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घोषणाओं और अमल का फ़ासला बहुत बड़ा
72 वर्षों पहले आदिवासी महासभा ने जयपाल सिंह मुंडा की अगुआई में अलग ‘झारखंड’ का सपना देखा. पर वर्ष 2000 में कद्र सरकार ने 15 नवंबर (आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के जन्मदिन) को भारत के अठ्ठाइसवें राज्य के रूप में झारखंड को मान्यता दी. तब लोगों की आकांक्षाएं आकाश छू रही थीं. राज्य के लिए संघर्ष के पीछे भावना थी कि प्राकृतिक रुप से देश का सबसे समृद्ध अंचल सबसे ग़रीब न रहे, झारखंड शोषण का केंद्र नहीं, समृद्धि का द्वीप बने. रोजगार के लिए लोग पलायन न करें, प्राकृतिक संपदा ढोकर बाहर न जाएँ, बल्कि यहीं उद्योग खुलें, छोटा राज्य हो, ताकि सुशासन स्थापित हो और नक्सली आंदोलन से लोग मुक्ति पा सकें और राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिरता हो. राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिरता 15 नवंबर 2003 को यह राज्य तीन वर्ष पुराना होगा.
राज्य में अब तीसरे राज्यपाल हैं. लगभग चार महीने पहले मणिपुर से राज्यपाल वेद मारवाह झारखंड आये. झारखंड को देख कर वह शासकों को आगाह कर चुके हैं कि तेज विकास नहीं हुआ तो यह राज्य उत्तर-पूर्व जैसा अशांत बन जायेगा. कोयला, लौह अयस्क, यूरेनियम, सोना और हीरे जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, पर देश का सबसे ग़रीब राज्य. भाजपा ने कहा था कि बिहार से अलग कर हम इसे ‘रूर ऑफ इंडिया’ यानी जर्मनी के विकसित औद्योगिक क्षेत्र जैसा बना देंगे. वह राज्य भूख से हो रही मौत, नक्सली हमलों, भ्रष्टाचार, कुशासन और बिजली के गंभीर संकट से जूझ रहा है. 'इन्वेस्टमेंट फ्रेंडली' का नारा खोखला सिद्ध हुआ है. देश के दस सबसे ग़रीब जिलों में से पांच जिले (डाल्टनगंज, साहेबगंज, गढ़वा, पाकुड़ और गोड्डा) झारखंड के हैं. राज्य में 57 फीसदी परिवार, गरीबी रेखा के नीचे हैं. प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 230 ग्राम है यानी प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत का आधा. एक चौथाई से भी कम ज़मीन सिंचित है. 32 हज़ार गांवों में से झारखंड के महज आठ सौ गांवों तक बिजली पहुंच पाई है. यूरेनियम, कोयला, लौह-अयस्क जैसी खनिज संपदा पर केंद्र का आधिपत्य है और राज्य को इन खनिजों के बदले महज आठ सौ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष रायल्टी मिलती है. देश के विकसित राज्यों के लिए झारखंड प्रांत आज भी मजदूरों का 'सप्लायर स्टेट' है. राज्य में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस की सरकार है. पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को 22 माह में समर्थक विधायकों की खुली बगावत से हटना पड़ा. दूसरे मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार धूमधाम से तीसरी वर्षगांठ की तैयारी में लगी है. तीन वर्ष पुराने इस राज्य में चौथे मुख्य सचिव ने काम संभाल लिया है. पहले मुख्य न्यायाधीश भी 27 माह में स्थानांतरित होकर हिमाचल चले गये. उनके कार्यकाल की न्यायिक सक्रियता और सरकार को सीमा बताने वाले-लगाम लगाने वाले अहम फ़ैसलों को आज भी लोग याद करते हैं. विकास राज्य बनने के साथ ही पहले मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि वे दस हज़ार शिक्षकों को बहाल करेंगे और आठ सौ सिपाहियों को नौकरी मिलेगी.
दूसरे मुख्यमंत्री ने भी पहले दिन यही संकल्प दोहराया. पर आज तक एक भी नियुक्ति नहीं हो सकी है. राज्य बनने के साथ यहां इंजीनियरिंग, क़ानून, कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी, बायोटेक में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ बनाने की होड़ मची थी. रोज़ सरकार की ओर से ताबड़तोड़ घोषणाएं, पर किसी क्षेत्र में कोई एक इंस्टीट्यूट या सेंटर ऑफ एक्सीलेंस नहीं खुला. अरबों के उद्योग बैठाने की घोषणाएं और 'मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिग' पर दस्तखत की सूची जारी हुई, पर ज़मीन पर एक भी नया ढांचा नहीं खड़ा हुआ. दर्जनों बंद कारखानों को झारखंड गठन के बाद 15 दिनों में चालू करने की सरकारी घोषणाएं झूठी निकलीं. हां, राजनीतिक मोर्चे पर, विधायकों को खुश करने में सरकार आगे रही है. दो बार विधायकों के वेतन-भत्ते बढाये गये हैं. 81 विधायकों में से 26 मंत्री हैं, बाकी लोगों के लिए सरकारी बोर्ड-निगम खोले जा रहे हैं और उन्हें मंत्री स्तर के लाभ दिये जा रहे हैं. झारखंड बनने के पहले 18 जिले थे, राजनीतिक कारणों से चार नये जिले बने हैं, दो सबडिवीजन और एक कमिश्नरी का गठन हुआ है. यही तीन वर्षों की ठोस उपलब्धि कही जा सकती है. सत्तापक्ष, पस्त और एक दूसरे की जड़ें खोदने में व्यस्त है, तो विपक्ष बिल्कुल प्राणहीन और बिखरा हुआ है. विधानसभा में राष्ट्रीय झंडा फाडने की घटना पहली बार यहीं हुई. बार-बार घोषणा और हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद अब तक पंचायत चुनाव नहीं हो सके हैं. प्रशासनिक ढांचा अब भी अस्त-व्यस्त है. बिहार और झारखंड के बीच बंटवारे के बाद की कई समस्याएं (अफसरों का काडर विभाजन, संपत्ति बंटवारा, देनदारी वगैरह) अनसुलझी हैं. कानून व्यवस्था कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ी है. झारखंड बनने के पहले यह चौदह जिलों तक सीमित नक्सलवादी चरमपंथ अब 19 जिलों में पसर गया है. राज्य बनने के बाद से अब तक पुलिस के 137 लोगों को चरमपंथी मार चुके हैं. राज्य का ढाँचा नहीं बन पाया है. वित्तीय वर्ष 2000-01, 2001-02 में आबंटित बजट राशि का बड़ा हिस्सा सरकार खर्च नहीं कर सकी. 2003-04 में भी वित्तीय वर्ष के सात महीने बीत चुके हैं, पर अब तक 16 फीसदी राशि ही खर्च हो सकी है. मुख्यमंत्री ने नाराज होकर अफसरों से कहा है कि वे ‘जलेबी’ की तरह फाइलें न घुमाएँ. विकास के मोर्चे पर खराब हालात देखते हुए लालकृष्ण आडवाणी और वेंकैया नायडू, मुख्यमंत्री और राज्य भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ एक पखवाड़े में दो बार समीक्षा बैठक दिल्ली में कर चुके हैं. बैठक में कहा गया कि रोड, बिजली, सिंचाई, नगर विकास, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर राज्य सरकार युद्ध स्तर पर काम करे ताकि अगले वर्ष लोकसभा चुनावों में भाजपा को ज़मीन मिल सके. इसी दिन दिल्ली में घोषणा हुई है कि राज्य स्थापना के अवसर पर १५ नवंबर को तीस हज़ार लोगों को नौकरियाँ दी जाएँगी. यह घोषणा झूठ सिद्ध होने के लिए अभिशप्त है क्योंकि तीन वर्षों में एक भी नियुक्ति नहीं हुई, वहां 20-22 दिनों में 30 हजार नियुक्तियाँ कैसे होंगी? यह राज्य के विकास, पहल और हकीकत की फैक्टशीट है. |
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