भारत की वो मौतें जिनकी गिनती नहीं हुई

सुनील शर्मा एक पुजारी थे. उनकी बहुत कम उम्र में मौत हो गई. सुनील के गुज़र जाने के बाद उनकी बीवी और दो बच्चों को किसी तरह अपनी ज़िंदगी संभालनी पड़ेगी.

सुनील शर्मा राजस्थान के गांवड़ी गांव के रहने वाले थे. उनकी पत्नी सीमा शर्मा ने बीबीसी को बताया, “इस साल 9 मई को उन्हें बुखार आ गया था जिसके बाद हम उन्हें पास के एक डॉक्टर के पास ले गए.”

एक हफ़्ते बाद जाँच में वो कोरोना पॉज़िटिव पाए गए.

41 बरस के सुनील को शुरुआत में तो इलाज से फ़ायदा हुआ था. उनकी हालत बेहतर होने लगी थी. लेकिन जब उनका ऑक्सीजन लेवल गिरने लगा, तो परिजन उन्हें राजधानी जयपुर के एक निजी अस्पताल में ले गए.

गांवड़ी गांव

गांवड़ी गांव

पत्नी सीमा शर्मा कहती हैं, “सुनील का अंतिम संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत ही हुआ लेकिन कोविड-19 से मरने वालों की सरकारी लिस्ट में उनका नाम नहीं है.

सुनील, हसीब, आशिक़, पुनीता, कुंदन- ये कुछ नाम हैं, जिनकी मौत तो कोरोना से हुई लेकिन कोविड-19 से हुई मौतों की सरकारी फ़ेहरिस्त में इनके नाम नहीं हैं. ऐसे लोगों की लिस्ट बहुत लंबी है जिनके नाम सरकारी सूची में नहीं हैं.

कोरोना से हुई मौतों की संख्या कम बताए जाने के दावों की पड़ताल के लिए बीबीसी के 12 रिपोर्टर भारत के अलग-अलग इलाक़ों में स्थित 8 राज्यों के 12 शहरों में गए.

हमने इन 12 शहरों में शवदाह गृहों, श्मशान घाटों, क़ब्रिस्तानों और अस्पतालों से संपर्क किया, सामाजिक कार्यकर्ताओं से बात की. हमारा मकसद 1 से 15 मई के दौरान कोरोना से हुई मौतों के सरकारी आंकड़ों और ज़मीनी हालात की तुलना करना है.

हमने उन शहरों को चुना जहां मई महीने की शुरुआत में कोरोना के संक्रमण में बहुत तेज़ी आ गई थी. शहरों के चुनाव में इस बात का भी ध्यान रखा गया कि देश के हर भौगोलिक क्षेत्र को शामिल किया जा सके.


इन शहरों में बिजनौर, दरभंगा, जमशेदपुर, जौनपुर, करीमनगर, मानसा, नागपुर, पटना, प्रयागराज, रायपुर, सीकर और शिमला हैं. उत्तर भारत से पंजाब, हिमाचल और उत्तर प्रदेश, मध्य भारत से छत्तीसगढ़, पूरब से बिहार, पश्चिम से महाराष्ट्र और दक्षिण भारत से तेलंगाना का जायज़ा लिया गया है.

इस पड़ताल में हमें जो जानकारी हासिल हुई, हमने उसे ही इस रिपोर्ट का आधार बनाया है.

सीमा शर्मा ने कहा, “अस्पताल ने बताया कि सुनील की मौत कोरोना से हुई थी लेकिन मुझे नहीं पता कि उनका नाम सरकारी लिस्ट में क्यों नहीं है.”

स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हुआ जबकि कोरोना से हुई हर मौत को दर्ज करना उन्हीं की ज़िम्मेदारी है.

सुनील गुजरात में पुजारी का काम करते थे लेकिन पिछले साल नवंबर से राजस्थान के अपने गांव में ही रह रहे थे. वो उन करोड़ों लोगों की तरह थे जो महामारी और लॉकडाउन के संकट के दौरान अपने परिवारों के पास घर लौट गए थे.

गांव के एक स्कूल के छोटे के कमरे से गांव का उप-स्वास्थ्य केंद्र संचालित होता है. विमला चौधरी इस स्वास्थ्य केंद्र में बतौर स्वास्थ्यकर्मी काम करती हैं.

विमला के मुताबिक उनके पास सुनील शर्मा की मौत का कोई रेकॉर्ड नहीं है क्योंकि वो गांव के बाहर रहते थे.

अगर किसी की मौत कोरोना से होती है तो अस्पताल को उस मरीज़ की मौत की ख़बर स्वास्थ्य विभाग को देनी होती है जिससे कोविड-19 से हुई मौतों की आधिकारिक सूची में उसका नाम भी दर्ज हो सके.

अस्पताल के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि उनके यहां कोविड प्रोटोकॉल का पालन पूरी तरह किया गया. वहीं राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने कहा कि लोगों के नाम सरकारी सूची में न होने की वजह “आपसी संवाद में थोड़ी कमी” हो सकती है.

रघु शर्मा ने कहा, “अगर किसी की मौत हमारे राज्य में हुई है तो उसका नाम यहीं दर्ज होना चाहिए. अब हम उस दौरान दर्ज कोरोना से हुई मौतों की जांच करा रहे हैं.

लेकिन इससे सुनील के दुखी परिवार को तो ढांढस नहीं बंधाया जा सकता. उन्हें डर है कि सरकार कोरोना से मरने वालों के परिजनों को जो मदद दे रही है कहीं वो उससे वंचित न रह जाएँ.

ये सुनील जैसे लोगों की मौत के मामले ही हैं, जिनकी वजह से आलोचक ये कह रहे हैं कि भारत में कोरोना से हुई मौतों की सही तरीक़े से गिनती नहीं हुई है.

सुनील के गांव से सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश में 11 हज़ार की आबादी वाले एक गांव के लोगों ने बताया कि उनके यहां अचानक बड़ी संख्या में लोगों की मौत होने लगी. बीच अप्रैल से महज़ चार हफ़्तों के भीतर गाँव में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई.

इन्हीं में से एक थे पत्रकार आशिक़ अली.

उनके छोटे भाई अब्दुल क़ादिर ने बीबीसी को बताया, “मेरे भाई को 19 अप्रैल को बुखार आ गया था लेकिन वो ठीक थे. जब वो दवा लेते तो बुखार उतर जाता था लेकिन दवा का असर ख़त्म होते ही फिर से बुखार हो जाता था. हमने सोचा कि ये आम बुख़ार ही होगा तो हमने कोरोना की जांच भी नहीं कराई. एक मई को अचानक उनकी मौत हो गई.”

स्थानीय पत्रकार कंवल जाफरी ने अपने इलाके में कोरोना जैसे लक्षणों से हुई एक-एक मौत का हिसाब रखा है.

उन्होंने बताया, “गांव में जो और लोग भी मरे, उन्हें भी वैसे ही लक्षण थे, जो आशिक़ में दिखे थे. जैसे कि बुखार, खांसी और सांस लेने में दिक़्क़त वग़ैरह.”


ज़िले के अधिकारी ये तो मानते हैं कि गांव में अचानक हुई बहुत-सी मौतों की ख़बर उन्हें है लेकिन वो ये नहीं मानते कि इन मौतों का ताल्लुक़ कोरोना के संक्रमण से था.

स्थानीय वरिष्ठ सरकारी अधिकारी धीरेंद्र सिंह ने बीबीसी को बताया, “हमने गांव में टेस्ट के लिए कई कैंप लगाए थे. लेकिन जांच में कोई भी कोरोना पॉज़िटिव नहीं पाया गया.”

जब हमने उनसे अचानक हुई मौतों की वजह के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि, “ये संयोगवश भी हो सकता है.”

क़रीब 1.4 अरब आबादी वाले देश के कई गांवों, शहरों और राज्यों में ऐसी ही कहानी दोहराई जाती दिखी.

नवीन सिन्हा बिहार के दरभंगा शहर के रहने वाले हैं. उनका संगठन गुमनाम लाशों का अंतिम संस्कार कराता है. नवीन ने बताया, “कोरोना की दूसरी लहर 8 अप्रैल से शुरू हुई थी. अगले 44 दिनों तक श्मशान घाटों में चिताओं की आग कभी ठंडी नहीं पड़ी.”

नवीन सिन्हा कहते हैं, “ऐसे भी परिवार हैं जिनके दो- तिहाई सदस्य चल बसे. बहुत से लोगों ने एक ही चिता में दो-दो शवों के अंतिम संस्कार की भी गुज़ारिश की क्योंकि श्मशान घाटों में इतनी जगह ही नहीं थी. लोग दर्द बांटने के लिए एक दूसरे को गले लगाने तक को तरस गए.”

लेकिन कोविड-19 से मौतों का सरकारी आंकड़ा इस हक़ीक़त से मेल नहीं खाता.

कोरोना से हुई मौतों के असली आंकड़े छिपाने को लेकर भारत की कड़ी आलोचना हुई है. जानकार कहते हैं कि इससे भविष्य में किसी महामारी से निपटने के लिए क्षमता विकसित करने की कोशिशों को झटका लगेगा.

भारत में कोरोना से हुई मौतों का सरकारी आंकड़ा जून महीने के अंत में 400,000 से कुछ ज़्यादा था.

दुनिया भर में कोरोना से हुई मौतों की आधिकारिक संख्या के मामले में अमेरिका और ब्राज़ील के बाद भारत का तीसरा नंबर है.

ब्रिटेन में ग्लोबल हेल्थ अलायंस के निदेशक डॉक्टर रजय नारायण कहते हैं:

“अगर आप मरने वालों की सही संख्या नहीं बताते तो आप बहुत बड़ा जोखिम मोल ले रहे हैं. आप मरने वालों की संख्या कम बताकर वायरस के उन स्ट्रेनों की पहचान सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं जिनकी वजह से लोगों की जान जा रही है.”

डॉक्टर रजय नारायण कहते हैं, “लोगों की मौत की संख्या बताने की एक स्वतंत्र और पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें सरकार का कोई दखल न हो.

सवाल तो बहुत से हैं

आरोप ये भी हैं कि अस्पतालों में मरने वाले लोगों में से सिर्फ़ उन्हीं के नाम कोविड-19 से मौत की सरकारी लिस्ट में डाले गए जिन्हें कोई दूसरी बीमारी नहीं थी.

ये अपने-आप में एक समस्या है. एक सच ये भी है कि बहुत से लोगों की मौत घरों में ही हुई. उनमें से बहुत सारे लोगों की तो जांच भी नहीं हुई. ये बात गांवों पर ख़ास तौर से लागू होती है, जहां देश की दो-तिहाई आबादी रहती है.

बहुत से लोगों के लिए तो ये साबित करना तक़रीबन असंभव ही था कि उनके परिजनों की मौत कोरोना से हुई. अब इस बात की संभावना नहीं है कि उनके नाम आधिकारिक सूची में दर्ज होंगे.

जब दूसरी लहर अपने शीर्ष पर थी तो हमने इस बारे में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जयप्रकाश सिंह से पूछा था.

उन्होंने कहा, “हमारे रिकॉर्ड में उन सभी लोगों के नाम हैं जिनकी मौत अस्पतालों में हुई”.

अपनी पड़ताल के दौरान हमें कई दिल दुखाने वाली कहानियाँ मिलीं, ज़मीर हाशमी की कहानी भी ऐसी ही है.

जब दूसरी लहर के शिखर पर लोग अस्पतालों में बेड की भारी कमी से जूझ रहे थे तो मरीज़ और उनकी देख-भाल करने वाले, दोनों ही अधर में छोड़ दिए गए थे. उन्हें मालूम ही नहीं था कि इलाज के लिए जाएँ तो जाएँ कहाँ.

बीबीसी से बात करते हुए ज़मीर हाशमी ने बताया कि उनके भाई एक मेकैनिकल इंजीनियर थे, वे कोरोना से संक्रमित हो गए थे. उन्हें पटना के कई अस्पतालों ने लौटा दिया था. आख़िर में उन्हें एक ऐसे अस्पताल में जगह मिली जिसने शर्त रखी कि मौत होने पर उनका मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं जारी किया जाएगा.

19 अप्रैल को ज़मीर हाशमी के भाई की मौत हो गई. भाई की मौत का दु:ख झेल रहे ज़मीर कहते हैं, ‘मेरे भाई को कोरोना वायरस ने नहीं, डॉक्टरों ने मार डाला. मैंने उसे सांस लेने के लिए तड़पते हुए और फिर मरते हुए देखा था.”

बीबीसी की पड़ताल


बीबीसी ने पूरे भारत में कोरोना से मौत के आंकड़ों की एक तस्वीर बनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में दर्ज मौत के आंकड़ों का विश्लेषण किया. हमने 12 क़स्बों और शहरों में शवदाह गृहों, श्मशान घाटों, क़ब्रिस्तानों, अस्पतालों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों से बात की, जिससे हम 1 से 15 मई के बीच ‘कोविड डेथ’ के तौर पर दर्ज मौतों और ज़मीनी हालात की तुलना कर सकें.

हमने अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों की नुमाइंदगी करने वाले शहरों को चुना. उन शहरों को तरज़ीह दी गई जहां मई की शुरुआत में संक्रमण के मामले अधिक थे.

इनमें बिजनौर, दरभंगा, जमशेदपुर, जौनपुर, करीमनगर, मानसा, नागपुर, पटना, प्रयागराज, रायपुर, सीकर और शिमला थे.

ये वो दौर था जब कई राज्यों में कोरोना की दूसरी लहर अपने शिखर पर थी और लोग अपनों के अंतिम संस्कार के लिए संघर्ष कर रहे थे.

हमने अपनी पड़ताल में पाया कि मरने वालों का आंकड़ा सभी जगह नहीं उपलब्ध था.

हमने जिन इलाक़ों में ये पड़ताल की, उनमें से ज़्यादातर जगहों पर पिछले साल इसी दौरान हुई मौतों के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे. इसने कोरोना से हुई मौतों के भयानक मंज़र को धुंधला कर दिया है.

हालांकि एक बात तो एकदम साफ़ है. कोरोना से हुई मौतों की आधिकारिक संख्या कम करके बताई गई है.

झारखंड के जमशेदपुर के पार्वती घाट के शवदाह गृह में अंतिम संस्कार कराने वाले दिपेंदर कुमार भट्ट कहते हैं, “सबसे बड़ी चुनौती तो ये थी कि इतनी बड़ी तादाद में आ रहे शवों का अंतिम संस्कार एक साथ कैसे हो.”

पार्वती घाट में बिजली से चलने वाली दो मशीनें हैं. इनकी क्षमता हर दिन 10 शवों को जलाने की है.

दिपेंदर कहते हैं, “दूसरी लहर के दौरान तो लाशों की बाढ़-सी आ गई थी. हर दिन 55-60 शव जलाने के लिए आ रहे थे, तो हमें लाश जलाने के लिए लकड़ियों का अलग से इंतज़ाम करना पड़ा था. आम तौर पर हम बरसात के सीज़न के लिए लकड़ियाँ अलग से रखा करते हैं ताकि वो सूखी रहें लेकिन वो सब खत्म हो गईं.”


बिहार की राजधानी पटना में 1 से 20 मई के दौरान, पूरे ज़िले में कोरोना से हुई मौतों का सरकारी आंकड़ा 357 का है. लेकिन स्थानीय नगर निगम के अधिकारियों के मुताबिक़ इस दौरान केवल शहर में छह जगहों पर 1352 कोविड संक्रमित लोगों का अंतिम संस्कार हुआ था. ये दोनों ही सरकारी आंकड़े हैं. इनके बीच का अंतर आप खुद देख सकते हैं.

पटना की कुल आबादी क़रीब 60 लाख है. इसमें से नगर निगम के दायरे में केवल 17 लाख लोग आते हैं. बिहार ने कोरोना से मरने वालों की संख्या में सुधार करके इसमें क़रीब चार हज़ार की वृद्धि कर दी है.


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कोरोना से मौत की आधिकारिक संख्या केवल 516 थी. हमारे संवाददाता ने कोरोना से कम-से-कम 340 और मौतों के सबूत जुटाए.

दिलचस्प बात ये है कि छत्तीसगढ़ ने मई 2020 में कोरोना से केवल एक मौत होने की जानकारी दी थी. यहां ये बात समझना ज़रूरी है कि केवल 12 शहरों से जुटाए गए आंकड़ों से पूरे देश में कोरोना से हुई मौतों की पक्की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई की तुलना सरकारी आंकड़ों से करने पर हमें ये अंदाज़ा ज़रूर हो जाता है कि कोरोना से हुई मौतों को किस हद तक कम करके बताया गया.

हमारी पड़ताल में ये चुनौती भी सामने आई कि देश के गांवों से आंकड़े जुटाना बहुत मुश्किल है. गांवों में पहले से ही आंकड़े दर्ज करने की व्यवस्था बहुत चुस्त नहीं है.

मीडिया की ख़बरों में बार-बार ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रहे कोरोना के मामलों की तरफ़ इशारा किया गया. लेकिन जब भारत की प्रमुख नदियों और ख़ास तौर से गंगा में लाशें तैरने लगीं तो लोगों को ज़बरदस्त सदमा लगा.

नदियों के किनारे, हज़ारों ऐसे शव भी मिले, जिन्हें रेत में बस हल्का-सा दबाकर दफ़ना दिया गया था. माना यही जाता है कि इनमें से ज़्यादातर लोग कोरोना के शिकार हुए थे और परिजन उनके अंतिम संस्कार का ख़र्च उठा पाने की हालत में नहीं थे.


शायद हमें ये बात कभी पता न चले कि इनमें से कितनों के नाम सरकारी आंकड़ों में दर्ज हुए थे.

इसके अलावा भारत एक विशाल देश है और अलग अलग क्षेत्रों में संक्रमण की भयावहता भी अलग थी.

भारत और विदेश के मीडिया में आई कई पड़तालों में ये आरोप लगे कि ज़मीन से जुटाए गए आंकड़े, सरकारी संख्या से मेल नहीं खाते.

गुजरात के एक अख़बार की रिपोर्ट ने सरकार के अपने आंकड़ों के हवाले से कहा कि 1 मार्च से 10 मई के दौरान हुई मौतें असल में सरकारी आंकड़ों से दस गुना ज़्यादा थीं.

वेबसाइट द स्क्रॉल ने हेडलाइन लगाई थी, ‘मध्य प्रदेश में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान सामान्य से तीन गुना अधिक मौतें हुईं.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि, ‘ये ज़रूरी नहीं है कि ज़्यादा मौतों की इस सारी संख्या के पीछे कोरोना महामारी ही हो.’

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ भी कई राज्यों में मौतों की अधिक संख्या की ख़बरें देता रहा है. इसकी एक रिपोर्ट में ये पता चला कि सेकेंड वेव के दौरान छत्तीसगढ़ में सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) में दर्ज मौतों की संख्या इसी दौरान के आधिकारिक आंकड़ों से क़रीब साढ़े चार गुना ज़्यादा है.

केंद्र सरकार ने मौतों की संख्या छुपाने के आरोपों को सख़्ती से ख़ारिज किया है.

जब मीडिया में ये रिपोर्ट आई कि “भारत में कोरोना से हुई मौतों की आधिकारिक संख्या से शायद पांच-सात गुना अधिक लोगों की जान गई है’, तो सरकार ने एक बयान जारी करके कहा कि ‘कोरोना के आंकड़ों के प्रबंधन में भारत ने पूरी पारदर्शिता अपनाई है.’

अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि भले ही मरने वाले को कोई और बीमारी रही हो लेकिन अब कोरोना से हुई हर मौत को कोविड-19 के शिकार लोगों में ही गिना जाएगा. हालांकि सरकार ने अदालत को ये भी बताया कि ये निर्देश तो 2020 में ही जारी किए गए थे. स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के निर्देशों में इस बात का भी ज़िक्र है.

लेकिन ये बात भी साफ़ है कि अस्पतालों में इन निर्देशों का पालन नहीं हुआ. ज़्यादातर अस्पतालों ने किसी की मौत के लिए कोरोना को ज़िम्मेदार तभी माना, जब उसे कोई और बीमारी न हो.
उत्तराखंड में हाई कोर्ट ने कहा, “हम कोरोना से हुई मौतों के सरकारी आंकड़े को स्वीकार नहीं कर सकते हैं.” हाई कोर्ट ने कहा कि उसे सरकार के इस दावे पर बिल्कुल यक़ीन नहीं है कि अल्मोड़ा के पहाड़ी ज़िले में हुई 111 मौतों की वजह ये थी कि वो सभी दिल का दौरा पड़ने या ‘फेफड़ों और दिल के काम न करने’ जैसी दिक़्क़तों से मरे.

अब मौत के आंकड़ों का परीक्षण करने वाली समितियां इन आंकड़ों की समीक्षा और मिलान करेंगी. लेकिन इस बात की उम्मीद कम ही है कि वो शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में अपने घरों में मरे लोगों की संख्या को आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज करेंगी.

आंकड़ों में अंतर

इन हालात की एक बड़ी वजह शायद आंकड़ों के बीच फ़र्क़ है.


बिहार

मिसाल के लिए आप बिहार की राजधानी पटना में कोरोना की मौत के सरकारी आंकड़े को ही लें. अधिकारियों के मुताबिक़ पूरे पटना ज़िले में 357 लोग कोरोना से मरे.

अब आप सरकारी आंकड़े की तुलना कुछ ज़मीनी सच्चाइयों से करें. मई 2020 में पटना में मौत का आधिकारिक आंकड़ा 740 था, तो मई 2019 में ये संख्या 964 थी. अब इसकी तुलना मई 2021 से करें, जब 4775 मौतें रजिस्टर कराई गईं. इनमें तमाम वजहों से गुज़र गए लोगों की संख्या शामिल है, तो इन सब को कोरोना का शिकार नहीं कहा जा सकता.

लेकिन आंकड़े अपनी कहानी ख़ुद ही कहते हैं.

अगर आप बिहार के एक और ज़िले दरभंगा का रुख़ करें तो वहां 1 से 15 मई के दौरान कोरोना से हुई मौतों की आधिकारिक संख्या 52 थी. दरभंगा ज़िले में हिंदुओं के क़रीब 50 छोटे-बड़े श्मशान घाट हैं. वहीं, ज़िले में लगभग 100 क़ब्रिस्तान हैं. ग्रामीण इलाक़ों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

सिर्फ़ कोरोना के शिकार हुए लोगों का अंतिम संस्कार करने वाले भिगो श्मशान घाट पर ही 15 दिनों में 52 लोगों की अंतिम क्रिया हुई. वहीं केवल कोरोना से मरने वालों को दफ़नाने के लिए बनाए गए क़ब्रिस्तान में 12 लोगों को दफ़नाया गया.

दरभंगा के ग्रामीण इलाक़ों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.



छत्तीसगढ़

राजधानी रायपुर में कोविड-19 से 15 दिनों में हुई मौतों की आधिकारिक संख्या 516 थी लेकिन कम से कम 857 मौतों के सबूत तो हमें ही मिले. ज़ाहिर है कि कोरोना से मौत की असली तादाद और भी ज़्यादा होगी. मौजूदा श्मशान घाटों के अलावा, रायपुर में अधिकारियों को अंतिम संस्कार के लिए 26 अस्थायी श्मशान घाट बनाने पड़े थे क्योंकि अंतिम संस्कार के लिए शवों की कतारें लग गई थीं. इससे मौजूदा श्मशान घाटों पर दबाव बढ़ गया और अंतिम संस्कार का इंतज़ार करती लाशों के ढेर लगने लगे थे.

रायपुर के एक शवदाह गृह में गार्ड, बलराम हिरवानी ने कहा, “अपनी 13 साल की नौकरी में मैंने पहले कभी अंतिम संस्कार के लिए ऐसी लाइन लगती नहीं देखी थी.

"पहले जितनी जगह में तीन लाशें जलती थीं, वहां नौ-नौ को जलाना पड़ा. लोग सड़कों के किनारे रखकर लाशें जला रहे थे.”



उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले में 1 से 15 मई के बीच सरकारी रजिस्टर में कोरोना से 51 मौतें दर्ज की गईं.

लेकिन अकेले जौनपुर के पिलकिचिया घाट पर 431 (जिसमें कोरोना और ग़ैर-कोरोना पीड़ित लोगों के शव शामिल थे) लोगों का अंतिम संस्कार किया गया. स्थानीय लोग बताते हैं कि आम तौर पर इतने दिनों में 70 से 100 के बीच अंतिम संस्कार होते हैं.

शहर के अन्य बड़े श्मशान स्थल रामघाट और अंतिम संस्कार के सात छोटे ठिकानों के आंकड़े उपलब्ध न होने से हमें शायद ये कभी न पता चल सके कि वहां कितने लोगों का दाह संस्कार हुआ.

सामाजिक कार्यकर्ता सत्यवीर सिंह अक्सर इन घाटों पर जाते रहते हैं और वो रामघाट पर काम करने वालों के संपर्क में ही रहते हैं. सत्यवीर बताते हैं कि 1 से 15 मई के दौरान हर दिन क़रीब 500 शव जलाए गए. जबकि महामारी से पहले श्मशान घाटों पर 100 से 125 लोगों के अंतिम संस्कार होते थे.

शवदाह गृहों में अंतिम संस्कार का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है.

रामघाट के संचालक राकेश भी यही कहते हैं कि महामारी के बुरे दिनों में हर दिन पांच सौ से सात सौ शव जलाए जा रहे थे.

लगातार जलती चिताओं की तपिश का आलम ये था कि ऊपर लगा टिन शेड गर्म होकर से पिघल गया.

उत्तर प्रदेश राज्य के ही प्रयागराज में 1 से 15 मई के दौरान कोरोना से 140 आधिकारिक मौतें दर्ज की गईं.

लेकिन शहर के सबसे बड़े फाफामऊ घाट श्मशान स्थल पर तैनात एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि इस दौरान तीन सौ से ज़्यादा कोरोना पीड़ितों के शव जलाए गए. फाफामऊ घाट के एक हिस्से को कोविड पीड़ितों के अंतिम संस्कार के लिए अलग रखा गया था.

शहर में वैसे तो पांच बड़े श्मशान घाट हैं लेकिन केवल ग़ैर-कोविड शवों के लिए अधिकृत रसूलाबाद घाट पर ही अंतिम संस्कार का रिकॉर्ड रखा जाता है.

इसे चलाने वाले अजय निषाद ने बताया कि 1 से 15 मई 2020 के दौरान 150 दाह संस्कार हुए थे लेकिन इस साल इसी दौरान ये संख्या बढ़कर 331 पहुंच गई. हो सकता है कि मरने वालों में से कई कोरोना पीड़ित रहे हों.

ज़िले में इस साल एक से 15 मई के दौरान 767 मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किए गए जबकि पिछले साल इसी दौरान ये संख्या 216 थी.

ग्रामीण इलाक़ों में हुई मौतों की जानकारी नहीं हासिल की जा सकी. ऐसे में जानकार ये कहते हैं कि कोरोना से मरने वालों की असल संख्या तभी पता चलेगी जब घर-घर जाकर सर्वे किया जाए.

कोरोना से हुई मौतें दर्ज करने में कई बार स्थानीय स्तर के हालात का भी असर पड़ता है. कई श्मशान घाट और क़ब्रिस्तान आंकड़े दर्ज करने के लिए कर्मचारी नहीं रख पाते.


कोविड से मौत बनाम कुल मौतें

मौतों की ज़्यादा संख्या निश्चित रूप से सवाल खड़े करती हैं. लेकिन विशेषज्ञ ये भी कहते हैं कि हर मौत को हम ‘कोविड डेथ’ नहीं कह सकते हैं.

नागपुर, महाराष्ट्र

नागपुर शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में मई के पहले पखवाड़े में कुल 1132 मौतें दर्ज की गईं. इनमें से 118 वो लोग थे जो इलाज के लिए बाहर से नागपुर आए थे और उनकी मौत हो गई.

नागपुर, महाराष्ट्र

नागपुर, महाराष्ट्र

हमने केवल नागपुर शहर में हुई 4446 मौतों की पड़ताल की. नागपुर नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग की समिति के प्रमुख संजय महाजन मई में कुल मौतों की संख्या 6892 बताते हैं.

इसकी तुलना में मई 2020 में 1624 तो 2019 में इसी दौरान 1900 लोगों की मौत दर्ज हुई थी.

विदर्भ हॉस्पिटल एसोसिएशन के डॉक्टर अनूप मरार कहते हैं, “सेकेंड वेव के दौरान अस्पतालों में मरीज़ों की बाढ़ आ गई थी. कोरोना के बाद के इलाज की सुविधा न होने से बहुत से लोग बेमौत मर गए.”

नागपुर, महाराष्ट्र

नागपुर, महाराष्ट्र

मानसा, पंजाब

पंजाब के मानसा ज़िले में मई के पहले पखवाड़े में कोरोना से 49 आधिकारिक मौतें दर्ज की गईं. मानसा में छोटे-बड़े 300 श्मशान घाट हैं. वहीं पूरे ज़िले में क़रीब 250 क़ब्रिस्तान हैं. मानसा में 240 गांव हैं.

हमने शहर के केवल 3 बड़े श्मशान घाटों और एक गांव के आंकड़े इकट्ठा किए तो पता चला कि कोरोना और बिना कोरोना वाले कुल 162 अंतिम संस्कार किए गए.

ग्रामीण इलाक़ों से तो आंकड़े जुटाना ही मुश्किल था.



ग्रामीण इलाक़ों की चुनौती

भारत में कोरोना की पहली लहर में ज़्यादातर शहरी इलाक़े प्रभावित हुए थे. लेकिन दूसरी लहर ने ग्रामीण क्षेत्रों पर भी ज़बरदस्त क़हर बरपाया.

बिहार के एक गांव के रहने वाले शिवकांत झा ने बीबीसी को बताया:

“पहले मेरी पत्नी की मौत हो गई. दो घंटे बाद मेरा बेटा भी चल बसा”.

शिवकांत ने कोरोना के हाथों अपने परिवार के तीन सदस्यों को गंवाया.

शिवकांत झा

शिवकांत झा

शिवकांत झा कहते हैं, “ऐसा कोई नहीं था जो मेरी पत्नी का दाह संस्कार कर सके. उसके अंतिम संस्कार में कुछ सरकारी कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने मदद की.”

भारत के बहुत से राज्यों में स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा या तो बेहद कमज़ोर है, या है ही नहीं. जो इलाज का बोझ उठा सकते हैं, वो शहरों की तरफ़ भागते हैं. वहीं अन्य लोग अपनी क़िस्मत के भरोसे रह जाते हैं.

उदाहरण के लिए राजस्थान के दंतारू गांव के रहने वाले लक्ष्मी चंद जेठू को ही लीजिए. उन्हें ये मालूम ही नहीं कि क्या उनकी पत्नी की जान इस वायरस ने ली.

लक्ष्मी चंद ने बीबीसी को बताया कि वो ये नहीं कह सकते कि उनके गांव में कोरोना से कितने लोगों की मौत हुई क्योंकि गांव में किसी का टेस्ट ही नहीं हुआ.

उसी गांव के रहने वाले सुखदेव सिंह ने अपनी बेटी को गंवाया है. वो मानते हैं कि उनकी बेटी की मौत कोरोना वायरस से हुई.

ब्रिटेन की मिडिलसेक्स यूनिवर्सिटी के मुराद बानाजी शुरुआत से ही भारत में कोरोना के हालात पर नज़र बनाए हुए हैं. मुराद कहते हैं:

“शहरी क्षेत्रों के मुक़ाबले, ग्रामीण इलाक़ों में कोविड-19 के किसी मरीज़ को मरने से पहले अस्पताल पहुंचाए जाने की संभावना बहुत कम होती है. इस बात से किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि शहरों के मुक़ाबले गांवों में स्वास्थ्य की सुविधाएं बहुत कम हैं.”

कोविड के लक्षणों को खांसी और ठंड लगना मानने की भूल ने भी कई बार हालात को बिगाड़ने का काम किया है. जब ज़रूरत पड़ी तो अस्पतालों में अच्छे इलाज की भारी कमी थी. कोविड-19 के लक्षण होने पर सामाजिक लांछन का डर भी शायद कोरोना से मौत को छुपाने की एक वजह बना.

उत्तर प्रदेश के बिजनौर के एक ग्रामीण ने कहा, “आइसोलेशन का प्रोटोकॉल, परिवार से दूरी बनाना और सरकार की पाबंदियां. ये बड़ी वजहें थीं जिनके चलते लोग कोविड के लक्षण बताने में संकोच करते थे.”

एक और ग्रामीण ने कहा, “अगर आप कोरोना पॉज़िटिव हैं तो पड़ोसी आपको ऐसे घूरते हैं जैसे आप कोई अपराधी हों”.

वैसे तो कोरोना से मौतों की संख्या कम करके बताने की समस्या विश्वव्यापी है. लेकिन मुराद बानाजी मानते हैं कि दक्षिण एशिया में ये समस्या ज़्यादा गंभीर है.

मुराद बानाजी

मुराद बानाजी

वो कहते हैं, “चुनौतियां ज़रूर हैं लेकिन अगर सरकार चाह ले तो इनसे पार भी पाया जा सकता है.”

वो कहते हैं, “हमें राज्य सरकारों से ये अपील करनी चाहिए कि इस मामले में वो नई राह दिखाएं.”

महाराष्ट्र और बिहार ने कोरोना से मौत के आंकड़ों में संशोधन किए हैं. इनके आंकड़ों को देखकर अन्य राज्य भी ऐसा कर सकते हैं.

मुराद बानाजी ने बीबीसी से कहा कि वो ये मानते हैं कि देश भर में कोरोना की मौतें कम-से-कम पांच गुना कम करके बताई गईं.

उन्होंने कहा, “कई बार तो दर्ज हुई मौतों और आधिकारिक मौतों के बीच का अंतर इतना बड़ा है कि इसके पीछे कोई ठोस तर्क देने में भी मुश्किल होगी. कोई ये नहीं कह रहा है औसत से अधिक हर अतिरिक्त मौत का कारण कोरोना वायरस ही था लेकिन ये भी तय है कि इनमें से बड़ी संख्या कोविड पीड़ितों की ही थी.”

अगर ये आकलन सही है, तो इससे भारत में कोरोना से मौत की कुल संख्या बीस लाख के क़रीब पहुंच जाएगी. जो दुनिया में सबसे ज़्यादा होगी और कोरोना से सबसे ज़्यादा प्रभावित दुनिया के दूसरे सात देशों, अमेरिका, ब्राज़ील, मेक्सिको, पेरू, रूस, ब्रिटेन और इटली की कुल मौतों की तादाद से भी अधिक होगी.

दिल्ली से मेधावी अरोड़ा और नितिन श्रीवास्तव के इनपुट के साथ लखनऊ से समीरात्मज मिश्र, हैदराबाद से बल्ला सतीश, दरभंगा से नीरज सहाय, जमशेदपुर और जौनपुर से मोहम्मद सरताज आलम, सीकर से मोहर सिंह मीणा, पटना से सीटू तिवारी, रायपुर से आलोक पुतुल, प्रयागराज से प्रभात कुमार वर्मा, शिमला से पंकज शर्मा/ राजेश कुमार, मानसा से सुरिंदर मान और नागपुर से प्रवीण मुधोलकर.

संपादकीय प्रोडक्शन: विनीत खरे और सुहैल हलीम
शॉर्टहैंड प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी
इलस्ट्रेशन: गोपाल शून्य
तस्वीरों का कॉपीराइट: गेटी इमेज़ेस


पड़ताल का तरीक़ा:

बीबीसी ने भारत के 12 शहरों में अपने रिपोर्टर भेजे जिन्होंने श्मशान स्थलों और अस्पतालों का दौरा किया. उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं और उन लोगों से बात की, जिनके परिजनों की मौत 1 से 15 मई 2021 के बीच हुई थी. हमने इन शहरों का चुनाव इस तरह से किया जिससे कि हम पूरे भारत में कोरोना से हुई मौतों की संख्या कम बताए जाने की वजह समझ सकें.

चुनौतियां:

- शवदाह गृहों, श्मशान घाटों और क़ब्रिस्तानों से मौतों की संख्या जुटाने की अपनी सीमाएं हैं. कई बार कोविड-19 से संदिग्ध मौत वाले शवों का अंतिम संस्कार भी आम तरीके से कर दिया गया.

- इसके अलावा ज़्यादातर श्मशान घाटों और क़ब्रिस्तानों के पास वहां आने वाले शवों का रिकॉर्ड रखने के संसाधन नहीं हैं. इससे वजह से सभी आंकड़ों को सही बताना और भी मुश्किल हो जाता है.

- ग्रामीण इलाक़ों के लोग बीमारी गंभीर होने पर, अक्सर इलाज के लिए क़रीब के शहरी इलाक़ों में जाते हैं. और जिन लोगों की अस्पतालों में मौत हो जाती है, उनका अंतिम संस्कार भी शहर में हो जाता है. इससे भी शहरी ज़िलों में मौत की संख्या बढ़ जाती है.

- इन सभी तथ्यों का ध्यान रखना भी ज़रूरी है और इस रिपोर्ट के ज़रिए बीबीसी ने किसी ज़िले विशेष में 1 से 15 मई 2021 के दौरान हुई मौतों की संख्या का पता लगाने की कोशिश की है. पटना ऐसा इकलौता शहर है जहां बीबीसी को पिछले कुछ वर्षों के दौरान दर्ज की गई मौतों के आंकड़े मिले, जिनसे इस साल हुई मौतों की संख्या की तुलना की जा सकी.

- पड़ताल के लिए चुने गए समय के दौरान इन ज़िलों में सभी तरह की मौतों के आंकड़े की अनुपलब्धता ने मौतों का आकलन करना और भी मुश्किल बना दिया. इसी वजह से इस रिपोर्ट में सिर्फ़ सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) में दर्ज अतिरिक्त मौतों के आंकड़ों का ही उल्लेख किया गया है. कोविड और ग़ैर-कोविड दौर में हुई मौतों के ये आंकड़े पत्रकारों के लिए उपलब्ध हैं. कोविड और ग़ैर-कोविड मौतों के आंकड़ों के बीच के अंतर से ही उस दौरान हुई अधिक मौतों की संख्या पता चलती है.