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दलित यौनकर्मी से पंजाब की कवयित्री बनने की कहानी
'ना मैं मुसलमान हूँ ना हिंदू. ना मैं समाज के चार वर्ण यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र को मानती हूँ और ना ही किसी ख़ास तरह के भेष धारण करने को.'
ये शब्द आज से लगभग दो सौ साल पहले लिखे गए थे और बुलंदी से तब के पितृसत्तात्मक, जातिवादी और धार्मिक रूढ़िवादिता भरे समाज को चुनौती दे रहे थे.
पंजाब के कुछ इतिहासकार इसे लिखने वाली पीरो प्रेमण को पंजाब की पहली कवयित्री तक मानते हैं, वहीं कुछ जगहों पर पीरो का असली नाम आयशा होने का ज़िक्र भी मिलता है.
पीरो पर लिखी गई एक पंजाबी किताब 'सुर पीरो' के मुताबिक़ उनका जन्म सन् 1810 के आस पास माना जाता है. पीरो एक ग़रीब परिवार और निचली जाति से आती थीं.
पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जसबीर सिंह ने बीबीसी पंजाबी से कहा, "पीरो के शुरुआती जीवन पर नज़र डालें तो वो बहुत ही डिस्टर्ब रहा है."
वे आगे कहते हैं, "जिस आदमी से उनकी शादी हुई उसकी मौत के बाद उन्हें बहुत कम उम्र में ही देह व्यापार में धकेल दिया गया.
उन्हें लाहौर की हीरा मंडी में बेच दिया गया. लेकिन वे जैसे-तैसे वहां से भाग निकलीं और साधु गुलाबदास के डेरे तक पहुंच गईं. उन्हें लेकर वहां विवाद हुआ लेकिन विवाद सुलझने पर वहां रहने लगती हैं."
पीरो के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, लेकिन जसबीर सिंह के मुताबिक़ गुलाबदास के डेरे पर ही कविताओं की तरफ़ उनका आग्रह बढ़ा और उनका नाम पीरो प्रेमण पड़ गया.
इतिहासकार डॉ. राज कुमार हंस ने बीबीसी को बताया, "पीरो उनका असल नाम नहीं था. उनका असल नाम आयशा था लेकिन जब वे गुलाबदास से संपर्क में आईं और डेरे में आकर रहने लगीं. वे इतनी गुणी और ज्ञानी थीं कि उन्हें पीर का दर्जा दिया गया. लेकिन वो औरत थीं तो पीर से उनका नाम पीरो रख दिया गया. उन्हें पीरो प्रेमण इसलिए कहा जाता था क्योंकि वो पीरो या पीर तो हैं ही लेकिन बहुत बड़ी प्रेमण भी हैं. और ये प्रेमण किसकी हैं, तो वो हैं गुलाबदास और ऊपरवाले की."
यही पीरो आंदोलनकारी कविताएं भी लिख रही थीं. ये उन्नीसवीं सदी का वो दौर था जब पंजाब में राजनीतिक उथल-पुथल हो रही थी और महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद यह रियासत धीरे-धीरे ब्रिटिश राज का हिस्सा बन रहा था.
इस माहौल में पीरो अपनी आंदोलनकारी कविताओं के ज़रिए सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दे रहीं थीं.
पीरो मानती थीं कि समाज को जिस ऊंच-नीच या भेदभाव के बंधन में बांधा जा रहा है वो कुदरत के नियम के ख़िलाफ़ है.
डॉ जसबीर सिंह ने इस बारे में बताया, "वो अपनी कविताओं के ज़रिए चुनौती देती थीं कि आपने सुन्नत कर ली और मूंछ मुंडवा ली तो आप तुर्क हो गए. चुटिया रख ली तो ब्राह्मण हो गए और सिख धर्म पर भी वो ऐसे ही टिप्पणी करती हैं. फिर वो कहती हैं कि औरत के पास तो ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे वो किसी धर्म को अपना सके."
"इसका मतलब ये हुआ कि ये जो ख़ास किस्म का धार्मिक कट्टरवाद है जो प्रतीकों या पहचान पर टिका हुआ है वो उन्हें चुनौती देती हैं कि ये धर्म नहीं है. धर्म तो इससे बड़ी एक घटना है. जो वो खुद के लिए टाइटिल इस्तेमाल कर रही हैं उसमें वे अपने लिए वैश्य या गणिका का प्रयोग कर रही है जो भक्ति परंपरा में भी आता है."
जसबीर सिंह कहते हैं, "पितृसत्ता, औरत पर एक ख़ास किस्म की पहचान लागू करती है और वो उन्हीं के इस माध्यम से और उन्हीं की भाषा में चुनौती देती हैं. इसी तरह को जात-पात को लेकर भी वो ये बताने में नहीं झिझकीं कि वो निचली जाति से आती हैं या वो शुद्र हैं. तो ये जो समाज को ग्रेड में बांट दिया गया है चाहे वो धर्म का हो या पितृसत्ता, जात-पात का हो वो सबको चुनौती देती हैं."
पीरो के बारे में जितनी जानकारी उपलब्ध है उसके अनुसार उन्होंने करीब 160 काफ़िये लिखे.
पीरो अपने तजुर्बों के आधार कविताएँ लिखतीं थीं. बेबाकी से समाज में रहकर उन्हीं से सवाल पूछना उस ज़माने में यक़ीनन क्रांतिकारी था.
पीरो को पढ़ने वाले लोग उन्हें उन्नसवीं सदी में पितृसत्ता, जातिवाद और धार्मिक रूढ़िवादिता के ख़िलाफ़ एक प्रतीक मानते हैं. वहीं इतिहासकार मानते है कि पंजाब में कई महिलाएं निर्भिक हो कर अपनी लेखनी के ज़रिए आवाज़ उठा रही है, उठाती रही हैं - इस जज़्बे को पीरो की कलम ने नयी धार दी - इससे इंकार नहीं किया जा सकता.
स्टोरी- नवदीप कौर, प्रोड्यूसर- सुशीला सिंह
(हमारी पुरखिन भाग दो की ये आख़िरी कड़ी थी. उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी पुरखिन की सभी कहानियां पसंद आईं होंगी. आप ऐसी और महिलाओं के बारे में पढ़ना या जानना चाहते हैं, तो हमें ज़रूर बताएं.)
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