प्यार सरहद पार: नेपाल और भारत में शादियों पर क्यों लग रहा है ग्रहण
सरहद पर बढ़ती चौकसी, नेपाल का नया नागरिकता क़ानून और कई तरह के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन क्या भारत-नेपाल के बीच वैवाहिक संबंध ख़त्म कर देंगे?

नेपाल और भारत के बीच सरहद जितनी कमज़ोर रही है, सरहद के दोनों ओर रहने वाले लोगों के रिश्ते उतने ही मज़बूत रहे हैं. लेकिन रिश्तों की ज़मीन अब कमज़ोर हो रही है.
इनकी वजहों की तलाश में मैंने नेपाल और बिहार की सीमाओं पर लगे इलाक़ों का दौरा किया.
भारत और नेपाल के बीच रिश्तों की गर्माहट के केंद्र रहे बीरगंज और रक्सौल की दूरी अब बढ़ रही है.

कहा जा रहा है कि संबंध बीरगंज और रक्सौल के बदले दिल्ली और काठमांडू में शिफ़्ट हो गया है.
काम कर वापस जा रहे मज़दूरों की साइकिल में टंगे खाद के बोरे से बने थैले की जाँच सरहद पर सख़्ती से की जा रही है.
सब्ज़ियों के थैले में सुरक्षा बल अफ़ीम खोज रहे हैं. साइकिल पर सवार दोनों तरफ़ के मज़दूर अपने ही इलाक़े में अनजान से लगने लगे हैं.
लेकिन इन सबके बावजूद प्रेम पनप ही जाता है. पाबंदियों से अरेंज मैरेज पर गहरा असर पड़ा है. लेकिन प्रेम विवाह तो पाबंदियों के ही ख़िलाफ़ होते हैं.
नेपाल और भारत के बीच रोटी-बेटी का संबंध जितना आम है, उतना ही ख़ास.
ग्वालियर राजघराने के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया की पत्नी लेखा दिव्येश्वरी यानी विजयाराजे सिंधिया हों या जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के बेटे कर्ण सिंह की पत्नी यशोराज्य लक्ष्मी या फिर माधवराव सिंधिया की पत्नी.
सबका नेपाल कनेक्शन है. नेपाल और भारत के बीच दिलों का रिश्ता भगवान से लेकर राजा-महाराजा और फिर मज़दूर-किसान तक जाता है.

मधुबनी की सीता देवी यादव 15 वर्ष की थीं, तभी उनके पिता ने नेपाल के सिरहा में शादी कर दी थी. तब सीता यादव 11वीं क्लास में पढ़ रही थीं.
सीता यादव के पति चंद्रकांत यादव नेपाली कांग्रेस के नेता थे. उनकी साल 2000 में हत्या हो गई थी.
सीता यादव अभी 66 साल की हैं और नेपाल के सिरहा में ही रहती हैं.
पति की हत्या के बाद सीता यादव ख़ुद नेपाल की राजनीति में आईं और सांसद बनने से लेकर नेपाल की मंत्री तक बनीं. वह नेपाली कांग्रेस में भी बड़ी नेता के रूप में जानी गईं.
सीता यादव से पूछा कि उनकी शादी नेपाल में करने का फ़ैसला क्यों किया गया था?

सीता यादव कहती हैं, "पहले भारत और नेपाल अलग हैं, इस तरह की फ़ीलिंग नहीं थी. मेरे मायके से ससुराल की दूरी महज़ छह किलोमीटर है. मेरे पिता को घर और लड़का पसंद आया, तो उन्होंने शादी का फ़ैसला किया था. पहले लड़कियों से पूछा भी कहाँ जाता था कि शादी किससे करनी है और कहाँ करनी है."
सीता यादव कहती हैं, ''अब भारत और नेपाल में वो बात नहीं है. अब भारत के लोग अपनी बेटी की शादी नेपाल में नहीं करना चाहते हैं. नागरिकता को लेकर परेशान किया जाता है. बारात आती है तो सरहद पर रोक-टोक की जाती है. यहाँ शादी के सात साल बाद नागरिकता देने का प्रावधान लाया जा रहा है. मान लीजिए इन सात साल से पहले ही दुर्भाग्यवश उस लड़की के पति की मौत हो गई और वह माँ भी बन गई, तब वह क्या करेगी?''
नेपाल में भारत से ब्याह कर जा रहीं लड़कियों को अब तक अंगीकृत नागरिकता मिल जाती थी. लेकिन वंशज नागरिकता की तुलना में कई अधिकार कम होते हैं. नेपाल के नए नागरिकता बिल के सेक्शन 5 (1) के अनुसार, कोई विदेशी महिला नेपाली पुरुष से शादी करेगी तो उसे नेपाल में लगातार सात साल रहने के बाद ही नागरिकता मिलेगी. सात साल की अवधि को 'कूलिंग पीरियड' कहा जा रहा है. हालाँकि, यह बिल अभी पास नहीं हुआ है.

नेपाल का कहना है कि भारत में भी नेपाली लड़कियों को सात साल के कूलिंग पीरियड के बाद ही नागरिकता मिलती है. हालाँकि, भारत में नेपाली लड़कियाँ शादी करके आती हैं तो वैवाहिक संबंध के आधार पर मतदाता सूची में उनका नाम शामिल कर लिया जाता है और आधार कार्ड भी बन जाता है. आधार कार्ड से ही भारत में कई बुनियादी काम हो जाते हैं.
सीता यादव कहती हैं कि अगर कूलिंग पीरियड वाला बिल पास हो गया तो इससे भारतीय लड़कियों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.
वह कहती हैं, "नेपाल में कुछ भी करने के लिए नागरिकता चाहिए. भारत की तरह नहीं है कि आधार कार्ड से ही सारा काम चल जाएगा. मैं नेपाल की राजनीति में एक मुक़ाम तक पहुँची लेकिन नागरिकता क़ानून की वजह से ही किसी प्रांत की मुख्यमंत्री नहीं बन सकती. राष्ट्रपति नहीं बन सकती. प्रधानमंत्री नहीं बन सकती. कई बार लगता है कि दोयम दर्जे की नागरिकता मिली हुई है."

सीता यादव कहती हैं, "मेरे मायके यानी भारत के कई लोगों को लगता है कि मेरे साथ भेदभाव हुआ है. लेकिन मैं उन लोगों से एक बात कहना चााहती हूँ. अगर भारत में भी सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने दिया जाता, तो नेपाल में इसका सकारात्मक असर होता. इस बात को नेपाल की संसद में भी पहाड़ी नेता तंज़ के तौर पर कहते हैं.''
''भारत में जिन लोगों ने सोनिया गांधी को पीएम नहीं बनने दिया, वही चाहते हैं कि मैं नेपाल की पीएम बन जाती. सोनिया गांधी को हंगामा करके रोका गया था. नेपाल में सारे लोग इसे देख रहे थे. इसका सीधा असर नेपाल पर पड़ा था. लोग मिसाल देने लगे थे कि नेपाल में भारत की लड़कियाँ यहाँ तक पहुँच गईं, लेकिन भारत ब्याह करके गईं नेपाल की लड़कियाँ कहाँ तक पहुँचीं?"

नेपाल के तराई क्षेत्र में शायद ही ऐसा कोई घर होगा, जहाँ भारत में शादी नहीं हुई होगी.
नेपाल से लगे भारत के सीमाई शहरों के हर घर की ख़ुशी हो या मातम, नेपाल के किसी न किसी घर में ज़रूर महसूस किए जाते हैं.
बीरगंज को नेपाल का मुंबई कहा जाता है. बीरगंज के ड्राई पोर्ट्स से ही नेपाल की 65 फ़ीसदी से ज़्यादा आर्थिक गतिविधियाँ होती हैं.
बीरगंज अगर बाधित होता है, तो पूरा नेपाल ठहर सा जाता है. बीरगंज नेपाल का दक्षिणी सीमाई शहर है.
यह बिहार के रक्सौल से लगा है. बीरगंज और रक्सौल के बीच महज़ एक गेट का फ़र्क है.
दोनों देशों के बीच की आवाजाही पर इसी गेट से नेपाल के सुरक्षाबल और कस्टम अधिकारी नज़र रखते हैं.
शाम के सात बजे हैं. बिहार के मोतिहारी से बारात का एक काफ़िला इसी गेट पर रुका है.
सबसे आगे दूल्हे की गाड़ी और पीछे बारातियों की बस.
24 साल के दूल्हा दीपक गाड़ी में बैठे हैं और उनके पिता राजू प्रसाद नेपाल कस्टम विभाग में काग़ज़ी काम पूरा करा रहे हैं.
पूरी बारात गेट पर आधे घंटे से रुकी है. बारात नेपाल के बारा ज़िले के बरिआरपुर जा रही है.
राजू प्रसाद इस बात से थोड़ा नाराज़ दिख रहे हैं कि सीमा पर अब कुछ ज़्यादा ही ब्यूरोक्रेसी बढ़ गई है.




वे कहते हैं, "अब चीज़ें ज़्यादा जटिल हो रही हैं. हम नेपाल जाने के लिए जितना कुछ कर रहे हैं, उतना नेपालियों को भारत जाने के लिए नहीं करना पड़ता है. दोनों सरकारों के लिए भले भारत और नेपाल अलग देश हैं, लेकिन सरहद पर रहने वाले लोग दोनों देशों की सरकारों की तरह नहीं सोचते हैं."
दूल्हे दीपक से पूछा कि क्या उन्हें ऐसा लग रहा है कि वह विदेश में शादी करने जा रहे हैं?
दीपक कहते हैं, "विदेश कहाँ लगता है? अपना ही है. मेरे घर में पहले भी कई शादियाँ नेपाल में हुई हैं. मेरे चाचाओं की शादी भी नेपाल में ही हुई है. अरे इंडिया-नेपाल एक ही है. सब भोजपुरी और हिन्दी बोलते हैं."
सरहद पर बढ़ती चौकसी

नीरज पटेल नेपाल में बीरगंज से एक किलोमीटर दूर मौजे सिरसिया गाँव के रहने वाले हैं.
उनकी भांजी निर्मला पटेल की बारात बिहार के रक्सौल से आने वाली है.
नीरज शादी की तैयारी में ज़ोर-शोर से जुटे हैं. इसके लिए वह हर छोटे-बड़े सामान की ख़रीदारी कर रहे हैं.
नीरज की कोशिश है कि सामान उचित क़ीमत पर मिल जाए ताकि ज़्यादा क़र्ज़ नहीं लेना पड़े. इसलिए वह सामान भारत से लाने की कोशिश कर रहे हैं.

नीरज रक्सौल से चावल और दूसरे ज़रूरी सामान लाने गए थे लेकिन नेपाल के कस्टम अधिकारियों ने रोक दिया और उसे नियम के तहत ले जाने के लिए कहा.
नियम के तहत लाने का मतलब है कि कस्टम ड्यूटी की रक़म देनी होगी. नीरज अगर ऐसा करते हैं, तो टैक्स के बाद सामान की क़ीमत उतनी ही हो जाएगी, जितनी क़ीमत पर नेपाल में सामान मिलते हैं.
नीरज कहते हैं कि अगर वह सामान भारत से नहीं लाएंगे, तो पूरी शादी में कम से कम डेढ़ लाख रुपए का नुक़सान होगा.
वह कहते हैं, "भारत में ही हमारा सारा संबंध है. हमलोग तो आवाजाही करते रहते हैं. हम कोई तस्करी करने वाले तो हैं नहीं. नेपाल के सुरक्षाकर्मियों से अनुरोध किया कि घर में शादी है, सामान आने दीजिए लेकिन नहीं आने दिया जा रहा है. हम शादी के कार्ड भी दिखा रहे हैं. लेकिन कस्टम अधिकारी कह रहे हैं कि वह अनुमति नहीं दे सकते हैं. हमलोग शादी का ये कार्ड तस्करी के लिए तो नहीं बनाए हैं. हमलोग ठहरे ग़रीब. एक-एक पैसा जोड़कर शादी के लिए जुटाते हैं."
नीरज ने ये भी कहा कि अब इसलिए लोग भारत में शादी करने से परहेज़ करने लगे हैं, क्योंकि कई तरह की दिक़्क़तें होती हैं.
नेपाल के कस्टम अधिकारियों से पूछा, तो उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ भारत से ही लाने के लिए छूट दे दी जाए, तो नेपाल कैसे चलेगा?
उन्होंने कहा कि यहाँ की अर्थव्यवस्था टैक्स और रेमिटेंस से चलती है, इसलिए कई चीज़ें न चाहते हुए भी करनी पड़ती हैं.
नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है. तीन तरफ़ से भारत से घिरा है और उत्तर में तिब्बत यानी चीन से.
चीन के साथ सीमा लगने के बावजूद संपर्क आसान नहीं हैं, क्योंकि ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और गहरी खाइयाँ हैं. इसलिए नेपाल की निर्भरता भारत पर ज़्यादा है.
नेपाल अपने कुल कारोबार का 65 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा भारत से करता है.
नेपाल और भारत के बीच क़रीब 1800 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. इनमें 1250 किलोमीटर ज़मीन से जुड़ी सीमा है.
घटती शादियों की संख्या

नेपाल में भारत से हर साल कितनी शादियाँ हो रही हैं, इसका डेटा इकट्ठा करने की कोई एक व्यवस्था नहीं है.
लेकिन शादियों के आधार पर नेपाल में जिन्हें अंगीकृत नागरिकता मिलती है, उनसे एक तस्वीर समझी जा सकती है.
भावेश झा नेपाल के सिरहा ज़िला कार्यालय में सेक्शन ऑफ़िसर हैं.
वह वैवाहिक संबंध के आधार पर अंगीकृत नागरिकता जारी करते हैं.
भावेश झा का कहना है कि साल 2017 से नेपाल के सभी ज़िला कार्यालयों के आँकड़ों को कंप्यूटराइज किया गया.
इसलिए 2017 के बाद के आँकड़े आसानी से मिल जाते हैं. वैवाहिक संबंध के आधार पर नेपाल के सिरहा ज़िले में अप्रैल 2017 से अबतक 3913 भारतीय लड़कियों को शादी के आधार पर अंगीकृत नागरिकता मिली.
भावेश झा कहते हैं कि पिछले छह सालों के आँकड़ों को देखें, तो ऐसा लगता है कि शादियाँ स्थिर हैं, जो कि बढ़नी चाहिए थीं.
भावेश कहते हैं कि देखने में ये भले ही स्थिर लग रही हैं, लेकिन सच यह है कि विवाह अब तेज़ी से कम हो रहे हैं.
भावेश झा कहते हैं, "नेपाल के सिरहा हो या बीरगंज या फिर बाक़ी के मैथिली और भोजपुरी इलाक़े, यहाँ जिस गति से आबादी बढ़ी है, उसकी तुलना में शादियां भारत से कम हुई हैं. इन इलाक़ों में युवाओं की आबादी बाक़ी उम्र वर्ग की तुलना में सबसे ज़्यादा है, ऐसे में शादियां साल दर साल बढ़नी चाहिए थीं. अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 का आँकड़ा इसलिए बढ़ा हुआ लग रहा है क्योंकि कोविड के कारण 2020 में लॉकडाउन लग गया था और शादियां बहुत कम हुई थीं."
उन्होंने बताया, "इन आँकड़ों के आधार पर हम ये भी नहीं कह सकते कि इस साल इतनी शादियां हुईं. जैसे सिरहा में अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 तक वैवाहिक संबंध के आधार पर 960 लोगों को नागरिकता मिली, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि जिन्हें नागरिकता मिली, उनकी शादी इसी अवधि में हुई हो. संभव है कि उनकी शादी पाँच साल पहले हुई थी और नागरिकता इतने दिनों बाद मिली."
इसी तरह से धनुषा ज़िले में पिछले पाँच वर्षों में वैवाहिक संबंध के आधार पर मिली अंगीकृत नागरिकता के आँकड़े को देखें, तो पता चलता है कि इसमें स्पष्ट गिरावट आई है.
विजयकांत कर्ण डेनमार्क में नेपाल के राजदूत रहे हैं.
वे काठमांडू में 'सेंटर फ़ॉर सोशल इन्क्लूजन एंडफ़ेडरलिज़म' (सीईआईएसएफ़) नाम से एक थिंकटैंक चलाते हैं.
सीईआईएसएफ़ ने पिछले साल भारत और नेपाल के बीच क्रॉस बॉर्डर रिलेशन पर एक शोध पत्र प्रकाशित किया था.
इस शोध में उन्होंने सरहद पार होने वाली शादियों का भी एक चैप्टर रखा था.
सीईआईएसएफ़ ने अपने शोध में पाया कि भारत और नेपाल के बीच होने वाली शादियाँ लगातार कम हो रही हैं.
विजयकांत कर्ण कहते हैं, ''शादियाँ कम हो रही हैं, इसे हम निजी तौर पर भी महसूस कर रहे हैं. मेरे पिता तीन भाई थे. मेरी माँ समेत सभी चाचियाँ भारत की थीं. मेरे दो भाइयों की शादी भी भारत में हुई लेकिन उसके बाद की पीढ़ी की शादी नेपाल में ही हुई. मेरी माँ बिहार के दरभंगा की थीं. उन्हें शादी के 40 साल बाद नेपाल की नागरिकता मिली थी. पहले बिना नागरिकता के भी वोटिंग का अधिकार मिलता था, लेकिन नेपाली राष्ट्रवाद के नए स्वरूप में इसे ख़त्म कर दिया गया.''
उन्होंने बताया कि कथित ऊँची जातियों के बीच भारत और नेपाल में शादी लगभग ख़त्म हो गई है. हालाँकि ओबीसी, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच शादियाँ अब भी हो रही हैं लेकिन वहाँ भी पहले की तुलना में बहुत कम हुई हैं."
विजयकांत कर्ण कहते हैं, "नेपाल के समतल में कई इलाक़ों में ऐसी जातियाँ हैं, जिनकी तादाद बहुत कम है. ऐसे में वे लड़के या लड़कियों की तलाश में यूपी-बिहार जाते हैं. मैं देख रहा हूँ कि जो सामाजिक और आर्थिक रूप से ज़्यादा पिछड़े हैं, उनके बीच रोटी-बेटी का संबंध ज़्यादा बचा है."
सीईआईएसएफ़ ने अपने शोध पत्र ‘नेपाल-इंडिया क्रॉस बॉर्डर रिलेशन्स इन द कॉन्टेम्पररी कॉन्टेक्स्ट’ में लिखा है, "ओबीसी, दलित और मुसलमानों के लड़के खाड़ी के देशों में बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं. वहाँ काम करने की वजह से इनके पास पैसे ठीक-ठाक आए हैं. ऐसे में जो पिता अपनी बेटियों के लिए लड़का भारत में देखते थे, वे अब इन लड़कों को ज़्यादा तवज्जो दे रहे हैं."
सीईआईएसएफ़ ने अपने शोध पत्र में लिखा है, ''यूपी-बिहार से ऊंची जातियों का पलायन भारत के दूसरे बड़े शहरों में तेज़ी से हुआ है. नेपाल से लगे बिहार और यूपी के सरहदी इलाक़ों से ऊंची जातियों के पलायन के कारण भी नेपाल में अब शादियां कम हो रही हैं.''
विजयकांत कर्ण कहते हैं, ''पहले नेपाल और भारत के बीच का संबंध सरहद से था लेकिन अब यह दिल्ली और काठमांडू से चल रहा है. पहले भारत-नेपाल का संबंध रक्सौल और बीरगंज से था, गोरखपुर और बहरावा से था, फरबिसगंज और विराटनगर से था. यह संबंध अब दिल्ली शिफ़्ट हो गया है. आप 50 के दशक में जाएँ, तो सरहद दिखती तक नहीं थी. लोग आते-जाते थे तो कोई पूछने वाला नहीं था. इधर से धान लेकर गए, तो उधर से कुछ सामान ख़रीद लिए. बीरगंज में खाद नहीं है, तो साइकिल से रक्सौल से लेते आए. अब संबंध बाज़ार में चला गया. सरहद पर स्टेट की मौजूदगी बढ़ती गई तो सहज संबंध कमज़ोर पड़ते गए.''
स्टेट की मौजूदगी बढ़ने के कई कारण भी हैं. नेपाल में माओवादियों का ‘जनयुद्ध’ शुरू हुआ, तो सभी जगह पहचान पत्र की माँग होने लगी.
फिर एयर टू एयर यात्रा में पासपोर्ट की माँग की जाने लगी. सांस्कृतिक संबंध शादी-विवाह और धर्म से जुड़े थे, लेकिन अब यह आर्थिक संपन्नता से जुड़ने लगे.
विजयकांत कर्ण कहते हैं, "नेपाल की सुरक्षा अवधारणा भी बदलने लगी. नेपाल का शासक वर्ग मधेसियों और भारत को सुरक्षा ख़तरे के रूप में देखने लगा. तराई के लोगों के लिए नागरिकता का मुद्दा बहुत बड़ा रहा है. पहले नागरिकता क़ानून में एक नियम बनाया गया कि जो नेपाली नहीं जानता है, उसे नागरिकता नहीं मिलेगी. अब तराई में नेपाली भाषा जानने वाले बहुत कम थे. तराई के लोग तो भोजपुरी, मैथिली, अवधी और हिन्दी बोलते थे."
तीन तरह की नागरिकता

सीके राउत मधेस में सप्तरी-2 से नेपाल की प्रतिनिधि सभा के लिए चुने गए हैं.
राउत जनमत पार्टी के अध्यक्ष हैं और नेपाल की मौजूदा प्रचंड सरकार में शामिल हैं.

राउत कहते हैं कि संविधान में तीन तरह की नागरिकता की व्यवस्था है.
"एक वंशज नागरिकता, दूसरी जन्मसिद्ध नागरिकता और तीसरी वैवाहिक संबंध के आधार पर अंगीकृत नागरिकता. तीनों तरह के नागरिकों को लेकर संविधान भेदभाव करता है. ये सारा तिकड़म मधेसियों को ख़तरा मानकर किया गया गया है.''
''ऐसी स्थिति में भारत की कोई भी लड़की शादी करके नेपाल आती है, तो उसे नागरिकता के लिए लड़ाई लड़नी पड़ती है. जहाँ सभी नागरिकों को समान होना चाहिए, वहाँ के संविधान में ही भेदभावपूर्ण व्यवस्था कर दी गई है."
सीके राउत की शादी बिहार के पूर्णिया में हुई है.
राउत कहते हैं, "सरहद को बहुत टाइट कर दिया गया है. कोई लड़की मायके जाएगी, तो उसे भारतीय रुपया चाहिए लेकिन उसे नहीं मिलता है. सरहद पर बहुत ही अपमानजनक तरीक़े से लोग बात करते हैं. भारत के साथ बॉर्डर रिलेशन बहुत मुश्किल हो रहा है. नेपाल के सुरक्षा बल भारत से सामान नहीं लाने देते हैं. अब लोग भारत में शादी नहीं करना चाहते हैं. भारत में शादी करने पर यहाँ का शासक वर्ग अगले की पहचान भारत से जोड़कर देखता है."
दोयम दर्जे की नागरिकता

नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली से पूछा कि भारत की जिन लड़कियों की शादी नेपाल में हो रही है, उनसे संविधान में भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, "हर देश का अपना संविधान अपने हिसाब से होता है. मुझे नहीं लगता है कि भारत से कोई लड़की नेपाल में शादी इसलिए करती होगी कि उसे प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनना है. इसके बावजूद भारत से ब्याह करके आईं लड़कियाँ नेपाल की राजनीति में ऊँचे ओहदे तक पहुँचीं, लेकिन भारत में नेपाली लड़कियाँ ऐसा नहीं कर पाईं. भारत के लोगों को इस पर भी सोचना चाहिए."
नागरिकता के मुद्दे पर नेपाल में पहाड़ी और तराई नेताओं की राय आपस में बँटी हुई है.
प्रदीप ज्ञवाली पहाड़ी नेता हैं और वह संविधान में नागरिकता के प्रावधान का विरोध नहीं करते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सीके लाल प्रदीप ज्ञवाली के इस तर्क के बारे में कहते हैं:
"भारत से ब्याह कर आई लड़की नेपाल की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या अन्य अहम पद पर आसीन हो सकती है या नहीं, ये अलग बात है. लेकिन इन पदों पर कभी नहीं पहुँच सकती, यह बिल्कुल उल्टा हो जाता है. बात इतनी सी है कि नागरिकों के बीच समानता तोड़ी जा रही है. नहीं बन सकते हैं, ये कहने का अर्थ यह हुआ कि आप बराबर नहीं हैं. समाज आगे जाता है. समाज में खुलापन बढ़ता है लेकिन नेपाल पीछे जा रहा है. जो चीज़ें कल तक थीं, उन्हें बदला जा रहा है."
- सीके लाल
सीके लाल कहते हैं कि नेपाल और भारत के बीच तीन तरह के संबंध थे. एक रोटी का, जो ख़त्म हो चुका है, क्योंकि सरहद पार सहभोज में आना-जाना बंद हो चुका है. एक बेटी का जो ख़त्म हो रहा है और एक रोज़गार का जो अभी बचा हुआ है.
उन्होंने कहा कि एक समय था जब सरहद पार लोगों के बीच रिश्तों में काफ़ी गर्माहट थी. लेकिन 90 के दशक के बाद बेटी का रिश्ता भी कमज़ोर होना शुरू हो गया था.
सीके लाल कहते हैं, "1980 के दशक तक हमारी अर्थव्यवस्थाएँ बराबर की थीं. अपेक्षाकृत नेपाल के मध्यवर्ग की स्थिति कुछ अच्छी थी. कहा जाता था कि बिहार में या तो बाढ़ आती थी या सूखा रहता था. प्राकृतिक आपदा की निरंतरता रहती थी. बिहार के लोग कहते थे कि बेटी सरहद पार जाएगी, तो भूखे नहीं रहेगी. 1990 के दशक के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में खुलापन आया. बिहार के लोग बाहर भी काम करने जाने लगे और पढ़ाई का दायरा बढ़ा. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड से नेपाल की सीमा लगती है. भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद लगने लगा कि अब सरहद पार बेटी देने की ज़रूरत नहीं है."
सीके लाल कहते हैं, "नेपाल के लोग भारत में पढ़ने जाते थे. पढ़ने जाते थे तो भारत में रिश्तेदारों को पता होता था कि नेपाल का कौन सा लड़का कैसा पढ़ने में है और पढ़ाई के साथ शादी की बात भी चलती रहती थी. लेकिन अब नेपाल के विद्यार्थियों के लिए भारत में पढ़ना सस्ता नहीं रहा. उन्हें विदेशी छात्रों की तरह लिया जाने लगा. ऐसे में नेपाल के छात्रों की संख्या भारत में तेज़ी से कम हुई और इसका असर भी बेटी-रोटी के रिश्ते पर सीधा पड़ा. भारत की ऊँची जातियों में नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने का आकर्षण था. नेपाल से राजशाही और हिंदू राष्ट्र का ख़त्म होना, यूपी, बिहार, उत्तराखंड की ऊँची जातियों के लिए किसी झटके से कम नहीं था. ऐसे में ऊँची जातियों के लिए नेपाल में बेटी देना बहुत मुफ़ीद नहीं रहा."
नेपाल में माओवादी सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ, तो 2006 तक बिहार के लोगों में डर रहा.
बिहार नक्सली आंदोलन देख चुका था. ऐसे में लोग नेपाल में बेटी का विवाह करने से परहेज़ करने लगे.
नेपाल में जब गणतंत्र लागू हुआ, तो समस्या दूसरी तरह की आने लगी.
नई परिस्थितियों में बिहार के लोगों को ऐसा लगने लगा कि उनकी बेटी नेपाल जाएगी, तो दोयम दर्जे की नागरिकता मिलेगी.
नेपाल के संविधान के नए प्रावधानों को लेकर भी सवाल उठने लगे और आरोप लगा कि ये अपने नागरिकों से भेदभाव करते हैं.

नेपाल के कई लोग मानते हैं कि पहले नेपाल पूरी दुनिया को भारत के नज़रिए से देखता था, लेकिन अब चीज़ें बदल गई हैं.
अब नेपाल के लोग पूरी दुनिया में काम कर रहे हैं और इसका असर भारत से संबंधों पर भी पड़ा है.
दूसरी तरफ़ दोनों देशों के बीच कई ऐसी चीज़ें हुईं, जिनसे आपसी भरोसा टूटा है.
2015 में नेपाल में संविधान के ख़िलाफ़ मधेसियों ने आंदोलन शुरू किया था. इसी आंदोलन के दौरान भारत की ओर से अघोषित नाकाबंदी हुई.
नेपाल के आम लोग इससे बहुत परेशान हुए थे.
नेपाल अपनी पहचान और राष्ट्रवाद की खोज में
यह भी कहा जा रहा है कि नेपाल का शासक वर्ग अपनी पहचान की खोज में है और इस पहचान की खोज में भारत के साथ बेटी-रोटी के रिश्ते को बाधा के रूप में देख रहा है.
नेपाली कांग्रेस के नेता कंचन झा कहते हैं कि मधेस इलाक़े में नेपाल की 51 फ़ीसदी आबादी रहती है लेकिन इस पूरी आबादी को नेपाल का शासक वर्ग शंका की नज़र से देखता है. मधेसियों को भारत परस्त कहा जाता है.
नेपाल में मुख्य रूप से तीन तरह की जातियाँ हैं- खस आर्या, जनजाति और मधेसी. खस आर्या में पहाड़ के ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं. जनजाति में शेरपा, मगर, राई, तमांग, थारू आदि हैं. मधेस यानी तराई की सभी जातियाँ.
कंचन झा कहते हैं, "खस आर्या, जनजाति और मधेसी तीनों को जोड़ने के लिए दुर्भाग्य से कोई राष्ट्रवादी आंदोलन नहीं चला है. अभी का जो नेपाली राष्ट्रवाद है, उसमें एक जाति खस आर्या की महत्वाकांक्षा पूरी की जा रही है.''
उन्होंने कहा, ''नेपाली राष्ट्रवाद के लिए भारत के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता दुश्मन की तरह हो गया है. नेपाल के शासक वर्ग के राष्ट्रवाद में मधेस और भारत दुश्मन हैं. एंटी मधेस कब एंटी इंडिया बन जाता है, यह पता भी नहीं चलता है.''
जाने-माने पत्रकार प्रशांत झा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में साल 2015 में 29 जून को एक लेख में लिखा था, ''मैं नेपाली हूँ और दिल्ली में रहता हूँ, यहीं काम करता हूँ. मैं पला-बढ़ा काठमांडू में और मेरे माता-पिता अब भी वहीं रहते हैं. नेपाल में क्या हो रहा है, इस पर मेरी नज़र बनी रहती है. मैं साल में कई बार नेपाल जाता हूँ. अभी मेरे बच्चे नहीं हैं. अगर होते भी हैं तो वे नेपाली नागरिक नहीं बन सकते हैं. ऐसा इसलिए कि मैंने शादी भारतीय महिला से की है.''
"नए संविधान के मुताबिक़, जिनके माता-पिता नेपाली नागरिक हैं, वही वंशज नागरिकता ले सकते हैं.
"काठमांडू की सत्ता को लगता है कि मधेस में यूपी, बिहार से इसी तरह शादियाँ होती रहीं, तो भारत का प्रभाव नेपाल में बढ़ेगा. जैसे भारत में हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को लगता है कि मुसलमान कथित लव-जिहाद कर रहे हैं, उसी तरह नेपाल में भारत से रोटी-बेटी का रिश्ता वहाँ की सत्ता को 'लव जिहाद' की तरह लग रहा है. हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले डर फैला रहे हैं कि भारत में मुसलमान बहुसंख्यक हो जाएँगे, उसी तरह नेपाल में अल्ट्रा राष्ट्रवादियों को लग रहा है कि भारत नेपाल को अपने नियंत्रण में ले लेगा."
- प्रशांत झा
कई विश्लेषकों को लगता है कि नेपाल और भारत में बेटी-रोटी का रिश्ता कमज़ोर पड़ा, तो भारत का नेपाल में प्रभाव कम होता जाएगा.
नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ऐसा नहीं मानते हैं कि रोटी-बेटी का संबंध कमज़ोर पड़ने का असर दोनों देशों के संबंधों पर पड़ेगा. ज्ञवाली कहते हैं कोई चलन हमेशा के लिए स्थिर नहीं रहता है, इसमें परिवर्तन वक़्त के साथ आता ही है.
अब विदाई की सुबह
नेपाल के बीरगंज में नीरज पटेल की भांजी निर्मला पटेल की बारात बिहार के रक्सौल से आ गई है.
बारात का काफ़िला लड़की के घर की ओर बढ़ रहा है. पूरी बारात लोकप्रिय भोजपुरी गाने पर नाच रही है.

द्वारपूजा के लिए दूल्हा बैठ गया है. गाँव की महिलाएँ गीत गा रही हैं. दूसरी ओर गाँव के पुरुष खाने पर टूट पड़े हैं.

हर तरफ़ जश्न का शोर है. आधी रात बीत चुकी है. सरहद शांत है. सुरक्षा बल सो रहे हैं. सुबह होते ही नेपाल की निर्मला भारत की बहू बनकर विदा हो गईं. निर्मला का नेपाल पीछे छूट गया लेकिन उसी वक़्त भारत की कोई बेटी भी नेपाल की बहू बनकर विदा हो रही होगी.
रिपोर्टर: रजनीश कुमार
फ़ोटो और वीडियो एडिटिंग: संदीप यादव
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
शॉर्टहैंड: शादाब नज़्मी
इसे पब्लिश किया गया: 13 फ़रवरी, 2023