ब्लॉग: जजों और सरकार के बीच दोस्ती के जोख़िम क्या क्या हैं?

दीपक मिश्रा

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    • Author, राजेश जोशी
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी हिंदी रेडियो

पिछले हफ़्ते दो अभूतपूर्व घटनाएँ हुईं जिन्हें आप चाहें तो 'मामूली बात' कहकर ख़ारिज कर सकते हैं, या फिर अगर बारीकी से देखें तो ये घटनाएँ आपको चिंतित कर सकती हैं.

हाल ही में पटना हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह ने बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री की तारीफ़ में कहा कि "नरेंद्र मोदी एक मॉडल हैं, वो एक हीरो हैं."

दूसरी घटना छत्तीसगढ़ की है जहाँ राज्य सरकार के जनसंपर्क विभाग ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की तस्वीरों वाली बड़ी बड़ी होर्डिंग्स रायपुर शहर में लगा दीं जिनमें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर पहली बार छत्तीसगढ़ आने के लिए उनका स्वागत किया गया था.

हालाँकि, रिपोर्टों के मुताबिक़ बाद में इनमें से कुछ होर्डिंग्स को उतार दिया गया था.

सतही तौर पर देखें तो दोनों घटनाएँ बेहद मामूली नज़र आएँगी.

क्या न्यायाधीश किसी नेता की तारीफ़ नहीं कर सकते?

भारत के किसी भी नागरिक को, चाहे वो न्यायाधीश ही क्यों न हो, किसी की तारीफ़ या आलोचना करने का संवैधानिक अधिकार है.

देश के नागरिक और वोटर की हैसियत से जज़ भी किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के काम या विचारधारा से सहमत होकर उसे वोट देते हैं.

जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह

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जज होने के कारण उनका ये जनतांत्रिक अधिकार कम नहीं हो जाता.

लेकिन जब कोई जज न्याय की कुर्सी पर बैठा होता है तो कई बार उसे नागरिक के तौर पर अपनी पसंद के नेता, राजनीतिक पार्टी यहाँ तक कि सरकार के ख़िलाफ़ भी फ़ैसला करना पड़ सकता है.

इसीलिए हमारी शासकीय प्रणाली में न्यायपालिका को सरकारों से आज़ाद रखा गया है.

न्यायपालिका को सरकार का अंग इसीलिए नहीं माना जाता कि वो सरकार और उसके मुखिया के ख़िलाफ़ भी फ़ैसले करती है.

न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा डिगा तो...

जनता की नज़रों में न्याय करने वाला सत्ता से ऊपर भले ही न हो पर आज़ाद ज़रूर होना चाहिए.

तभी न्याय की व्यवस्था में जनता का भरोसा बना रह सकता है.

जब तक ये भरोसा बना रहता है तब तक जनता न्याय की तलाश में पुलिस-प्रशासन और नौकरशाही के ज़रिए अदालत तक जाती है.

जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह

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जहाँ ये भरोसा दरकने लगता है लोग अपने अपने तरीक़े और नज़रिए से ख़ुद ही "न्याय" करने लग जाते हैं.

दुनिया के कई देशों में इसी तरह से अराजकता फैली है और वहाँ अदालतें नहीं बल्कि विजिलांती संगठन, मिलिशिया और अपराधियों के गिरोह फ़ैसला करते हैं.

ज़्यादातर मामलों में दुश्मन के ख़िलाफ़ ये फ़ैसले सड़क पर ही किए जाते हैं.

ये बात जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह ही बेहतर जानते हैं कि जब वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "हीरो और मॉडल" बता रहे थे तो क्या ये उन्होंने ये राय एक आम नागरिक की हैसियत से दी थी या पटना हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस के तौर पर.

और क्या उनकी राय में मोदी उनके अपने मॉडल और हीरो हैं या वो ये बात पूरे देश के लोगों की ओर से कह रहे थे?

पटना हाईकोर्ट के जज ने की मोदी की तारीफ़

रिपोर्टर ने जस्टिस शाह से उनके गुजरात कनेक्शन के हवाले से सवाल किया था कि "सब लोग आपको मोदी से जोड़ लेते हैं, ऐसा क्यों होता है?"

दीपक मिश्रा

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जस्टिस शाह चाहते तो कह सकते थे कि लोगों की राय पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है और सबको अपनी बात कहने का हक़ है.

लेकिन उन्होंने जवाब में मोदी के बारे में अपनी राय स्पष्ट शब्दों में प्रकट की और कहा, "क्योंकि नरेंद्र मोदी एक मॉडल हैं, वो एक हीरो हैं."

सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि न्यायाधीश उनकी तरफ़दारी करें? सरकारें और सत्तारूढ़ पार्टियाँ क्यों नहीं चाहेंगी कि क़ानून के हाथ जब उनके किसी बड़े नेता तक पहुँचने वाले हों तभी कोई अदृश्य शक्ति इस हाथ को पीछे खींच ले?

सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि उनके हर सफ़ेद-सियाह पर अदालतें अपनी मुहर लगाएँ ताकि उनको सबकुछ करने की छूट मिल जाए, जैसा कि इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी ने चाहा और करवाया?

सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि देश के हर नागरिक की आँखों की पुतलियों की तस्वीरें, अँगुलियों के निशान, फ़ोन नंबर, बैंक खाते, मकान-दुकान, पत्नी-बच्चे, माता-पिता, चाचा-ताऊ-बिरादर और रिश्तेदारों की सब जानकारियाँ उसकी मुट्ठी में हो?

सरकारें ज़रूर जानना चाहेंगी कि आप क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं, कौन से कपड़े पहनना पसंद करते हैं, इंटरनेट पर कितना समय और क्या देखने में बिताते हैं, किस पार्टी को अच्छा और किसे बुरा समझते हैं, ट्रेड यूनियन को नेतागिरी मानकर ख़ारिज करते हैं या इसे कामगारों का बुनियादी अधिकार मानते हैं.

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सरकारों की ऐसी ही कई असंवैधानिक मनमानियों पर अंकुश लगाने का काम न्यायाधीशों का है. पर अगर न्यायाधीश सरकार चलाने वालों को "हीरो और मॉडल" कहने लगे तो इसे उनकी सहानुभूतियों के संकेत की तरह देखा जा सकता है और न्याय की कुरसी पर बैठे व्यक्ति के बारे में इस आधार पर ग़लत-सही धारणाएँ बना ली जा सकती हैं.

छत्तीसगढ़ में जो हुआ वो ग़लत क्यों है?

जस्टिस दीपक मिश्रा के राज्य आगमन पर रमन सिंह सरकार को बड़े बड़े होर्डिंग्स के ज़रिए हर ख़ास ओ आम को ये बताने की क्या ज़रूरत पड़ गई कि वो वाक़ई ख़ुश है?

इसमें जस्टिस दीपक मिश्रा कुछ नहीं कर सकते थे पर राज्य सरकार की मंशा छिपाए नहीं छिपती क्योंकि कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ के एक गंभीर मामले में वो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अदालत में अपना बचाव करने के लिए पेश हो रही है.

सिर्फ़ इसी वजह से जस्टिस मिश्रा के स्वागत में होर्डिंग्स लगाने के अर्थ बदल जाते हैं.

छह अगस्त को छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के कोंटा क्षेत्र में हुई एक कथित मुठभेड़ में राज्य सरकार ने 15 माओवादियों को मारने का दावा किया था.

एक मानवाधिकार संगठन ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है और छत्तीसगढ़ सरकार पर आम गाँव वालों को मार डालने का आरोप लगाया है.

सुप्रीम कोर्ट

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छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे फ़र्ज़ी याचिका बताया है और फ़ैसला अब जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच को करना है.

अगर ऐसे होर्डिंग्स एसोसिएशन या वकीलों की कोई संस्था लगवाती तो बहुत सामान्य सी बात होती, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसा करके ख़ुद जस्टिस दीपक मिश्रा के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है.

पुरानी कहावत है कि अदालत का काम न्याय करना ही नहीं है बल्कि ये दिखाना भी है कि न्याय किया जा रहा है.

जस्टिस मिश्रा के सामने ऐसे कई मामले हैं जिनपर उन्हें न्याय भी करना है और न्याय होते हुए दिखाना भी है.

जब ऐसे मामलों की गहन सुनवाई चल रही हो तब इस विवाद से जुड़ी बीजेपी और उसकी सरकारों से उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वो सुनवाई कर रहे न्यायाधीश से दूरी बनाकर चले?

रमन सिंह की सरकार ने जस्टिस दीपक मिश्रा के स्वागत में होर्डिंग्स लगवाकर उनका स्वागत नहीं किया बल्कि न्याय की कुर्सी पर राजनीति की छाया डालने की कोशिश की है.

इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी ने न्यायपालिका को सत्ता के लोहे से बने बूट तले दबा दिया था और — चंद अपवादों को छोड़कर — मनमाने फ़ैसले करवाए.

इमरजेंसी को इसीलिए भारतीय जनतंत्र के इतिहास की सियाह तारीख़ के तौर पर देखा जाता है और उस सियाह तारीख़ का दोहराव कोई नहीं चाहता.

इसलिए न्यायमूर्तियों को ही तय करना होगा कि वो न्याय की मूर्तियों को खंडित होने से कैसे बचाएँगे.

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