आसान नहीं हैं जम्मू कश्मीर के बकरवालों की ज़िंदगी

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, जम्मू कश्मीर के वेरीनाग से, बीबीसी हिंदी के लिए
जब मैं वेरीनाग के वोमोह इलाक़े की ऊंची पहाड़ियों पर चढ़ रहा था तो वहां की पहाड़ियों के बीच एक खुले मैदान में जम्मू से वापस लौटे कई बकरवाल परिवार अपना डेरा संभाल रहे थे.
यासिर अहमद ख़ान ने अपने परिवार के साथ दो दिन पहले दक्षिणी कश्मीर के वेरीनाग इलाक़े के पीर पंजाल पहाड़ियों के बीचोंबीच एक खुले मैदान को कुछ दिनों के लिए अपना घर बनाया है.
यहां उनके साथ अपने बकरवाल समुदाय के कई और परिवार भी हैं जो आसपास ही डेरा डाले हुए हैं.
जैसे-जैसे अंधेरा घना हो रहा था बकरवाल महिलाएं दूर से पानी के मटके कन्धों पर ले कर घर लौट रही थीं. इसके बाद वो खाना बनाने में जुट गईं. उनकी मदद करने के लिए परिवार के पुरुष अपनी कुल्हाड़ियां ले कर आ गए.

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बकरवाल परिवारवालों की महिलाएं अपना चूल्हा जला रही हैं और शाम की चाय और रात का खाना बनाने की तैयारी कर रही हैं. तेज़ हवाएं बार-बार चूल्हों के जलने में खलल पैदा कर रहे हैं. लेकिन आग और मेहनत की इस लड़ाई में आख़िर जीत औरतों की हुई और लगातार कोशिशों के बाद चूल्हे जल गए.
लेकिन चूल्हा जलाते-जलाते मरीना बीबी का हाल बुरा हो गया. कई मिनटों तक लगातार चूल्हे में फूंक मारने के बाद उनकी आंखों में आंसू आ गए थे. यहीं हाल वहां की दूसरी औरतों का भी था.

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पहाड़ी रास्ता, लंबा सफ़र और हाड़ कंपाने वाली ठंड
रफ़ीक खान क़रीब एक घंटे तक कुल्हाड़ी ले कर खाना बनाने लायक लकड़ी तोड़ने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कुछ वक्त बाद उनकी हिम्मत ने जवाब दे दिया. उनके बेटे यासिर ख़ान ने उनके हाथ से कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी चीर कर चूल्हे में डाला.
साथ ही आसपास बकरवाल समुदाय के कुछ लोग भेड़, बकरियां और घोड़े चराते नज़र आए.
जम्मू-कश्मीर का बकरवाल समुदाय छह महीने ठंड वाले इलाके कश्मीर में रहता है और फिर ठंड के महीने को लिए जम्मू जैसे गर्म इलाके में आ जाता है. ये लोग अपना सफ़र पैदल चलकर तय करते हैं.
इन्हें आने और जाने में क़रीब दो महीने लगते हैं. इस बीच ये लोग सफ़र के दौरान रास्ते में कई-कई दिन रुक भी जाते हैं.

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'हमारी बच्चियों की कोई ज़िन्दगी नहीं'
75 साल के चाचा ख़ान सर्दी से कांप रहे थे. वो आग के सामने बैठकर लंबी आहें भर रहे थे. बार-बार उनके मुंह से निकल रहा था, "बकरवालों की कोई ज़िन्दगी नहीं. हमारी बच्चियों की कोई ज़िन्दगी नहीं. हमारे बच्चे ख़राब हो गए. किसी चीज़ का कोई इंतज़ाम नहीं है. हम क्या करें?"
2011 की जनगणना के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर में गुर्जर बकरवाल की कुल आबादी लगभग 12 लाख के क़रीब है यानी ये लोग कुल जनसंख्या का 11 प्रतिशत हैं.

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जहां बकरवाल वहां उनके मवेशी
बकरवाल समुदाय के खाने-पीने का गुज़ारा अपने माल-मवेशियों के ज़रिए होता है.
जहां कहीं भी रास्ते में इन बकरवालों को पहाड़ियों के आसपास जगह मिलती है वहां ये लोग डेरा जमाते हैं. ज़्यादतर ये लोग रात का खाना अंधेरे में ही खाते हैं. अक्सर जहां ये लोग रुकते हैं वहां बिजली की कोई व्यवस्था नहीं होती है.

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यासिर अहमद ख़ान कहते हैं, "पहली परेशानी तो हमारी ये होती है कि जब हम जम्मू या श्रीनगर का रुख़ करते हैं तो अपने माल-मवेशी को लेकर हमें ये परेशानी होती है कि हमें रास्ता नहीं मिलता है. दिन में चलें तो सड़कों पर गाड़ियों इतनी ज़्यादा होती हैं कि हमें उससे परेशानी होती है. हमें इस कारण मजबूर होकर रात में ही अपना सफ़र तय करना पड़ता है."
"जहां कहीं हम डेरा जमाते हैं वहां पहाड़ी इलाका होता है और वहां बिजली नहीं होती है. सोलर लाइट कुछ मिनटों के लिए चलती है और इसे हम तभी चार्ज कर सकते हैं जब धूप होती है. मोबाइल चार्ज का भी यही हाल है. अगर नज़दीक में कभी कोई बस्ती मिल जाती है तो हम अपना मोबाइल चार्ज कर पाते हैं. अगर ऐसा नहीं हुआ तो कई-कई दिनों तक हमारे फ़ोन स्विच ऑफ़ हो जाते हैं."

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पानी लाना मुख्य समस्या
मरीना बीवी कहती हैं कि जब वो किसी जगह पर डेरा जमाते हैं तो महिलाओं के लिए सबसे पहली मुश्किल पानी होता है.
वो कहती हैं, "अक्सर ऐसा होता है कि खाना बनाने के लिए पानी की बड़ी दिक्कत होती है. हमें बहुत दूर-दूर से जाकर पानी लाना पड़ता है. कभी-कभी ऐसा होता है कि सुबह चाय पीते हैं तो रात तक उसी पर गुज़ारा करते हैं. हम भी भूखे रहते हैं और हमारे बच्चे भी."
"कभी ऐसा भी होता है कि चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी भी नहीं मिलती है. बारिश में बहुत मुश्किल होती है. हर जगह टेंट भी तो नहीं लगा पाते हम."

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बकरवाल समुदाय के लोगों का खाना-पीना आम कश्मीरियों से थोड़ा अलग होता है. बकरवाल समुदाय चावल के साथ-साथ हाथ से बनाई जाने वाली मक्के की रोटी भी खाते हैं.
इस समुदाय की एक और परेशानी उनके माल-मवेशी भी होते हैं जिनकी सुरक्षा के लिए इन्हें मुस्तैद रहना पड़ता है.
रात के समय अपने माल-मवेशियों को देखने के लिए इन्हें कई बार नींद से उठना पड़ता है तो कई बार ये उनके लिए पहरा भी देते हैं.
यासिर कहते हैं, "पिछले दिनों जब बारिश हुई को हमारी कई भेड़-बकरियां मर गईं. बारिश से छिपने के लिए हमारे पास कोई ख़ास इंतज़ाम नहीं होता है. अब हम अगले एक दो दिनों में यहां से वडवन इलाक़े का रुख़ करेंगे और वह पहुंचने में हमें क़रीब एक महीने का वक्त लगेगा. वहां पर भी हमें परेशानी होती है. वहां भी हम खुले आसमान के नीचे रहते हैं. वहां बर्फ़बारी भी होती है."

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'बच्चों को पढ़ा पाना संभव नहीं'
बकरवाल समुदाय जहां-जहां डेरा डालते हैं वहां तापमान अक्सर ठंडा रहता है. इस ठंड से बचने के लिए ये अपने आसपास हमेशा आग जलाकर रखते हैं.
रफ़ीक अहमद ख़ान कहते हैं, "हम जिस क़िस्म की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं उसमें हम बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं."
वो ये भी कहते हैं "हमें नहीं पता कि किस जंगल में हमारी शाम हो जाए."
रफ़ीक कहते हैं कि अब सरकार ने जगह-जगह जंगलों में नर्सरियां बनाई हैं जिसकी वजह से बकरवाल लोगों को अब जंगलों में भी अपने लिए जगह तलाशना मुश्किल हो जाता है.

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कठुआ मामले के बाद डर का माहौल
ग़ौरतलब है कि कठुआ में जिस आठ साल की मासूम के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या की गई थी वो बकरवाल समुदाय से थी.
10 जनवरी 2018 को कठुआ के रसना इलाके में इस बच्ची का अपहरण हुआ था. दस दिनों के बाद बच्ची का शव इलाके की झाड़ियों में मिला था. इस मामले में अभी तक आठ आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 10 अप्रैल को कठुआ की अदालत में आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाख़िल किया है. अब इस मामले की अगली सुनवाई 26 अप्रैल को है.
इस घटना के बाद बकरवाल सुमदाय दहशत में है. इस साल कठुआ और जम्मू के दूसरे इलाकों में रहने वाले बकरवाल पहले ही कश्मीर की तरफ आना शुरू हो गए हैं.
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