स्टार, पब्लिक और पीआर राज़ी तो क्या नहीं करेगा पैपराज़ी?

अपने पसंदीदा एक्टर्स की रील्स, तस्वीरें देखी हैं न? पर कभी सोचा है कि कैमरे के पीछे से ''मलाइका, मलाइका मैम, करीना, दीपिका, सलमान भाई"... की चीख़-पुकार मचाते और तस्वीरें खींचते ये लोग कौन हैं और कहाँ से आते हैं?
ये कहानी है उन लोगों की है जिनसे तस्वीरें खिंचवाने के लिए अक्सर स्टार्स होते हैं राज़ी, और कभी-कभी दिखाते हैं अपनी नाराज़ी, इन लोगों को कहा जाता है पैपराज़ी.

मुंबई का एक सिनेमाहॉल. दोपहर के 12 बजे. फ़ैंस की भीड़ जुट रही है.
कुछ लड़के हाथों में फ़ोन और कैमरा लिए खड़े हैं. आसपास सलमान ख़ान की फ़िल्म 'किसी का भाई, किसी की जान' के पोस्टर लगे हैं.
कैमरा पकड़े लड़कों से पूछा- प्रोग्राम कितने बजे का है और सलमान कितने बजे आएँगे?
जवाब मिला, ''प्रोग्राम तो ढाई बजे का है, पर सलमान छह-सात बजे तक आएंगा. उसका सिक्योरिटी का कुछ लोचा चल रहा है तो अभी पक्का नहीं है कि आएंगा कि नई आएंगा.''
ये लोग कैमरों का सेटअप लगाने लगते हैं. पांच बजे से कुछ एक्टर्स आना शुरू होते हैं. एक्टर्स का नाम पुकारकर फ़ोटोग्राफ़ी शुरू होती है. मगर इन लोगों की नज़रें किसी और को खोज रही हैं.
लगभग छह बजे तेज़ म्यूज़िक बजता है. अचानक सामने सलमान ख़ान खड़े दिखते हैं. अब तक तस्वीरें खिंचवा रहे नए एक्टर्स पीछे हट जाते हैं.
हाथ में मोबाइल, कैमरा पकड़े इन लोगों की भीड़ कहना शुरू करती है- ''भाई आ गए, भाई आ गए. भाईजान, आपके राइट साइड. भाई आपके लेफ़्ट.'' इस दौरान तेज़ धक्का-मुक्की जारी रहती है. कैमरों की नज़र से सलमान ख़ान के हटते ही हाथ में मोबाइल, कैमरा पकड़े लोगों की ये दुनिया शांत-सी हो जाती है. वैसे ही जैसे लौटती लहर के साथ थोड़े वक़्त के लिए समंदर का किनारा शांत हो जाता है.
ये पैपराज़ी ही होते हैं, जो आपके पसंदीदा एक्टर्स के निजी से लेकर सार्वजनिक पलों को आपके सामने लाते हैं. कई बार सितारों का पीछा करके, कई बार बिना उनकी मर्ज़ी के. बदले दौर के ये नए पैपराज़ी आपकी नज़रों में आने की ख़्वाहिश रखने वाले एक्टर्स के लिए भी पुल का काम करते हैं. ज़रिया बनती हैं- सोशल मीडिया पर दिखतीं तस्वीरें, रील्स, वीडियो.
फिर चाहे कभी अभिषेक बच्चन की शादी की तस्वीर हो. आलिया भट्ट के लिविंग रूम या कभी छुट्टी मनाने गईं कैटरीना कैफ की बेपरवाह तस्वीरें. पैपराज़ी तब भी थे, जब दिलीप कुमार का दौर था और अब भी हैं, जब नन्हा तैमूर स्कूल जाता है या लौटता है या मलाइका जिम जाती हैं तो पैपाराज़ी साये की तरह मंडरा रहे होते हैं.
मगर ये पैपराज़ी शब्द कहां से आया और कैसे छाया? पैपराज़ी की दुनिया में काम करने वाले लोगों की चुनौतियाँ क्या हैं और कमाई कितनी, कैसे होती है? साथ ही ये भी जानेंगे कि पैपराज़ी कब कर जाते हैं सीमा पार और क्या कहता है क़ानून? पैपराज़ी को कैसे पता चलता है कि कौन सा एक्टर कब, कहाँ दिखने वाला है?
ये है पैपराज़ी की दुनिया, जिसमें स्नेह ज़ाला भी हैं और बिहार के कैमूर से पैपराज़ी बनने आए चुलबुल पांडे भी.

पैपराज़ी

पैपराज़ी यानी मशहूर हस्तियों की फ़ोटो खींचने वाले, कई बार हस्तियों की मर्ज़ी से और कई बार उनकी मर्ज़ी के बग़ैर. ये लोग इन तस्वीरों को किसी अख़बार, मैगज़ीन चैनल को बेचते हैं या ऐसे किसी पैपराज़ी संस्थान के लिए नौकरी कर रहे होते हैं.
मुंबई में इनकी महीने की सैलरी 10 हज़ार रुपये से लेकर 25 हज़ार रुपये तक होती है. कई बार इन पैपराज़ी की खींची कोई एक्सक्लूसिव या निजी तस्वीर 10 हज़ार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक में बिकती है. क़ानून के जानकारों से पूछें तो छुपकर बिना किसी की मर्ज़ी के तस्वीरें खींचना स्टॉकिंग माना जाता है.
पैपराज़ी इतालवी भाषा का शब्द है.
1960 में इटली के फ़िल्ममेकर फ्रडरिको फेलिनी की एक फ़िल्म रिलीज़ हुई- ''ला डॉयचे वीटा'' यानी स्वीट लाइफ़.
इस फ़िल्म के एक किरदार का नाम था- पैपराज़ो. ये किरदार बेख़ौफ़ था और मशहूर हस्तियों की तस्वीर लेने के लिए कहीं भी चला जाता था. माना जाता है कि इस किरदार का नाम लेखक जॉर्ज गिसिंग की 1901 में आई किताब से लिया गया था.

फेलिनी की फ़िल्म ''ला डॉयचे वीटा'' का एक दृश्य.
फेलिनी की फ़िल्म ''ला डॉयचे वीटा'' का एक दृश्य.

पैपराज़ी की दुनिया कैसी होती है? देखिए बीबीसी की ख़ास पेशकश.
पैपराज़ी की दुनिया कैसी होती है? देखिए बीबीसी की ख़ास पेशकश.
ऐसा नहीं है कि इस नाम के मिलने से पहले नामी हस्तियों की तस्वीरें नहीं खींची जाती थी. मगर फेलिनी की फ़िल्म से इन लोगों को एक नया नाम मिल गया- पैपराज़ी.
पश्चिमी देशों में पैपराज़ी काफ़ी चर्चा में रहे. राजकुमारी डायना की कार जब दुर्घटनाग्रस्त हुई, तब पैपराज़ी ही कार का पीछा कर रहे थे. इस हादसे में डायना की जान चली गई थी. कुछ देशों में तो पैपराज़ी की सीमाएँ तय करने के लिए क़ानून भी हैं.
हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में पैपराज़ी पहले भी सक्रिय थे और अब भी. वक़्त के साथ पैपराज़ी के काम करने का ढंग बदला है.
पुराने दौर में मायापुरी, स्टारडस्ट जैसी पत्रिकाएँ थीं और अब विरल भयानी, मानव मंगलानी, वरिंद्र चावला, योगेन शाह जैसे कई नाम हैं जो पैपराज़ी कंपनियों की तरह काम करते हैं. मोबाइल फ़ोन आने से पैपराज़ी का बाज़ार लगातार बढ़ा है, अच्छे कैमरे वाले मोबाइल फ़ोन से तस्वीरें खींची भी जा रही हैं और मोबाइल पर देखी भी जा रही हैं. इसकी एक वजह- सोशल मीडिया भी है, ख़ास तौर पर इंस्टाग्राम.
पैपराज़ी की दुनिया के बारे में जानकार कहते हैं, ''यहां हर किसी को हर किसी की ज़रूरत है. सेलेब्रिटी के सेलेब्रिटी बनने और अपना जलवा कायम रखने के लिए पैपराज़ी की ज़रूरत होती है.''
ये बाज़ार इतना बड़ा है कि इसमें पहले से भी पैपराज़ी हैं और नए लोग भी जगह बनाने आ रहे हैं. जैसे- चुलबुल पांडे उर्फ़ विनय.

आकर्षण

'दबंग' फ़िल्म में सलमान ख़ान ने चुलबुल पांडे का किरदार निभाया था और ये महज़ इत्तेफ़ाक ही है कि इन्हीं सलमान ख़ान के एक इवेंट के बाहर कंधे पर बैग लटकाए, हाथ में कैमरा पकड़े चुलबुल पांडे से हमारी मुलाक़ात हुई.
चुलबुल पांडे...ये आपका असली नाम है?
चुलबुल पांडे कहते हैं, ''2017 से पहले मेरा नाम विनय था. मगर जब से इस पैपराज़ी की दुनिया में आया तो मेरे को प्यार से सब चुलबुल पांडे बुलाने लगे. मैंने भी ये नाम अपना लिया है. थोड़ा मैं मस्ती करता रहता हूँ तो सब चुलबुल-चुलबुल बोलने लगे.''

चुलबुल पांडे
चुलबुल पांडे
अपने-अपने गांवों, शहरों से निकलकर मुंबई में बसने और ख़ुद के यहां से जुड़ा दिखाने का सबसे आसान तरीका ''अपुन'' बोलना है.
चुलबुल के मामा भी मुंबई रहते हैं. वो बोले, ''हम तो चुलबुलवा से बोले थे कि ट्रैवल के काम में लग जाओ, मगर इसको यही सब अच्छा लगता है.''
चुलबुल हँसते हुए बताते हैं,
''मेरा बचपन से शौक़ था कि मैं भी हीरो, हीरोइन से मिलूँ. सामने से देखूँ. मैं महादेव को बहुत प्रसाद चढ़ाया कि भोलेनाथ मेरे को भी कहीं लगा दो. उधर मैं दसवीं फेल भी हो गया था. भागकर मुंबई आया. पैपराज़ी का काम दिल से अच्छा लगता है. हर रोज़ नए लोगों से मिलना होता है. नई बात सीखने को मिलती है. पैपराज़ी की दुनिया में लगे हुए हैं. देखते हैं. कहीं कुछ मिल जाए. किस्मत क्या करती है.''
पैपराज़ी के काम में चेज़ यानी मशहूर हस्तियों का पीछा करना बेहद अहम हिस्सा है. संजय दत्त के कोर्ट जाने के वक़्त हुए चेज़ को याद करके कई पुराने लोगों की आँखें आज भी चमकने लगती हैं.
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद रिया चक्रवर्ती हों या फिर आर्यन ख़ान मामला. मीडिया चैनलों की भीड़ का मुक़ाबला पैपराज़ी से ही हो रहा था.

रिया चक्रवर्ती मीडिया के कैमरों से घिरी हुईं.
रिया चक्रवर्ती मीडिया के कैमरों से घिरी हुईं.
पैपराज़ी के पास बाइक या गाड़ी का होना ज़रूरी होता है. ऐसे में महज 10-12 हज़ार की नौकरी कर रहे चुलबुल पांडे बिना बाइक के कैसे काम करते हैं?
पैपराज़ी की दुनिया के स्ट्रगलर चुलबुल कहते हैं, ''बस, ऑटो और लोकल से ही अपना ट्रैवल है. रात दो बजे घर पहुंचे. सुबह मैसेज फ़ोन में गिर गया कि इवेंट में जाना है. कहीं भी हो तो अपुन को भागना ही है. मेरा शौक़ भी है कि अच्छा ख़ासा पैसा आ जाए तो अपना बाइक ले लूँ. अपना कैमरा ले लूँ. इस लाइन से दिल से प्यार करता हूँ.'


जो सपना चुलबुल की आंखों में है. वो हक़ीक़त स्नेह ज़ाला जैसे पैपराज़ी के जीवन में दिखती है. स्नेह के दो लाख से ज़्यादा इंस्टाग्राम फॉलोअर्स हैं. स्नेह दूसरे पैपराज़ी प्लेटफॉर्म के लिए भी तस्वीरें देते हैं.
कई एक्टर्स स्नेह को नाम से पुकारते हैं और पहचानते हैं.
स्नेह ज़ाला कहते हैं, ''शुरू में दीपिका, रणवीर के फैन पेज देखा करता था. फिर पता चला कि बांद्रा में ये सब होता है. मैं ख़ुद भी घूमने लगा. सारे सेलेब्रिटीज़ मिलने लगे. फिर मानव मंगलानी सर से मिला. तब रील्स नहीं होती थी. हम छोटे वीडियो बनाते थे. अब सभी रील कर रहे हैं.''
स्नेह बोले, ''मुझे कभी ये नहीं लगता है कि मैं काम पर आ रहा हूं. अच्छा लगता है ये काम मेरे को. मैंने बी-कॉम किया है. सीए का एंट्रेंस एग्ज़ाम तीन बार दिया, एक बार भी नहीं निकला लेकिन अभी जो मैं कर रहा हूँ वो सीए से भी अच्छा है.''

स्नेह ज़ाला
स्नेह ज़ाला
'मानव मंगलानी' पैपराज़ी प्लेटफॉर्म के प्रमुख मानव कहते हैं, ''लोग इस काम में इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उनको सेलेब्रिटी की तस्वीरें खींचना, उनके आस-पास रहना अच्छा लगता है.''

संघर्ष

दोपहर के एक बजे रहे हैं. स्नेह फ़ोन पर कहते हैं, ''टिप मिली है. अदिति राव हैदरी बांद्रा के पास एक जगह आने वाली हैं. आप पहुंचो.''
हम स्नेह से पहले पहुंचते हैं. अदित राव हैदरी की नीली कार आती है और वो एक बिल्डिंग के भीतर चली जाती हैं. कुछ देर बाद स्नेह आते हैं. जब हम ये बताते हैं कि अदिति आ चुकीं तो वो बोले- वीडियो बनाया क्या, नीले रंग की गाड़ी थी न?

स्नेह ज़ाला एक स्टार का इंतज़ार करते हुए.
स्नेह ज़ाला एक स्टार का इंतज़ार करते हुए.
मुंबई में पैपराज़ी को पता होता है कि किस एक्टर के पास किस रंग की कौन-सी गाड़ी है और उसका क्या नंबर है?
अब स्नेह इंतज़ार कर रहे हैं कि अदिति कब बाहर निकलेंगी. दो घंटे बाद स्नेह कहते हैं- मैं अदिति को नीचे लाने की कोशिश करता हूँ क्योंकि ये प्रोग्राम तो 7 बजे तक है.
ये इंतज़ार लंबा चलता है और शाम पाँच बजे अदिति राव हैदरी 'जुबली' सिरीज़ की स्टारकास्ट के साथ बाहर निकलती हैं. तस्वीरें खिंचती हैं.
अदिति राव हैदरी कहती हैं:
''हमारे मुंबई के जो फ़ोटोग्राफ़र हैं वो बहुत प्यारे हैं. ये लोग हमारे बारे में बहुत सोचते हैं. ये लोग प्यार से हमारे वीडियो बनाते हैं. प्यारे पल कैद कर लेते हैं.''
मगर ये प्यारे पल कैद करना आसान नहीं होता.
चुलबुल जैसे नए पैपराज़ी के लिए चुनौतियां और ज़्यादा हैं. बाइक ना होने से सफ़र ट्रेन, ऑटो से होता है या कई बार पैदल भी चलना पड़ता है.
चुलबुल बताते हैं, ''बहुत बार हुआ है कि शूट कर रहे हैं और चलते-चलते गिर गए. अब पीछे तो दिखाई नहीं देता न. गिरते हैं तो फिर फ़ौरन उठते हैं और शूट करते हैं. सेलेब्रिटी बोलते भी हैं कि अरे, अरे संभालकर. पर जब गिर गए तो अब क्या संभलना. मात्र 10 मिनट के विजुअल के लिए घंटों बैठे रहो.''
स्नेह कहते हैं, ''एक बार दीपिका और रणवीर छुट्टियों से लौट रहे थे. मैं फ़ोटो लेते हुए उल्टा चल रहा था और अचानक गिर गया था. फिर अगली बार जब दीपिका मिलीं तो पूछा कि तुम ठीक हो न?''
हम मुंबई के एक रेड कार्पेट इवेंट में हैं. यहाँ भारतीय सिनेमा के लगभग सभी बड़े नाम मौजूद हैं. आमिर, रहमान, रितिक, शाहिद कपूर, अभिषेक, लारा दत्ता, राजू हिरानी....
हस्तियों की तस्वीर खींची जा रही हैं और लगातार अपलोड भी की जा रही हैं.



एक्टर आमिर ख़ान और डायरेक्टर शेखर कपूर
एक्टर आमिर ख़ान और डायरेक्टर शेखर कपूर

संगीतकार ए आर रहमान
संगीतकार ए आर रहमान

अभिषेक बच्चन और रितिक रोशन
अभिषेक बच्चन और रितिक रोशन
स्नेह कहते हैं, ''आपने कोई चीज़ शूट की. वो एक मिनट के अंदर पहुंच जानी चाहिए. ये इसी पर निर्भर करता है कि आप कितना तेज़ हो. अगर कोई 10 मिनट पहले वीडियो डाल रहा है और कोई 10 मिनट बाद, तो सारा इंगेजमेंट चला जाएगा.''
कभी पैपराज़ी बनकर ग्राउंड पर काम कर चुके निक्के राणा कहते हैं, ''अपन लोगों का काम ऐसा है कि कभी ताज में बैठे रहते हैं, कभी शमशान घाट पर.''
कभी जूते-चप्पल सिलने वाले एक शख़्स जो अब मुंबई में पैपराज़ी हैं, वो कहते हैं- ''कितने लोगों को अपने पसंद के सितारे को ज़िंदगी में देखने को मिलता है. यहां पैपराज़ी तो रोज़ इन सितारों के आस-पास रहते हैं.''

स्नेह ज़ाला
स्नेह ज़ाला
पैपराज़ी और परिवार
चुलबुल ने कुछ वक़्त पहले ही शादी की है. पत्नी बिहार में है. चुलबुल का मन है कि आर्थिक स्थिति ठीक होने पर बीवी को मुंबई लाएँ.

चुलबुल पांडे अपने कुछ दोस्तों के साथ इसी कमरे में रहते हैं.
चुलबुल पांडे अपने कुछ दोस्तों के साथ इसी कमरे में रहते हैं.
अभी चुलबुल सांताक्रूज की तंग गलियों की एक चॉल में रहते हैं. कुछ दूरी पर विशाल समंदर है. मगर चुलबुल जिस छोटे कमरे में रहते हैं वहाँ पानी, टपक-टपककर नसीब होता है.
चुलबुल ने कहा, ''बीवी को यही बताता हूँ कि बॉलीवुड में काम करता हूँ. हीरोइन के साथ जब फ़ोटो निकालकर भेजता हूँ तो बीवी गुस्सा करती है. कहती है- हीरोइन के इतने पास चिपके हुए हो. फिर मैं कहता हूं कि ऐसी कोई बात नहीं है भाई. वो खाली फोटो भर है. आगे की दुनिया तू है, लेकिन आप जानते ही हो. औरत दूसरे शक में चली जाती है कि कहीं मेरा पति कहीं और तो नहीं. तो कहता हूँ- नहीं जी, तुम्हारा ही हूँ. ऐसा-ऐसा हो जाता है. बीवी भोजपुरी एक्टर आम्रपाली दुबे की फैन है. बोलती है- गाने में खेसारी और फाइट में पवन. मेरा भी मन करता है बीवी को बॉलीवुड की दुनिया दिखाऊँ.''

भोजपुरी फ़िल्म अभिनेत्री आम्रपाली दुबे और चुलबुल पांडे
भोजपुरी फ़िल्म अभिनेत्री आम्रपाली दुबे और चुलबुल पांडे
स्नेह कहते हैं, ''घर वालों को पता है कि ये मीडिया में है. इसको कभी भी एयरपोर्ट जाना है. जैसे खाना लगा हो तो कई बार खाने को भी छोड़कर भागना पड़ता है. एक-एक मिनट की भी अहमियत है. मैं एक मिनट लेट पहुँचा और सेलेब्रिटी चला गया तो मेरा दिन खराब हो जाता है.''
पैपराज़ी के काम में परिवार बेहद ख़ास हैं. इसका एक अंदाज़ा आप इस फ़ील्ड में काम करने वाले लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या देखकर लगा सकते हैं.
चुलबुल कहते हैं:
''पहले लड़कियां थीं. फिर लॉकडाउन आ गया. लौटा तो देखा कि जो लड़कियां थीं उनकी शादी हो गई. शादी करके अपना घर बसा लिया. असल में वो लड़कियां हैं न. ससुराल वालों ने बोल दिया कि नहीं तुमको वो काम नहीं करना है. फिर वो कैसे करेंगी. हम तो लड़के हैं. हमारा तो चलता है. लड़कियों को भी ये काम करना चाहिए. कोई ग़लत काम थोड़ी है.''

जलवा

पैपराज़ी सितारों के पीछे भागते हैं. मगर इनका जलवा कई बार किसी सितारे से कम नहीं होता.
मुंबई का एक बड़ा रेड कार्पेट इवेंट. कई पैपराज़ी प्लेटफॉर्म्स के फ़ोटोग्राफर्स बुलाए गए और कुछ मीडिया संस्थानों के विजुअल जर्नलिस्ट भी.
तय जगह से आगे बढ़ने पर बॉडीगार्ड आकर पैपराज़ी को पीछे होने को बोलते हैं. मगर कुछ पैपराज़ी अपनी जगह पर बैग के साथ जमे रहते हैं. थोड़ी बहस होती है.
तब तक पैपराज़ी पीआर का नाम लेकर बुलाते हैं और कहते हैं- ऐ समझा न इसको, कौन लोग हैं हम.. ज़्यासती बोल रेला है ये.

सुहाना ख़ान एक इवेंट के दौरान.
सुहाना ख़ान एक इवेंट के दौरान.
बॉडीगार्ड पीआर के सामने हल्के-से कुछ बोलते हैं तो पैपराज़ी फ़ौरन कहते हैं- अब क्या तमीज़ से बात कर रहा है, वैसे कर न जैसे पहले बोल रहा था.
पैपराज़ी जब किसी इवेंट पर होते हैं या सेलेब्रिटी के इंतज़ार में होते हैं तब एक-दूसरे की टांग खींच रहे होते हैं. हँसी-मज़ाक चलता है. कुछ ऐसे इवेंट्स या टिप ऑफ भी होते हैं, जिनमें स्नेह ज़ाला जैसे पैपराज़ी तो बुलाए जाते हैं मगर चुलबुल पांडे जैसे नए पैपराज़ी को घुसने के लिए संघर्ष करना होता है.
कोई एक्टर जैसे ही कैमरों या फ़ोन की रेंज में आता है- पैपराज़ी नाम लेकर कुछ एक जैसी लाइनें कहना शुरू करते हैं.
जैसे:- लव यू शाहिद भाई, टू योर राइट, फ्रंट टू बैक. फ़र्स्ट प्वॉइंट टू सेकेंड प्वॉइंट. इन सारे शब्दों को सुनकर कैमरे के सामने क्या करना है, एक्टर्स जानते हैं.

अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा
अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा
कई बार पैपराज़ी एक्टर्स से बात करने की भी कोशिश करते हैं और कई बार नज़रों के सामने आए किसी गुमनाम होते कलाकार को कॉन्फिडेंस भी देते हैं- मैं जानता हूँ आपको.
इन इवेंट्स में पैपराज़ी के लिए रास्ते बनाए जाते हैं. एंट्री से लेकर बाहर निकलने तक. पैपराज़ी का काम करने वालों में बड़ी तादाद यूपी और बिहार के लोगों की है. ऐसे में कई बार जब मनोज तिवारी, रवि किशन, खेसारी लाल दिखते हैं तो जितना ख़ुशी भरा शोर पैपराज़ी के बीच से उठता है, उतना किसी दूसरे बड़े एक्टर के आने पर भी नहीं होता.
कई बार किसी रेड कार्पेट इवेंट में पैपराज़ी चमक खो रहे सितारों से मज़ाक करने से भी नहीं चूकते. हरमन बावेजा कई बार जब पैपराज़ी के सामने से अलग-अलग एक्टर्स के साथ फ़ोटो खिंचवाने रुके तो कुछ पैपराज़ी बोल पड़े- हरमन सर, आज कितनी बोगी में चढ़ लिए हो आप? हरमन हँसकर बोलते हैं- अब तक चार, अब नहीं दिखूँगा."

फ़िल्म 'किसी का भाई, किसी की जान' के ट्रेलर लॉन्च के दौरान सलमान ख़ान और दूसरे सितारे पोज़ देते हुए.
फ़िल्म 'किसी का भाई, किसी की जान' के ट्रेलर लॉन्च के दौरान सलमान ख़ान और दूसरे सितारे पोज़ देते हुए.
ये पैपराज़ी के कमेंट्स ही हैं, जो अकसर चर्चा में रहते हैं. इसीलिए मुंबई के एक इवेंट में जब सुनील ग्रोवर आए तो बोले-आजकल आपके कमेंट्स बहुत पॉपुलर हो रहे हैं.
पैपराज़ी जब खाली खड़े होते हैं तब सितारों के कपड़े या जूतों के बारे में बात करते हैं. कई बार तारीफ़ें करते हैं तो कई बार ''लो बजट'' तक बोल देते हैं.
पैपराज़ी ज़्यादातर मौक़ों पर ऐसी बातें बोलने की कोशिश करते हैं, जिससे एक्टर सहज हो जाए और खुलकर तस्वीरें दे. ज़ाहिर है कि ये बातें तारीफ़ों से भरी होती हैं.


धंधा

पैपराज़ी की दुनिया को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है.
1. पैपराज़ी को टॉप ग्रेड सितारों जैसे अमिताभ, शाहरुख़, सलमान, दीपिका, आलिया की ज़रूरत होती है. इन सितारों में पब्लिक की काफ़ी दिलचस्पी होती है और लाइक्स, कमेंट्स, शेयर काफ़ी आते हैं.
2. किसी इनवाइट या टिपऑफ के ज़रिए पैपराज़ी को किसी रेड कार्पेट इवेंट या किसी जिम, रेस्त्रां के बाहर बुलाया जाता है. तस्वीरें खींची जाती हैं. सब प्रकट तौर पर फिक्स दिखता है.
3. पैपराज़ी को पैसे देकर बुलाया जाता है ताकि ज़्यादा दिखने और लोकप्रियता की ख़्वाहिश रखने वाले सितारों की फ़ोटो खींची जा सके. फिर पैपराज़ी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर आपकी सोशल मीडिया फ़ीड और ख़बरों में बना रहा जा सके.
हमने मुंबई में ऐसे कई पैपराज़ी ग्रुप्स देखे, जिसमें किसी लाखों फॉलोअर वाले पैपराज़ी प्लेटफॉर्म पर किसी तस्वीर को अपलोड करने के लिए पैसे दिए गए थे.
एक पोस्ट की कीमत 4000 रुपये से 25 हज़ार रुपये तक होती है.

सुहाना ख़ान
सुहाना ख़ान
कई बार ऐसा भी होता है कि किसी इवेंट में कोई बड़ा सितारा आता है मगर इवेंट जिस प्रोडक्ट का है, उसकी ओर से पैपराज़ी को कोई भुगतान नहीं हुआ है. ऐसी हालत में पैपराज़ी प्लेटफॉर्म सितारे को वीडियो, तस्वीर में रखते हैं मगर बैकग्राउंड में दिख रहे प्रोडक्ट को ब्लर कर देते हैं.
मुंबई में शाहरुख़ ख़ान की बेटी सुहाना ऐसे ही एक इवेंट में नज़र आईं. मगर जब उनकी तस्वीरें पैपराज़ी प्लेटफॉर्म पर दिखीं तो प्रोडक्ट ब्लर था.
चुलबुल बताते हैं, ''कहीं कहीं पीआर पैसे देते हैं. कहीं कहीं नहीं मिलते हैं. पैसा देकर फ़ोटो नहीं खिंचवाते हैं. बस हम लोग इतनी दूर से आते हैं तो उसी के लिए देते हैं. बॉस 10 हज़ार रुपये देते हैं. घर छह-सात हज़ार रुपये भेज पाता हूं.''
स्नेह कहते हैं, ''कमाई हो जाती है. यू-ट्यूब से पैसा आ जाता है. इंस्टाग्राम के ज़रिए शूट मिल जाते हैं. मेरा सपना यही है कि डिजिटली मज़बूत होना है.''

मानव मंगलानी
मानव मंगलानी
मानव मंगलानी ने कहा, ''मैगजीन, पेपर, मीडिया चैनल, ये लोग हमसे कंटेंट लेते हैं और पैसे देते हैं. अभी ज़्यादातर ऐप्स पर कंटेंट डालने के पैसे मिलते हैं. जितना ज़्यादा कंटेंट डालेंगे, उतना पैसा मिलेगा.''
मानव बोले, ''बहुत सारे प्रोडक्शन हाउस अपने प्रमोशन के लिए हमें कंटेंट और पैसे देते हैं. फ़िल्म प्रमोट करने का अलग पैकेज होता है और सेलेब्रिटी प्रमोट करने का अलग. जिम या कहीं से आते-जाते अपनी तस्वीरें खिंचवाने के लिए कुछ सितारे पैसे भी देते हैं. पर इसमें टॉप के सितारे शामिल नहीं हैं. जो चाहते हैं दिखना, वो पैसे देते हैं. ताकि डायरेक्टर, कास्टिंग डायरेक्टर को ये सितारे भी दिख सकें कि ये भी बंदा है जो अच्छा दिखता है, इसको कितनी इंगेजमेंट मिल रही है. ये तक देखा जाता है.''

पैपराज़ी की भेजी तस्वीरें, वीडियो एडिट करते हुए एक वीडियो एडिटर, जगह- नसीम का दफ़्तर.
पैपराज़ी की भेजी तस्वीरें, वीडियो एडिट करते हुए एक वीडियो एडिटर, जगह- नसीम का दफ़्तर.
पीआर का रोल
पैपराज़ी को बुलाने में पीआर की भूमिका अहम होती है. ये पीआर होते हैं जो किसी इवेंट या ''अचानक'' किसी जगह पर दिखे एक्टर्स से पहले ही पैपराज़ी को बुला लेते हैं.
हमने पैपराज़ी के ऐसे कई ग्रुप्स देखे, जिसमें भेजे गए मैसेज में फ्लाइट नंबर, गूगल लोकेशन तक लिखी होती है.
एक पैपराज़ी ने बताया, ''जो पीआर होते हैं वो बताते हैं कि कहाँ आना है. मैसेज में सब लिखा रहता है.''
स्नेह बोले, ''मेरे साथ कई और लोग हैं. हम लोग पेट्रोलिंग करते हैं. राउंड लगाते रहते हैं. अभी इतने साल से काम कर रहे हैं तो हमारे भी थोड़े सोर्स बन जाते हैं. पर 80 फ़ीसदी चीज़ें हमें खोजकर ही निकालनी पड़ती है. ज़्यादातर मौक़ों पर हम खोजते ही हैं. कभी-कभार मैनेजर या पीआर से पूछ लेते हैं कि जहाँ तुम्हारा आर्टिस्ट है. कोई संभावना है फ़ोटो लेने की. कभी एक्टर मूड में है तो वो चीज़ें हो जाती हैं. हम कभी-कभार मैनेजर्स की मदद ले लेते हैं.''

फ़िल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा
फ़िल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा
फ़िल्म क्रिटिक और फ़िल्मी सितारों के बीच अपनी अच्छी पकड़ रखने वालीं जर्नलिस्ट अनुपमा चोपड़ा कहती हैं, ''सभी मामलों में नहीं, पर ज़्यादातर पीआर पैपराज़ी को बुलाते हैं. ये एक बिज़नेस है. जहां आप ज़्यादा दिखने के लिए पैसे दे सकते हैं.''
अनुपमा ने कहा, ''जैसे एयरपोर्ट लुक एक नई चीज़ बन गई है. एक बार करण जौहर ने मज़ाक में कहा था कि मैं इतना तैयार होकर एयरपोर्ट गया और कोई मिला नहीं तो मुझे लगा कि आउटफिट बर्बाद हो गए.''
पैपराज़ी जिन एक्टर्स के लिए इतनी मेहनत करते हैं वो एक्टर पैपराज़ी के बारे में क्या सोचते हैं?
अदिति राव हैदरी बोलीं, ''मैं कभी नहीं बताती हूं कि मैं कहाँ हूं. अगर मना भी करूं तो ये लोग मान जाते हैं.''
इतरे सारे सितारे और मुट्ठी भर पैपराज़ी. फिर एक साथ अलग-अलग जगहों पर जाते पैपराज़ी को सितारे कैसे पकड़ते हैं?
पैपराज़ी प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट सप्लाई करने वाले नसीम कई सालों से मुंबई में हैं, वे मुंबई में पैपराज़ी कंटेंट की एजेंसी चलाते हैं.

नसीम
नसीम
नसीम कहते हैं, ''किसी भी लेवल का हो, आर्टिस्ट आर्टिस्ट होता है. सबकी पीआर मशीनरी, मैनेजर, सोशल मीडिया टीम होती है. इस टीम का काम होता है कि पैपराज़ी को बताना कि आर्टिस्ट कहां दिखेगा. वो ख़ुद बताते हैं. कोई कहता है कि ख़ुद से पता चल गया तो ऐसा नहीं होता है बॉस. किसी को अपनी फ़ोटो डलवानी है तो वो इंडस्ट्री के चुनिंदा फ़ोटोग्राफ़र्स की बात करेगा कि मानव मंगलानी, विरल भयानी के इंस्टाग्राम अकाउंट्स पर डलवा दो. वो मेरी बात नहीं करेगा क्योंकि मैं उस पिक्चर में हूँ ही नहीं.''
कोई एक्टर क्या किसी प्लेटफॉर्म पर अपनी फ़ोटो डलवाने के लिए पैसे देते हैं?
नसीम बताते हैं, ''ऐसा होता है. ऐसा हमेशा होता है. रोज़ होता है. हर आर्टिस्ट ऐसा करना चाहता है. मगर इस बिज़नेस की बड़ी बारीक-सी लाइन है जो दोनों तरफ़ से क्रॉस नहीं की जाती.''



प्राइवेसी

ऐसा नहीं है कि फ़िल्मी दुनिया के इस 'चिराग' में सिर्फ़ चमक ही है. कुछ अंधेरे भी हैं. जैसे- प्राइवेसी.
हाल ही में लिविंग रूम में बैठी आलिया भट्ट की तस्वीर किसी पैपराज़ी ने खींच ली थी. इस तस्वीर को साझा करने पर आलिया ने मुंबई पुलिस को टैग करते हुए पैपराज़ी के इस रवैये पर सख़्त आपत्ति ज़ाहिर की थी.
अनुष्का और विराट कोहली की बिटिया वामिका की तस्वीर लाइव हुई तो दोनों हस्तियों ने तस्वीर को और साझा ना करने की अपील की. वहीं करीना-सैफ़ के बेटे तैमूर पैपराज़ी कैमरों के फ़ोकस में रहे हैं.
बॉम्बे हाईकोर्ट में वकील रिज़वान सिद्दीक़ी कहते हैं, ''कई मां-बाप होते हैं वो नहीं चाहते कि बच्चा एक्सपोज़ हो जाए. मगर कुछ मां-बाप ऐसा चाहते हैं कि बच्चा दिखे. लेकिन अगर कोई बच्चा ओवर-एक्सपोज़ हो जाता है और वो ये बात अगर रिपोर्ट कर देता है तो मां-बाप को भी दिक़्क़त हो सकती है.''

वकील रिज़वान सिद्दिक़ी
वकील रिज़वान सिद्दिक़ी
कुछ फ़िल्मों के लुक पैपराज़ी जब तस्वीरों में कैद करते हैं तो एक्टर्स, फ़िल्म निर्माताओं की ओर से भी आपत्ति आती है. कुछ मौक़ों पर जया बच्चन, तापसी पन्नू समेत कई एक्टर्स पैपराज़ी पर गुस्सा होते भी दिखे हैं.
अनुपमा चोपड़ा कहती हैं, ''जब एक्टर रेड कार्पेट पर जाते हैं तो आप फ़ोटो के लिए तैयार हैं. लेकिन आप अगर किसी के लिविंग रूम में झांक रहे हैं तो आप बिना इजाज़त घुस रहे हैं. ये गलत है.''
पैपराज़ी के बीच मलाइका अरोड़ा अच्छी ख़ासी लोकप्रिय हैं. पैपराज़ी कैमरों के सामने मलाइका की चाल का मज़ाक उड़ाते कई मीम्स, रील्स सोशल मीडिया पर भी देखने को मिले हैं.

जिम से आते या जाते हुए मलाइका अरोड़ा की ऐसी कई तस्वीरें सोशल मीडिया और पैपराज़ी प्लेटफॉर्म्स पर अकसर शेयर होती रहती हैं.
जिम से आते या जाते हुए मलाइका अरोड़ा की ऐसी कई तस्वीरें सोशल मीडिया और पैपराज़ी प्लेटफॉर्म्स पर अकसर शेयर होती रहती हैं.
अनुपमा चोपड़ा ने कहा, ''ये ग़लत है. जब आप किसी सेलेब्रिटी के बैग को गोला लगाकर ये पूछ रहे हैं कि ये कितने का होगा. फिर आप किसी के शरीर के हिस्से को ज़ूम कर रहे हैं और उसे जिस तरह से पेश किया जाता है वो ग़लत है. रिश्ता अच्छा रखने में क्या नुकसान है?''
पश्चिमी देशों में पैपराज़ी के सीमा लांघने पर केस होते हैं मगर भारत में ये सब देखने को नहीं मिलता है. इसकी क्या वजहें हो सकती हैं?
अनुपमा चोपड़ा बोलीं, ''यहाँ लीगल में जाना एक और पहाड़ चढ़ना है. तो शायद एक्टर्स सोचते हैं कि कौन शुरू करे.''
वकील रिज़वान सिद्दीक़ी कहते हैं, ''किसी को लगता है कि एक एंगल से किसी सेलेब्रिटी की चुपके से फ़ोटो निकाल लूँ जब वो अपने प्राइवेट मूमेंट में हों, तो ऐसे में स्टॉकिंग का केस हो जाता है. ये अपराध है. अगर कोई ऐसा करते हुए पकड़ा जाता है तो उन्हें सज़ा भी हो सकती है. पश्चिमी देशों की तुलना में हमारा सिस्टम कुछ धीमा है. फ़ैसला आते-आते कई साल निकल जाते हैं.''

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
सिद्दीक़ी बोले, ''इंडिया के सुपरस्टार अकसर अपने-आप को सरेंडर कर देते हैं क्योंकि वो इन लोगों की नज़रों में ख़राब नहीं होना चाहते. क्योंकि इससे इनकी फ़िल्म पर असर पड़ता है. सेलेब्रिटी होना ऐसी चीज़ है कि आपको दिखना भी है और बिकना भी है.''
जो लोग पैपराज़ी का काम करते हैं, क्या उनके मन में भी क़ानून का कोई डर रहता है?
मानव मंगलानी कहते हैं, ''केस होना तो मुश्किल ही है. हाँ, कोई बहुत ज़्यादा ही प्राइवेट मूमेंट पकड़ ले तो बात अलग है. आलिया भट्ट वाला मूमेंट बस हो गया, प्लान नहीं किया गया था. बहुत बार प्राइवेसी लोगों ने तोड़ी है. ये सब नहीं होना चाहिए.''
स्नेह ज़ाला ने कहा, ''मैंने तो यही सीखा है कि कुछ भी करो, प्राइवेट प्रॉपर्टी में घुसकर मस्ती मत करो. आर्टिस्ट देना चाहता है तो फ़ोटो लो. नहीं देना चाहता तो मत लो.''
जया बच्चन अकसर पैपराज़ी पर ग़ुस्सा और पैपराज़ी प्लेटफॉर्म के नाम पर भी हैरत में दिखी थीं.
अदिति राव हैदरी कहती हैं, ''मैं उम्मीद करती हूं कि ये बाउंड्री बनी रहे. क्योंकि जब कभी ये सीमा पार हो जाती है, तब ये अच्छा नहीं है. ये बहुत आसान है कि पैपराज़ी ग़लत रास्ते पर चले जाएँ. उम्मीद है कि ऐसा हमारे साथ न हो. क्योंकि हमने दुनिया में देखा है कि ऐसा होता आया है.''


अतीत और भविष्य

पैपराज़ी के किए काम की उम्र कम होती है. मगर इसमें जो रिश्ते बनते हैं वो कई बार इतने मज़बूत होते हैं कि दशकों तक चलते हैं.
प्रदीप बांदेकर 1977 से फ़िल्मी दुनिया में फ़ोटोग्राफ़ी कर रहे हैं. अब उम्र बढ़ी है तो तस्वीरें लेना कम हो गया है. मगर यादें इतनी हैं कि प्रदीप जब कुछ बताते हैं तो पुराने दौर की तस्वीरें दिखने लगती हैं.
प्रदीप से अगर पूछें कि आपने किन-किन सितारों की तस्वीरें खींची हैं तो वो कहते हैं- अरे किसकी नहीं खींची है, ये पूछो. हीरोइनों का तो मैं दीवाना था. इतनी हीरोइनों की मैंने फ़ोटो ली. ख़ूबसूरत हीरोइनें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं.''
आज पैपराज़ी का जो रूप है, प्रदीप उसे पहले के मुकाबले अलग मानते हैं.
प्रदीप कहते हैं, ''पहले एक्टर दिखते ही नहीं थे. दिलीप साब, राजकुमार, राजेंद्र कुमार की किसी इवेंट की तस्वीरें आपको देखने को मिलेंगी ही नहीं. अभी जैसे आर्टिस्ट आसानी से मिल जाते हैं, ऐसा तब नहीं था. पहले आर्टिस्ट का इतना रुतबा था कि बात करने की हिम्मत नहीं होती थी. आप किसी आर्टिस्ट का सीधा फ़ोटो नहीं ले सकते थे. सेट पर आने की इजाज़त नहीं होती थी.''

सलमान ख़ान और प्रदीप बांदेकर
सलमान ख़ान और प्रदीप बांदेकर
प्रदीप ने कहा, ''पहले लोग कोर्स करके फोटोग्राफ़ी करते थे. अब जिसकी जेब में फ़ोन, वो फ़ोटोग्राफर. किसी भी एंगल से खींचकर गंदे फ़ोटो निकालते हैं. आप इनसे मोबाइल ले लो, ये लोग फ़ोटोग्राफ़ी नहीं कर पाएंगे.''
पहले छिपकर ली गई तस्वीरों की कितनी दिलचस्पी होती थी, इसका अंदाज़ा प्रदीप के बताए एक क़िस्से में मिलता है.
प्रदीप बोले, ''उस ज़माने में किसी हीरो हीरोइन का चक्कर बड़े ज़ोरों से चल रहा था. मुझे मायापुरी वालों ने बोला कि तू कैसा फ़ोटोग्राफ़र है? तू इन दोनों की तस्वीर ला दे तो हम तेरे को मान जाएं. मगर जिस हीरो की तस्वीर लेनी थी, उसका हाथ बहुत तगड़ा था, मारने में. फिर एक बार जब वो चुपके से बैठे थे, मैं गया और दो फ्लैश मारी और वहाँ से भाग गया.''
पुराने दौर के फ़ोटोग्राफ़र्स में एक नाम बीके तांबे का भी है. कहा जाता है कि हाल के वक़्त तक तांबे बच्चन परिवार के साथ सीधे संपर्क में रहे और कई फ़िल्मी सितारे तांबे को ख़ूब मान, सम्मान देते रहे.

प्रदीप बांदेकर
प्रदीप बांदेकर
उस दौर के बारे में प्रदीप कहते हैं, ''पहले जब हम सेट पर जाते थे तो आर्टिस्ट पर झपट नहीं पड़ते थे. पहले नमस्ते वगैरह करके, वक़्त देकर सहज करना होता था. फिर पूछते थे कि फोटो हो सकती है क्या?''
कुछ दिन पहले मिली धमकी के बाद सलमान ख़ान की सिक्योरिटी बढ़ाई गई है. हाल ही में जब सलमान किसी इवेंट में गए और प्रदीप को देखा तो गले मिले.
एक बड़े सितारे का एक फ़ोटोग्राफ़र से ये ऐसा रिश्ता है, जिसको देखकर ही शायद स्नेह ज़ाला और चुलबुल पांडे जैसे नए पैपराज़ी की आंखों में उम्मीदें भर जाती हैं.
स्नेह ज़ाला बोले, ''पैसा हर किसी की ज़रूरत है. मगर मुझे हर दिन लगता है कि ये दिन मेरे लिए नया है. मैं ख़ुश हूं क्योंकि कभी लगता नहीं कि मैं काम पर जा रहा हूं.'
''जय शिव काशी में, ख़ूब मज़ा बदमाशी में...'' ये लाइन अकसर इस्तेमाल कर चुलबुल कहते हैं, ''ये बॉलीवुड है. अब आपको क्या बताएं कि इसकी दुनिया बहुत छोटी है पर इसमें बहुत से लोग हैं. इसको समझना पड़ता है. मैं भी बहुत समझा. मगर अभी भी समझ रहा हूं. ज़िंदगी है, अभी तो आगे और समझाएगी.''
प्रदीप बोले, ''फ़िल्म इंडस्ट्री में यहां कोई मज़हब, झगड़ा नहीं. यहां दो ही मज़हब हैं- हिट और फ्लॉप.''

मुंबई
मुंबई
कभी बाइक से चेज़ करना. कभी ऑटो से रेड कार्पेट के किनारे तक पहुँचना. पैपराज़ी का हर दिन फ़ोटो क्लिक के साथ गुज़रता जाता है. इन क्लिक्स में सितारों के नाम तो सुनाई देते हैं. मगर पैपराज़ी के नाम और चेहरे कैमरे के पीछे ही रह जाते हैं.
मुंबई में समंदर के किसी भी छोर पर लहरें आती हैं और किनारे से मिलकर लौट जाती हैं. पैपराज़ी और एक्टर्स का रिश्ता भी कुछ इस जैसा ही है. दोनों को मालूम है कि एक-दूसरे से कहां मिलना है लेकिन ये मिलन उतना ही क्षणिक है, जितना लहरों का किसी किनारे से मिलना.



रिपोर्टर: विकास त्रिवेदी
फ़ोटो, वीडियो जर्नलिस्ट: देबलिन रॉय
तस्वीरें: गेटी इमेजेस