रेहड़ियों के हुजूम में 'गुम' हुए ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब की बरसी पर जानिए किस हाल में है उनकी मज़ार.

ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, जगह के लिए जूझते चादर और फूल बेचने वाले, बिरयानी की रेहड़ियां, क़साइयों की दुकान, दातून बेचने वालों और नानबाइयों के बीच खड़ी है अपने वक्त के और शायद अबतक के बड़े शायरों में से एक मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान ग़ालिब की मज़ार. (सभी तस्वीरें जगदीश तालुरी की)
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, ग़ालिब धार्मिक आस्था को लेकर जीवन भर विवादों में घिरे रहे. उनके लफ़्ज़ों में...ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ्र काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, जश्न ए ग़ालिब में साहिर ने ग़ालिब की मज़ार को उपमा के रूप में इस्तेमाल कर उर्दू की बदतर हालत बयां की है...
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, वीरान मज़ार पर खड़े होकर देखें तो बरबस याद आ जाती हैं साहिर की वो बातें जो उन्होंने करीब 50 साल पहले कही थी... सौ साल से जो तुरबत चादर को तरसती थी, अब उसपे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है. उर्दू के तालुक़ से कुछ भेद नहीं खुलता, ये जश्न ये तमाशा ख़िदमत है कि साज़िश है.
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, ग़ालिब उस दौर में उभरे थे जब आख़िरी मुग़ल शासक बहादुरशाह ज़फर अंग्रेज कंपनी बहादुर की पेंशन पर राज कर रहे थे हालांकि तब भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ था, क्योंकि उम्दा दर्जे की शायरी उसी वक्त फल-फूल रही थी.
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, उर्दू शायरी ग़ालिब की छत्रछाया में अपने उरूज पर पहुंची. हालांकि ग़ालिब अपनी नई सोच को व्यक्त करने में अक्सर उर्दू शायरी के नियमों को ताक़ पर रख देते थे. इस वजह से उनका विरोध करने वालों की भी एक बड़ी तादाद थी. वो लिखते हैं...गनजिना ए मानी का तिलिस्म उस को समझिये जो लफ़्ज़ के ग़ालिब मेरे अशार में आवे
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, मज़ार के सिरहाने लगे पत्थर पर जब जालियों से छन कर सूरज की रोशनी आती है तो ग़ालिब के शिष्य मीर मेंहदी मजरूह की लिखी लाइन दिखती है...गंज इ माने है ताह इ ख़ाक (मतलबों का खज़ाना दफ़्न है.)
ग़ालिब एकेडमी

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इमेज कैप्शन, ग़ालिब को उनके जीवन काल में शोहरत तो मिली लेकिन साथ ही कुछ बदनामियां भी. ख़त का जवाब लिखने के लिए पता पूछने पर एक बार ग़ालिब ने कहा था कि बस “असदुल्लाह ख़ान, दिल्ली काफ़ी होगा.” उस अंग्रेज़ की हैरत के बारे में सोचिए जो ग़ालिब की मौत के एक सदी बाद उनकी क़ब्र ढूंढने में नाकाम होकर लौटा.
ग़ालिब एकेडमी

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इमेज कैप्शन, ग़ालिब ए ख़स्त के बग़ैर कौन से काम बंद हैं, रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाय हाय क्यूं
ग़ालिब की मज़ार

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इमेज कैप्शन, हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है, वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता...