प्यार सरहद पार: भूटान के लोग भारत में शादी कर झेल रहे मुश्किलें

भूटान के लड़के भारत में शादी करने के बाद भी अपनी बीवी को घर नहीं ले जा पा रहे हैं. शादी के बाद भी भारत की लड़की ससुराल जा रही है तो भूटान की सरकार हर दिन एसडीएफ़ के रूप में 1200 रुपए ले रही है.

रजनीश कुमार

भूटान के फुंतशोलिंग और भारत के जयगाँव के बीच सरहद की दीवार पर एक जोड़े कबूतर बैठे हैं.

दोनों कबूतर कभी भूटान, तो कभी भारत में पंख फड़फड़ाते हुए आ जाते हैं.

40 साल की छोकी वांगमो इन कबूतरों को ललचाई नज़रों से देख रही हैं.

छोकी शायद सोच रही हैं कि वह भी कबूतर होतीं तो सरहद की दीवार उन्हें रोज़ नहीं चिढ़ाती. 

छोकी आए दिन भूटान-भारत की सरहद पर आकर बैठी रहती हैं.

आज वह भारत की तरफ़ जयगाँव में बैठी हैं और उनके पति पुष्पेंद्र सिंह दूसरी तरफ़ भूटान के फुंतशोलिंग में काम कर रहे हैं.

पुष्पेंद्र सिंह फुंतशोलिंग में मकैनिक का काम करते हैं. शाम में जब पुष्पेंद्र सिंह काम करके लौटते हैं, तो उन्हें पत्नी का साथ मिलता है.

पुष्पेंद्र सिंह भारतीय नागरिक हैं. उन्हें भूटान में काम करने के लिए वर्क परमिट मिली हुई है और हर तीन महीने पर उन्हें अपनी वर्क परमिट को रेन्यू कराना पड़ता है.

छोकी अक्सर अपने पति का इंतज़ार सरहद पर बैठकर करती हैं. दोनों पश्चिम बंगाल के जयगाँव में किराए के घर में रहते हैं.

छोकी ख़ुद भूटान में पारो की हैं. उन्होंने 2019 में हिमाचल प्रदेश के पुष्पेंद्र सिंह से शादी की थी.

छोकी बताती हैं कि उनके बड़े भाई इस शादी के ख़िलाफ़ थे.

बड़े भाई का मानना था कि भारत में शादी करने के बाद छोकी अपने पति और बच्चों को यहाँ की नागरिकता नहीं दिला पाएँगी और नाहक ही परेशान रहेंगी.

लेकिन प्यार और परेशानी की सोहबत बहुत पुरानी है.

छोकी के मामा हिमाचल प्रदेश के मनाली में एक बौद्ध मंदिर में लामा हैं. वह अपने मामा से मिलने मनाली गई थीं.

इसी दौरान उनकी मुलाक़ात 2019 में रिकोंगपीओ में पुष्पेंद्र सिंह से हुई थी.

पुष्पेंद्र सिंह के विवाह प्रस्ताव को छोकी वांगमो ने तत्काल स्वीकार कर लिया था. छोकी बौद्ध हैं और पुष्पेंद्र सिंह हिन्दू.

दोनों के प्रेम विवाह में मज़हब बिल्कुल आड़े नहीं आया, लेकिन सरहद की दीवार उन्हें हर दिन सताती है.

छोकी के लिए भूटान और भारत में किसी एक को चुनना आसान नहीं है.

छोकी कहती हैं- भूटान और भारत में किसी एक को चुनना मुश्किल है लेकिन भूटान, भारत और प्रेम, तीनों में मैंने प्रेम को चुना है.

छोकी चाहती हैं कि उनके पति भूटान में उनके घर में भी रहें. लेकिन पुष्पेंद्र अपनी पत्नी के साथ पारो जाएँगे, तो हर दिन एसडीएफ़ यानी 'सस्टनेबल डिवेलपमेंट फ़ीस' के तौर पर 1200 रुपए देने होंगे.

भूटान की सरकार भारतीयों के भूटान आने पर हर दिन एसडीएफ़ के रूप में 1200 रुपए लेती है. पुष्पेंद्र पर भी यही नियम लागू होगा.

भूटान पहले भारतीयों से एसडीएफ़ नहीं लेता था. लेकिन पिछले साल सितंबर में कोविड के बाद भूटान पर्यटकों के लिए खुला, तो भारतीयों पर भी एसडीएफ़ लगा दिया गया.

छोकी को अगर भूटान से मैरेज सर्टिफ़िकेट मिल जाता, तो उनके पति को एसडीएफ़ नहीं देना पड़ता.

छोकी कहती हैं कि उन्हें मैरिज सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा क्योंकि लोग भारतीयों से शादी करने के बाद 15-15 सालों से मैरेज सर्टिफ़िकेट का इंतज़ार कर रहे हैं.

भूटानी लड़कियाँ और लड़कों की मुश्किलें

यह दर्द केवल छोकी वांगमो का नहीं है. जयगाँव के खोकला इलाक़े में इस दर्द के साथ जीने वाले कई छोकी वांगमो और पुष्पेंद्र हैं.

करमा कीनले पूर्वी भूटान के हुंसी के रहने वाले हैं. उन्होंने 2019 में भूटान से सटे भारत के बक्सा हिल की छृंग छोकी डुक्पा से प्रेम विवाह किया था.

2020 में जब कोविड महामारी आई, तो करमा भारत के बक्सा में ही थे और भूटान ने बॉर्डर बंद करने की घोषणा कर दी थी.

पूरे लॉकडाउन में करमा भारत में ही अपनी बीवी के साथ रहे. इसी दौरान उनकी पत्नी छोकी डुक्पा ने एक बच्चे को जन्म दिया. बच्चा भी डेढ़ साल का हो गया है.

करमा कीनले के परिवार से मिलने के बाद लगता है कि उनका प्रेम दो देशों के बीच बँट गया है. छोकी डुक्पा भले करमा की बीवी हैं लेकिन भूटान की नागरिकता मिलना मुश्किल है.

यहाँ तक कि उनके बच्चे को भी भूटान की नागरिकता मिलना कठिन है.

करमा मजबूरी में अपनी बीवी और बच्चे के साथ जयगाँव में रह रहे हैं. जयगाँव में ही करमा हैंडीक्राफ़्ट का काम करते हैं.

करमा से पूछा कि क्या उनका प्रेम दो देशों के बीच फँस गया है?

करमा कहते हैं, "मेरा नाम करमा है और मैं करमा में ही भरोसा करता हूँ. प्रेम की कोई नागरिकता नहीं होती. हिन्दी फ़िल्मों का ही डायलॉग है कि प्यार अंधा होता है. मुझे भी यही लगता है कि प्यार सरहदों से परे होता है. मुश्किलें तो हैं लेकिन मैंने कोशिश नहीं छोड़ी है."

करमा चाहते हैं कि वे अपनी बीवी और बच्चे को लेकर भूटान जाएँ और वहीं रहें, लेकिन वहाँ के नियम उन्हें ऐसा करने से रोक रहे हैं.

अपनी बीवी को लेकर करमा भूटान जाएँगे, तो हर दिन 1200 रुपए एसडीएफ़ देने होंगे.

एक बार छोकी डुक्पा चार दिन के लिए भूटान गई थीं, तो उन्हें एसडीएफ़ के रूप में 4800 रुपए देने पड़े थे.

 करमा कोशिश कर रहे हैं कि छोकी को भूटान से मैरेज सर्टिफिकेट मिल जाए.

इसके लिए छोकी ने भूटान जाकर इंटरव्यू भी दिया है लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है. करमा को लगता है कि उनकी बीवी को अच्छे नंबर मिले होंगे क्योंकि छोकी को भूटानी भाषा भी आती है.

करमा कहते हैं, "भूटान से मैरेज सर्टिफ़िकेट मिल जाएगा, तो मेरी बीवी भूटान में साथ रह सकती है. मैरेज सर्टिफ़िकेट हर चार साल पर रेन्यू कराना होता है. मैरेज सर्टिफ़िकेट के लिए बच्चे के साथ कोर्ट में गया था. एमसी मिल जाएगा, तो आने-जाने में दिक़्क़त नहीं होगी और एसडीएफ़ भी नहीं देना होगा. मैं भूटान अकेले रह नहीं सकता और अभी पत्नी को साथ में रखूँगा, तो हर दिन के पैसे देने होंगे. भारत कम से कम प्रेम को पनाह दे रहा है."

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करमा कहते हैं कि वे अपनी बीवी और बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं. करमा जब ये बातें कह रहे थे तो डेढ़ साल का उनका बच्चा रो रहा था. वह अपने बच्चे को गले लगा लेते हैं और कुछ देर के लिए बिल्कुल ख़ामोश हो जाते हैं.

करमा उस ख़ामोशी को भावुकता के साथ तोड़ते हुए कहते हैं, "भूटान मेरी जन्मभूमि है. शादी करने के बाद लोग अपने घर में ही पत्नी को ले जाते हैं. मेरे बच्चे का भविष्य तो मेरे ही हाथ में है. मैंने कोई ग़लत काम नहीं किया है. प्यार कोई गुनाह नहीं है. कोविड के पहले भारतीयों को भूटान में पैसे नहीं देने होते थे. अगर वही नियम होता, तो मेरे लिए आसान होता. मुझे अपनी ही बीवी को साथ में रखने के लिए पैसे देने होते हैं. ठीक तो नहीं लगता है, लेकिन नियम है तो मानना पड़ेगा."

भारत में रहो तो माँ की याद, भूटान में रहो तो पति और बच्चों की याद

भूटान की छिमी डेमा ने 16 साल पहले जयगाँव के पूरन छेत्री को अपना हमसफ़र बनाया था.

पूरन और छिमी के अब 12 और 14 साल के दो बेटे भी हैं.

छिमी की ज़िंदगी में कोई कमी नहीं हैं. जयगाँव में ख़ूबसूरत घर है, जो भूटान की सरहद के ठीक पीछे है.

भूटान की सरहद से छिमी का घर इतना क़रीब है कि सरहद की दीवार पर बैठा कबूतर उड़कर आता है तो छिमी की छत पर ही बैठता है.

छिमी अपने प्यार और परिवार से काफ़ी ख़ुश दिखती हैं. लेकिन माँ को याद कर भावुक हो जाती हैं.

छिमी की माँ 67 साल की हैं और वे भूटान के पारो से दो किलोमीटर दूर एक गाँव में रहती हैं.

भूटान में पारो एकमात्र शहर है, जहाँ एयरपोर्ट है. छिमी अपनी माँ की अकेली संतान हैं.

छिमी के पिता दार्जिलिंग के एक बौद्ध मंदिर में लामा थे. उनकी मौत हो चुकी है. पति की मौत और बेटी की भारत में शादी के बाद वह बिल्कुल अकेली हो गई हैं.

छिमी कहती हैं, "पाकिस्तानी फ़िल्म का एक संवाद है कि मोहब्बत साइंस है और बिछड़ना आर्ट. मैं पति के साथ साइंस जी रही हूँ और माँ के साथ आर्ट. दुनिया की ज़्यादातर लड़कियों को यही जीवन चुनना पड़ता है."

छिमी अपनी माँ को याद करते हुए कहती हैं, "माँ को अपने पास ले आती हूँ लेकिन उनका यहाँ मन नहीं लगता है. वह अपने फूलों को याद करने लगती हैं. पहाड़ों की याद में ग़ुम हो जाती हैं. भूटान की आबोहवा उसकी नसों में बहती है. उन्हें मेरी शादी क़बूल नहीं थी.''

''वह सालों तक हमसे नाराज़ रहीं. भूटान में नेपाली भाषी और गोरखाओं को लेकर कई तरह के ऐतिहासिक पूर्वाग्रह हैं. नेपाली भाषियों के ख़िलाफ़ भूटान में 90 के दशक में एक अभियान भी चला था. लेकिन संयोग से मैंने अपना जीवनसाथी नेपाली ही चुना. अब मेरी माँ ने मेरे पति को स्वीकार कर लिया है. मेरे पति ने माँ के लिए थोड़ी भूटानी सीखी और माँ ने अपने दामाद के लिए थोड़ी नेपाली सीखी."

हालाँकि भूटान में बड़ी तादाद में लोग नेपाली भाषा भी बोलते और समझते हैं.

छिमी डेमा और पूरन छेत्री की पहली मुलाक़ात 2006 में कालिम्पोंग में हुई थी. पूरन अपने तिब्बती दोस्त के साथ एक धार्मिक कार्यक्रम में कालिम्पोंग गए थे.

छिमी भी उस पूजा में आई थीं. इस पहली मुलाक़ात का सिलसिला थमा नहीं. छिमी के माता-पिता नेपाली भाषी भारतीय पूरन से शादी के लिए तैयार नहीं हुए, तो दोनों ने भागकर शादी कर ली.

छिमी भूटान को बहुत मिस करती हैं. वह कहती हैं कि अगर उनकी माँ अकेले ना होतीं तो शायद इतना मिस नहीं करतीं.

छिमी ने अभी भूटान की नागरिकता नहीं छोड़ी है. अगर वह नागरिकता छोड़ देती हैं, तो उनके लिए भी भूटान में आना-जाना मुश्किल हो जाएगा.

छिमी कहती हैं- मैं अपने पति के साथ माँ के पास नहीं जा सकती. बच्चों को नानी से मिलवाने ले जाना उतना मुश्किल है. अब तो नए नियम के तहत पति और बच्चे साथ में जाएँगे, तो हर दिन तीनों को 3600 रुपए एसडीएफ़ के रूप में देने होंगे. इतनी रक़म देना आसान नहीं होता है. पति को साथ ले जाने के लिए भी परमिट बनानी होती है. हमें पहले बताना होता है कि पति मेरे साथ कितने दिन रहेगा. भूटान का एक भी नियम ऐसा नहीं है, जो प्रेम की परवाह करता हो. हर नियम अलगाव को प्रोत्साहित करता है. वो हमारे प्रेम की परवाह नहीं करते हैं, लेकिन हमें उनके हर नियम मानने पड़ते हैं.

पूरन और छिमी ने भूटान से मैरेज सर्टिफ़िकेट (एमसी) भी बनाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. छिमी कहती हैं कि वह अब एमसी की उम्मीद छोड़ चुकी हैं.

पूरन भूटान के नियमों को लेकर ख़फ़ा रहते हैं. उन्हें लगता है कि भारत को इस मामले में भूटान से बात करनी चाहिए.

पूरन को लगता है कि भूटान आए दिन नियम बदल देता है और सरहद के इस तरफ़ रहने वाले लोग परेशान होते हैं.

पूरन कहते हैं, "भूटानियों के लिए भारत में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिनसे वो परेशान होते हों. लेकिन भारतीयों के लिए भूटान ने ऐसे कई नियम बनाकर रखे हैं. भूटान की सैकड़ों गाड़ियाँ हर दिन भारत में आती हैं, लेकिन उन्हें कोई चार्ज नहीं देना पड़ता है.''

सरहद पर सिसकियाँ

भारत और भूटान की सरहद पर चौकसी बहुत बढ़ गई है. ख़ासकर भारतीयों के लिए भूटान जाना बहुत आसान नहीं रहा है.

भूटान जाने के लिए भले भारतीयों को वीज़ा नहीं लगता है, लेकिन वोटर आईडी कार्ड या पासपोर्ट दिखाना अनिवार्य है.

इन्हीं दो पहचान पत्रों के आधार पर भारतीयों को भूटान जाने की परमिट मिलती है. एक तरीक़े से यह परमिट वीज़ा की तरह ही है.

गेट पर सारा डिटेल देना होता है कि कहाँ-कहाँ जाना है और कितने दिनों तक रहना है.

अगर कोई भारतीय 10 दिनों के लिए भूटान जाता है, तो उसे 10 दिनों तक भूटान का ही एक गाइड साथ में रखना होगा.

इसके लिए उस गाइड को हर दिन 1500 रुपए देने होंगे. इसके अलावा प्रति व्यक्ति हर दिन 1200 रुपए एसडीएफ़ देने होंगे.

लेकिन भूटान के लोग भारत में आते हैं, तो उनके लिए ऐसा कोई भी नियम नहीं है. वे आराम से भारत आ सकते हैं और चाहे जितने दिन भी भारत के किसी भी हिस्से में रह सकते हैं.

जयगाँव के आम लोगों में भूटान के नए नियम के प्रति नाराज़गी भी दिखती है.

भारत में भूटान के राजदूत रहे पवन वर्मा से पूछा कि क्या भूटान को शादीशुदा जोड़ों को लेकर थोड़ी उदारता नहीं बरतनी चाहिए?

 पवन वर्मा कहते हैं, "भूटान और भारत के बीच कोई भी मसला हो, तो उसके लिए समाधान ढूँढना आसान है. दोनों मुल्कों में अटल विश्वास का रिश्ता है. यह विश्वास कोई आज नहीं बना है, बल्कि पिछले 70 सालों से बना है. पंडित जवाहरलाल नेहरू पैदल चलकर भूटान पहुँचे थे और उन्होंने भूटान को आश्वासन दिया था कि वह स्वतंत्र देश है और भारत इसका हमेशा सम्मान करेगा."

पवन वर्मा कहते हैं- भूटान के उत्तर में 20 हज़ार फुट ऊँचे हिमालय हैं. भूटान और भारत के बीच आना-जान लगा रहता है. भूटान नागरिकता के मामले में काफ़ी संवेदनशील है. भूटान अपनी अस्मिता को लेकर काफ़ी सतर्क रहता है. नेपाल और सिक्किम को आप मिसाल के तौर पर ले सकते हैं. दोनों जगह इतने लोग आए कि उनकी स्थानीय पहचान धुंधली पड़ गई है. भूटान ने इसे देखा है कि सिक्किम और नेपाल की ख़ास अस्मिता प्रभावित हुई है. भूटान की कोशिश यह है कि जो उसके नागरिक हैं, जो वहाँ जन्मे हैं, जो पुश्तैनी भूटानी हैं, उसमें कोई तब्दीली ना हो.

वे कहते हैं- अगर शादीशुदा जोड़े में से किसी एक को हर दिन भूटान जाने के लिए एसडीएफ़ देना बड़ा मसला है, तो बातचीत के ज़रिए समाधान मिल जाएगा. भूटान रणनीतिक लिहाज़ से भारत के लिए बहुत ही विशिष्ट दोस्त है. यह एक छोटा मुल्क है. संभव है कि भूटान के कुछ क़ानून सहज नहीं हों. मुझे लगता है कि छोटे पड़ोसी मुल्कों के साथ, जो बहुत हद तक हमारी मदद पर निर्भर हैं, उनके प्रति हमें लचीलापन दिखाना चाहिए न कि उनसे उम्मीद करनी चाहिए. हर चीज़ में एक मैकेनिकल रेस्पॉन्स नहीं दे सकते. हम ऐसा नहीं कह सकते कि जो भूटान कर रहा है, वही हम भी करें. इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. भूटान के साथ हमारे रिश्ते प्रेम विवाह से आगे के हैं. हम केवल इन चीज़ों में नहीं उलझकर नहीं रह सकते. भूटान के साथ जो रिश्ते बने हैं, वो लंबे समय में बने हैं.

कहा जाता है कि भूटान अपनी संस्कृति, अपनी अस्मिता के प्रति बहुत जागरूक है.

भूटान चाहता है कि भारत के साथ सीमा खुली ज़रूर हो, लेकिन भारत की बड़ी आबादी वहाँ न आ जाए. भूटान की आबादी मुश्किल से आठ लाख है.

नेपाल के लोग बड़ी संख्या में भूटान आने लगे थे और बाद में भूटान को रोक लगानी पड़ी थी.

भूटान को क्षेत्रफल के लिहाज़ से देखें, तो हिमाचल प्रदेश से भी छोटा है. दक्षिण एशिया में भारत सबसे बड़ा मुल्क है.

पवन वर्मा कहते हैं कि भारत बड़ा है, तो छोटे मुल्कों के साथ बड़प्पन के साथ पेश भी होना होता है.

वे कहते हैं कि बड़े मुल्क होने के नाते भारत की ज़िम्मेदारी होती है कि वह किसी के लिए ख़तरे के रूप में ना उभरे.

दक्षिण एशिया में भूटान में प्रति व्यक्ति आय सबसे ज़्यादा है. भूटान आर्थिक वृद्धि दर से ज़्यादा जीएचआई यानी ग्रॉस हैपीनेस इंडेक्स पर ध्यान देता है.

कहा जाता है कि भूटान इन चीज़ों को टिकाऊ बनाने के लिए ख़ुद को बहुत खोलता नहीं है.

जयगाँव पश्चिम बंगाल में कालचिनी विधानसभा क्षेत्र में आता है. यहाँ से बीजेपी के विधायक विशाल लामा हैं. यह विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व है.

लामा कहते हैं कि पूरे विधानसभा क्षेत्र में 40 फ़ीसदी आबदी नेपाली भाषियों की हैं. इस इलाक़े में आने पर इसका अहसास भी होता है. सार्वजनिक जगहों पर लोग या तो नेपाली बोलते दिखते हैं या हिन्दी.

विशाल लामा से भूटान की नागरिकता और मैरिज सर्टिफ़िकेट को लेकर उनके विधानसभा क्षेत्र के लोगों को हो रही समस्या पर पूछा तो उन्होंने कहा कि भूटान एक संप्रभु देश है और वह नियम बनाने के लिए स्वतंत्र है.

भूटान के अधिकारियों से बात कीजिए, तो वे दो टूक कहते हैं कि उनके संविधान के जो नियम हैं, वही आधिकारिक रुख़ है और इसमें अलग से कोई टिप्पणी नहीं की जाएगी.

भूटान से मैरिज सर्टिफिकेट के लिए क्या-क्या चाहिए?

विदेशी से शादी करने पर भूटान के लड़के या लड़की को माँ-बाप की सहमति चाहिए. यानी एनओसी देना होगा.

इसके अलावा पुलिस का एनओसी चाहिए कि कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है.

उसके बाद ब्लॉक में जाना होगा और फिर कोर्ट में. इंटरव्यू में देखा जाता है कि लड़की भारतीय है तो उसे भूटान के बारे में क्या पता है.

अगर उसे भूटानी भाषा आती है, तो उसका अतिरिक्त नंबर मिलता है. इंटरव्यू में कई तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं. अगर घर वाले एनओसी नहीं देंगे तो मैरेज सर्टिफ़िकेट पर विचार भी नहीं होगा.

भूटान के मैरिज बिल, 2017 के अनुसार, भूटान के हर नागरिक और निवासी को धर्म, जाति, लिंग, वर्ग, रंग-रूप के भेदभाव के बिना किसी भी व्यक्ति से शादी करने का अधिकार है, बशर्तें लड़के और लड़की की शादी के लिए आपसी सहमति हो और वे मैरिज एक्ट में दिए गए सभी प्रावधानों पर अमल करें.

साल 2015 में भूटान के सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि विदेशियों से शादी करने वाले भूटान के लोग मैरेज सर्टिफ़िकेट हासिल कर सकते हैं.

भूटान में मैरेज सर्टिफ़िकेट जारी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट हर साल एक इंटरव्यू आयोजित करता है.

इस इंटरव्यू में पास होने पर जिस ज़िले की जनगणना में आपके पति या पत्नी का नाम है, वहाँ की ज़िला अदालत से मैरेज सर्टिफ़िकेट हासिल करने के लिए आप योग्य हो सकते हैं.

विदेशियों के लिए भूटान की नागरिकता हासिल करना आसान नहीं है. अगर आप किसी भूटानी से शादी करना चाह रहे हैं, तो पहले ख़ुद से ये सवाल करिए कि क्या आप भूटान में रहना चाहते हैं?

अगर आप किसी भूटानी से शादी करते हैं, तो आपको भूटान की नागरिकता अपने आप नहीं मिल जाती.

अगर आप भूटान में बसना चाहते हैं, तो एक विकल्प है- नेचुरलाइज़ेशन के ज़रिए भूटान की नागरिकता के लिए आवेदन या भूटान में रहने के लिए स्पेशल रेजिडेंस परमिट के लिए आवेदन.

पहला विकल्प इतना आसान नहीं है. नेचुरलाइज़ेशन के ज़रिए आवेदन हासिल करने के लिए आपको भूटान में 10 साल रहना होगा और वहाँ आपकी ख़ुद की ज़मीन होनी चाहिए. हालाँकि, कई मामलों में भूटान के राजा ने इन नियमों में छूट भी दी है.

दूसरा विकल्प पहले की तुलना में थोड़ा आसान है.

भूटान और उनके विदेशी पार्टनर पर पाबंदियाँ

विदेशियों से शादी करने वाले भूटान के लोगों को राजनीतिक दलों, सेना और कुछ सरकारी नौकरियों में शामिल होने की इजाज़त नहीं होती है.

भूटान के क़ानून के अनुसार, भूटान का कोई पुरुष अगर किसी विदेशी लड़की से शादी करता है, तो उसके बच्चे को तो भूटान की नागरिकता मिल सकती है. लेकिन भूटान की लड़की किसी विदेशी से शादी करती है तो उसके बच्चे को भूटान की नागरिकता अपने आप नहीं मिलेगी.

उनके बच्चों को नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन की एक लंबी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है.

भूटान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है. अगर आप भूटान की नागरिकता हासिल करते हैं, तो आपको अपने मूल देश का पासपोर्ट छोड़ना होगा.

भूटान के मैरेज एक्ट को इन बिंदुओं में समझ सकते हैं-

⚫ लड़का और लड़की से परिचित दो गारंटर्स को कोर्ट के सामने पेश होना ज़रूरी है, जिसमें से एक गारंटर भूटानी नागरिक होना चाहिए.

 ⚫ ग़ैर-भूटानी पति या पत्नी नागरिकता हासिल कर भूटान में रह सकते हैं.

 ⚫ कोई भूटानी नागरिक अगर सरकारी नौकरी में है, तो विदेशी से शादी करने पर उसे शादी के वक़्त की पोस्ट से आगे प्रमोट नहीं किया जाएगा.

⚫ विदेशियों से शादी करने वाले भूटानियों को रक्षा विभाग या विदेश मंत्रालय में काम करने का मौक़ा नहीं मिलेगा.

 ⚫ विदेशियों से शादी करने वाले भूटानियों को कई सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित कर दिया जाएगा.

⚫  ग़ैर-भूटानी पति या पत्नी को भूटान के धर्म के अलावा कोई कोई नया धर्म अपनाने या उसका प्रचार करने की इज़ाजत नहीं होगी.

⚫ ग़ैर-भूटानी पति या पत्नी को भूटान की संस्कृति को अपनाना होगा और सरकारी आदेशों का पालन करना होगा.

भारत में क्या है प्रावधान

भूटान के लोग भारत में एक पहचान पत्र दिखाकर कहीं भी आ जा सकते हैं. उनके ऊपर किसी तरह की पाबंदी नहीं है. भूटान का लड़का भारत की किसी लड़की से शादी कर भारत में भी रह सकता है और भूटान की लड़की किसी भारतीय लड़का से शादी करती है तो उसे विवाह के आधार पर नागरिकता समेत सारे अधिकार मिल जाते हैं. मतदाता सूची में नाम और आधार कार्ड तो आते ही बन जाते हैं.

रिपोर्टर: रजनीश कुमार
फ़ोटो और वीडियो एडिटिंग: संदीप यादव, गेटी
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
शॉर्टहैंड: शादाब नज़्मी
इसे पब्लिश किया गया: 14 फ़रवरी, 2023