भारत में फ़ेसबुक के चेहरे पर उठते सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2015 में अमरीका के दौरे पर थे और फ़ेसबुक के संस्थापक-सीईओ मार्क ज़करबर्ग ने अपने मुख्यालय में उनके लिए एक टाउनहॉल आयोजित किया था.

10 साल पहले की अपनी महीने भर की भारत यात्रा को याद करते हुए ज़करबर्ग ने उसी मंच से कहा, “फ़ेसबुक के इतिहास में भारत का बहुत महत्व है. कंपनी जब बुरे दौर से गुज़र रही थी और बंद होने की कगार पर थी तब मेरे गुरु स्टीव जॉब्ज़ (एपल के संस्थापक) ने मुझे भारत के एक मंदिर जाने की सलाह दी. वहाँ से लौटकर मुझे आत्मबल मिला और कंपनी सफल होती गई”.

सार्वजनिक तौर पर तो ये बात मार्क ज़करबर्ग ने पहली बार कही थी लेकिन इस वाक़ये से साफ़ हो चला था कि भारत उनकी ‘लिस्ट’ में ऊपर है.

इसके ठीक एक साल पहले ज़करबर्ग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान इशारा किया था कि उनका इरादा ग़रीब लोगों तक इंटरनेट पहुँचाने का है. ज़ाहिर है इस प्रक्रिया में फ़ेसबुक भी केंद्र में ही रहता और ये ज़करबर्ग के “फ़्री बेसिक प्रोग्राम’’ के तहत होने वाला था जिसकी बुनियाद internet.org प्लान पर टिकी थी.

लेकिन दुनिया के कई अन्य देशों की तरह फ़ेसबुक की ये योजना भारतीय टेलीकॉम नियामकों को भी खटक गई थी क्योंकि इस योजना से ‘नेट न्यूटरैलिटी’ यानी इंटरनेट के स्वतंत्र रहने पर ही खतरा दिख रहा था.


बहरहाल, इस मामले को पूरे छह साल हो चुके थे और इस बीच फ़ेसबुक ने भारत में लोकप्रियता की एक नई मिसाल बना डाली थी.

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भारत में अगर 2015 में 13 करोड़ 50 लाख फ़ेसबुक यूज़र्स थे तो 2020 में ये संख्या 34 करोड़ पार कर चुकी है.

शायद यही वजह रही होगी कि ज़करबर्ग ने भारत के सबसे अमीर इंसान मुकेश अम्बानी से एक कारोबारी समझौता किया जिससे फ़ेसबुक को भारत में और बड़ा बाज़ार मिल सके.

इसी वर्ष के मध्य में, जब दुनिया कोविड-19 के प्रकोप से जूझ रही थी, सोशल मीडिया साइट फ़ेसबुक ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म रिलायंस जियो में 43,574 करोड़ रुपए का निवेश किया.

इस डील के साथ ही फ़ेसबुक रिलायंस जियो में 9.99 प्रतिशत का हिस्सेदार बन गया है.

चार साल से कम समय में ही रिलायंस जियो 38.8 करोड़ लोगों को इंटरनेट पर लाने में कामयाब रहा है.

जबकि भारत में फ़ेसबुक यूज़र मौजूदा समय में किसी भी दूसरे देश की तुलना में सबसे ज़्यादा हैं और अगर चैट-ऐप व्हाट्सऐप की बात करें तो इसके भी 30 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर हैं. कुछ साल पहले व्हाट्सऐप को फ़ेसबुक ने खरीद लिया था.

जहाँ इस क़रार से रिलायंस को फ़ेसबुक के व्हाट्सऐप के ज़रिए भारतीय इंटरनेट बाज़ार में एमेज़ॉन और वॉलमार्ट को कड़ी टक्कर देने का मौक़ा मिलेगा वहीं भारत के टेक्नॉलजी क्षेत्र में किसी विदेशी कंपनी के अब तक के सबसे बड़े निवेश के बाद फ़ेसबुक को एक पड़ा पड़ाव मिल चुका है विस्तार के लिए.

लेकिन कुछ सवाल भी हैं जिनके जवाब आगे चलकर ही मिलेंगे.

भारत में अभी भी न तो डेटा प्रोटेक्शन पर ठोस क़ानून हैं और न ही डेटा प्राइवेसी पर.

ये दोनों काफ़ी संवेदनशील विषय हैं जिनके बारे में कम ही लोग ठीक से जानते-समझते हैं. अमरीका के एक चर्चित मामले की मदद से इन दो मसलों को ठीक से समझा जा सकता है.

मामला कैम्ब्रिज एनालिटिका का है जो एक राजनीतिक परामर्शदाता ब्रितानी कंपनी थी.

इस कंपनी पर करोड़ों फ़ेसबुक यूजर्स का डेटा हासिल करने और उसका इस्तेमाल अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में डोनल्ड ट्रंप को फ़ायदा पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करने के आरोप हैं.

आरोप थे कि कंपनी ने डाटा का इस्तेमाल वोटरों के मतों को प्रभावित करने के लिए किया था.

यह डाटा एक क्विज़ के ज़रिए हासिल किया गया था, जिसमें यूज़र्स को कुछ सवालों के जवाब देने थे.

क्विज़ इस तरह के बनाया गया था कि इसमें हिस्सा लेने वाले न सिर्फ़ यूज़र्स का डाटा बल्कि उनसे जुड़े दोस्तों का भी डाटा इकट्ठा कर लेता था.

फ़ेसबुक ने कहा था कि उसका मानना है कि 8.7 करोड़ यूजर्स का डाटा ग़लत तरीके से कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ साझा किया गया था.

2018 में सार्वजनिक हुए इस स्कैंडल की जाँच अमरीका के संघीय व्यापार आयोग (एफ़टीसी) ने की और फ़ेसबुक पर पाँच अरब डॉलर यानी लगभग 34 हज़ार करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया. फ़ेसबुक ने जुर्माने को अदा करने की बात तो मान ली लेकिन उसकी वैश्विक साख को ज़बरदस्त झटका लगा.

जाँचकर्ताओं को इसके तार भारत से भी जुड़े मिले थे क्योंकि कैम्ब्रिज एनालिटिका की भारतीय सहयोगी कंपनियों ने देश में कुछ चुनावों में ‘अपार सफलता’ हासिल करने के दावे किए.

राजनीतिक तूफ़ान खड़ा होने के साथ फ़ेसबुक यूज़र्स के डाटा की सुरक्षा पर इससे पहले, इतना बड़ा सवाल कभी नहीं उठा था.

हालाँकि इस प्रकरण के बाद से फ़ेसबुक ने अपने नियमों और मानकों में कई बदलाव किए हैं लेकिन अभी पूरा भरोसा जीतने में कसर बाकी है.

दिलचस्प ये भी है कि अमरीका और कनाडा में फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वाले उसके कुल यूज़र्स का महज़ 10% हैं, लेकिन कंपनी का लगभग आधा रिवेन्यू (लाभ) इन दोनो देशों से ही आता है. ज़ाहिर है, कंपनी को नए बाज़ार चाहिए कमाई को बढ़ाए रखने के लिए.


चीन आज भी फ़ेसबुक की पहुँच से बाहर है, तो उसकी पहली पसंद भारत होना स्वाभाविक है. सस्ता डाटा, बेहतर होती इंटरनेट सुविधाएँ और सस्ते स्मार्टफ़ोन भारत को फ़िलहाल दुनिया का सबसे हसीन मार्केट बनाते हैं.


दोनों कंपनियां (फ़ेसबुक और रिलायंस जियो) जब एक साथ भारत के एक उभरते हुए क्षेत्र में बड़ी क्रांति लाने का दावा कर रही हैं, तो सवाल ये भी उठता है कि जो भी जानकारियां उपभोक्ता कंपनी से साझा करेंगे, उसका इस्तेमाल कब, कहां और किस तरीक़े से होगा इस मामले में पारदर्शिता बढ़ाने की ज़्यादा ज़रूरत है.

ताज़ा विवाद

दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी फ़ेसबुक और विवादों का साथ अब पुराना हो चला है.

फ़ेसबुक ने जिस रफ़्तार से लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचने में कामयाबी हासिल की है वो बेजोड़ कही जाती है.

इस बेजोड़ कामयाबी पर सवाल भी उठते रहे हैं और ताज़ा मामला फ़ेसबुक के सबसे बड़े बाज़ार यानी भारत से जुड़ा है, भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली से जुड़ा है और भारतीय संविधान के ज़रिए मिले ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के मौलिक अधिकार से भी जुड़ा है.

ताज़ा विवाद में फ़ेसबुक पर भारत की सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ नेताओं की ‘हेट-स्पीच’ को ‘नज़रंदाज़ करने’ और ‘हेट-स्पीच’ के नियमों को ताक पर रखने के आरोप लगे हैं.



अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रिका वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इसी वर्ष अगस्त महीने में अपनी एक रिपोर्ट 'फ़ेसबुक हेट-स्पीच रूल्स कोलाइड विद इंडियन पॉलिटिक्स' में इस बात का दावा किया कि फ़ेसबुक ने आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और वैचारिक रूप से संघ के क़रीब मानी जाने वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की मदद की है.

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इस रिपोर्ट में फ़ेसबुक के अधिकारी के हवाले से दावा किया गया कि कंपनी ने भाजपा कार्यकर्ताओं की नफ़रत फ़ैलाने वाली पोस्टों को हटाए जाने से 'भारत में कंपनी के कारोबार पर प्रभाव' पड़ने की आशंका जताई थी.

रिपोर्ट में फ़ेसबुक-इंडिया की पब्लिक पॉलिसी प्रमुख, अंखी दास पर आरोप लगे कि अपने पद पर रहते हुए उन्होंने तीन हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों और लोगों के ख़िलाफ़ ‘हेट-स्पीच’ के नियम के तहत कार्रवाई नहीं की. बीजेपी के कई नेताओं पर हेट स्पीच के मामले में कंपनी के ज़रिए कार्रवाई नहीं होने दी.

वॉल स्ट्रीट जर्नल रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़ेसबुक के कर्मचारियों ने इन लोगों या संगठनों के ‘हेट-स्पीच’ में शामिल होने की बात अंखी दास के सामने रखी थी.

सबसे ज्यादा ज़ोर इस बात पर था कि अंखी दास ने तेलंगाना से भाजपा विधायक टी राजा सिंह के खिलाफ फेसबुक के हेट स्पीच नियमों को लागू करने का विरोध किया था, क्योंकि “उन्हें डर था कि इससे कंपनी के संबंध भाजपा से बिगड़ सकते हैं”, जिसका बुरा असर कंपनी के कारोबार पर पड़ सकता है.

टी राजा सिंह के फ़ेसबुक अकाउंट से एक ‘भड़काऊ’ पोस्ट हुई थी जिसमें कहा गया था कि “रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों को गोली मार देनी चाहिए.”

इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही भारत की विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने फ़ेसबुक के अधिकारियों और भारतीय जनता पार्टी की आलोचना करते हुए फेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क ज़करबर्ग को पत्र लिखकर इस मामले की जांच की माँग की.

मामले ने नया मोड़ तब लिया जब केंद्रीय कानून और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मार्क ज़करबर्ग को चिठ्ठी लिखकर आरोप लगाया कि उनका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वालों की पोस्ट को सेंसर कर रहा है.

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प्रसाद का ये भी आरोप था कि अमरीकी अख़बार वाल स्ट्रीट जर्नल में जो लिखा गया है दरअसल वो उल्टी छवि पेश कर रहा है. उन्होंने ये भी कहा कि ‘भारत की राजनीतिक व्यवस्था में अफ़वाहें फैलाकर दख़लंदाज़ी करना निंदनीय है’.

मामला भारतीय संसद भी पहुँच चुका है जहाँ इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक पर गठित हुई 30 सदस्यों वाली संसदीय समिति फ़ेसबुक पर लगे कई आरोपों की सुनवाई कर रही है.

फेसबुक की तरफ़ से दलील यही दी गई है कि -

“उसने हमेशा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर पारदर्शिता रखी है और बिना किसी राजनीतिक दबाव के लोगों को अपनी अभिव्यक्ति प्रकट करने का माध्यम भी दिया है”.

इसी बीच ‘शांति और सद्भाव’ पर दिल्ली विधानसभा की एक समिति ने ये कहते हुए कि “पहली नज़र में ऐसा प्रतीत होता है कि बीते फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों को भड़काने में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक की भूमिका थी”, फ़ेसबुक इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर अजीत मोहन को समिति के समक्ष हाज़िर होने का नोटिस भेजा.

अजीत मोहन इस समिति के समक्ष उपस्थित नहीं हुए और नोटिस के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गए जहाँ उनके वकीलों ने दलील रखी कि, “यह मुद्दा भारत संघ के क्षेत्र में आता है और ससंदीय समिति मामले की जाँच कर रही है”. फ़िलहाल अजीत मोहन को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई है.

हालांकि वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के बाद फ़ेसबुक प्रवक्ता की ओर से सभी आरोपों को ख़ारिज़ करते हुए बीबीसी को फेसबुक ने ईमेल के ज़रिये बताया कि, “किसी भी तरह की हिंसा या नफ़रत फैलाने वाली सामग्री फेसबुक पर प्रतिबंधित है. ये मायने नहीं रखता कि पोस्ट लिखने वाले का राजनीतिक रुझान किस तरफ़ है.”

इसी बीच अमरीका में नागरिक अधिकार समूहों ने कहा कि फ़ेसबुक भारत में ख़तरनाक सामग्री के विषय पर ध्यान देने में नाकाम रहा है.

अमरीका में फ़ेसबुक के शीर्ष मैनेजमेंट को लिखे गए एक ख़त में भारत में पब्लिक पॉलिसी प्रमुख अंखी दास को पद से हटाने की मांग की है. इस खत पर 40 से अधिक समूहों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें सदर्न पॉवर्टी लॉ सेंटर, विटनेस, मुस्लिम एडवोकेट्स और ग्लोबल प्रोजेक्ट्स एगेंस्ट हेट एंड एक्स्ट्रिमिज्म शामिल हैं.

ख़त में लिखा था, "फेसबुक को और अधिक ऑफलाइन हिंसा में भागीदार नहीं होना चाहिए. एक और नरसंहार में तो बिलकुल भी नहीं. लेकिन कंपनी के कोई कदम ना उठाने का रवैया इतना लापरवाही भरा है कि वो मिलीभगत के बराबर है."

इधर भारत में विवाद बढ़ने के बाद ही टी राजा को बैन करते हुए फेसबुक के प्रवक्ता ने कहा कि, “उन्होंने नफरत और हिंसा को बढ़ावा देने वाली सामग्री को लेकर फेसबुक की पॉलिसी का उल्लंघन किया है”.

टी राजा सिंह ने इस पूरे प्रकरण से ये कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि, “2019 के बाद से फ़ेसबुक पर मेरा अकाउंट नहीं है क्योंकि वो हैक हो गया था”.

अंखी दास

1992 की एक सर्द शाम थी और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के साबरमती हॉस्टल के बाहर चाय के साथ 8-9 छात्र-छात्राओं के बीच एक गम्भीर चर्चा जारी थी.

चंद हफ़्तों पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने वाले मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को सही ठहराया था. चर्चा में ज़्यादातर छात्र एमए के थे जो या तो सेंटर फ़ॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ के थे या सेंटर फ़ॉर इंटरनैशनल स्टडीज़ में पढ़ रहे थे.

चर्चा ने जब तीखी बहस की शक्ल लेनी शुरू की और बात मामले की राजनीति पर खिसकी, तो एक छात्रा धीरे से उठी और हॉस्टल के भीतर चली गई. जबकि उसी की हमशक्ल वहीं रहकर बहस में हिस्सा लेती रही.

बहस छोड़ कर जाने वाली छात्रा अंखी दास थीं और बहस जारी रखने वाली थीं उनकी दो मिनट बड़ी जुड़वां बहन, रश्मि दास.

कोलकाता के लॉरेटो कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद अंखी दास का जेएनयू के स्कूल ओफ़ सोशल साइंसेज़ के राजनीति शास्त्र के एमए प्रोग्राम में दाख़िल हो गया था और उनकी बहन भी इसी विश्वविद्यालय में पढ़ने आ गईं थीं.

अंखी दास के समकालीन रहे एक छात्र ने नाम न लेने की शर्त पर बताया कि, “अंखी को हमेशा से पोलिटिकल फ़िलोसोफ़ी में दिलचस्पी रही है”.

2011 से बतौर फ़ेसबुक इंडिया की पब्लिक पॉलिसी प्रमुख, अंखी दास ने कुछ अख़बारों में लेख लिखे हैं और लगभग सभी में राजनीतिक दर्शन से उनका लगाव साफ़ दिखता है.

भारत के 70वें स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में उन्होंने “सिविक टेक्नॉलजी की सामाजिक बदलाव लाने की भूमिका” पर अपने लेख में जाने-माने ग्रीक राजनीतिक दार्शनिक अरस्तू की ‘दोस्ती की तीन क़िस्मों’ का ज़िक्र किया जिसमें ‘मतलब की दोस्ती, सुख की दोस्ती और बेहतरी की दोस्ती’ की मिसालें मिलती हैं. इसी अख़बार के एक और लेख में उन्होंने मैक्स वेबेर की राजनीतिक सोच का ज़िक्र किया किया था.

बहराल, जेएनयू की पढ़ाई के दौरान जहाँ अंखी ने अपने राजनीतिक रुझान पर कभी खुल कर बात नहीं की, वहीं उनकी बहन रश्मि दास यूनिवर्सिटी की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) इकाई में सक्रिय होती चली गईं.

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जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

1996 में रश्मि दास जेएनयू एबीवीपी की अध्यक्ष थीं और उनके मुताबिक़, “इसी साल परिषद को न सिर्फ़ काउन्सिलर बल्कि छात्र संघ के सेंट्रल पैनल चुनावों में काफ़ी सफलता मिली थी”.

हालाँकि अंखी दास इस दौरान जेएनयू में नहीं थीं लेकिन उस दौर में एबीवीपी के सक्रिय कार्यकर्ता के अनुसार, “भले ही अंखी पब्लिक में राजनीति या अपने रुझान पर बात नहीं करती थीं लेकिन हम लोगों को लगता था कि अपनी बहन को निजी तौर पर प्रोफ़ेशनल सलाह भी देती रहती थीं”.

फ़ेसबुक से पहले अंखी दास भारत में माइक्रोसॉफ़्ट की पब्लिक पॉलिसी हेड थीं. माइक्रोसॉफ़्ट से वो जनवरी 2004 में जुड़ीं, और लगभग आठ साल काम करने के बाद वो फ़ेसबुक में चली गईं.

हालाँकि वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्टों में अंखी दास पर ‘राजनीतिक पक्षपात’ और ‘भाजपा समर्थक’ होने के जो दावे किए गए हैं उनका प्रमाण अभी सार्वजनिक नहीं है.

न ही अंखी दास ने कभी इस संदर्भ में सार्वजनिक तौर पर बात की है.

लेकिन नरेंद्र मोदी डॉट इन नाम से प्रधानमंत्री मोदी की एक व्यक्तिगत वेबसाइट है और एक व्यक्तिगत ऐप भी है - नमो ऐप.

वेबसाइट पर न्यूज़ सेक्शन के रिफ़्लेक्शंस सेक्शन के कॉन्ट्रिब्यूटर्स कॉलम में, और नमो ऐप पर नमो एक्सक्लूसिव सेक्शन में एक टैब या स्थान पर कई लोगों के लेख प्रकाशित किए गए हैं.

वहाँ जो 33 नाम हैं, उनमें 32वें नंबर पर अंखी दास का नाम है और उनके लेखक का शीर्षक है “प्रधानमंत्री मोदी और शासन की कला

इसके कुछ अंश इस प्रकार हैं:

“हमारे देश की जनसांख्यिकीय में युवा सबसे ज्यादा हैं। 70.30 करोड़ भारतीयों की उम्र 30 साल से कम है...मई, 2014 में मैंने इसके बारे में लिखा था कि तब नरेंद्र मोदी ने किस तरह से इन सभी साधनों का उपयोग जनता, मतदाताओं और निर्वाचकों को साथ जोड़ने के लिए किया. उसके बाद फेसबुक पर प्रधानमंत्री के प्रशंसकों की संख्या 1.40 करोड़ से बढ़कर 2017 में 4.28 करोड़ प्रशंसक तक पहुंच गई है और इसने उन्हें वर्तमान समय में फेसबुक पर विश्व का सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया है”.

“पारदर्शिता बढ़ाना, महान लोकतांत्रिक परंपराओं से बनी हमारे संस्थानों से अपारदर्शिता खत्म करना और अपनी संस्कृति की आवश्यकताओं के अनुसार काम, यही वो परिवर्तन है जो प्रधानमंत्री मोदी के शासन का मॉडल है”.

फ़ेसबुक पर विवादों का साया

भारत में हाल के दिनों में उठे विवाद के अलावा दुनिया के कुछ दूसरे देशों में भी फ़ेसबुक विवादों से घिरी रही है.

विवादास्पद राजनीतिक पोस्ट और विज्ञापनों के चलते कंपनी को आलोचना झेलनी पड़ी है, दर्जनों आयोजक पीछे हट चुके हैं कर्मचारियों ने कार्य-प्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए इस्तीफ़े दिए हैं.

अमरीका में “कलर ऑफ़ चेंज” नामक नागरिक समूह की कैम्पेन डायरेक्टर ब्रैंडी कॉलिंज़-डेक्स्टर के मुताबिक़, “फ़ेसबुक दबाव में है, जो अच्छी बात है. लेकिन मुझे लगता है, उन्हें अभी भी बहुत कुछ करना बाक़ी है”.

अमरीका

हालाँकि फ़ेसबुक का आग़ाज़ अमरीका से ही हुआ था लेकिन इसी देश में वो ख़ासी “बैकफ़ुट” पर भी रही है.

विवादास्पद राजनीतिक बयानों पर कंपनी से जवाब तब माँगे जाने लगे जब 2015 में फ़ेसबुक के अधिकारियों ने तब राष्ट्रपति चुनाव उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की “मुस्लिमों के देश में आने पर रोक” वाली एक पोस्ट को नहीं हटाया था.

कंपनी के भीतर और बाहर हुए विरोध में इसे ‘हेट-स्पीच’ की श्रेणी में रखा गया और और अमरीकी अख़बार ‘वॉशिंटॉन पोस्ट’ के मुताबिक़ बाद की बैठकों में ख़ुद मार्क ज़करबर्ग ने “इसे तुरंत हटाए जाने की बात कही”.

साथ ही शुरू हुआ फ़ेसबुक के भीतर का आत्ममंथन जिसमें राजनीतिक बयानों को लगाए रहने या हटाने के मुद्दे पर “ख़बर करने लायक राजनीतिक संवाद” को छूट देनी के पॉलिसी बनाई गई. ऐसे फ़ैसले लेते समय कम्यूनिटी गाइडलाइंस पर भी ध्यान रखने की बात कही गई थी.

लेकिन मार्क ज़करबर्ग की जिन दो बड़ी नीतियों की आलोचना बढ़ी है उसमें पहला तो उनका इस बात पर ज़ोर है कि उनकी “कंपनी सच की मध्यस्थ” नहीं है और दूसरे अमरीका या दूसरे देशों में राजनीतिक विज्ञापनों की फ़ैक्ट-चेकिंग नहीं की जाती.

अक्तूबर, 2019 में अमरीका की डेमोक्रेटिक पार्टी ने फ़ेसबुक पर ये कहते हुए ‘पक्षपात’ के आरोप लगाए कि कंपनी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की उस फ़ेसबुक पोस्ट को नहीं हटाया था जिसमें लगातार दूसरे चुनावी कैम्पेन में उतरे ट्रंप ने पूर्व उप-राष्ट्रपति और मौजूदा उम्मीदवार जो बाइडेन पर ओबामा प्रशासन की यूक्रेन पॉलिसी के तहत भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाए थे.

कई अमरीकी राजनीतिज्ञों ने इसी दौरान फ़ेसबुक पर “कुछ ग़लत राजनीतिक विज्ञापन ख़रीद कर चलवाए” जिससे ’पक्षपात’ के आरोपों को साबित किया जा सके.

अब तक फ़ेसबुक पर दबाव भी बढ़ रह था और कार्रवाई करने की माँग भी.

कंपनी 2016 में उन आरोपों से जूझ चुकी थी जिनमें उस पर “फ़ेक न्यूज़ के शेयर किए जाने पर रोक न लगाते हुए मतदाताओं पर प्रभाव डालने” की बातें दोहराई गईं थीं.

जानकरों के मुताबिक़, “मार्क ज़करबर्ग पर अमरीका में दबाव बढ़ चुका था और ख़ास तौर पर 2018 से जब उन्हें अमरीकी सीनेट में हाज़िर होना पड़ा था डाटा प्राइवेसी और अपने सोशल नेटवर्क प्लैटफ़ॉर्म पर रूस से जुड़ी कुछ ग़लत ख़बरों के मामले पर”.

2020 में फ़ेसबुक ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की उस पोस्ट को हटा दिया जिसमें लिखा था कि “बच्चों पर कोरोना वायरस का असर नहीं होता”.

इसी साल अमरीका में अफ़्रीकी मूल के जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत के बाद देश में नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ आक्रोश भड़क गया था और कई विरोध-प्रदर्शन उग्र और हिंसक हो गए थे.

मई महीने में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों को ‘धमकाते हुए’ कहा “जब लूटिंग शुरू होगी, तब शूटिंग शुरू होगी”.

फ़ेसबुक पर की गई उनकी इस पोस्ट की घोर निंदा हुई लेकिन मार्क ज़करबर्ग ने ख़ुद एक फ़ेसबुक पोस्ट लिख कर डोनल्ड ट्रंप की पोस्ट को न हटाए जाने के फ़ैसले की वजह बताई और कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हम तब तक सम्मान करते हैं जब तक उससे हिंसा करने या भड़काने का अभिप्राय नहीं निकलता”.

अमरीका में फ़ेसबुक के कुछ आलोचकों का कहना है कि, “ट्रंप और ज़करबर्ग में एक डील रही है” हालाँकि मार्क ज़करबर्ग ने इसे “एक निंदनीय अटकलबाज़ी” बताया है.

लेकिन ये भी सच है कि एक दूसरी अमरीकी सोशल मीडिया कंपनी, ट्विटर, के ‘हेट-स्पीच’ से निपटने वाले हाल-फ़िलहाल के क़दमों की ज़्यादा तारीफ़ हुई है और इसमें राष्ट्रपति ट्रंप का वो ट्वीट भी था (“जब लूटिंग शुरू होगी, तब शूटिंग शुरू होगी”) जिसे “हिंसा को गौरवान्वित” करने के आधार पर राष्ट्रपति ट्रंप की टाइमलाइन से हाइड कर दिया गया.

जबकि यही कमेंट फ़ेसबुक पर आज भी मौजूद है.

श्रीलंका



सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समूह पिछले दो सालों से श्रीलंका की राजनीति में फ़ेसबुक की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे हैं. सबसे ज़्यादा आलोचना फ़ेसबुक पर राजनीतिक विज्ञापनों में होने वाले दावों की रही है.

कोलंबो स्थित ‘सेंटर फ़ॉर पॉलिसी ऑल्टरनेटिव्स’ नामक थिंकटैंक के वरिष्ठ शोधकर्ता संजना हटोटुवा ने 2019 के राष्ट्रपति चुनावों के पहले फ़ेसबुक को लिखी गई एक चिट्ठी का हवाला देते हुआ कहा कि चुनाव पर निगरानी बनाए हुए नागरिक समूहों को और मदद की ज़रूरत है क्योंकि फ़ेसबुक से जवाब नहीं मिला है.

दरअसल, इस ख़त में उन्होंने लिखा था कि श्रीलंका में फ़ेसबुक पर चुनावी विज्ञापनों को मॉनिटर करने के लिए उतने पारदर्शी माध्यमों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है जैसे पिछले अमरीकी चुनावों के दौरान किया गया था जिससे बाहरी यानी कथित रूसी हस्तक्षेप को रोका जा सके.

द गार्डियन अख़बार में छपी के ख़बर के मुताबिक़ राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार गोटाभाया राजपक्षे के आधिकारिक फ़ेसबुक अकाउंट से जुड़े एक फ़ेसबुक अकाउंट पर ग़लत सूचनाएँ दी जा रहीं थीं जिन्हें समाचार एजेंसी एएफ़पी ने अपनी जाँच में ग़लत पाया था.

इस मामले के ठीक एक साल पहले श्रीलंका में सरकार ने देश भर में फ़ेसबुक को ब्लॉक कर दिया था क्योंकि “कुछ बौद्ध राष्ट्रवादियों की फ़ेसबुक पोस्टों” के चलते हिंसा को हवा मिली थी जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और कई धार्मिक स्थलों और घरों को जला कर राख कर दिया गया था.

हिंसा शांत होने पर फ़ेसबुक प्रवक्ता अमृत आहूजा ने ये कहते हुए कि, “हमसे ग़लती हुई और हम थोड़े धीमे दिखे”, इस बात पर ज़ोर दिया कि कंपनी कमेंट मोडरेशन के लिए ज़्यादा सिंहला भाषियों को भर्ती करेगी.

फ़िलिपींस


आँकड़ों की मानें तो फ़िलिपींस के सोशल मीडिया बाज़ार पर फ़ेसबुक का एकछत्र राज है. विश्व बैंक के अनुसार 2018 में फ़िलिपींस की कुल आबादी 10 करोड़ 67 लाख थी और इसमें से सात करोड़ से ज़्यादा लोगों का निजी फ़ेसबुक अकाउंट था.

ये तो जगज़ाहिर है कि फ़िलिपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते उन नेताओं में से हैं जिन्होंने फ़ेसबुक की बढ़ती लोकप्रियता पर सवारी कर अपनी सोच करोड़ों लोगों तक पहुँचाई है.

2016 के राष्ट्रपति चुनावों की तैयारी में उनके सहयोगियों ने अपने फ़ेसबुक अकाउंट्स पर प्रतिद्वंदियों के ख़िलाफ़ जम कर कैम्पेन भी किया और प्रतिद्वंदियों के बारे में ग़लत ख़बरें भी फैलाईं थीं.

उस चुनावी जीत के चार साल बाद यानी 2020 तक के बीच फ़ेसबुक पर ग़लत ख़बरें फैलने पर ख़ामोशी बरतने के आरोप लगते रहे हैं और अब फ़ेसबुक ने इस पर सख़्ती बरतनी शुरू कर दी है कि राजनीतिक नेता और उनके सहयोगी अपनी पोस्टों में क्या कह सकते हैं और क्या नहीं.

ज़ाहिर है, राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते इससे नाराज़ हैं.

28 सितंबर, 2020 के दिन अपने जनसंदेश में राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने फ़ेसबुक पर अपना ग़ुस्सा निकाला क्योंकि उसने कई फ़ेक अकाउंट्स बंद कर दिए थे जो उनकी नीतियों का समर्थन करते थे.

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फ़िलिपींस में फ़ेसबुक को बैन करने की धमकी देते हुए उन्होंने कहा -

“मैं आपको यहां ऑपरेट करने की इजाज़त देता हूँ. आप मुझे रोक नहीं सकते यहां सरकार के उद्देश्यों का बयान करने से. मुझे नहीं पता, फ़ेसबुक के बाद भी जीवन है? लेकिन हमें बात करने की ज़रूरत है”.

नशीले पदार्थों के सेवन के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते की मुहीम को भी देशभर में ‘लोकप्रियता’ मिलने पर सोशल मीडिया की बड़ी उपलब्धि बताया जाता है.
हालाँकि इस मुहीम की अगुवाई करने के दौरान उनके समर्थकों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के भी आरोप लगे हैं. ज़्यादातर का मत है कि फ़िलिपींस के सोशल मीडिया पर ग़लत ख़बरों की भरमार सी रही है.

बर्मा



बर्मा यानी म्यांमार एक ऐसा देश है जहां न सिर्फ़ सोशल मीडिया का ज़बरदस्त इस्तेमाल बढ़ा है बल्कि सोशल पोस्टों के ज़रिए फ़ेक न्यूज़ के प्रचार ने भी कई दफ़ा ख़तरनाक रूख अपनाया है.

हाल ही के एक उदाहरण पर ग़ौर करिए. कोरोना काल के दौरान मार्च महीने में पूर्व राजधानी यांगोन से फ़ेसबुक पर पान की तस्वीर शेयर करते हुए एक शक़्स ने लिखा, “पान खाने वाले सभी लोगों के लिए अच्छी ख़बर. पान खाने वालों के मुँह में जाकर कोरोना मर जाएगा क्योंकि कोरोना की मोती परत को पान के साथ खाया जाने वाले चूना काट देगा”.

कुछ ही दिनों में इस पोस्ट के 33,000 शेयर हो गए और लोगों ने इसके स्क्रीनशॉट लेकर लोगों को मैसेज, ईमेल और सोशल नेट्वर्क पर इसे वायरल कर दिया. बर्मा के स्वास्थ्य विभाग को नोटिस जारी करना पड़ा कि ये ख़बर झूठ है और समाचार एजेंसी एएफ़पी ने इस दावे का फ़ैक्ट चेक कर इसे ग़लत साबित किया.
लेकिन फ़ेसबुक के सामने इस तरह के उदाहरण से कहीं बड़ी चुनौती खड़ी हो चुकी है 2017 के रोहिंग्या संकट के दौरान जब उस पर “सरकार के पक्ष में किए फ़ेसबुक पोस्टों पर कम ध्यान देने के” आरोप लगे थे.
जानकारों का मत है कि उस साल रोहिंग्या संकट उत्पन्न होने के दौरान बर्मा में हेट-स्पीच में ज़बरदस्त उछाल देखा गया.

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इसके प्रमाण उस दौरान देखने को मिले जब क़रीब 700,000 रोहिंग्या मुस्लिमों को बर्मा के रखाईन प्रांत से भाग कर बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार में शरण लेनी पड़ी थी.

शोधकर्ताओं ने राष्ट्रवादी कट्टरपंथी माबाथा ग्रुप और उससे जुड़े लोगों के क़रीब 15,000 फ़ेसबुक पोस्टों की जाँच करने के बाद पाया कि हेट-स्पीच से जुड़ी पोस्टों और रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ वाले फ़ेसबुक अकाउंट और पोस्टों में 200% का इज़ाफ़ा हुआ था.

संकट के कुछ महीनों बाद एक अमरीकी समाचार एजेंसी से बात करते हुआ ख़ुद मार्क ज़करबर्ग ने माना था कि “बर्मा एक बड़ा मसला था और स्थानीय एक्सपर्ट्स के साथ काम कर हम इसे हल करने की कोशिश कर रहे हैं”.

Report: Nitin Srivastava
Illustrations: Gopal Shoonya
Images: Getty
Production: Shadab Nazmi
Published on: 7October 2020