ईश्वर दयाल गौड़ हीर-रांझा को पंजाब के शहीद के तौर पर देखते हैं.
इमेज कैप्शन, हीर रांझा की प्रेम कहानियों को भला किसने नहीं सुना होगा. पंजाब की यह प्रेम कहानी इतनी लोकप्रिय हुई कि यह लोककथाओं में प्रेम का प्रतीक बन गई. सभी तस्वीरें और कैप्शन: बीबीसी पंजाबी संवाददाता दलजीत अमी
इमेज कैप्शन, इस प्रेम कहानी को साहित्य में भी भरपूर जगह मिली, लेकिन वारिस शाह की कहानियों में हीर-रांझा के ज़िक्र का कोई जवाब नहीं है. ईश्वर दयाल गौर पंजाब यूनिवर्सिटी के इतिहासकार हैं और उन्होंने हीर-रांझा से जुड़ी तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई है.
इमेज कैप्शन, दयाल देश भर में जगह-जगह पर इस प्रदर्शनी को लगा रहे हैं. इस प्रदर्शनी में हीर-रांझा से जुड़ी पांडुलिपि, बुक-कवर्स, पेंटिंग्स, पोस्टर्स और तस्वीरें हैं. देखिए इस प्रदर्शनी की तस्वीरें-
इमेज कैप्शन, हीर-रांझा की कहानी पंजाबी साहित्य का अहम हिस्सा है. इसे कविताई अंदाज़ में पेश किया जाता है. पंजाब में यह मुख्यधारा के साहित्य के साथ सूफ़ी और लोककथाओं में भी रचा बसा है. हीर-रांझा की कहानी आशिकी का प्रतीक बन गई है.
इमेज कैप्शन, हीर-रांझा की कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई गई, फिर कुछ ब्रिटिश मानव विज्ञानियों ने इसे डॉक्यूमेंट किया जिसके बाद यह कहानी लिखित रूप में लोगों तक पहुंची. ईश्वर दयाल गौड़ ने हीर-रांझा का अध्ययन पंजाबी पहचान और संस्कृति के साथ जोड़कर किया है.
इमेज कैप्शन, गौड़ का कहना है कि हीर पंजाबियों के लिए एक दस्तावेज़ है जो सिंध और यमुना के बीच रहते हैं उनके लिए हीर जीवन का अहम हिस्सा है.
इमेज कैप्शन, गौड़ ने लिखा है कि हीर ने असली पंजाबी पहचान को गढ़ा है जिसमें जाति, वर्ग और धर्म की सीमा नहीं है. हीर-रांझा की मौजूदगी साहित्य और कला की सभी विधाओं में है. फ़ारिना मीर ने 19वीं शताब्दी के बाद के दशकों में लिखे गए हीर के तीन क़िस्सों का अध्ययन किया. उनका कहना है कि सभी क़िस्साकारों ने अपने क़िस्से के शुरू में हीर-रांझा की कहानी लिखे जाने के संदर्भ का हवाला दिया है.
इमेज कैप्शन, देश विभाजन के वक़्त हुई हिंसा के दौरान अमृता प्रीतम ने वारिस शाह को याद करते हुए कहा था कि आप क़ब्र से निकलकर बाहर आइए और महिलाओं के विलाप को दर्ज़ कीजिए. इससे पहले पूर्ण सिंह ने भी ऐसा ही कुछ कहा था. उन्होंने बहन हीर और भाई रांझे को एक बार फिर से वापस आने की गुहार लगाई थी. ईश्वर दयाल गौड़ हीर-रांझा को पंजाब के शहीद के तौर पर देखते हैं. उनका कहना है कि हीर की कहानी का ज़िक्र भाई गुरुदास और गुरु गोविंद सिंह की कविताओं में भी मिलता है. उधम सिंह (1899-1940) ने फांसी की सज़ा मिलने से पहले जेल में पढ़ने के लिए वारिस शाह की लिखी हुई हीर की मांग की थी.