंजाब आना बंद कर दिया. इस वजह से कॉस्ट ऑफ़ प्रोडक्शन बढ़ी है. पहले जानवरों का चारा काटने पर 1500 रुपये का खर्च आता था. अब यह खर्च प्रति एकड़ 3000 रुपये हो गया है.''
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इमेज कैप्शन, किसानों ने आरोप लगाया कि ज़मींदारों का मसीहा बनने वाली अकाली-भाजपा सरकार ने उन जैसे किसानों के लिए कुछ नहीं किया है. आगे कुछ होगा, इसकी भी उन्हें उम्मीद नहीं है. (सभी तस्वीरें- अजय शर्मा/बीबीसी)