अजीत डोभाल और एम.के. नारायणन का नाम जासूसी की दुनिया में इज़्ज़त से क्यों लिया जाता है?

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, डोभाल और नारायणन
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आमतौर से ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख अपनी आत्मकथा लिखने से कतराते हैं और अगर लिखते भी हैं तो अपने साथियों का खुलेआम ज़िक्र करने से परहेज़ कर जाते हैं. रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख रहे अमरजीत सिंह दुलत की हाल में प्रकाशित आत्मकथा 'अ लाइफ़ इन द शैडोज़ अ मेमॉएर' इस मामले में अपवाद है.

इस किताब में उन्होंने अपने बॉस रहे एम.के. नारायणनन और अपने जूनियर रहे अजीत डोभाल की कार्यशैली पर अपनी बेबाक राय प्रकट की है.

दुलत लिखते हैं, "मैंने इंटेलिजेंस ब्यूरो के दिल्ली मुख्यालय में डेस्क पर एक विश्लेषक के रूप में चार साल बिताए हैं. तब मुझे नॉर्थ ब्लॉक में एमके नारायणन के साथ कमरा शेयर करने का सौभाग्य मिला था. उस ज़माने में मेरे सबसे बड़े बॉस ए.के. दवे हुआ करते थे. उनके नीचे थे आर के खंडेलवाल जिन्हें नारायणन 'कैंडी' कह कर पुकारते थे."

"दवे को सनक थी कि वो देखें कि फ़ाइल पर आप किस तरह से नोटिंग करते हैं. अक्सर वो अपने साथियों की फ़ाइल पर नोटिंग पर झल्ला कर कहते थे इससे अच्छा तो एक सब-इंसपेक्टर लिख सकता है. कई बार तो नारायणन भी उनकी इस सनक से खीज जाते थे. दूसरी तरफ़ के.एन. प्रसाद होते थे जो बाहर से तो बहुत कठोर दिखते थे लेकिन अंदर से बहुत शालीन थे और युवाओं को वो सब कुछ सिखाने के लिए तत्पर रहते थे जो वो जानते थे."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, HarperCollins India

साम्यवाद के सबसे बड़े विशेषज्ञ थे नारायणन

ए.एस. दुलत मानते हैं कि उन्होंने ख़ुफ़िया जानकारी के विश्लेषण के गुर नारायणन को काम करते देख सीखे थे. उनसे उन्होंने ये भी सीखा कि फ़ील्ड से आने वाली हर उत्साही ख़ुफ़िया अधिकारी की रिपोर्ट को किस तरह टोन डाउन किया जाता है. नारायणन ने उन्हें ये भी सिखाया कि अगर संभव हो तो आप जो कुछ भी कहना चाहते हैं एक पेज के अंदर कह डालिए.

दुलत लिखते हैं, "जब नारायणन के पास किसी विषय की फ़ाइल आती थी तो वो उसे अपने पास कुछ समय के लिए रखते थे और उस पर गहन मंत्रणा करने के बाद अपना प्रेजेंटेशन देते थे. भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों में साम्यवाद के सबसे बड़े विशेषज्ञ नारायणन थे. उस समय उनसे मेरा संपर्क सीमित रहा करता था लेकिन मुझे हमेशा ये अहसास रहता था कि मैं एक महान व्यक्तित्व की उपस्थिति में काम कर रहा हूँ. बाद में मुझे इस तरह का अहसास आर.एन. काव की उपस्थिति में हुआ था."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, आईबी के पूर्व प्रमुख एम.के. नारायणन

इंतज़ार के खेल के माहिर थे नारायणन

काव साहब नारायणन से इस मामले में अलग थे कि वो बहुत चुपचाप रहते थे और लोगों से कम खुलते थे. उनके बारे में कहानी मशहूर थी कि जब तक वो रॉ के प्रमुख के पद पर रहे उनकी तस्वीर न तो किसी पत्रिका में दिखाई दी और न ही किसी अख़बार में.

नारायणन जहाँ प्राप्त जानकारी का काफ़ी समय तक विश्लेषण करते थे, काव एक्शन में विश्वास करते थे. वो ऑपरेशन मैन थे, जिनको अपने सहज ज्ञान पर बहुत भरोसा था. दोनों के व्यक्तित्व में ख़ासा फ़र्क था लेकिन दोनों भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के बेहतरीन शख़्स थे.

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Bloomsburg

इमेज कैप्शन, आईबी के पूर्व प्रमुख रामनाथ काव

दुलत लिखते हैं, "अगर नारायणन आप को पसंद करते थे तो उनको आपकी हर चीज़ पसंद आती थी, लेकिन अगर इसका उलटा होता था तो आपकी मुसीबतों का कोई अंत नहीं होता था. हालांकि वो उस समय असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर काम कर रहे थे, लेकिन वो तब तक विभाग में बहुत मशहूर हो चुके थे."

"जानकारी की बहुतायत होने के बावजूद वो फ़ैसला लेने में जल्दबाज़ी नहीं करते थे. कई बार तो वो एक फ़ाइल को पढ़ने में घंटों, दिनों और कभी कभी महीनों तक लगाते थे. यही वजह थी कि उनका विश्लेषण हमेशा उच्च कोटि का हुआ करता था. नारायण से ही मैंने सीखा था कि कोई निष्कर्ष निकालने से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार करना सबसे अच्छा होता है. इंटेलिजेंस हमेशा से ही इंतज़ार का खेल रहा है. अब तक जितने भी लोगों से मेरा पाला पड़ा है इस खेल को खेलने में नारायणन से पारंगत कोई नहीं था."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

मलिक मानते थे नारायणन को एशिया का सबसे अच्छा इंटेलिजेंस अधिकारी

नारायणन की नज़र हमेशा तेज़ रहती थी. हालांकि वो दुलत से कहीं सीनियर थे लेकिन उन्हें बहुत पहले ये आभास हो गया था कि वो अपने बॉस आरके खंडेलवाल से बहुत ख़ुश नहीं हैं. लेकिन उनकी भी एक कमज़ोरी थी कि वो अपनी हीरो वरशिप कराना पसंद करते थे.

उनको अपनी ख्याति का अंदाज़ा था और वो हमेशा चाहते थे कि उनकी तारीफ़ों के पुल बाँधे जाएं. इसकी कमी उन्हें कभी नहीं हुई. जवाहरलाल नेहरू के इंटेलिजेंस चीफ़ रहे बी.एन मलिक, जिन्होंने एक किताब लिखी थी 'माई इयर्स विद नेहरू,' एमके को एशिया का सर्वश्रेष्ठ ख़ुफ़िया अधिकारी मानते थे.

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Allied Publishers

ए.के. दुलत लिखते हैं, "मैंने नारायणन को कई बार शुक्रवार की साप्ताहिक बैठक को संबोधित करते हुए देखा है. जब वो बोलते थे तो उनके सम्मान में कमरे में पिन ड्रॉप शाँति छा जाती थी. उनको हमेशा पता रहता था कि किस इलाके में क्या हो रहा है. वो ये बात भी पसंद करते थे कि हर जानकारी के लिए उनपर निर्भर रहा जाए और किसी भी विषय की जानकारी लेने के लिए सबसे पहले उन्हें बुलाया जाए."

"इस मामले में वो एफ़बीआई के पूर्व प्रमुख एडगर हूवर की तरह थे. उनके बारे में मशहूर था कि उनके पास हर विषय और हर उस व्यक्ति के बारे में फ़ाइल थी जिनसे अपने जीवन में वो कभी मिले थे. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में उनसे बेहतर चलना कोई नहीं जानता था."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

राजीव गाँधी से नारायणन की निकटता

गाँधी परिवार का उनमें बहुत विश्वास था. यही वजह है कि ख़ुफ़िया दुनिया में वो हमेशा प्रासंगिक रहे. ख़ासतौर से राजीव गाँधी ख़ुफ़िया जानकारी के लिए नारायणन पर बहुत निर्भर रहा करते थे. राजीव गांधी को खुफ़िया जानकारी लेने का बहुत शौक था. उनको इसका अंदाज़ा था कि ख़ुफ़िया जानकारी से विदेश नीति को किस तरह प्रभावित किया जा सकता है.

दुलत लिखते हैं, "वो नारायणन से मिलना बहुत पसंद करते थे और उनका बहुत सम्मान भी करते थे. उनकी देर रात बैठक होती थी जिसमें नारायणन को कॉफ़ी और चॉकलेट सर्व की जाती थी."

"राजीव हमेशा ये जानने के लिए उत्सुक रहते थे कि दिल्ली में विदेशी दूतावासों की क्या गतिविधियाँ हैं. एक बार तो इंटेलिजेंस ब्यूरो की टोही टीम के साथ अरुण सिंह और अरुण नेहरू भी ये देखने के लिए गए थे कि ज़मीन पर क्या हो रहा है."

"नारायणन ने मुझे एक बार बताया था कि एक ख़ास जानकारी देने पर वो उनके पीछे पड़ गए थे कि वो इस जानकारी का स्रोत बताएं. लेकिन नारायणन का जवाब था- प्रधानमंत्री, मेरा काम है आपको जानकारी देना लेकिन आपको ये पूछने का हक नहीं है कि ये जानकारी मुझे कहाँ से मिली है."

राजेश पायलट को जब कश्मीर का इंचार्ज बनाया गया था तो वो कश्मीर की ज़मीनी हक़ीक़त जानने के लिए नारायणन के पास ही जाया करते थे.

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल (दाएं)

अजीत डोभाल ने सबसे पहले संपर्क किया था नवाज़ शरीफ़ से

नारायणन के ज़माने में ही अजीत डोभाल एक उभरते हुए सितारे थे. अजीत पर पहली बार सबकी नज़र तब गई जब उन्हें पूर्वोत्तर में मिज़ोरम में काम करने भेजा गया.

सत्तर के दशक में आइज़ोल के ज़िला मजिस्ट्रेट रहे और बाद में भारत के गृह सचिव बने वी.के. दुग्गल बताते हैं कि उन दिनों डोभाल मिज़ोरम में फ़ील्डमैन हुआ करते थे. भूमिगत हो गए लोगों से उनके अच्छे संबंध हुआ करते थे.

सन 2006 में डोभाल ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को एक इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने कहा था, "एक बार मैंने लालडेंगा के मिज़ो नेशनल फ़्रंट के विद्रोहियों को अपने घर खाने पर बुलाया. उनके पास भारी हथियार थे. मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि वो सुरक्षित रहेंगे. मेरी पत्नी ने उनके लिए सूअर का माँस बनाया. हालांकि उससे पहले उसने कभी सूअर का माँस नहीं बनाया था."

ये विवरण बताता है कि ज़रूरत पड़ने पर डोभाल लीक से हटकर काम कर सकते थे.

सन 1982 से 1985 तक कराची में भारत के काउंसल जनरल रहे जी. पार्थसार्थी बताते हैं कि 'डोभाल ने सबसे पहले नवाज़ शरीफ़ से संपर्क स्थापित किया था. तब उन्होंने पाकिस्तान की राजनीति में उभरना शुरू किया ही था. जब 1982 में भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान दौरे पर लाहौर पहुंची, तो डोभाल के कहने पर ही नवाज़ शरीफ़ ने अपने घर के लॉन में भारतीय टीम को दावत दी थी.'

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Reuters

इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़

परेशन ब्लैक थंडर में डोभाल की भूमिका

सन 1988 में हुए ऑपरेशन ब्लैक थंडर-टू में डोभाल की भूमिका ने उनकी ख्याति में चार चाँद लगा दिए थे. उनके जीवनीकारों का कहना है कि जब चरमपंथी स्वर्ण मंदिर के अंदर घुसे हुए थे तो डोभाल भी अंडर कवर के रूप में मंदिर के अंदर घुसे हुए थे.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अजीत डोभाल के जीवनवृत्त में यतीश यादव ने लिखा था, "सन 1988 में स्वर्ण मंदिर के आसपास रहने वाले अमृतसर के निवासियों और खालिस्तानी लड़ाकों ने एक व्यक्ति को रिक्शा चलाते हुए देखा. उसने उन लड़ाकों को विश्वास दिला दिया कि वो आईएसआई का सदस्य है और उसे ख़ासतौर से उनकी मदद करने के लिए भेजा गया है."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

"ब्लैक थंडर ऑपरेशन शुरू होने से दो दिन पहले वो रिक्शा चलाने वाला स्वर्ण मंदिर में घुसा और वहाँ से महत्वपूर्ण जानकारी लेकर बाहर लौटा. उसने पता लगाया कि मंदिर के अंदर कितने चरमपंथी थे."

ये रिक्शेवाला और कोई नहीं अजीत डोभाल थे. जहाँ तक कश्मीर की बात है डोभाल ने पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के साथ संपर्क स्थापित किए.

दुलत लिखते हैं, "कश्मीर में मैंने कभी डोभाल के काम में हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि मुझे पता था कि वो एक ऐसे शख़्स हैं जो मुझे परिणाम देंगे. डोभाल मुझसे बेहतर जासूस थे क्योंकि वो चीज़ों को निर्लिप्त होकर देखते थे इसलिए उनके लिए सोच समझ कर फ़ैसले लेना आसान था."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

डोभाल को अपहरणकर्ताओं से बातचीत करने के लिए कांधार भेजा गया

दुलत आगे लिखते हैं, "जब 1999 में भारतीय विमान का अपहरण कर कांधार ले जाया गया तो ब्रजेश मिश्रा ने मुझसे और श्यामल दत्ता से कहा कि वहाँ बातचीत करने के लिए अपने लोग भेज दो. मेरी नज़र में इस काम के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे सी.डी. सहाय और आनंद आर्नी, क्योंकि वो दोनों ऑपरेशनल अफ़सर थे और अफ़गानिस्तान को अच्छी तरह से समझते थे. लेकिन श्यामल दत्ता ने कहा कि इंटेलिजेंस ब्यूरो में इस काम को अजीत डोभाल और नहचल संधू से बेहतर कोई नहीं कर सकता."

"आखिर में इन दोनों को ही कांधार भेजा गया. उनके साथ उस समय विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव के तौर पर काम कर रहे विवेक काटजू भी गए. मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि कांधार से सी.डी. सहाय की बजाए डोभाल वहाँ का सारा नज़ारा मुझे बता रहे थे. उन्होंने मुझसे कहा, 'जल्दी फ़ैसला करवाइए. यहाँ बहुत प्रेशर है. पता नहीं क्या हो सकता है इधर."

लालकृष्ण आडवाणी ने कभी ऊपरी तौर पर नहीं कहा, लेकिन वो चरमपंथियों से बातचीत करने के पक्ष में नहीं थे.

आडवाणी का व्यक्ति होने के नाते संभवत: डोभाल की भी यही राय थी. यात्रियों की जगह चरमपंथियों की रिहाई का एक और शख़्स विरोध कर रहे थे और वो थे जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला.

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने किया था चरमपंथियों को छोड़ने का विरोध

अपनी एक और किताब 'कश्मीर द वाजपेई इयर्स' में ए.एस. दुलत ने लिखा है कि जब फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने चरमपंथियों को रिहा करने से इनकार कर दिया तो उन्हें मनाने के लिए दुलत को श्रीनगर भेजा गया.

दुलत लिखते हैं, "जब फ़ारूक़ ने मुझे देखा तो वो बोले तुम फिर आ गए? रुबैया सईद के अपहरण के समय भी तुम आए थे. मैंने कहा 'सर, उस समय मैं आपके साथ था, लेकिन इस बार मैं भारत सरकार के साथ हूँ. उस समय मैं आपकी तरफ़ से सरकार से बात कर रहा था. इस बार मैं सरकार की तरफ़ से आपके पास आया हूँ.'

"फ़ारूक़ ने कहा कि दो पाकिस्तानियों मसूद अज़हर और उमर शेख़ के साथ आप जो करना चाहे करें लेकिन मैं उस कश्मीरी मुश्ताक अहमद ज़रगर को नहीं छोड़ूँगा क्योंकि उसके हाथ पर कश्मीरियों के ख़ून के निशान है."

इसके बाद फ़ारूक़ शेख़ दुलत के साथ कश्मीर के राज्यपाल गैरी सक्सेना के पास गए. उन्होंने उनसे कहा कि "मैंने रॉ के प्रमुख को बता दिया है कि मैं इन चरमपंथियों को छोड़ने के फ़ैसला का हिस्सा नहीं बन सकता. मैं इस्तीफ़ा देना पसंद करूँगा और यही करने मैं यहाँ आया हूँ."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Harper collins

गैरी सक्सेना ने ब्लैक लेबेल स्कॉच की एक बोतल निकाली और फ़ारूक़ से कहा, "डाक्टर साहब आप लड़ाके हैं. आप इतनी आसानी से हार नहीं मान सकते." फ़ारूक़ ने कहा, "ये लोग नहीं जानते कि ये चरमपंथियों को छोड़कर कितनी बड़ी ग़लती कर रहे हैं."

गैरी ने कहा, "आप सौ फ़ीसदी सही हैं लेकिन इस समय कोई विकल्प नहीं है. इस बारे में दिल्ली में ज़रूर बात हुई होगी. अगर उनका मानना है कि इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं है तो हमें उनका साथ देना चाहिए. अगले दिन मसूद अज़हर और ज़रगर को रॉ के गल्फ़स्ट्रीम विमान में बैठा कर मैं ही श्रीनगर से दिल्ली ले गया था."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन

इमेज स्रोत, Getty Images

डोभाल अपने करियर के पीक पर पहुंचे

कांधार हाइजैक में चरमपंथियों को छोड़ने की वजह थी कि भारत सरकार द्वारा फैसला लेने में बहुत देर कर देना.

दुलत लिखते हैं कि 'कंधार में हो रही मंत्रणा की पूरी जानकारी डोभाल उन्हें सेटेलाइट फ़ोन से देते रहे. उन्होंने कहा कि यहाँ रहना बहुत मुश्किल हो रहा है, क्योंकि वो अब धमकी देने लगे हैं कि अगर आप समझौता नहीं करना चाहते तो यहाँ से चले जाइए. मुझे शुरू से ही पता था कि डोभाल एक दिन अपने करियर के पीक पर पहुंचेंगे. इस ज़िम्मेदारी के लिए डोभाल से उचित व्यक्ति कोई था ही नहीं."

भारत जासूसी डोभाल दुलत नारायणन
इमेज कैप्शन, रॉ के पूर्व प्रमुख ए.एस.दुलत के साथ रेहान फ़ज़ल

"जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के लिए पहले हरदीप पुरी का नाम लिया गया था. लेकिन अरुण जेटली के सिवा बीजेपी में उनका कोई समर्थक नहीं था. आख़िर में नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल के नाम पर अपनी मोहर लगाई."

"जब सन 2004 में मैं प्रधानमंत्री कार्यालय छोड़ रहा था तो नारायणन ने मुझसे पूछा था कि अब कश्मीर कौन देखेगा? तब मैंने बिना किसी संकोच के जवाब दिया था डोभाल. तभी नारायणन ने मुझसे कह दिया था, नहीं, डोभाल कश्मीर नहीं देखेंगे क्योंकि वो इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर बनने जा रहे हैं."

दिलचस्प बात है कि बीजेपी के विरोधी कांग्रेस के कार्यकाल में अजीत डोभाल को इंटेलिजेंस ब्यूरो का प्रमुख बनाया गया था.

जेएन दीक्षित के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने एम.के. नारायणन खुलेआम कहा करते थे, "जब किसी मामले में मुझे नर्म रुख़ अपनाना होता है तो मैं अमरजीत सिंह दुलत को इस्तेमाल करता हूँ लेकिन जब मुझे कभी डंडे से काम लेना होता है तो मैं डोभाल को बुलवाता हूँ."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)