मुज़फ्फरनगर: बेबस औरतें, बेख़बर बच्चे...

दिसंबर के महीने की ठंड, खुले आकाश के नीचे कैंपों में रह रहे मुज़फ्फरनगर के दंगा प्रभावित परिवारों के औरतों और बच्चों की बदहाली तस्वीरों की ज़ुबानी.

मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, चार महीने गुज़र जाने के बाद भी लोग अपने घरों को वापिस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं. औरतें भी यही कहती हैं कि घर नहीं जाएंगे भले ही जिंदगी चली जाए.
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इमेज कैप्शन, हिंसा और माहौल ने बच्चों के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रखा है. उस्मान को नहीं पता कि उसे खुले आसमान के नीचे कब तक हालात सुधरने का इंतज़ार करना होगा.
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, इन बूढ़ी आंखों का एक ही ख़्वाब है कि सिर से उजड़ी छत दोबारा बस जाए.
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, इन लोगों की मांग है कि उन्हे भी मुआवज़ा दिया जाए ताकि वो अपने लिए थोड़ी ज़मीन लेकर दोबारा ज़िंदगी बसर कर सकें.
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, घर छोड़ने के वक्त कई औरतें गर्भवती थी जिनके बच्चे ठंड लग जाने से बच नहीं सके.
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, गिरते पारे में इन मासूम ज़िंदगियों को कैसे बचाया जाएगा इस पर कुछ भी कहना मुमिकन नहीं है
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, मुज़फ्फरनगर के लोई कैंप में बुर्ज़ुंगों की जान जाने की भी ख़बर है. इन्होने कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि उम्र के इस पड़ाव पर यूं बेबसी झेलनी होगी
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, खाने-पीने का सामान कुछ ग़ैर-सरकारी संस्थानों और आस-पास के गांवों से भी आ रहा है. कुछ कैंपों में सरकारी कर्मचारी कंबल बांटते भी दिखे.
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, हिंसा और दंगे का शिकार क्षेत्रों में बच्चे तो बेख़बर हैं लेकिन जो स्थितियां पैदा हुई हैं वो उसके सबसे बड़े शिकार है जो अपने हक़ में कुछ करने में सक्षम नहीं.
मुज़फ्फरनगर लोई कैंप
इमेज कैप्शन, सवाल ये है कि यहां से आगे बढ़ने का रास्ता क्या है.इन बिखरी जिंदगियों को संभालने की ज़िम्मेदारी अगर समाज और प्रशासन नहीं लेगा तो जवाबदेह कौन है.