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शनिवार, 01 नवंबर, 2003 को 00:20 GMT तक के समाचार
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विडंबनाओं से मुक्ति की चुनौती

बस्तर के आदिवासी
आदिवासियों के इलाक़ों में नक्सलियों का प्रभाव कम होने की जगह बढ़ा ही है

तीन साल पहले तक मध्यप्रदेश के एक हिस्से के बतौर छत्तीसगढ़ अलग थलग पड़ा हुआ था.

बाक़ी दुनिया में उसकी पहचान थी तो वह बस्तर के अर्धनग्न आदिवासी स्त्री पुरुषों की तस्वीरें तथा उनकी मुड़िया जनजाति के गोटुल, जिसकी चर्चा महानगरीय शहरी तबके में चटख़ारे लेकर की जाती थी, के रुप में थी.

भिलाई इस्पात संयंत्र, कोरबा का बिजली घर या फिर बाल्को का एल्यूमिनियम संयंत्र मध्यप्रदेश के गौरव का प्रतीक बने हुए थे.

छत्तीसगढ़ से उभरा राजनीतिक नेतृत्व मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक छाया हुआ, लेकिन ग़रीब छत्तीसगढ़िया दिल्ली, पंजाब और कश्मीर तक दिहाड़ी मजदूर के रुप में खट रहा था.

विडंबना

यह विडंबना ही थी कि अपने मूल राज्य से अलग होने के बावजूद पंजाब, केरल, हरियाणा, और तमिलनाडु से बड़ा यह राज्य, अपने वनस्पतियों से भरे वनों और खनिज भंडारों की प्रचुरता के बावजूद दरिद्र बना हुआ था.

अजीत जोगी
अजीत जोगी ने शुरुआत में एक साथ ढेर सारी योजनाओं और नीतियों की घोषणा की

पचास के दशक में राज्य पुनर्गठन आयोग के दौर से 1980 के दशक तक समय-समय पर उठी छत्तीसगढ़ राज्य के गठन की माँग को इन्ही विडंबनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.

छत्तीसगढ़ को विषमता और उपेक्षा का दंश कितना गहरा था इसकी एक मिसाल देखिए-एक नवंबर 2000 को अलग राज्य के रुप में अस्तित्व में आने के समय छत्तीसगढ़ में 15 बड़ी, 20 मध्यम और 1600 छोटी सिंचाई परियोजनाएँ 20 वर्षों से अधूरी पड़ी हुई थीं.

यह उस इलाक़े की व्यथा-गाथा थी जिसके गाँवों में जीवनयापन मुख्यरुप से कृषि और खेती पर आधारित उद्यमों से चलता था.

तीन साल पहले अलग राज्य बनने के समय अपना वर्तमान और भविष्य संवारने की वे आकांक्षाएँ तथा समानता और न्याय का व्यवहार किए जाने की वह चाहत न केवल जीवंत थीं अपितु अपना राजपाठ मिलने से और भी प्रखर हो उठी थी.

उम्मीद और सच

एक नए राज्य को नए सिरे से सँवारने के लिए तीन वर्ष की अवधि किसी सरकार के लिए वाक़ई कुछ भी नहीं.

छत्तीसगढ़ के लोगों ने अजीत जोगी की भारी भरकम सरकार से इतने कम समय में आकाश से तारे तोड़ लाने की आशा भी नहीं की लेकिन सिंचाई के साधन बढ़ाने, गाँव-देहात तक सड़कें पहुँचाने और ख़पत से अधिक बिजली का विचारशील और रचनात्मक उपयोग कर स्थानीय उपयोग और निर्यात के लिए उत्पाद बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों को न्यौतने की अपेक्षाएँ थीं.

शिक्षा पाने की स्वाभाविक ललक के चलते साल दर साल पढ़लिखकर पुश्तैनी काम की बजाए नौकरी की चाहत रखने वाले बेरोज़गारों, पलायन करने वाले श्रमिकों के लिए योजनाएँ बनाकर उस दिशा में आगे बढ़ाने की उम्मीदें भी थीं.

यह भी उम्मीद थी कि सरकार मध्यप्रदेश से विरासत में मिली नक्सली उग्रवाद की समस्या पर क़ाबू पाने के ठोस उपाय सोचेगी.

नई सरकार ने स्वाभाविक चिंता वाली कई समस्याओं पर एक साथ मोर्चा भी खोला.

कृषि, उद्योगों, सूचना प्रोद्योगिकी, निवेश, बुनियादी ढाँचे, उर्जा, खनिज, वनोपज, पर्यटन और शिक्षा के लिए फ़टाफ़ट कई नीतियों और योजनाओं की घोषणा कर दी गई.

कुछ नतीजे भी लेकिन...

कुछ नतीजे दिखने भी लगे, मसलन 26 साल पहले शुरु हुई भाटापारा नहर में पहली बार पानी आया, खरसिया के पास नहर का निर्माण टर्न की आधार पर निजी हाथों में दे दिया गया ताकि नहर समय पर पूरी हो सके, तालाबों के संरक्षण और सिंचाई-मछली पालन के लिए हर खेत में पोखर बनाने के लिए अनुदान बाँटा गया, बीमार सार्वजनिक उद्योगों से छुटकारा पाया गया, सार्वजनिक परिवहन और नदी तक का निजीकरण कर दिया गया.

बस्तर के आदिवासी
आदिवासियों को नए राज्य में बड़ी उम्मीदें हैं

लेकिन सिंचाई की कुछ योजनाओं को छोड़ बाक़ी नीतियाँ-योजनाएँ साकार होने का बाट जोह रही हैं.

धान की फ़सल छोड़कर कैश क्रॉप लेने का ज़ोरदार अभियान बिना पूरी तैयारी और खेतिहरों की रज़ामंदी न लेने से विफल हो गया, जोगी डबरियाँ सूख चलीं तो निजीकरण की आपाधापी भ्रष्टाचार के आरोपों का सबब बन गईं.

साठ हज़ार करोड़ रुपए के औद्योगिक निवेश के आशय पत्र बाल्को में केंद्र के विनिवेश का निरर्थक विरोध करने के कारण कागज़ से नीचे न उतर सके.

प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत बनाई गई 11 बड़ी सड़कों को सरकार ने नामंज़ूर कर दिया.

इस बारिश से पहले पड़े सूखे में हज़ारों ज़रुरतमंद पहले की तरह पलायन को मजबूर हुए. नक्सली उत्पात और हिंसा ने राज्य के करीब आधे ज़िलों को अपनी चपेट में ले लिया.

शिक्षा के प्रसार के नाम पर एक दो कमरों में चलने वाले 35 निजी विश्वविद्यालय खुल गए. निजी क्षेत्र में ही तीन वर्षीय चिकित्सा पाठ्यक्रम शुरु हो गया जिसे इंडियन मेडिकल कौंसिल ने मान्यता देने से इंकार कर दिया.

सबसे अधिक पीड़ा की बात तो यह है कि सामाजिक राजनीतिक सौहार्द्र वाले इस क्षेत्र में कभी न रहे जातिवाद ने सिर उठाया और राजनीतिक मत-भिन्नताएँ कट्टर शत्रुताओं में बदलती दिखीं.

उम्मीद की जानी चाहिए कि क़रीब महीने भर बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद ज़्यादा परिपक्व हुआ राज्य का राजनीतिक वर्ग इस परिदृश्य को बदलने की क़वायद शुरु करेगा. तब कहीं छत्तीसगढ़ अपनी विडंबनाओं और व्यथाओं से मुक्त होने की राह पर सचमुच आगे बढ़ सकेगा.

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