अमिताभ बच्चन: ज़ंजीर ने कैसे एक फ़्लॉप हीरो कोबनाया सुपरस्टार

बात 1972 की है. प्रकाश मेहरा और धर्मेंद्र की फ़िल्म 'समाधि' आई थी और ज़बरदस्त हिट हुई. दोनों की बीच बेहतरीन तालमेल बन गया था.

उन्हीं दिनों धर्मेंद्र ने साढ़े 9 हज़ार रुपए देकर एक फ़िल्म की कहानी ख़रीदी.

ये कहानी सलीम-जावेद की थी लेकिन धर्मेंद्र तुरंत वो फ़िल्म नहीं बनाना चाहते थे, वो कहानी 55 हज़ार रुपए देकर प्रकाश मेहरा ने धर्मेंद्र से ख़रीद ली. 

उसी कहानी पर प्रकाश मेहरा ने धर्मेंद्र के साथ फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया. ये कहानी धर्मेंद्रं के दिल के बहुत करीब थी लेकिन किस्मत का खेल कुछ यूँ रहा कि अपनी ही पसंदीदा कहानी में वे मौजूद नहीं रह पाए.

दरअसल, उनकी एक चचेरी बहन थी जिनके प्रकाश मेहरा से गहरे मतभेद हो गए थे. टीवी शो 'आप की अदालत' में धर्मेंद्र ने बताया था, “ मेरी उस बहन ने मुझे ऐसी कसम दे दी कि इमोशनल बंधन में बाँध दिया मुझे. मैं दुखी बहुत हुआ था वो फ़िल्म छोड़कर लेकिन बहन के कहने पर छोड़ दी.”

 ये बात तो जगज़ाहिर है कि दिलीप कुमार, राज कुमार, देव आनंद सबने उस रोल को निभाने से इनकार कर दिया. 40 साल पहले 11 मई 1973 मई को रिलीज़ हुई ये वही फ़िल्म थी जिसने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को दिया 'एंग्री यंग मैन', एक नया सुपरस्टार जो आने वाले सालों में हिंदी फ़िल्मों की काया पलटने वाला था. इसके साथ ही शुरु हुई प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन की जादुई जोड़ी जिसका जादू 1989 में फ़िल्म 'जादूगर' के साथ टूटा. 

ज़ंजीर कहानी है अंदर ही अंदर ग़ुस्से और विद्रोह से भरे एक ईमानदार युवा पुलिस ऑफ़िसर विजय की जिसे न जाने किसी ज़ंजीर ने जकड़ा हुआ है.

अमिताभ बने एंग्री यंग मैन

विजय की तासीर फ़िल्म के शुरुआती सीन में ही समझ में आ जाती है जब सीनियर अधिकारी (इफ़्तेख़ार) इंस्पेक्टर विजय से कहते हैं:

“पुलिस सर्विस में आपको पाँच बरस हो गए और इन पाँच बरसों में आपके 11 ट्रांसफ़र हुए. मुझे मालूम हुआ है कि आप एक ईमानदार और मेहनती ऑफ़िसर हैं लेकिन आप में एक कमज़ोरी भी है. आप हर मुजरिम को अपना ज़ाती दुश्मन समझने लगते हैं और क़ानून की हिफ़ाज़त करने के लिए कभी-कभी क़ानून के दायरे से बाहर भी निकल जाते हैं.”

 ज़ंजीर की ख़ासियत ये है कि कहने को तो पर्दे पर इसमें एक सुपरहीरो है -अमिताभ बच्चन. लेकिन दरअसल ज़ंजीर की सफलता के पीछे कई हीरो हैं.

सबसे पहले बात करते हैं अमिताभ की. दीप्तोकीर्ति चौधुरी ने हिंदी फ़िल्मों से जुड़ी कई किताबें लिखी हैं. वे कहते हैं, “एक अच्छी परफॉर्मेंस की पहचान ये होती है कि आप उस रोल में किसी और की कल्पना नहीं कर सकते जैसे कि इंस्पेक्टर विजय खन्ना के रोल में अमिताभ के सिवा किसी और के बारे में सोचना संभव नहीं है. वो इन्टेसिटी जो उनके किरदार में नज़र आती है, उसकी धार शायद महीनों से उन्हें करियर में मिले रिजेक्शन से और तेज़ हुई होगी. फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले गुरुवार को लोगों के लिए प्राण और जया भादुड़ी फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण थे लेकिन एक हफ़्ते बाद अमिताभ बतौर एक्टर और स्टार फ़िल्मी मैगज़ीनों के कवर पर थे. इस फ़िल्म ने अमिताभ को स्टार बनाया, ऐसा स्टारडम जिसकी चमक आज तक फ़ीकी नहीं पड़ी है.”

फ़्लॉप हीरो अमिताभ पर खेला दाँव

ज़ंजीर में दूसरा बड़ा हीरो है इसका स्क्रीनप्ले जिसे सलीम-जावेद ने लिखा. फ़िल्म की सफलता के हीरो वो दमदार किरदार भी हैं जो प्राण (शेर ख़ान) और अजीत (तेजा) जैसे अभिनेताओं ने निभाए, और असली हीरो रहे निर्देशक प्रकाश मेहरा- एक ऐसा निर्देशक जिसकी कहानी को हर बड़े हीरो ने ठुकरा दिया था.

ये राजेश खन्ना वाला दौर था. फ़िल्म में रोमांस होना लाज़मी हुआ करता था, नाच गाना तो होना ही चााहिए और साथ में थोड़ी कॉमेडी भी लेकिन ज़ंजीर में ऐसा कुछ भी नहीं था.

लेकिन प्रकाश मेहरा ने फ़िल्म बनाई और वो भी एक ऐसे एक्टर के साथ जो तब तक 10-12 फ़्लॉप फ़िल्में दे चुका था. 

एक फ़्लॉप हीरो को लेना ख़तरा मोल लेना था और वो भी तब जब प्रकाश मेहरा पहली बार किसी फ़िल्म में अपना पैसा लगा रहे  थे. पर प्रकाश मेहरा ने अमिताभ को हीरो लिया और उनके मुरीद हो गए. ज़ंजीर की सफलता का फ़ायदा सबको मिला.

प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन के लिए राज़ी कराने का काम सलीम-जावेद ने किया जो अमिताभ की बॉम्बे टू गोवा, परवाना जैसी फ़िल्में देख चुके थे.

जब पोस्टर पर छपा सलीम-जावेद का नाम

सलीम जावेद की बात करें तो उन दिनों पोस्टर पर लेखकों का नाम लिखने का चलन नहीं था.  दोनों ने प्रकाश मेहरा से कहा कि पोस्टर पर उनका भी नाम होना चाहिए. 

बीबीसी से बातचीत में जावेद अख़्तर बताते हैं, “जब हमने अपनी ये इच्छा ज़ाहिर की तो हमें बताया गया कि ऐसा होता नहीं है. जब बंबई में 'ज़ंजीर' रिलीज़ हुई तो हमने दो जीपें किराए पर लीं, उनमें 3-4 लोग बिठाए, उन्हें सीढ़ियाँ और पेंट दिया और उनसे कह दिया कि बंबई में जहाँ भी 'ज़ंजीर' के पोस्टर दिखाई दें, वहाँ लिख दें- रिटेन बाइ सलीम-जावेद. हर पोस्टर पर सलीम जावेद का नाम लिख दिया गया.  उसके बाद से ही पोस्टरों पर लेखक का नाम लिखने की शुरुआत हुई.

वो कहते हैं, “सलीम-जावेद ने ज़ंजीर के साथ फ़िल्म इंडस्ट्री में लेखकों को मिलने वाली अहमियत को बदल डाला. वो इंडस्ट्री के पहले स्टार लेखक थे. सलीम जावेद ने ज़ंजीर रमेश सिप्पी को दिखाई जिसके बाद सिप्पी ने अमिताभ को शोले में ले लिया और अमिताभ की चर्चा होने लगी.

ये अजब इत्तेफ़ाक़ है कि पहली बार जिस फ़िल्म 'अधिकार' के लिए सलीम-जावेद ने स्क्रीनप्ले लिखा था , तब उनके नाम क्रेडिट लिस्ट में नहीं दिए गए थे.

दीप्तोकीर्ति चौधुरी ने ‘रिेटेन बाय सलीम जावेद- द स्टोरी ऑफ़ हिंदी सिनेमाज़ ग्रेटेस्ट स्क्रीनराइटर्स’ नाम की किताब लिखी है.

इस तरह सलीम जावेद ने फ़िल्म ज़ंजीर डिस्ट्रीब्यूटरों को बेचने में भी मदद की. एंग्री यंग मैन हिंदी सिनेमा का सबसे टिकाऊ फ़ॉर्मूला है जिसने हिट के बाद हिट दी है और सलीम जावेद के इस फ़ॉर्मूला ने कइयों को स्टार बना दिया है.”

जब तक बैठने को ना कहा जाए शराफत से खड़े रहो...

ये सलीम जावेद के स्क्रीनप्ले का ही कमाल था कि शेर ख़ान (प्राण) की दोस्ती और विलेन तेजा (अजीत) के साथ दुश्मनी, इन दोनों को जैसे पिरोया गया है, वो कहानी को कहीं भी ढीला नहीं होने देती. 

प्राण और अमिताभ बच्चन के बीच के शुरुआती टकराव के सीन आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं. जब प्राण कहते हैं- इलाके में नए आए हो साहेब, वरना शेरखां को कौन नहीं जानता.

और अमिताभ जवाब देते हैं -जब तक बैठने का ना कहा जाए शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं.

दोनों के बीच ये तकरार और बाद की गहरी दोस्ती फ़िल्म का हाई प्वाइंट है. फ़िल्म के गाने यारी है ईमान मेरा के लिए गुलशन बावरा को फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था.

सूट-बूट वाला सलीकेदार विलेन अजीत

तेजा के रोल में अजीत ने विलेन को एक नया आयाम दिया. बड़ी बंदूकों वाले डाकू या लालची साहूकार वाले विलेन से अलग ज़ंज़ीर में तेजा (अजीत) सूट-बूट और बो-टाई वाला बहुत ही सलीकेदार विलेन था जो लोगों की बारीक़ समझ रखता है.

 जब स्मगलर तेजा अपनी पार्टी में इंस्पेक्टर विजय खन्ना (अमिताभ) को अलग-थलग देखता है तो मोना यानी बिंदु से कहता है, “जो लोग पार्टियों में अलग-थलग रहते हैं वो आम तौर पर बहुत ज़िद्दी होते हैं.” 

तेजा बिल्कुल सही पहचानता है कि विजय वाकई बहुत ज़िद्दी था जबकि तेजा और विजय की ये पहली मुलाक़ात थी.

कुछ लोगो का कहना है कि ज़ंजीर का सेठ धर्म दयाल तेजा का किरदार भारत के शिपिंग टाइकून जयंत धर्मा तेजा के किरदार से लिया गया था जिन्होंने शिपिंग इंडस्ट्री में बहुत पैसा कमाया लेकिन बाद में उन्हें भारत से भागना  पड़ा और आख़िर में उन्हें जेल भी हुई.

खलनायकों पर केंद्रित किताब 'प्योर इविल द बैड मैन ऑफ़ बॉलीवुड' के लेखक बालाजी विट्ठळ ने बीबीसी को बताया, "1960 में जयंत धर्मा तेजा ने जयंती शिपिंग कंपनी की स्थापना के लिए 2 करोड़ 20 लाख रुपए का कर्ज़ लिया था. बाद में जब पोल खुली कि वो कर्ज़ के पैसे को अपने निजी खाते में ट्रांसफ़र कर रहे थे तो वो देश से भाग खड़े हुए. शुरू में अजीत तेजा के रोल को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे लेकिन सलीम  उन्हें ये रोल करने के लिए बहुत मुश्किल से मना लिया."  

 किसी भी किरदार की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि वो बाक़ी फ़िल्मों में, चुटकुलों में और आज के सोशल मीडिया मीम्स में ज़िंदा रहे.  तेजा और मोना डार्लिंग (बिंदू) के कितने ही स्पूफ़ आपको आज भी मिल जाएँगे.

छोटे रोल में छाप छोड़ी जया भादुड़ी ने

ज़ंजीर में देखा जाए तो रोल के हिसाब से जया भादुड़ी के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं था हालांकि ज़ंजीर आने से पहले जया स्टार बन चुकी थी. लेकिन जया ने फ़िल्म में काम करने के लिए हामी भरी.

 ज़ंजीर में चाकू छुरी तेज़ करने वाली ज़िंदादिल और तेज़ तर्रार माला गुमसुम और नाराज़ रहने वाले विजय की काट है. 

वो विजय के उन जज़्बातों को ज़िंदा करती है जिन्हें या तो वो भूल चुका है या जिनका एहसास उसने अपने काम और फ़र्ज़ की चादर तले दबा दिया है.

मसलन अकेलेपन पर माला के सवाल में जवाब में विजय कहता है, “आदल पड़ गई है अकेले रहने की.”

 ऐसे में माला तपाक से जवाब देती है,  “अकेले तो हम भी रहते हैं. लेकिन अकेले रहने की आदत कभी नहीं पड़ती. जी तो हमेशा चाहता है कि भाई बहन हो, माँ बाप हों. मैने कुछ ग़लत कहा.” तब विजय कहता है- “तुमने बिल्कुल सही कहा. अकेले रहने की आदत नहीं पड़ती. दिल तो हमेशा चाहता है लेकिन चाहने से क्या होता है.”

शायद पहली दफ़ा विजय को एहसास होता है कि वो कितना अकेला है. इस सीमित रोल को जया ने अच्छे से निभाया. 

ज़ंजीर का हिट होना और अमिताभ- जया की शादी

ज़ंजीर में तो अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी का रोमांस था ही दोनों की शादी की कहानी भी ज़ंजीर से जुड़ी हुई है. 

फोटो: SMM AUSAJA ONLINE

फोटो: SMM AUSAJA ONLINE

अपनी नातिन नव्या नंदा के पॉडकास्ट में जया बताती हैं, “हमने तय किया था कि अगर हमारी फ़िल्म ज़ंजीर हिट हो गई तो हम छुट्टियाँ मनाने कहीं जाएँगे.  तब तक हम दोनों ने 1973 में अक्तूबर में शादी करने का फ़ैसला कर लिया था. जबकि ज़ंज़ीर अप्रैल में रिलीज़ हो गई थी. अमिताभ ने मुझसे कहा कि मेरे माता पिता ने कहा है कि बिना शादी किए हम छुट्टियों पर नहीं जा सकते हैं. तो हमने सोचा कि अक्तूबर की बजाए जून में शादी कर लेते हैं.” अमिताभ की सबसे बेहतरीन फ़िल्म कौन सी है इस पर अंतहीन बहस चलती रही है. लेकिन ज़ंज़ीर को लोग टर्निंग प्वाइंट तो मानते ही हैं.

उस दुनिया का हीरो ग़ुस्से में रहता था....

लेखिका सुष्मिता दासगुप्ता ने अमिताभ द मेकिंग ऑफ़ ए सुपरस्टार में ज़ंजीर पर लिखा है, “ज़ंजीर ने नेक दिल और नैतिक हीरो के पैमाने को तोड़ा. ज़ंज़ीर का विजय सही काम करता है लेकिन ये काम शासन की नज़रों में भी सही हो ये ज़रूरी नहीं. ज़ंजीर में अमिताभ बच्चन ने एंटीहीरो में नई तरह की नैतिकता की बहस छेड़ी. ज़ंज़ीर ने दर्शकों को उस दुनिया में नहीं धकेला जहाँ अच्छे लोगों के साथ अंत में बस अच्छा ही होता है. ज़ंजीर उस दुनिया का हिस्सा थी जहाँ न्याय मिलना कोई गारंटी की बात नहीं थी- उसके लिए लड़ना पड़ता था. हैरत की बात नहीं कि उस दुनिया का हीरो ग़ुस्से में रहता था.”

90 को दशक में तवलीन सिंह की एक पुरानी टीवी सीरिज़ थी एक दिन एक जीवन. इसमें बात करते हुए अमिताभ कहते हैं, “एंग्री यंग मैन कोई नई शख्यिसत नहीं है. मदर इंडिया का बिरजू, गंगा जमुना के दिलीप साहब.. ये सब उसी इमेज से निकले किरदार हैं. ज़ंजीर का एंग्री यंग मैन उस समय की परिस्थितियों से निकला था. तब लेखकों के मन में ख़्यालात आए कि सरकार आम लोगों के लिए वो सब नहीं कर रही है .. तो आम इंसान को ख़ुद उन चीज़ों को माँगना पड़ेगा. तभी उसे न्याया मिलेगा और इसी धारा को लेकर ये एंग्री यंग मैन बना. किस्मत की बात है कि मैं उस वक़्त था.”

ज़ंज़ीर में अमिताभ का एंग्री यंग मैन का अक्स उस सीन में बख़ूबी नज़र आता है जब जया भादुड़ी नए घर, नए पर्दे, के सपने बुन रही होती है और समाज में चल रहे अपराध पर चुप्पी साधने को मजबूर विजय का आक्रोश कुछ यूँ फूटता है, “ हाँ हम अपने घर में ऐसे ही ख़ूबसूरत पर्दे लगवाएंगे. और मैं ये जानने की कोशिश भी नहीं करूँगा कि इन पर्दों कि दूसरी तरफ़ दुनिया में क्या हो रहा है.  हमारे ख़ूबसूरत घर के बाहर लोग मरते हैं तो मरते रहें.स्मग्लरों की गाड़ियाँ मासूम बच्चों को कुचलती रहें .हाँ माला हम ज़रूर एक ख़ूबसूरत घर बनाएगे और हम भूल जाएँगे कि ये घर जिस दुनिया में बना है वो कितनी बदसूरत है . वहाँ कितने जुल्म है, कितनी बेइंसाफ़ी है. यही होगा माला यही होगा.”

लगभग एक मिनट के इस मोनोलॉगमें जो आक्रोश अमिताभ की आँखों, अदायगी में नज़र आता है, वो न जाने आने वाली कितने वाली फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन का हॉलमार्क बनने वाला था- द एंग्री यंग मैन.

किरदार अनेक शहंशाह बस एक

हालांकि उस दौर में वन मैन इंडस्ट्री का जो बैज अमिताभ बच्चन को मिला, वो फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए कितने फायदेमंद रहा उसे लेकर लोगों की राय अलग अलग है.

ख़ैर ज़ंजीर की बात करें तो ज़ंजीर की ही तरह 49 साल बाद बनी फ़िल्म झुंड में भी अमिताभ बच्चन का नाम विजय ही था. फ़िल्म के निर्देशक नागरज मंजुले कहते हैं, ज़ंज़ीर और बच्चन साहब का असर पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री पर पड़ा. आज अगर फ़िल्मों में मेरी रुचि है तो बच्चन जी उसके ज़िम्मेदार हैं. 

सचिन तेंदुलकर भी अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फ़ैन हैं. उन्होंने अमिताभ बच्चन के बारे में कहा था, किरदार अनेक शहंशाह बस एक. मैं आपकी फ़िल्में देखकर बड़ा हुआ हूँ. आपका पैशन और आपका लंबा करियर मुझे हैरान करता है. बड़े हो रहे हर बच्चे के लिए आप प्रेरणा हैं, मेरे लिए आप आज भी मेरी प्रेरणा हैं.

ये इ्त्तेफ़ाक़ ही है कि ये बच्चा यानि सचिन तेंदुलकर 1973 में पैदा हुआ था और ज़ंजीर का एंग्री यंग मैन भी इस साल वजूद में आया और दोनों ने 50 बरस पूरे कर लिए हैं.


लेखक: वंदना,टीवी एडिटर, बीबीसी भारत
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी