यूपी: लिंचिंग, पुलिस की जाँच और इंसाफ़

6 नवंबर, 2021

साल 2015 की बात है, यूपी के दादरी में अख़लाक़ को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला, ये गाय के नाम पर की गई मॉब लिंचिंग की संभवत: पहली घटना थी जो आने वाले वक्त में एक तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह दोहराई जाने लगी.


बीते छह साल में देश के कई राज्यों से एक-के-बाद एक लिंचिंग की ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जिनमें मारे जाने वाले व्यक्ति की धार्मिक पहचान उसकी हत्या की वजह थी, ऐसी हत्याओं को दुनिया के कई देशों में 'हेट क्राइम' की श्रेणी में रखा जाता है. भारत में 'हेट क्राइम' के तहत आँकड़े दर्ज नहीं किए जाते.


पिछले कुछ सालों में देश के कई राज्यों में धर्म के आधार पर निशाना बनाकर की गई हिंसा और मॉब लिंचिंग (भीड़ की हिंसा की वजह से मौत) की घटनाएँ सामने आई हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर, गेटी इमेज

प्रतीकात्मक तस्वीर, गेटी इमेज

चूँकि देश में हेट क्राइम के सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बीबीसी ने साल 2016 और साल 2021 में उत्तर प्रदेश में धर्म के आधार पर भीड़ की गंभीर हिंसा के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि  2016 में जनवरी से लेकर अगस्त तक मुसलमानों के साथ हेट क्राइम के 11 गंभीर मामले सामने आए, जबकि साल 2021 में जनवरी से लेकर अगस्त के बीच मुसलमानों के खिलाफ़ संगीन हिंसक वारदातों की संख्या 24 थी. 2016 के पहले आठ महीनों का आंकड़ा तब के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दौर का है, जबकि 2021 के पहले आठ महीनों का आंकड़ा मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल का है.

यहाँ हमने उत्तर प्रदेश के केवल संगीन मामलों को शामिल किया है. हिंसा, मारपीट के छिट-पुट मामले होते रहे हैं जो न तो मीडिया में रिपोर्ट हो पाते हैं और न ही पुलिस को रिपोर्ट किए जाते हैं लेकिन अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं.

साल 2019 में मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट आई जिसके मुताबिक़ 'हेट क्राइम' के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है. यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और हेट क्राइम के एमनेस्टी के आंकड़ों में मुसलमानों के अलावा दलितों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा भी शामिल है.

ये समझना ज़रूरी है कि धर्म या जाति के आधार पर हुई मारपीट की घटनाएँ ही 'हेट क्राइम' के दायरे में आती हैं, हर मारपीट या लिंचिंग को 'हेट क्राइम' नहीं कहा जा सकता, मसलन, धार्मिक शिनाख्त के बिना किसी जेबकतरे को अगर भीड़ पीट-पीटकर मार डाले, तो ये लिंचिंग है, लेकिन हेट क्राइम नहीं है, भीड़ में शामिल लोगों की धार्मिक पहचान से भी तय होता है कि वह घटना हेट क्राइम है, या नहीं.

जब भीड़ किसी व्यक्ति की जान ले लेती है तो उसे तकनीकी तौर पर लिचिंग माना जाता है. कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें हमले के पीछे पीड़ित व्यक्ति के धर्म की कोई भूमिका नहीं थी, उन्हें हेट क्राइम नहीं कहा जा रहा.

उत्तर प्रदेश में हिंसक भीड़ के हमलों की घटनाओं पर अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार बीबीसी से कहते हैं, "हमने डीजीपी स्तर पर कई सर्कुलर जारी किए हैं और वक़्त-वक़्त पर इन सर्कुलरों को दोहराते भी रहे हैं कि ऐसी लिंचिंग किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए, अगर किसी ने कुछ गलत किया भी है तो लोगों को उसे पीटने का कोई हक़ नहीं है और ऐसा होता है तो पीटने वाले के खिलाफ़ कठोर कार्रवाई की जाती है. किसी को भी कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, चाहे वह कोई भी हो."

पड़ताल का मुद्दा क्या?

मॉब लिंचिंग और हिंसा के इन मामलों में आखिर होता क्या है? ऐसे केस में यूपी पुलिस किस तरह जाँच करती है? गोरक्षा और धर्म के नाम पर लिंचिंग और हिंसा करने वाले लोगों के साथ क्या होता है? क्या उन्हें सज़ा मिलती है और अगर नहीं मिलती, तो क्यों नहीं मिलती?

अदालतों में लिंचिंग और हिंसा के शिकार लोगों के परिजन कैसे इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे हैं और क्या वो ये लड़ाई लड़ भी पा रहे हैं?

हमने ये सब समझने के लिए यूपी के चार ज़िलों--सोनभद्र, बुलंदशहर, मथुरा और मुरादाबाद-- के चार ऐसे मामलों में पुलिस के रवैए की पड़ताल की, हमने ये समझना चाहा कि इन केसों की जाँच में क्या सामने आया और उसके बाद क्या हुआ?

इस पड़ताल के लिए हमने एफ़आईआर, पुलिस की केस डायरी, चार्जशीट और अभियुक्तों के ज़मानत के आदेश जैसे दस्तावेज़ बारीक़ी से पढ़े.

अनवर अली

अनवर अली

केस नंबर-1 सोनभद्र: अनवर अली की लिंचिंग

कामरुन डबडबाई आँखों को अपने दुपट्टे के कोरों से पोंछते हुए कहती हैं, "रात के 9.30 बजे होंगे, अचानक घर के बाहर से थोड़ी आवाज़ आई तो इनके अब्बा ने बाहर झाँका, उन्हें लगा कि कुछ लोग फिर इमाम चौक तोड़ रहे हैं, वो बाहर निकले तो कुछ लोग इमाम चौक तोड़ रहे थे, जैसे ही उन्होंने बोला, अरे! ये क्या कर रहे हो? बस इतने में ही उन लोगों ने फावड़े और गंड़ासे से उन पर हमला कर दिया."

अनवर अली की पत्नी कामरून

अनवर अली की पत्नी कामरून

48 साल की विधवा कामरुन बताती हैं, "वो कंधे पर गमछा रखते थे, उनके गमछे को मुंह में ठूंस दिया ताकि वो किसी को बुला न सकें. होलिका दहन का दिन था और जानबूझ कर ढोल-मंजीरे की आवाज़ तेज़ कर दी गई थी कि चीख दब जाए. उन्हें फ़ावड़े से मारा. जब वो अंदर नहीं आए तो मैं बाहर गई, देखा तो चीख पड़ी, थोड़ी-थोड़ी साँसें चल रही थीं लेकिन आंगन तक लाकर रखते-रखते सब खत्म हो गया."

परसोई गांव का इमाम चौक

25 मार्च, 2019 को अख़बार के सोनभद्र संस्करण में छपी ख़बर

परसोई गांव का इमाम चौक

25 मार्च, 2019 को अख़बार के सोनभद्र संस्करण में छपी ख़बर

20 मार्च, 2019 को होलिका दहन के दिन, रात के 9.30 बजे उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के परसोई गांव में 50 साल के अनवर अली को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला.

दो साल बाद ये मामला अब कोर्ट में तो पहुँच गया है लेकिन अब भी बहस शुरू नहीं हुई है, बल्कि गवाहियों का दौर चल रहा है. अनवर अली की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बताती है कि उन्हें सात चोटें आईं और धारदार हथियार से लगी चोटों के कारण उनकी मौत हुई.

'मुसलमान विरोधी नारे लगाए जाने लगे'

बात वर्ष 2000 की है जब सोनभद्र के ओबरा इलाक़े के परसोई गांव में हाईटेंशन तारें लगाई जा रही थीं और इस काम के लिए बतौर सुपरवाइज़र अनवर अली इस गांव में आए. काम तो पूरा हो गया लेकिन मूलतः गाज़ीपुर से ताल्लुक करने वाले अनवर अली इसी हिंदू बहुल गाँव में बस गए.

अनवर अली के छोटे बेटे सिकंदर

अनवर अली के बेटे एनुल हक़

अनवर के बेटे सिकंदर अली

अनवर अली के छोटे बेटे सिकंदर

अनवर अली के बेटे एनुल हक़

अनवर के बेटे सिकंदर अली

अनवर के बेटे एनुल हक़ ग्राम प्रधान के हस्ताक्षर वाले कागज़ दिखाते हुए कहते हैं, "साल 2006 में खुद ग्राम प्रधान ने हमें हमारे घर के सामने स्थित सरकारी ज़मीन पर इमाम चौक लगाने की इजाज़त दी थी और इसके लिए पूरे गांव वाले भी तैयार हुए थे. फिर उसी के लिए हमारे अब्बा को मार दिया."

एनुल हक़ गांव के सरकारी स्कूल में शिक्षक रविंद्र खरवार को अपने पिता की लिंचिंग का ‘मास्टर माइंड’ बताते हैं. अनवर के परिवार का दावा है कि जब से वो गांव में आए थे तभी से गांव में हिंदू-मुसलमान की बातें शुरू हुई थीं.

अपने पिता को आँखों के सामने तड़प कर मरता देखने वाले सिकंदर की उम्र उस वक़्त 25 बरस थी. वे कहते हैं, "परसोई गांव के सरकारी स्कूल में रविंद्र खरवार मास्टर की ड्यूटी थी. बच्चों को पढ़ाने के बाद वह शाखा लगाते थे. इस शाखा में 'मुसलमान मुर्दाबाद!' 'पाकिस्तान मुर्दाबाद' के नारे लगाए जाते थे. पहले ये शाखा स्कूल के पास लगाई जाती थी जो हमारे घर से एक किलोमीटर की दूरी पर था. लेकिन कुछ दिन बाद यह शाखा इमाम चौक वाले मैदान पर लगने लगी जो हमारे घर के ठीक सामने था. नारों में भी बदलाव हो गया और अब नारा लगने लगा-‘परसोई के वीर आएँगे, इमाम चौक गिराएँगे. पूरे गांव में एक फ़ीसदी भी मुसलमानों की आबादी नहीं थी, यहाँ ताज़िये में हमारे साथ हिंदू लोग शामिल होते थे."

सिकंदर उस रात को याद करते हुए कहते हैं, "वो लोग इमाम चौक तोड़ रहे थे और जब अब्बू ने उन्हें रोकने को कहा तो उन लोगों ने अब्बू को मार दिया, इस बार वो लोग तैयारी के साथ आए थे कि जान से मार देंगे."

कैसे बिगड़ता गया गाँव का माहौल

इमाम चौक जिसे लेकर शुरू हुआ विवाद

इमाम चौक जिसे लेकर शुरू हुआ विवाद

अनवर अली की हत्या से छह महीने पहले इमाम चौक ( एक चबूतरा जिस पर ताज़िया रखी जाती है) को तोड़ा गया था और पुलिस की मौजूदगी में उस चबूतरे को बनवा दिया गया था. हत्या की घटना से डेढ़ महीने पहले फिर इमाम चौक को तोड़ा गया. इस बार भी पुलिस आई, चबूतरे की मरम्मत कराई गई. चबूतरे के टूटने पर जब इसकी लिखित शिकायत अनवर के परिवार ने की तो दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर मामला खत्म करा दिया गया.

एनुल हक़ कहते हैं, "जब इमाम चौक पहले तोड़ा गया और पुलिस आई तो इंस्पेक्टर साहब उन्हीं लोगों के साथ बैठते थे जिन लोगों ने चबूतरा तोड़ा था, ऐसे में उनका मन क्यों ना बढ़ता?"

20 मार्च 2019 को होलिका दहन की रात गांव के हिंदू लड़के एक बार फिर जब इमाम चौक तोड़ रहे थे तभी अनवर उन्हें रोकने घर से बाहर निकले लेकिन इस बार वह अपने घर वापस नहीं लौटे.

अनवर अली की पत्नी कामरुन

अनवर अली की पत्नी कामरुन

कामरुन अपने पति को याद कर बिलखते हुए कहती हैं, "कह दिया होता कि ताज़िया नहीं रखा जाएगा, हम कह देते कि तोड़ दो. सब कुछ गांव वालों से पूछकर शुरू किया था. हमारी तो आबादी भी गांव में कुछ नहीं थी, ताज़िये के जुलूस में हिंदू परिवार भी आते थे, नहीं पता था कि जो लोग साथ खड़े थे, कभी वही जान के दुश्मन बन जाएंगे."

कामरुन कहती हैं, "मास्टर ने ज़हर घोला सबके दिमाग़ में, उसने ही गांव वालों के मन में डाला कि मुसलमान गांव की ज़मीन छीन रहे हैं, हम बाहरी हैं. भीतर ही भीतर साजिश रची गई और मेरे पति को मार दिया गया."

ये बात खुद रविंद्र खरवार ने बीबीसी को बताई कि उन्हें पूछताछ के लिए कभी पुलिस थाने नहीं बुलाया गया.

अनवर अली का परिवार मानता है कि "अगर वक्त रहते प्रशासन ने कार्रवाई की होती तो ये नहीं होता."

एनुल हक़

एनुल हक़


इंसाफ़ के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे एनुल हक़ कहते हैं, "इस मामले में आज सभी ज़मानत पर रिहा हैं, गिरफ्तारी सबकी हुई लेकिन जो शख़्स लोगों को सिखाता था जिसने लोगों से ये करवाया उसे पुलिस ने कभी गिरफ्तार नहीं किया. मैं एक बार थाने भी गया और पूछा कि मास्टर की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही है तो जाँच अधिकारी ने मुझे डाँटकर भगा दिया."

पुलिस की केस डायरी में फ़रार बताए जाने वाले रविंद्र खरवार का नाम चार्जशीट में नहीं है.

हमारी टीम परसोई गांव पहुंची, वहाँ गाँव की एक महिला अनवर अली का नाम लेने पर कहती हैं, "वही जिसको लड़कों ने मार दिया था ना, अब तो उनका परिवार इस गांव में नहीं रहता." दो साल बाद भी इस गांव में लोग अनवर की हत्या के बारे में बात नहीं करना चाहते.

गांव में हमारी मुलाकात इस केस के मुख्य अभियुक्तों--राजेश प्रजापति, राजेश खरवार और अक्षय-- से हुई. ये सभी ख़ुद को बेक़सूर बताते हैं, वे बताते हैं कि कैसे ''धीरे-धीरे मुसलमानों ने ताज़िये के नाम पर पूरा पक्का चबूतरा बना लिया."

राजेश खरवार कहते हैं, "मास्टर जी शाखा लगाते थे, सबको कहते ऐसा करो-वैसा करो, आज हम फँस गए, वो बच गए, जबकि सब कुछ उनका ही किया हुआ था. आज भी हमसे बात करते हैं तो दुख जताते हैं लेकिन उससे क्या होगा, मैडम जी."

क्या कहते हैं दस्तावेज़

बीबीसी ने इस केस से जुड़े सभी दस्तावेज़ों की पड़ताल की. 17 जून, 2019 को पुलिस की केस डायरी संख्या 18 का ब्यौरा कहता है कि "रविंद्र खरवार के बलिया स्थित निवास पर छापा मारा गया लेकिन वे नहीं मिले, पुलिस के पास अदालत से जारी वारंट है लेकिन रविंद्र खरवार फ़रार हैं."

रविंद्र खरवार, सरकारी शिक्षक

रविंद्र खरवार, सरकारी शिक्षक



जब इस मामले में चार्जशीट दायर की गई तो इस केस में रविंद्र खरवार का कहीं नाम नहीं था. लिंचिंग के बाद रविंद्र खरवार का परसोई गांव से ट्रांसफ़र हो गया और अब वह चोपन ब्लॉक के एक स्कूल में पढ़ाते हैं.

बीबीसी ने रविंद्र खरवार से मुलाकात की. खरवार का कहना है कि वे बीते 20 सालों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं और वे खुद को सोनभद्र का सह-ज़िला कार्यवाह बताते हैं.

पुलिस की केस डायरी जिसमें रविंद्र खरवार को फ़रार बताया गया

पुलिस की केस डायरी जिसमें रविंद्र खरवार को फ़रार बताया गया



जब हमने रविंद्र खरवार से 2019 में अनवर की लिंचिंग पर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, "लोग आरएसएस को बदनाम करने के लिए मेरा नाम लेकर आए, मैं तो अपने घर में था और जो लोग इस घटना के अभियुक्त हैं, उनको मैं जानता तक नहीं."

जब उनसे पूछा गया कि मुख्य अभियुक्तों का कहना है कि वह आपको बखूबी जानते हैं और आपसे बातचीत भी होती है उनकी, इस सवाल को सुनकर रविंद्र खरवार असहज हो गए और कहा, "हाँ, लेकिन बात होने से क्या होता है."

इसके साथ ही रविंद्र खरवार बताते हैं कि "पुलिस ने न तो कभी पूछताछ के लिए थाने बुलाया और न ही कभी हिरासत में लिया." जबकि वह इस एफ़आईआर में मुख्य आरोपी के तौर पर नामजद थे.

बीबीसी ने इस मामले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पक्ष जानने और खरवार के दावे की तस्दीक करने की कोशिश की. हमने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख डॉक्टर सुनील अंबेकर से एसएमएस के ज़रिए और टेलीफ़ोन से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

अनवर की लिंचिंग की एफ़आईआर

अनवर की लिंचिंग की एफ़आईआर



बीबीसी ने जब सोनभद्र के एसपी अमरेंद्र सिंह से बात की तो उन्होंने कहा, "सिर्फ़ नाम दर्ज होने से तो नहीं हो जाता, हमारी जांच में रविंद्र खरवार के खिलाफ़ कुछ नहीं मिला". पुलिस इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँची कि खरवार अभियुक्त नहीं हैं, इसका जवाब एसपी अमरेंद्र सिंह ने नहीं दिया.

25 मार्च, 2019 को अख़बार में छपी ख़बर

25 मार्च, 2019 को अख़बार में छपी ख़बर

अनवर अली के परिवार का दावा है कि उनको तीन लाख के मुआवज़े का वादा प्रशासन की ओर से किया गया था लेकिन वो आज तक नहीं मिला है.

बुलंदशहर के सोही गांव में गुलाम अहमद की कब्र

बुलंदशहर के सोही गांव में गुलाम अहमद की कब्र

केस नंबर 2- गुलाम अहमद, 'लव जिहाद' के नाम पर बदला

दो मई, 2017 को 60 साल के गुलाम अहमद को बुलंदशहर के सोही गांव में ही मार डाला गया. उन्हें भीड़ ने इसलिए मार डाला क्योंकि गुलाम के मज़हब का एक लड़का एक हिंदू लड़की के साथ गाँव से भाग गया था. इस ठाकुर बहुल गाँव में इक्का-दुक्का मुसलमान परिवार हैं जो पेशे से मज़दूर हैं.

गुलाम अहमद

गुलाम अहमद


दरअसल, इस घटना से छह दिन पहले गुलाम के पड़ोस में रहने वाले यूनुस ने पास के गांव की हिंदू लड़की के साथ घर छोड़ दिया था. गांव वाले बताते हैं कि इसके बाद गुलाम के घर लोगों की भीड़ आई जिसमें कुछ गांव के लोग और ज्यादातर बाहरी लोग शामिल थे, गालियां और धमकियां दी गईं.

गुलाम अहमद के बेटे वकील अहमद

गुलाम अहमद के बेटे वकील अहमद

पुलिस भी लड़का और लड़की को खोजने में जुटी थी और इसके लिए वह हर दिन गुलाम अहमद के परिवार के मर्दों को अपने साथ ले जाती और आस-पास के ज़िलों में रिश्तेदारों के घरों पर छापे मार रही थी. 2 मई, 2017 को गुलाम अहमद के बेटे वकील अहमद पुलिस के बुलावे पर थाने गए थे.

वकील अहमद के मुताबिक़, "सुबह लगभग 9.30 बजे गुलाम अहमद गांव के ही अनिल शर्मा के आम के बाग की रखवाली कर रहे थे कि तभी गमछे से मुँह ढँके 6-7 लोग लाठी- डंडों के साथ आए और गुलाम को आम के बागीचे से उठाकर थोड़ी दूरी पर ले गए और उन्हें बुरी तरह पीटा."

गुलाम की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बताती है कि उन्हें गहरी अंदरूनी चोट आई थी जिससे उनकी मौत हो गई.

वकील अहमद ने गांव में ही रहने वाले गविंदर और हिंदू युवा वाहिनी के लोगों को दोषी बताते हुए एफ़आईआर दर्ज कराई. पुलिस ने अपनी जाँच में ये पाया कि गुलाम अहमद की लिंचिंग में गविंदर सहित जिन 9 लोगों की गिरफ़्तारी हुई वो सभी ‘हिंदू युवा वाहिनी’ से जुड़े हुए थे. हिंदू युवा वाहिनी के बुलंदशहर के अध्यक्ष सुनील सिंह राघव ने बीबीसी से कहा कि "इन लोगों को गलत तरीके से फँसाया गया है."

लिंचिंग के बाद वकील अहमद का परिवार अब सोही गांव छोड़ चुका है और वे अलीगढ़ में रहते हैं लेकिन काम करने के लिए उन्हें बुलंदशहर जाना पड़ता है.

इस हत्या के पाँच साल बाद जब बीबीसी की टीम बुलंदशहर के पहासू में वकील अहमद से मिलने पहुंची तो उन्होंने हमें बताया कि इस केस में अब कुछ नहीं होने वाला और सब लोग छूट जाएँगे. उन्होंने हमें बताया कि इस मामले में पैसों का लेन-देन किया गया है और मामले को रफ़ा-दफ़ा किया जा रहा है.

पेशे से बढ़ई वकील अहमद ने अब अभियुक्तों और हालात से समझौता कर लिया है. समझौते की सबसे बड़ी वजह है गुलाम के परिजनों का भी गवाह बनने से इनकार करना. वकील कहते हैं, "मैंने तो गवाही दे दी लेकिन मेरी भाभी, मेरे चाचा और मौसा भी गवाही देने को तैयार नहीं हैं, जिन लोगों ने देखा वो भी जब गवाही नहीं देंगे तो हम क्या करेंगे?"

वकील अहमद

वकील अहमद


वकील अहमद कहते हैं, "हमारे अब्बा चार साल के थे जब सोही गाँव आए थे और हमेशा इस गाँव को अपना माना तो उनके साथ ये हुआ. लड़ाई टक्कर की हो तो लड़ते, हमारी तो ये हालत है कि थोड़ा भी गांव में लोगों की मर्ज़ी के खिलाफ़ कह दिया तो दो दिन की रोटी छीन लेंगे. कौन गवाही दे पाएगा, मेरे परिवार वाले उनके ही खेतों में तो काम कर रहे हैं."

इस मामले में गविंदर और आस-पास के गांव से 9 लोगों की गिरफ्तारी की गई थी. इन सभी को छह महीने बाद ज़मानत मिल गई.

वकील बताते हैं कि गुलाम की लिंचिंग के आरोप में गविंदर ठाकुर को जब ज़मानत मिली तो उनका फूल-माला से स्वागत किया गया. कुछ लड़कों ने गांव में डीजे बुलाकर जश्न मनाया.

जेल से बाहर आने पर गविंदर का स्वागत. तस्वीर-व्हाट्सएप

जेल से बाहर आने पर गविंदर का स्वागत. तस्वीर-व्हाट्सएप


वकील कहते हैं, "एक आदमी जिसने हमारे अब्बू को मारा और जब वो जेल से वापस आया तो उसे माला पहनाई जाए, गाने बजाए जाएं और जलसा हो तो लगता है कि इस गांव में कैसे रहा जा सकता है. मुझे इस गांव से नफरत हो गई."

गुलाम के 46 साल के भाई पप्पू वो शख्स हैं जिन्होंने गमछा ओढ़े लोगों को अपने भाई को उठाकर ले जाते देखा था लेकिन इस केस में उन्होंने गवाही देने से इनकार कर दिया.

जब हम उनसे मिलने सोही गांव पहुंचे तो वह इस बात से ही डर गए कि फिर उनसे गुलाम की हत्या के बारे में क्यों पूछा जा रहा है. वह डरते-डरते बताते हैं, "हाँ, मैंने देखा तो था, लेकिन मैं गवाह नहीं हूँ."

गुलाम अहमद की लिंचिंग के बाद महीना भर गांव में पुलिस रही लेकिन जब पुलिस चली गई तो गुलाम के परिवार के लिए गांव में रहना मुश्किल हो गया. वकील ने गांव छोड़ दिया और अलीगढ़ में बस गए. गुलाम के चचेरे भाइयों ने भी गांव छोड़ दिया और दिल्ली-मुंबई में मजदूरी के लिए चले गए लेकिन लॉकडाउन में सब कुछ फिर छिन गया और उन्हें वापस सोही गांव आना पड़ा.

गुलाम अहमद की लिंचिंग केस में मुख्य अभियुक्त गविंदर

मुख्य अभियुक्त गविंदर के भाई जो ख़ुद को जूना अखाड़े का संन्यासी बताते हैं.

गुलाम अहमद की लिंचिंग केस में मुख्य अभियुक्त गविंदर

मुख्य अभियुक्त गविंदर के भाई जो ख़ुद को जूना अखाड़े का संन्यासी बताते हैं.

मुसलमानों की बस्ती के दूसरी ओर इस मामले के मुख्य अभियुक्त गविंदर रहते हैं. हम गविंदर से मिलने पहुंचे तो वहां हमारी मुलाकात उनके साधु जैसी वेशभूषा वाले भाई से हुई, वे खुद को जूना अखाड़े का संन्यासी बताते हैं. वह हमें बताते हैं कि ज़िले में "पुलिस-प्रशासन" से उनके अच्छे संबंध हैं.

जब हमने उन्हें बताया कि हम लिंचिंग के बारे में बात करना चाहते हैं तो उन्होंने मेरा नाम पूछा, परिचय पत्र माँगा, मेरे हिंदू होने की पुष्टि करने के बाद उन्होंने मुझसे बात की.

लिंचिंग के आरोप पर सफ़ाई देते हुए गविंदर कहते हैं, "मुझे फँसाया गया, मैं हिंदू युवा वाहिनी में था, लेकिन कोई आधिकारिक सदस्यता नहीं ली थी. मैं उन लोगों के साथ बैठता था इसलिए मेरा नाम फँसाया जा रहा है."

गविंदर वकील के परिवार को पैसे दिए जाने की बात से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "हमें अदालत पर भरोसा है, हम तो गरीब लोग हैं, पैसे कहां से देंगे."

वकील का केस लड़ रहे एडवोकेट नईम शहाब कहते हैं, "ये समझौता 90 फ़ीसदी डर का है और 10 फ़ीसदी गरीबी का. वकील अहमद का परिवार बहुत गरीब है, इन लोगों को हर काम के लिए सोही आना पड़ता है, अलीगढ़ में बस तो गए लेकिन काम उस गांव से अलग नहीं हो सका. उन लोगों को बताया गया कि ये लोग छूट ही जाएँगे और हर सुनवाई के लिए तुम पैसे खर्च करोगे, इसके बदले पैसे ले लो हमसे, आना-जाना भी उस गांव में तभी हो पाता जब ये समझौता कर लेता, बस यही कारण है. यहां लिचिंग के ज्यादातर मामले ऐसे ही समझौतों की भेंट चढ़ जाते हैं."

शेर ख़ान की पत्नी सितारा

शेर ख़ान की पत्नी सितारा


केस नंबर 3- शेरा को किसने मारा?

बुलंदशहर में रहने वाले 50 साल के शेर खान उर्फ़ शेरा को मथुरा में मार डाला गया, उन पर गायों की तस्करी करने का संदेह था. शेरा की मौत गोली लगने से हुई.

4 जून 2021 को मथुरा के कोसीकलां थाने के तुमौला गांव से टाटा 407 पर सवार होकर सात लोग जा रहे थे, जिसमें से एक शेरा थे. पुलिस का कहना है कि उनकी गाड़ी में गाय-बैल थे जिनके लिए यूपी पुलिस गोवंश शब्द का इस्तेमाल करती है.

मथुरा के कोसीकलां थाने में इस पूरे मामले को लेकर दो एफ़आईआर दर्ज हैं. एफ़आईआर 410 गौवंश तस्करी के मामले में है जो उन छह लोगों के खिलाफ़ है जो शेरा के साथ थे. ये एफ़आईआर मथुरा के अजनौख गांव में एक गौशाला चलाने वाले चंद्रशेखर बाबा ने दर्ज कराई है.

दूसरी एफ़आईआर जिसका नंबर 411 है, वह शेरा की हत्या की एफ़आईआर है जिसमें कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, न ही किसी को नामजद अभियुक्त बनाया गया है, मुकदमा 'अज्ञात ग्रामीणों' के ख़िलाफ़ है.

चंद्रशेखर बाबा की एफ़आईआर के मुताबिक़, तीन-चार जून 2021 की रात तकरीबन साढ़े तीन बजे उन्हें "जानकारी मिली कि तुमौला गांव के पास गाय के तस्कर पकड़े गए हैं जिनके पास से छह गौवंश बरामद हुए. गांव वालों की भीड़ के साथ तस्करों की मारपीट हुई. उसमें वे लोग घायल हो गए. इसके बाद घायल तस्करों को अस्पताल भेजा गया और गौवंशों को अजनौख गौशाला में भेज दिया गया. इस मामले में गोहत्या निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाए."

अजनौख गौशाला चलाने वाले चंद्रशेखर बाबा

अजनौख गौशाला चलाने वाले चंद्रशेखर बाबा


चंद्रशेखर के मुताबिक़ शेरा को गोली गांव के लोगों ने मारी लेकिन पीड़ित परिवार की कहानी कुछ और है. शेरा के साथ उस दिन उनके बेटे शाहरुख, पड़ोस में रहने वाले सोनू, शहज़ाद और रहमान सहित छह लोग थे.

शेर ख़ान के बेटे शाहरुख़

शेरख़ान का बेटा शाहरुख

शेर ख़ान के बेटे शाहरुख़

शेरख़ान का बेटा शाहरुख

उस दिन को याद करते हुए शाहरुख कहते हैं, "चंद्रशेखर बाबा ने मेरे पापा को गोली मारी. मैंने देखा था, हम लोग पुन्हाना (मेवात) जा रहे थे, तभी बाबा और उसके साथ के लोग हम लोगों पर गोली चलाने लगे, मैं भागकर पास के खेत में छिपा रहा, गांव वाले नहीं थे. बाबा के लोग थे, बाबा के साथ. मुझे पीठ में छर्रे लगे, मैं बेहोश था, जब अगले दिन दोपहर में पुलिस गांव में आई तो मुझे थाने ले जाया गया और पता चला कि मेरे पापा को गोली लगी और वो नहीं रहे, मैं रोता रहा कि मुझे उनकी मैयत में जाने दो लेकिन मुझे थाने में बिठाए रखा."

शाहरुख़ का कहना है कि उनके पिता गाय-भैंसों का व्यापार करते थे, वे ये दावा भी करते हैं कि उनके मृत पिता शेरा चंद्रशेखर बाबा को जानते थे क्योंकि दोनों के बीच मवेशियों के व्यापार के कारण जान-पहचान हुई थी.

24 साल के शाहरुख़ का कहना है कि जब वो अपने पिता की हत्या के मामले में एफ़आईआर के लिए शिकायत लिख रहे थे तो उन्होंने उसमें चंद्रशेखर का नाम लिखा था लेकिन "थाने के दरोगा ने शिकायत फाड़ दी."

शाहरुख़ कहते हैं, "इंस्पेक्टर साहब बार-बार कहते रहे कि बाबा का नाम क्यों लिख रहे हो और मुझसे जबरदस्ती एफ़आईआर में अज्ञात ग्रामीणों का नाम लिखवाया."

शेरा की मौत के बाद अब उनकी पत्नी सितारा ही इस घर की मुखिया हैं, वही कोर्ट, थाने के चक्कर भी लगाती हैं और बच्चों का पेट भी पाल रही हैं.

सितारा कहती हैं, "हमारे बच्चों और पति को तो तस्कर बना दिया, अगर यही मान लें कि वे तस्कर थे तो पुलिस को दे देते, गोली क्यों मारी? मेरा पति मरा और बेटे को जेल में बंद कर दिया, बताओ, हमारे मज़हब में पति के मरने पर औरतें 40 दिन घर में बैठती हैं, लेकिन मैं तो ठीक से रो भी नहीं सकी. मेरे बच्चों के लिए थाने में खड़ी रही."

शेर ख़ान की पत्नी सितारा

शेर ख़ान की पत्नी सितारा

सितारा ने अपने पति शेरा की मौत के मामले में एक नई अर्ज़ी लिखी जो चंद्रशेखर बाबा और उनके साथी पवन और चंद्रपाल के खिलाफ़ है. लेकिन सितारा का कहना है कि पुलिस ने इस अर्ज़ी पर कुछ नहीं किया, न ही चंद्रशेखर बाबा का नाम एफ़आईआर में जोड़ा गया है. जबकि कानूनन अगर एफ़आईआर कराने वाला अभियुक्तों के नाम जोड़ना या हटाना चाहे तो वह विवेचना अधिकारी के पास जाकर इसके लिए अर्ज़ी दे सकता है. लेकिन शेरा के मामले में हत्या की एफ़आईआर में अब तक ‘अज्ञात ग्रामीणों’ का ही नाम है.

शाहरुख़ का आरोप है कि शेर ख़ान की हत्या के मामले में ज़बरदस्ती 'अज्ञात ग्रामीणों' के नाम पर शिकायत लिखवाई गई

शाहरुख़ का आरोप है कि शेर ख़ान की हत्या के मामले में ज़बरदस्ती 'अज्ञात ग्रामीणों' के नाम पर शिकायत लिखवाई गई



एफ़आईआर संख्या 410 (गोवंश हत्या निषेध मामला) में सोनू, शहज़ाद, रहमान, अब्दुल करीम और शाहरुख़ का जो बयान पुलिस ने दर्ज किया है उनमें एक शब्द का भी अंतर नहीं है.

इन सभी छह लोगों ने अपने बयान में कहा है, "हम लोग दिनांक तीन-चार जून 2021 की रात्रि में सड़क के किनारे घूम रही आवारा गायों को पकड़ कर काटने के लिए निकले थे. छह गायों को अलग-अलग जगहों से पकड़कर टाटा 407 में लादकर हम वापस जा रहे थे. जब हम लोग तुमौला गांव पहुंचे तो अज्ञात ग्रामीणों ने घेर लिया और गो-तस्कर कहकर मारपीट करने लगे. हम लोगों ने बचते हुए तमंचों से फायरिंग की और तमंचा कहाँ फेंक दिया, याद नहीं."

दिलचस्प बात ये भी है कि सभी छह अभियुक्तों में से किसी भी शख्स ने अपने साथी शेरा की मौत को लेकर कुछ भी नहीं कहा है.

पुलिस ने इन लोगों के पास से छह गोवंश की जो बरामदगी दिखाई है, उनका हुलिया, रंग, आकार जैसी कोई भी जानकारी नहीं दी गई है. अगर शेरा और उसके साथ के लोग जिन्हें पुलिस गो-तस्कर बता रही है, उन लोगों ने गोली चलाई तो क्या कोई गांव वाला इसमें घायल हुआ? इसका जवाब पुलिस के पास नहीं है. तमंचा या तमंचे कहाँ गए और उनका हुलिया क्या था? इस सवाल का जवाब भी पुलिस के दस्तावेज़ों में नहीं है.

चंद्रशेखर की गौशाला के बाहर खड़ी टाटा 407 गाड़ी

चंद्रशेखर की गौशाला के बाहर खड़ी टाटा 407 गाड़ी



एफ़आईआर में चंद्रशेखर ने ये लिखा है कि गौवंश उनकी गौशाला में लाए गए लेकिन जब हमने उनसे कहा कि अब वो कहाँ हैं, तो उन्होंने कहा, "नहीं, वो यहां थोड़ी देर के लिए ही आई थीं और फिर उन्हें यहां से दूसरे गौशाला भेज दिया गया."

जब हमने उनसे गौशाला का नाम पूछा तो पहले उन्होंने कोसीकलां गौशाला का नाम लिया फिर कहा- "मुझे ठीक ठीक नहीं पता, पुलिस से जानकारी ले लें आप."

गौशाला चलाने वाले चंद्रशेखर

गौशाला चलाने वाले चंद्रशेखर



बातचीत में चंद्रशेखर बाबा कहते हैं, "मैं तो रात में फरसा लेकर घूमता हूँ और देखता हूं कि हमारी गायों को कोई तकलीफ़ तो नहीं, मैं तो उस दिन पास के ही गांव जाव में ठहरा हुआ था, मुझे पता चला तो मैंने गांव वालों को रोका और उन लोगों को अस्पताल भेजा, लेकिन ये लोग मेरा ही नाम लगा रहे हैं."

उन्हें कैसे पता चला कि गो-तस्कर पास के गांव में पकड़े गए हैं? इस सवाल का पहला जवाब हमें मिला- "हमें गांव वालों ने बताया", यही सवाल दूसरी बार पूछने पर कहा गया, ''हमें गोलियों की आवाज़ सुनाई दी थी."

चंद्रशेखर बाबा की गौशाला सरकार से प्रमाणित गौशाला नहीं है, लेकिन पुलिस ऐसे 'प्राइवेट गौशाला' में तस्करी से बचाए हुए गाय-बैल भेज रही थी.

अब बारी थी गांव वालों से ये जानने की कि उस रात क्या हुआ था? गांव के कई लोगों ने हमें बताया कि ये गोलीबारी गोरक्षकों और तस्करों के बीच हुई और गोलियाँ इतनी चल रही थीं कि कोई गाँव वाला घर के बाहर तक नहीं निकला. ये बात सभी गांव वालों ने मानी कि जब वे घरों से बाहर निकले तो एक व्यक्ति की खून से सनी लाश उन्होंने देखी.

अपने सवालों के साथ जब हम पुलिस का पक्ष जानने मथुरा के एसपी (ग्रामीण) श्रीश चंद्रा से मिले तो उन्होंने कैमरे पर बात करने से इनकार कर दिया. लेकिन ये ज़रूर कहा कि इन्वेस्टिगेटिंग अधिकारी सारे सवालों के जवाब कोर्ट में देंगे. इसके बाद वे कहते हैं कि ये मामला तस्करी का है. पीड़ित परिवार को अगर विवेचना अधिकारी से शिकायत है, तो हमारे पास आना चाहिए.

तुमौला गांव के स्थानीय लोग

तुमौला गांव के स्थानीय लोग

अगर ये मामला तस्करी का भी है तो क्या हत्या के अपराध की सुनवाई नहीं होगी और क्यों चार महीने बाद भी शेरा की हत्या को लेकर पुलिस ने एक भी गिरफ्तारी नहीं की? इन सभी बातों का जवाब चंद्रा एक मु्स्कान के साथ देते हैं, "मैं आपके सवालों के जवाब देने के लिए अधिकृत नहीं हूँ, इस मामले पर कोर्ट में बात की जाएगी."

लेकिन सबसे अहम बात ये है कि जब किसी की कोई गिरफ्तारी ही नहीं होगी तो चार्जशीट कैसे बनेगी और जब चार्टशीट नहीं बनेगी तो ये मामला कोर्ट के सामने कब और किस रूप में जाएगा?

केस नंबर 4- मुरादाबाद में मारपीट का वायरल वीडियो

दिल्ली से 190 किलोमीटर की दूरी पर बसे मुरादाबाद का एक वीडियो मई में वायरल हो गया. इस वीडियो में एक पेड़ के पास एक शख्स को कुछ लोग पीट रहे हैं. पीटने वाले यह भी कह रहे हैं कि "पुलिस के आने तक खूब मार लो, पुलिस आ गई तो पीटने को नहीं मिलेगा."

इस वीडियो में जिन्हें मारा जा रहा है वो मुरादाबाद के कटघर इलाके में रहने वाले शाक़िर कुरैशी हैं. शाक़िर और उनके घरवालों के भीतर डर इस क़दर बैठ चुका है कि हमें अपने घर के बाहर देखते ही उनकी माँ रोने लगती हैं और बुदबुदाती हैं- "हम ये काम नहीं करते, बेटा घर पर नहीं है."

कुछ देर बाद शाक़िर अपने घर आते हैं और हमें बताने लगते हैं, "मैंने तो ये काम छोड़ दिया है, अब शहर में वेल्डिंग का काम करने लगा हूं. मैडम, हम गरीब लोग है."

गाँव वालों का कहना है कि मुसलमानों की बस्ती में आए दिन पुलिस छापा मारती है और अक्सर गाय काटने का इल्ज़ाम लगाकर लोगों को घरों से उठा ले जाती है.

शाक़िर कुरैशी

शाक़िर कुरैशी

कुछ देर बाद हमसे हमारा पूरा परिचय जानने के बाद शाक़िर बताते हैं, "हम कुरैशी लोग हैं, मीट का काम करते हैं, 23 मई को हमें शहर में भैंसे का मीट देने जाना था, मैं स्कूटी पर वही देने जा रहा था कि गोट गाँव में कुछ लोगों ने मुझे पकड़ लिया और पेड़ से बांधकर मारा. मैं रो-रो कर बताता रहा कि गाय का मीट नहीं है ये, लेकिन वो लोग मारते रहे. फिर कट्टे की नोक पर कहा कि 50 हज़ार रुपया दे. मैं कहां से दे पाता, जब मैं रोने लगा तो मुझे पेड़ से बांधकर पीटा और कहा कि पुलिस को मत बताना."

शाकिर बताते हैं कि वे खुद पुलिस के पास भी तब गए जब ये वीडियो वायरल हो गया, उससे पहले तक वो इतने डरे थे कि पुलिस के पास खुद जाकर मामले में एफ़आईआर तक दर्ज नहीं कराई.

हालांकि जब वीडियो के सामने आने से सनसनी मची तो इस केस में पुलिस ने मुख्य अभियुक्त मनोज ठाकुर सहित छह लोगों को गिरफ्तार किया. दो महीने जेल में रहने के बाद मनोज ठाकुर को ज़मानत मिल चुकी है.

मनोज खुद को गौरक्षा युवा वाहिनी का पूर्व उपाध्यक्ष बताते हैं. हमने जब इस संगठन के बारे में पड़ताल की तो पता चला कि ये दिल्ली में रजिस्टर्ड एक संगठन है जिसके प्रमुख राकेश सिंह परिहार हैं. हालांकि जब मनोज ठाकुर का वीडियो सामने आया तो उन्हें उपाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया.

बीबीसी से बात करते हुए वह बताते हैं, "अरे, यहां तो पुलिस गो-तस्करों से पैसे लेती है. पहले के अधिकारी हमारी मदद करते थे, गोरक्षा में उनकी श्रद्धा थी लेकिन अब कुछ लोग ऐसे हैं जो पैसे लेते हैं और मुझे फँसा रहे हैं."

कैमरा बंद होने के बाद होने वाली बातचीत में वे हमें बताते हैं कि वे गोरक्षा के दौरान गोली भी चला चुके हैं, बिना लाइसेंस वाले तमंचे से. डंडे-लाठियां रखते हैं, वे कहते हैं, "पहले अगर ऐसा कोई मामला होता भी था तो पुलिस उन पर कार्रवाई नहीं करती थी."

ये कोई पहली बार नहीं है जब मनोज ठाकुर के खिलाफ़ कोई शिकायत हुई हो, इससे पहले भी उन पर गोरक्षा के नाम पर वसूली, डराने-धमकाने की शिकायत दर्ज की गई थी लेकिन मई में वीडियो के वायरल होने के बाद पहली बार उनके खिलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज की गई है.

अभियुक्त मनोज ठाकुर

अभियुक्त मनोज ठाकुर


मुरादाबाद के स्थानीय अखबारों के मुताबिक़, दिसंबर, 2020 में मनोज ठाकुर के खिलाफ़ कई शिकायतें मिलने के बाद एसपी स्तर की जांच के आदेश दिए गए, लेकिन उस जांच का नतीजा क्या हुआ, ये किसी को नहीं पता.

मनोज ठाकुर खुद मानते हैं कि अगर इस बार घटना का वीडियो वायरल न होता, तो उनके जेल जाने की नौबत नहीं आती.

हमसे बात करने के दौरान ही मनोज ठाकुर के फोन की घंटी बजती है, फोन पर कुछ मिनट बात करने के बाद वह हमसे कहते हैं, "हमारे लोग हमें तस्करों के बारे में बताते हैं, जानकारी मिल गई है, कल सुबह का इनपुट है. लेकिन इस बार मैं जेल से आया हूं तो थोड़ा संभलना पड़ रहा है लेकिन मैं अपना काम तो करता रहूंगा."

इस मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए हमने मुरादाबाद के एसएसपी बबलू कुमार को सवालों की एक लिस्ट दी जिसका जवाब हमें अब तक नहीं मिला है.

"लिंचिंग करने वालों के खिलाफ़ कठोर कार्रवाई की जाती है"- यूपी पुलिस

उत्तर प्रदेश में लिंचिंग की घटनाओं पर अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार बीबीसी से कहते हैं, "ऐसी लिंचिंग किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए, अगर किसी ने कुछ गलत किया भी है तो लोगों को उसे पीटने का कोई हक़ नहीं है और ऐसा होता है तो पीटने वाले के खिलाफ़ कठोर कार्रवाई की जाती है. किसी को भी कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, चाहे वह कोई भी हो."

हमने एडिशनल डायरेक्टर जनरल (ए़डीजे) प्रशांत कुमार को बताया कि अपनी पड़ताल में हमें पुलिस की जांच में एक पैटर्न मिला, मुख्य अभियुक्तों पर एक्शन नहीं हुआ और इसका साफ़ उत्तर पुलिस की जांच में नहीं मिलता, साथ ही, फास्ट ट्रैक कोर्ट में ट्रायल न होने के कारण लिंचिंग के केस परिजनों के लिए लड़ना मुश्किल होता है, और वे मजबूरी और डर की वजह से समझौता कर लेते हैं.

इस पर प्रशांत कुमार कहते हैं, "हमने हापुड़-पिलखुआ में लिचिंग की जाँच माननीय कोर्ट की निगरानी में आईजी स्तर पर की थी और हमारी जांच की कोर्ट में सराहना हुई थी. ये मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चला. राज्य में कोर्ट के हर निर्देश का पालन होता है."

यहां ये जानना ज़रूरी है कि साल 2018, जून में हापुड़-पिलखुआ में मोहम्मद कासिम को भीड़ ने पीटकर मार डाला था. उनके साथ इस घटना में बुरी तरह घायल हुए समीउद्दीन इस घटना के प्रमुख गवाह हैं और उन्होंने पुलिस पर इस मामले में लीपापोती करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस के आईजी की निगरानी में इस लिंचिंग केस की जांच के आदेश दिए थे.

पड़ताल में दिखा एक जैसा पैटर्न

बीबीसी ने जिन चार मामलों की पड़ताल की उनमें तीन बातें अहम हैं, वो ये कि पीड़ित परिवार या तो हमेशा के लिए या कुछ वक्त के लिए पलायन कर गए. किसी मामले में पुलिस की जांच को पीड़ित परिवारों ने निष्पक्ष नहीं माना.अभियुक्तों के नाम जो एफ़आईआर में होते हैं, वे चार्जशीट तक नहीं पहुंचते.

फ़ाइल फोटो

फ़ाइल फोटो

जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने तहसीन पूनावाला की याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए लिंचिंग के मामलों से निबटने के लिए अलग तरह की तैयारी करने की बात कही थी.

कोर्ट ने राज्यों को कहा था कि वह हर ज़िले में लिचिंग के केसों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए, जहां सिर्फ़ लिचिंग के मामलों के ट्रायल हों. एक स्पेशल टास्क फोर्स बने जिसमें इंटेलिजेंस रिपोर्ट के आधार पर फेक न्यूज़ फैलाने वालों, भड़काऊ भाषण देने वाले लोगों को ट्रेस किया जा सके.

पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा समय पर मिल सके इसके लिए भी कोर्ट ने राज्यों को व्यवस्था करने का निर्देश दिया था. एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और कुछ राज्यों को नोटिस भेजकर ये पूछा कि लिंचिंग के ख़िलाफ़ किस तरह के क़दम उठाए गए हैं? अब तक सिर्फ़ मणिपुर, पश्चिम बंगाल और राजस्थान, इन तीन राज्यों ने ही लिंचिंग के ख़िलाफ़ क़ानून बनाया है.

उत्तर प्रदेश की बात करें तो जुलाई 2019 में राज्य के क़ानून आयोग ने 'एंटी लिंचिंग बिल' का ड्राफ्ट तैयार कर सरकार को सौंपा था. 128 पन्ने के इस ड्राफ्ट को सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर तैयार किया गया था. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वर्तमान क़ानून लिंचिंग के मामलों के लिए नाकाफ़ी है.

आयोग की रिपोर्ट में लिंचिंग के दोषी के लिए सात साल से लेकर उम्रक़ैद की सज़ा की सिफ़ारिश की गई है. लेकिन साल 2020 में अंतरधार्मिक शादियाँ रोकने के लिए अध्यादेश लाने वाली योगी सरकार ने इस लिंचिंग बिल के इस ड्राफ्ट पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की है.

इस मामले में बीबीसी ने उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष जानने के लिए अतिरिक्त मुख्य सचिव (सूचना) नवनीत सहगल से संपर्क किया, ईमेल से भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं मिला, टेलीफ़ोन पर हुई एक संक्षिप्त बातचीत में उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

लिंचिंग के ये केस सालों-साल ज़िला न्यायालय में चल रहे हैं. सरकारी विभागों की ठोकर खाने के बाद पीड़ित परिवार को मुआवज़े के नाम पर दुत्कार मिली है. ये सभी परिवार जिनसे बीबीसी ने मुलाकात की वे सभी न्याय की लड़ाई लड़ना चाहते हैं लेकिन सवाल है कि ये लड़ाई आखिर वो कितने सालों तक तमाम दबावों को झेलते हुए लड़ सकेंगे.

बीबीसी संवाददाता: कीर्ति दुबे
डेटा विश्लेषण: तज़ीन पठान
तस्वीरें: पीयूष नागपाल,गेटी इमेजेस
शॉर्टहैंड: शादाब नज़्मी