कोहिनूर समेत बेशक़ीमती भारतीय विरासत की ब्रिटेन से वापसी मुमकिन है?

लंबे समय से यह माँग उठती रही है कि कोहिनूर समेत अरबों डॉलर क़ीमत की भारतीय कलाकृतियों को वापस किया जाए, क्या ये माँग पूरी हो सकती है?

ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता

दो हफ़्ते पहले लंदन में टीपू सुल्तान की तलवार और दूसरी कलाकृतियों की नीलामी 142 करोड़ रुपए में हुई.

ब्रिटेन में भारत की नायाब कलाकृतियों का एक बड़ा ख़ज़ाना है जिन्हें वापस कराने के लिए भारत की सरकारें लगातार प्रयास करती रही हैं. 

मोदी सरकार भी कोशिश कर रही है. बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद एक विशेष रिपोर्ट में बता रहे हैं कि सरकार के सामने क्या चुनौतियाँ हैं और क्या ब्रिटेन कभी लूटी हुई कलाकृतियों को वापस करेगा? 

'होलोकॉस्ट सर्वाइवर्स' (हिटलर के जनसंहार से बचे यहूदी) कई बार कहते सुने गए हैं कि नाज़ी जर्मनी ने न केवल बड़ी संख्या में यहूदियों को मारा, बल्कि उनकी हज़ारों कलाकृतियों को भी लूटा.

नरसंहार को रोकने में नाकाम यूरोप पछतावे में डूबा था और अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के तुरंत बाद यहूदियों की कलाकृतियों को वापस दिलाने में सक्रिय हो गया. 

अमेरिकी सेना के निर्देशन में लगभग सात लाख कलाकृतियों की पहचान की गई और उन्हें उन देशों में वापस भेजा गया जहाँ से उन्हें लूटा गया था. इनमे से अधिकांश के मालिक यहूदी लोग थे. 

इस कोशिश का अंत यहीं नहीं हुआ. यूरोपीय देशों ने 1985 में सामूहिक तौर पर यहूदियों से लूटी गई कलाकृतियों की पहचान करके उन्हें वापस दिलाने का काम औपचारिक रूप से शुरू कर दिया और 1998 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस सिलसिले में एक समझौता हुआ जिस पर  39 देशों ने हस्ताक्षर किए.

इन दिनों पूरे यूरोप में यह सोच ज़ोर पकड़ रही है कि मध्यकाल से लेकर मौजूदा दौर तक स्वतंत्र देशों पर क़ब्ज़ा करना, आज़ाद लोगों को ग़ुलाम बनाना और उनकी बहुमूल्य कलाकृतियों को लूटना एक गंभीर अपराध था. 

इस अपराध का सबसे बड़ा खामियाज़ा भारत ने उठाया. पहले ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी ने और 1857 में हुए ग़दर के बाद से ब्रिटिश राज ने भारत की बहुमुल्य कलाकृतियों, पेंटिंग, टेक्सटाइल, मूर्तियों, हीरे-जवाहरात और आभूषणों को लूटा या जबरन हासिल किया. इनमें से कुछ उन्हें तोहफ़े में मिले और कुछ समझौतों के तहत हथियाए गए.

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर को भारत में एक 'काले युग' की तरह से याद किया जाता है.

दिल्ली में एक भावुक दक्षिणपंथी राजनीतिक, विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. सुव्रोकमल दत्ता बीबीसी से एक बातचीत में कहते हैं कि ब्रिटेन के पुराने अपराधों का प्रायश्चित करने का समय आ गया है.

 
उनका कहना है:

"अगर ब्रिटेन लूटी गई भारतीय कलाकृतियों और बेशक़ीमती धरोहरों को वापस नहीं करता है तो उसे दुनिया के सामने यह घोषणा करनी चाहिए कि वह गुलामी, औपनिवेशीकरण, लूट, बंधुआ मज़दूरी और नरसंहार को सही ठहराता है. ब्रिटेन को अपने काले इतिहास को मिटाने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा, अभी नहीं, तो कभी नहीं." 

 'इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट' दुनिया भर के सार्वजनिक संग्रहालयों और निजी संग्रहकर्ताओं से चुराई गई और तस्करी की गई प्राचीन कलाकृतियों की भारत को वापस लाने के लिए शुरू किया गया एक छोटा-सा नागरिक आंदोलन है. 

इसे चेन्नई के एस विजय कुमार और सिंगापुर स्थित सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ अनुराग सक्सेना ने 2013 में शुरू किया था. अनुराग सक्सेना कहते हैं:

"आपने किसी हड़पे हुए देश को उस वक़्त तक आज़ादी नहीं दी है जब तक आप उस देश को उसकी संपत्ति वापस नहीं कर देते."  

भारत ने लूटे हुए सामानों की औपचारिक रूप से कोई सूची नहीं तैयार की है और न ही इसकी क़ीमत का कोई सही अंदाज़ा लगाया जा सका है. 

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि उनके विभाग के पास ऐसी कोई लिस्ट नहीं है लेकिन उनकी संख्या हज़ारों में है. एक अनुमान के मुताबिक़, ब्रिटेन में भारतीय कलाकृतियों की संख्या 30 हज़ार से अधिक है. लेकिन आम राय ये है कि ये कलाकृतियाँ नायाब और बहुमूल्य हैं, इनकी क़ीमत नहीं लगाई जा सकती.

डॉ दत्ता कहते हैं, "यह भारत की राष्ट्रीय विरासत है, ये हमारी संस्कृति से जुड़ी है."

ब्रिटेन में भारत की क्या ख़ास कलाकृतिया हैं?

क्या भारत की इन नायाब विरासत को वापस लाना संभव है? इस अहम सवाल पर प्रकाश डालने से पहले ये बता दें कि ब्रिटेन में भारत की कौन-कौन सी महत्वपूर्ण भारतीय कलाकृतियां हैं

कोहिनूर हीरा

सबसे प्रसिद्ध भारतीय कलाकृतियों में से एक, कोहिनूर हीरा 'ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स' का हिस्सा है, इसे 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लड़ाई के बाद हासिल किया था और बाद में महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया था.

कोहिनूर का इतिहास और पृष्ठभूमि
परिचय:

कोहिनूर हीरा विवादों से घिरा हुआ है. कोहिनूर हीरे ने, जो दुनिया के सबसे बहुमूल्य रत्नों में से एक के रूप में प्रसिद्ध है, सदियों से लोगों के दिलों और दिमाग़ को मोह लिया है। यह दिलकश हीरा आज भी विस्मय और आकर्षण को प्रेरित करता है। भारत कहता है कोहिनूर का असली घर भारत है जबकि इंग्लैंड के लोग समझते हैं कि वो उसकी मिल्कियत है 

उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास:

कोहिनूर हीरे की सटीक उत्पत्ति रहस्य में डूबी हुई है। माना जाता है कि गोलकुंडा क्षेत्र में भारत की कोल्लूर खदान में इसका खनन किया गया था, हीरे का सबसे पुराना दस्तावेज़ इतिहास काकतीय वंश के शासनकाल के दौरान 1306 का है। 

राजवंशीय स्थानान्तरण और स्थानांतरण सीमाएँ:

जैसे-जैसे हीरा सदियों से हाथ बदलता गया, उसने दक्षिण एशिया के विभिन्न राज्यों में यात्रा की। यह काकतीय वंश से दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल साम्राज्य तक चला गया। मुगल बादशाह बाबर ने अपने संस्मरणों में हीरे का उल्लेख किया है, इसे कथित रूप से फिर से काटे जाने से पहले इसका वजन 186 कैरेट बताया था। समय के साथ पत्थर को और संशोधित किया गया, इसके आकार को घटाकर वर्तमान 105.6 कैरेट कर दिया गया।

ब्रिटिश अधिग्रहण और विवाद:

18वीं और 19वीं शताब्दियों में भारतीय उपमहाद्वीप में कई शक्ति संघर्ष और युद्ध हुए। इस उथल-पुथल भरे दौर के बीच, कोहिनूर हीरे ने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का ध्यान खींचा। 1849 में, द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध में ब्रिटिश जीत के बाद, हीरा युद्ध की लूट का हिस्सा बन गया, लाहौर की संधि के तहत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया।

रॉयल खजाना और प्रदर्शन:

ब्रिटिश अधिकारियों ने 1850 में रानी विक्टोरिया को कोहिनूर हीरा भेंट किया था। तब से, यह लंदन के टॉवर में प्रदर्शित ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा रहा है।

स्वामित्व विवाद और मांगें:

कोहिनूर हीरे का सही स्वामित्व गहन बहस और विवाद का विषय रहा है। एक के बाद एक आने वाली भारतीय सरकारों और विभिन्न व्यक्तियों ने भारत में इसकी वापसी की मांग की है, यह तर्क देते हुए कि इसे औपनिवेशिक युग के दौरान दबाव में लिया गया था।

हीरे का वैश्विक प्रभाव:

स्वामित्व विवादों से परे, कोहिनूर हीरे ने अपनी दुर्लभता और बेजोड़ प्रतिभा के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। फारसी में कोहिनूर का अर्थ है "प्रकाश का पर्वत"

विरासत और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण:

हाल के वर्षों में, कोहिनूर हीरे के भविष्य को लेकर भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच चर्चा हुई है। कुछ लोग एक साझा व्यवस्था का प्रस्ताव करते हैं जो ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स के शेष भाग के दौरान हीरे को भारत में प्रदर्शित करने की अनुमति देगा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा और इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करेगा।

सुल्तानगंज बुद्ध

यह एक महत्वपूर्ण भारतीय कलाकृति है. ये बुद्ध की 8वीं शताब्दी की एक कांस्य प्रतिमा है, यह वर्तमान में लंदन में विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय में रखा है.

अमरावती स्तूप पैनल

लंदन में ब्रिटिश म्यूजियम में अमरावती स्तूप प्राचीन पत्थर के पैनलों का संग्रह है, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों में से एक है. ये पैनल बुद्ध के जीवन के दृश्यों को दर्शाते हैं.

टीपू सुल्तान की तलवार

ये लंदन में निजी संग्रह में है लेकिन ये भारत की विरासत का एक अहम हिस्सा है.

शिवाजी की तलवारें

 शिवाजी की तीन लोकप्रिय तलवारों के नाम 'भवानी', 'जगदंबा' और 'तुलजा' थे. ये तलवार वर्तमान में ब्रिटिश शाही परिवार की मिल्कियत में लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में हैं . द हिंदू अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र सरकार ने इन तलवारों को वापस लाने के लिए कोशिशें शुरू कर दी हैं.

टीपू सुल्तान का बाघ 

यह प्रतिष्ठित यांत्रिक खिलौना है जिसमें एक ब्रिटिश सैनिक को एक बाघ मारता हुआ दिखाया गया है, यह मैसूर साम्राज्य के शासक टीपू सुल्तान के लिए बनाया गया था. ये पॉविस कैसल में है.

अमरावती रेलिंग

ब्रिटिश संग्रहालय में अमरावती स्तूप से नक्काशीदार संगमरमर की रेलिंग का संग्रह भी है, ये रेलिंग दूसरी ईसा पूर्व दूसरी सदी की हैं और इनमें बुद्ध के जीवन के दृश्यों का चित्रण है.

पंजाब के महाराजा का ताज

यूके में रॉयल कलेक्शन ट्रस्ट में सिख साम्राज्य के अंतिम महाराजा रणजीत सिंह का ताज है. मुकुट कई हीरे और कीमती रत्नों से सुशोभित है.

चोल कांस्य प्रतिमाएँ

ब्रिटिश संग्रहालय में भारत के चोल वंश की कांस्य प्रतिमाओं का संग्रह है, ये उत्कृष्ट मूर्तियां 9वीं से 13वीं शताब्दी की हैं और देवताओं और संतों का प्रतिनिधित्व करती हैं.

'बनी ठनी' पेंटिंग 

लंदन की नेशनल गैलरी में बनी-ठनी के नाम से मशहूर राजस्थानी मिनिएचर पेंटिंग है, 18वीं शताब्दी में निर्मित इस पेंटिंग में राजस्थान के किशनगढ़ के दरबार की एक महिला को दर्शाया गया है.

इसके अलावा, भारत की कई और क़ीमती चीज़ें ब्रिटेन के क़ब्ज़े में हैं. ये सभी मुख्य रूप से चार प्रकार की कस्टडी में हैं: संग्रहालय, यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी, निजी मिल्कियत और ब्रिटिश क्राउन ज्वेल.

 डॉ दत्ता कहते हैं:

"मेरा मानना है कि भारत से लूटे गए सामानों की संख्या कम से कम 25 से 30 हजार होनी चाहिए, इससे अधिक भी हो सकती है क्योंकि अभी तक इसकी औपचारिक रूप से गणना नहीं की गई है"

भारत की कलाकृतियां कैसे वापस हो सकती हैं?

भारत की पिछली कई सरकारों ने ब्रिटेन के अधिकारियों से कोहिनूर और देश की दूसरी कलाकृतियों को वापस करने की माँग की है लेकिन उसमें उसे सफलता नहीं मिली है. इंग्लैंड के अख़बार 'द टेलीग्राफ' के अनुसार मोदी सरकार कोहिनूर हीरा और हज़ारों अन्य कलाकृतियों को वापस हासिल करने की मुहिम के लिए कूटनीतिक तैयारी कर रही है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि कोहिनूर जैसे विवादित हीरे को वापस लाना लगभग असंभव है. 

हर्ष त्रिवेदी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं, उनका कहना है कि भारत को दो मुख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. 

उनके मुताबिक़:

"पहली चुनौती है--जटिल क़ानूनी प्रक्रियाएँ, चोरी की गई कलाकृतियों को वापस करने की कानूनी प्रक्रिया बेहद जटिल हो सकती है और इसमें कई अधिकार क्षेत्र और कानूनी प्रणालियां शामिल हो सकती हैं. भारत को कई क़ानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें क़ानूनी स्वामित्व का प्रदर्शन और ये साबित करना शामिल है कि कलाकृतियों को चुराया गया था या अवैध रूप से प्राप्त किया गया था."

"दूसरी चुनौती राजनीतिक और कूटनीतिक है. राष्ट्रों के बीच जटिल राजनीतिक और राजनयिक संबंधों को साधना होता है, यह उन मामलों में विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है जहां कलाकृतियों को औपनिवेशिक शासन के दौरान लिया गया था, क्योंकि पूर्व उपनिवेशवादी शक्ति और पराधीन रहे राष्ट्र के बीच ऐतिहासिक तनाव और अनसुलझे सवाल होते हैं."

क़ानूनी दृष्टिकोण से ऐसा लगता है कि भारत ने कम-से-कम कोहिनूर की वापसी के मामले में हार मान ली है. 2016 में एक जनहित याचिका में एक नागरिक ने भारत सरकार से कोहिनूर वापस भारत लाने का आग्रह करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी. जवाब में भारत सरकार ने कोहिनूर को ब्रिटेन की मिल्कियत को स्वीकार कर लिया और इससे अपना पलड़ा झाड़ लिया था. 

कोहिनूर हीरा भारत और ब्रिटेन के आपस में गुंथे हुए इतिहास का प्रमाण है, कोहिनूर की बेजोड़ सुंदरता उसकी कहानियाँ दुनिया भर के दिलों को लुभाती है. भारतीयों के लिए एक भावुक मुद्दा है. मोदी सरकार के निकट लोगों का कहना है कि देशवासी ये आशा रखते हैं कि सरकार कोहिनूर हीरे और दूसरी भारतीय संपत्तियों को भारत वापस लाने की कोशिश ज़रूर करेगी.

डॉ दत्ता कहते हैं:

"भारत में पिछली सरकारों के पास इस तरह की साहसिक पहल करने की इच्छाशक्ति नहीं थी लेकिन अब चीजें बहुत बदल गई हैं. अब हमारे पास एक शक्तिशाली राष्ट्रवादी सरकार है इसलिए अब भारतीयों को मोदी सरकार से अपेक्षाएं अधिक हैं."

लेकिन इसके लिए भारत को सबूत और दस्तावेज़ जुटाने और ब्रिटेन की अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रुरत होगी. लंदन में ब्रितानी क़ानून के माहिर सरोश जइवाला कहते हैं, "भारत उसी समय अपनी कलाकृतियों को वापस पा सकता है जब वो ब्रिटेन की अदालत में यह साबित कर दे कि वो ब्रितानी क़ानून के तहत उनका हक़दार है. भारत को अदालत में यह दिखाना होगा कि उसके पास कलाकृतियों की मिल्कियत है जो अपने-आप में एक बहुत मुश्किल काम होगा और इसके लिए स्पष्ट सबूतों की आवश्यकता होगी."

नटराज की वापसी, उम्मीद की एक किरण?

लेकिन अब भी उम्मीद की किरण दिखाई देती है. ब्रिटेन की अदालत में भारत को एक अनोखे और जटिल मुक़दमे में कामयाबी मिल चुकी है और इस कामयाबी का श्रेय सरोश जइवाला को जाता है. ये मामला तमिलनाडु के एक मंदिर से ब्रिटेन पहुंचे नटराज की एक मूर्ति का है.

इसकी जानकारी ख़ुद सरोश जइवाला देते हैं, "मूर्ति को भारत से तस्करी करके ब्रिटेन ले जाया गया था, मेरी फर्म जइवाला एंड कंपनी ने तमिलनाडु सरकार के लिए काम किया था और भारत में नटराज की मूर्ति की वापसी में सफल रही थी. हम भारतीय क़ानून के तहत एक अनोखे आइडिया के आधार पर सफल हुए. वो आइडिया ये था कि नटराज की मूर्ति एक प्रतिष्ठित मूर्ति है, यह हिंदू क़ानून के तहत एक न्यायिक व्यक्ति (लीगल एंटिटी) है और इसलिए तमिलनाडु के मंदिर में अपने घर वापस लौटने के लिए ये खुद मुक़दमा कर सकती है."  

इस नटराज मूर्ति को 1976 में तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले के पाथुर गांव के अरिल थिरु विश्वनाथ स्वामी मंदिर से चुराया गया था. तस्करी के रास्ते ये इंग्लैंड पहुंचा जहाँ इसे बेच दिया गया. अब ये मूर्ति वापस उसी मंदिर के हवाले कर दी गई है.  

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पिछले नौ वर्षों में 240 प्राचीन कलाकृतियां बरामद की गई हैं और भारत वापस लाई गई हैं. उनका कहना था कि आज़ादी के बाद से 2014 तक बीस से भी कम कलाकृतियों को वापस लाया गया था. उन्होंने कहा कि भारत से सांस्कृतिक कलाकृतियों की तस्करी भी काफ़ी कम हुई है, राजधानी में अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय एक्सपो के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने भारत जैसे प्राचीन संस्कृति वाले देश सैकड़ों वर्षों से इस तरह के मुद्दों से जूझ रहे हैं. 

क़ीमती मूर्तियों की वापसी के लिए नागरिकों की पहल

भारत प्राचीन मंदिरों का देश है, सदियों से प्राचीन मंदिरों से संबंधित नायाब मूर्तियों और अन्य मूल्यवान वस्तुओं को चोरी और तस्करी के ज़रिए देश से बाहर भेज दिया गया है.

दो साधारण व्यक्तियों ने उन मूर्तियों को वापस लाने की कोशिश शुरू की है जो कभी हिंदू, बौद्ध और जैन मंदिरों की मिल्कियतें थीं. 

विजय कुमार और अनुराग सक्सेना ने 2013 में इस पहल की शुरुआत की और हैशटैग #BringOurGodsHome के तहत इसे इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट  का नाम दिया.

विजय कुमार का कहना है कि वे कई चीजें भारत वापस लाए हैं, जैसे "न्यू साउथ वेल्स की आर्ट गैलरी से वृद्धाचलम अर्धनारीश्वर, ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय गैलरी से श्रीपुरंतन नटराज, लंदन से नालंदा बुद्ध, लंदन से ब्रह्म-ब्राह्मणी, लंदन से आनंदमंगलम राम समूह, टोलेडो संग्रहालय से गणेश, एशिया सोसाइटी न्यूयॉर्क से पुन्नैनल्लुर नटराज, बॉल स्टेट संग्रहालय से अलिंगना मूर्ति तिरुपंबपुरम वग़ैरह." 

कलाकृतियों को वापस करने के लिए क्या व्यवस्था है? 

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से चोरी की कलाकृतियों को वापस लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानून बनाने की जागरूकता आई है.

यूरोप में बोनेली एर्डे की कला और सांस्कृतिक फ़ोकस टीम के सलाहकार और सदस्य प्रोफ़ेसर मनिलियो फ़्रिगो सांस्कृतिक कलाकृतियों के विशेषज्ञ हैं, उनका कहना है कि सैद्धांतिक रूप से दो मुख्य बहुराष्ट्रीय संधियाँ हैं जो इन मामलों पर लागू होती हैं.

पहला, 1954 का हेग कन्वेंशन, जो युद्ध के समय लूटी गयी संपत्ति से संबंधित है. प्रोफ़ेसर मनिलियो फ़्रिगो कहते हैं, "यह संधि न केवल सांस्कृतिक संपत्ति की रक्षा करता है जैसे कि वास्तुकला, कला या ऐतिहासिक स्मारक, पुरातात्विक स्थल, कलाकृतियाँ, पांडुलिपियाँ, किताबें और ऐतिहासिक या पुरातात्विक महत्व की अन्य वस्तुएँ. यह सैन्य क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों से चुराई गई सांस्कृतिक संपत्ति को वापस करने का दायित्व भी निर्धारित करता है, भारत और ब्रिटेन इस संधि के पक्षकार हैं भारत ने 1958 में और यूके ने 2017 में इस पर दस्तख़त किए."

दूसरा बहुराष्ट्रीय समझौता है यूनेस्को (UNESCO)संधि जिसे 1970 में पारित किया गया और जो शांति के समय लूटे गए सामानों से ताल्लुक़ रखता है. प्रोफ़ेसर मनिलियो फ़्रिगो कहते हैं, "यह समझौता राज्यों से सांस्कृतिक संपत्ति की अवैध तस्करी को रोकने के उपाय करने का आग्रह करता है, इस समझौते का मुख्य पहलू चोरी की गई सांस्कृतिक संपत्ति की वापसी है."

1970 के यूनेस्को कन्वेंशन की कुछ कमियों को पूरा करने के लिए चोरी या अवैध रूप से निर्यात की गई सांस्कृतिक वस्तुओं पर रोम में 1995 में एक और संधि हुई. ये समझौता अवैध सांस्कृतिक वस्तु के मालिकों पर लागू होता है, इसलिए सांस्कृतिक वस्तु रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए इसे वापस करना अनिवार्य है, यह संधि दावों के लिए समय-सीमा भी निर्धारित करता है और सांस्कृतिक कलाकृतियों के अधिग्रहण के लिए उचित कोशिश की आवश्यकता निर्धारित करता है.

इन अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत अमेरिका ने 23 सितंबर, 2021 को, 2003 में इराक़ पर क़ब्ज़े के बाद चुराई गई 17 हज़ार से अधिक कलाकृतियों को इराक़ को लौटा दिया है.

लेकिन ये तमाम अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन मध्यकाल में लूटे गए सांस्कृतिक कलाकृतियों पर लागू नहीं होते. इसका मतलब ये हुआ कि आधुनिक भारत में लूटी हुई सांस्कृतिक कलाकृतियों की ही वापसी का दावा किया जा सकता है. भारत जब ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था, उस समय लूटी गई क़ीमती चीज़ें इन अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत नहीं आतीं.  

वापसी के क़ानूनी रास्ते बंद?

लंदन में ब्रितानी क़ानून के माहिर और वरिष्ठ वकील सरोश जइवाला कहते हैं, क़ानूनी रास्ता खुला है लेकिन मुश्किलों से भरा है. वो कहते हैं कि भारत चाहे तो सबूतों के साथ ब्रितानी अदालतों में अपनी कलाकृतियों की वापसी के लिए मुक़दमा कर सकता है.

वे कहते हैं:

"अगर ब्रिटिश सरकार भारतीय कलाकृतियों को वापस करने के लिए सहमत हो तो इसके लिए ब्रिटेन को कोई क़ानून बनाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी, अगर ब्रिटिश अदालत ब्रिटेन की सरकार को कोहिनूर भारत को सौंपने का आदेश देती है तो ब्रिटेन ऐसा करने के लिए बाध्य होगा."

दिल्ली में इन मुद्दों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ वकील रजत भारद्वाज कहते हैं कि भारत सरकार को राजनयिक और क़ानूनी दोनों रस्ते अपनाने चाहिए. वे कहते हैं, "अगर इस बात का कोई दस्तावेज़ी सबूत नहीं है कि क्या कलाकृतियों को उपहार में दिया गया था या इन्हें लूटा गया था, तो यह विवादित तथ्यों का सवाल है और सरकार को कोहिनूर हीरा और अन्य कीमती कलाकृतियों को वापस लाने के लिए राजनयिक और क़ानूनी सहित सभी उपाय करने चाहिए. वे हमारे देश की संपत्तियाँ हैं."

भारद्वाज कहते हैं कि भारत सरकार को अगर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस भी जाना पड़े तो उसे जाना चाहिए.

"कलाकृतियों को उपहार में दिया गया था या इन्हें लूटा गया था इसका विश्लेषण तथ्यों/गवाहों/दस्तावेज़ी सबूतों के आधार पर करके भारत को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए."

धीरे-धीरे माहौल बदल रहा है. यूरोप के कोलोनियल पावर्स को अब ये एहसास हो रहा है कि 'ग़ुलाम' देशों से लूटा माल वापस लौटाने का समय आ गया है. कई भूतपूर्व कोलोनियल पावर्स क़ानून बना रहे हैं ताकि वो लूटा सामान कभी ग़ुलाम रहे देशों को वापस कर सकें. 

प्रोफ़ेसर मनिलियो फ़्रिगो के मुताबिक़, कलाकृतियां वापस लौटाने के लिए यूरोपीय देशों का क़ानून बनाना ज़रूरी है. उनके अनुसार फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल जैसे देशों में, जहाँ कलाकृतियां पब्लिक कलेक्शन के तहत हैं, क़ानून पारित कराना ज़रूरी है. 

कम-से-कम उन देशों में जहां संबंधित कलाकृतियां सार्वजनिक संग्रह से संबंधित हैं (जैसा कि आमतौर पर फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल में होता है) कलाकृतियों को लौटाने के लिए कानून पारित किए जाने चाहिए, लेकिन ब्रिटेन ने इस तरफ़ अब तक कोई पहल नहीं की है. 

प्रोफ़ेसर मनिलियो फ़्रिगो कहते हैं, "जहाँ तक मुझे पता है, ब्रिटेन ने इस मामले पर कोई विशिष्ट क़ानून नहीं बनाया है इसलिए किसी भी अनुरोध को मुकदमा-दर-मुक़दमा के आधार पर निपटाया जाएगा. अन्य यूरोपीय देशों के विपरीत ब्रिटेन अब भी सामानों की वापसी के लिए कोई मुनासिब कोई क़ानूनी रणनीति नहीं रखता."

नैतिकता का मामला

भारत में कई विशेषज्ञों का तर्क है कि कलाकृतियों की वापसी को क़ानूनी या राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. 

यह एक नैतिक मुद्दा है जैसा कि अनुराग सक्सेना भूतपूर्व कोलोनियल पावर्स को संबोधित करते हुए कहते हैं, "आपने हमारी जान ले ली, आपने हमारे प्राकृतिक संसाधनों को ले लिया, आपने हमारी विरासत को ले लिया, आप हमें हमारी ज़िन्दगी नहीं लौटा सकते, संसाधनों को वापस नहीं दे सकते, कम-से-कम आप हमारी विरासत तो लौटा दें."

दक्षिणपंथी विचारक और मोदी सरकार समर्थक डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता भी विरासत को बिना किसी शर्त लौटाने की बात करते हैं, "कई यूरोपीय देश अपने पूर्व उपनिवेशों से लूटा गया माल वापस कर रहे हैं क्योंकि वे अपने अतीत की क्रूरताओं पर शर्म महसूस करते हैं, ब्रिटेन को ऐसा करने से क्या चीज़ रोकती है? यदि ब्रिटेन यह पहल करता है तो यह हमारे घाव को भर सकता है और हमारी दर्दनाक यादों को कुछ हद तक मिटा सकता है."

बीबीसी संवाददाता: ज़ुबैर अहमद
फोटो: गेटी, ब्रिटिश म्युज़ियम, मेट्रोपोलिटन म्युज़ियम ऑफ़ आर्ट, इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट
प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी