अफ़ग़ानिस्तान की सबसे ख़तरनाक जेल

काबुल की जेल का वो हिस्सा जहां क़ैद हैं 2000 तालिबानी लड़ाके

पुल-ए-चरखी जेल में 2000 क़ैदी हैं.
ये क़ैदी कौन हैं
और
अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य में इनकी
भूमिका क्या होगी?

पुल-ए-चरखी जेल में 2000 क़ैदी हैं.
ये क़ैदी कौन हैं
और
अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य में इनकी
भूमिका क्या होगी?

पुल-ए-चरखी जेल

काबुल

चेतावनी- इस लेख में कुछ ऐसी बातें भी हैं, जिन से कई लोगों को परेशानी हो सकती है.

पुल-ए-चरखी जेल अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के बाहरी इलाक़े में है. विशाल भूरे पत्थरों वाली दीवारें इसकी पहरेदार हैं, जिनके ऊपर कंटीली तारें भी लगी हुई हैं. इस दीवार में थोड़ी-थोड़ी दूर पर निगरानी टॉवर भी लगे हुए हैं, जिन से क़ैदियों पर निगाह रखी जाती है.

इस जेल में आने-जाने के लिए इस्पात के विशाल फाटक बने हुए हैं. पुल-ए-चरखी जेल में क़रीब दस हज़ार लोग क़ैद हैं. इन में से क़रीब दो हज़ार क़ैदी अफ़ग़ानिस्तान के चरमपंथी इस्लामी संगठन तालिबान से ताल्लुक़ रखते हैं.

तालिबानी क़ैदी मौलवी फ़ज़ल बारी कहते हैं कि वो लड़ने के लिए नहीं पैदा हुआ थे. लेकिन, जेल में पांच बरस बिताने के बाद अब उन्हें शिद्दत से इस बात का एहसास होता है कि वो लड़ते-लड़ते जान दे दें.

मौलवी फ़ज़ल बारी कहते हैं, "मैं इस क़दर उकता गया हूं कि जो मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि मैं ख़ुदकश बॉम्बर बनूंगा, लेकिन, अल्लाह पाक की क़सम अब मैं वो भी कर गुज़रने को तैयार हूं."

हालांकि, फिलहाल तो मौलवी फ़ज़ल बारी इस बेहद सख़्त सुरक्षा इंतज़ाम वाली जेल में ही क़ैद रहेंगे. लेकिन, काबुल की पुल-ए-चरखी जेल, अफ़ग़ानिस्तान की उन जेलों में से एक है, जहां से तालिबानी चरमपंथियों को धीरे-धीरे बड़ी तादाद में रिहा किया जा रहा है. अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत, तालिबान से बंद पड़ी शांति वार्ता की बहाली से पहले सद्धभावना के तौर पर तालिबानी लड़ाकों को रिहा कर रही है.

तालिबान ने लंबे समय से एलान किया हुआ है कि उनका अंतिम लक्ष्य अफ़ग़ानिस्तान में दार-उल-इस्लाम यानी इस्लामी क़ानूनों पर चलने वाली अमीरत या हुकूमत क़ायम करनी है. जब 1996 से 2001 के बीच अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का राज था, तो उन्होंने इसी तरीक़े से सरकार चलाई थी. उस वक़्त की तालिबानी सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान में शरीयत क़ानून लागू किया था.

और, उनकी हुकूमत बेहद सख़्त थी. महिलाओं का सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था. साथ ही तमाम जुर्म के लिए पत्थर से पीट कर मारने, हाथ-पैर काटने जैसी सजाएं दी जाती थीं. अभी ये साफ़ नहीं है कि अगर भविष्य में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का राज क़ायम हुआ, तो वो किस तरह की सरकार चलाएंगे.

2001 में अमेरिका ने 9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद तालिबान की हुकूमत का ख़ात्मा कर दिया था. तब से अब तक अफ़ग़ानिस्तान में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. इन में बड़ी तादाद में मारे गए बेगुनाह शहरी शामिल हैं.

जब हम पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी चरमपंथियों से मिले, तो उन्होंने हम से खुल कर बातें कीं. अपनी ज़िंदगी के मक़सद बताए. अपनी शिकायतें बयां कीं. हालांकि उन्होंने अपनी गतिविधियों के बारे में बहुत बारीक़ी से जानकारी नहीं दी.

लेकिन, हमें ये ज़रूर पता है कि मौलवी फ़ज़ल बारी ने 15 साल पहले तालिबान का दामन थामा था. वो अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंद सूबे में तालिबान के कमांडर थे और वहां अंतरराष्ट्रीय सेना से जंग में शामिल थे.

पुल-ए-चरखी जेल में फज़ल बारी की छोटी सी कोठरी में तालिबानी लड़ाके ठुंसे पड़े हैं. बाहर राहदारी में लंबी क़तार लगी हुई है. कई लोग आवाज़ देते हुए आते-जाते हैं. वहीं, कई लोग अपनी तीन मंज़िला चारपाइयों से झांकते दिखते हैं. एक बुज़ुर्ग क़ैदी ज़मीन पर बैठा हुआ है और हाथ में तस्बीह लिए हुए कुछ वज़ीफ़े पढ़ रहा है.

ज़मीन पर क़ालीन और गद्दियों का लंबा-चौड़ा विस्तार दिखता है. कोठरी की चारों दीवारों पर पोस्टर लगे हुए हैं. कुछ इस्लाम की पवित्र जगहों जैसे मक्का और मदीना के हैं. तो, कई तस्वीरें ख़ूबसूरत नज़ारों वाली हैं. गुलदस्तों, झरनों और आइसक्रीम के कोन की तस्वीरें भी दीवारों पर नज़र आती हैं.

असल में इस कोठरी को इस तरह सजाया गया है कि जन्नत का दीदार हो. इस के ज़रिए इन क़ैदियों का वो बुनियादी यक़ीन ज़ाहिर होता है कि अगर वो जंग में मारे गए, तो वो सीधे जन्नत तशरीफ़ ले जाएंगे.

दीवारों से लगी हुई अल्मारी में इस्लामिक साहित्य की भारी भरकम किताबें और पवित्र पुस्तक क़ुरान रखे हुए हैं.

जैसे ही फ़ज़ल बारी ख़ुत्बा पढ़ना शुरू करते हैं, तो सारे क़ैदियों की निगाहें उन पर टिक जाती हैं. असल में मौलवी फ़ज़ल बारी पहले इस्लाम के वरिष्ठ विद्वान थे. इसीलिए जेल में उनके साथी उन्हें सम्मान की नज़र से देखते हैं.

फ़ज़ल बारी कहते हैं, "मैं आप को बता रहा हूं. जब तक हमारे मुल्क में एक भी विदेशी फ़ौजी रहेगा, अफ़ग़ानिस्तान में अमन आ ही नहीं सकता."

An inmate lies back in his bunk bed decorated by red drapes and a large poster of Medina

तालिबान पर आरोप है कि अफ़ग़ानिस्तान में अपनी हुकूमत के दौरान उसने ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा के दूसरे आतंकवादियों को पनाह दी. इन पर इल्ज़ाम है कि इन्होंने अमरीका पर सितंबर 2001 में 9/11 का आतंकवादी हमला किया था. तालिबान और अमरीका की अगुवाई वाली सेनाओं के बीच अफ़ग़ानिस्तान में पिछले 19 वर्षों से जंग चल रही है, जो अमरीका के इतिहास का सबसे लंबा युद्ध है.

इस साल सितंबर में ऐसा लग रहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तालिबान के बीच समझौता होने वाला है. लेकिन, जब काबुल में एक बम धमाके में एक अमरीकी सैनिक समेत 12 लोग मारे गए, और तालिबान ने इस धमाके की ज़िम्मेदारी ली, तो, ट्रंप ने अचानक ही शांति वार्ता को रद्द कर दिया.

अमरीका का कहना है कि अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में उसके कम से कम 13 हज़ार सैनिक तैनात हैं. तालिबान से चल रही शांति वार्ता के प्रस्तावित समझौते के तहत, अमरीका ने समझौता लागू होने के पांच महीने के भीतर, अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8 हज़ार 600 करने का वादा किया था. लेकिन, फिलहाल तो ये समझौता विचाराधीन भी नहीं है.

2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने ये वादा किया था कि वो राष्ट्रपति चुने गए तो अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला लेंगे.

News image

चेतावनी- इस लेख में कुछ ऐसी बातें भी हैं, जिन से कई लोगों को परेशानी हो सकती है.

पुल-ए-चरखी जेल अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के बाहरी इलाक़े में है. विशाल भूरे पत्थरों वाली दीवारें इसकी पहरेदार हैं, जिनके ऊपर कंटीली तारें भी लगी हुई हैं. इस दीवार में थोड़ी-थोड़ी दूर पर निगरानी टॉवर भी लगे हुए हैं, जिन से क़ैदियों पर निगाह रखी जाती है.

इस जेल में आने-जाने के लिए इस्पात के विशाल फाटक बने हुए हैं. पुल-ए-चरखी जेल में क़रीब दस हज़ार लोग क़ैद हैं. इन में से क़रीब दो हज़ार क़ैदी अफ़ग़ानिस्तान के चरमपंथी इस्लामी संगठन तालिबान से ताल्लुक़ रखते हैं.

An elderly Talib holding his prayer beads

तालिबानी क़ैदी मौलवी फ़ज़ल बारी कहते हैं कि वो लड़ने के लिए नहीं पैदा हुआ थे. लेकिन, जेल में पांच बरस बिताने के बाद अब उन्हें शिद्दत से इस बात का एहसास होता है कि वो लड़ते-लड़ते जान दे दें.

मौलवी फ़ज़ल बारी कहते हैं, "मैं इस क़दर उकता गया हूं कि जो मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि मैं ख़ुदकश बॉम्बर बनूंगा, लेकिन, अल्लाह पाक की क़सम अब मैं वो भी कर गुज़रने को तैयार हूं."

हालांकि, फिलहाल तो मौलवी फ़ज़ल बारी इस बेहद सख़्त सुरक्षा इंतज़ाम वाली जेल में ही क़ैद रहेंगे. लेकिन, काबुल की पुल-ए-चरखी जेल, अफ़ग़ानिस्तान की उन जेलों में से एक है, जहां से तालिबानी चरमपंथियों को धीरे-धीरे बड़ी तादाद में रिहा किया जा रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत, तालिबान से बंद पड़ी शांति वार्ता की बहाली से पहले सद्धभावना के तौर पर तालिबानी लड़ाकों को रिहा कर रही है.

तालिबान ने लंबे समय से एलान किया हुआ है कि उनका अंतिम लक्ष्य अफ़ग़ानिस्तान में दार-उल-इस्लाम यानी इस्लामी क़ानूनों पर चलने वाली अमीरत या हुकूमत क़ायम करनी है. जब 1996 से 2001 के बीच अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का राज था, तो उन्होंने इसी तरीक़े से सरकार चलाई थी.

उस वक़्त की तालिबानी सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान में शरीयत क़ानून लागू किया था. और, उनकी हुकूमत बेहद सख़्त थी. महिलाओं का सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था. साथ ही तमाम जुर्म के लिए पत्थर से पीट कर मारने, हाथ-पैर काटने जैसी सजाएं दी जाती थीं. अभी ये साफ़ नहीं है कि अगर भविष्य में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का राज क़ायम हुआ, तो वो किस तरह की सरकार चलाएंगे.

2001 में अमेरिका ने 9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद तालिबान की हुकूमत का ख़ात्मा कर दिया था. तब से अब तक अफ़ग़ानिस्तान में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. इन में बड़ी तादाद में मारे गए बेगुनाह शहरी शामिल हैं.

जब हम पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी चरमपंथियों से मिले, तो उन्होंने हम से खुल कर बातें कीं. अपनी ज़िंदगी के मक़सद बताए. अपनी शिकायतें बयां कीं. हालांकि उन्होंने अपनी गतिविधियों के बारे में बहुत बारीक़ी से जानकारी नहीं दी.

लेकिन, हमें ये ज़रूर पता है कि मौलवी फ़ज़ल बारी ने 15 साल पहले तालिबान का दामन थामा था. वो अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंद सूबे में तालिबान के कमांडर थे और वहां अंतरराष्ट्रीय सेना से जंग में शामिल थे.

An inmate lies back in his bunk bed decorated by red drapes and a large poster of Medina

ज़मीन पर क़ालीन और गद्दियों का लंबा-चौड़ा विस्तार दिखता है. कोठरी की चारों दीवारों पर पोस्टर लगे हुए हैं. कुछ इस्लाम की पवित्र जगहों जैसे मक्का और मदीना के हैं. तो, कई तस्वीरें ख़ूबसूरत नज़ारों वाली हैं. गुलदस्तों, झरनों और आइसक्रीम के कोन की तस्वीरें भी दीवारों पर नज़र आती हैं.

असल में इस कोठरी को इस तरह सजाया गया है कि जन्नत का दीदार हो. इस के ज़रिए इन क़ैदियों का वो बुनियादी यक़ीन ज़ाहिर होता है कि अगर वो जंग में मारे गएे, तो वो सीधे जन्नत तशरीफ़ ले जाएंगे.

दीवारों से लगी हुई अलमारी में इस्लामी साहित्य की भारी भरकम किताबें और पवित्र पुस्तक क़ुरान रखे हुए हैं. जैसे ही फ़ज़ल बारी ख़ुत्बा पढ़ना शुरू करते हैं, तो सारे क़ैदियों की निगाहें उन पर टिक जाती हैं.

असल में मौलवी फ़ज़ल बारी पहले इस्लाम के वरिष्ठ विद्वान थे. इसीलिए जेल में उनके साथी उन्हें सम्मान की नज़र से देखते हैं.

फज़ल बारी कहते हैं, "मैं आप को बता रहा हूं. जब तक हमारे मुल्क में एक भी विदेशी फ़ौजी रहेगा, अफ़ग़ानिस्तान में अमन आ ही नहीं सकता."

A Talib inmate clasping a cup of green tea listens intently to his elders

तालिबान पर आरोप है कि अफ़ग़ानिस्तान में अपनी हुकूमत के दौरान उसने ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा के दूसरे आतंकवादियों को पनाह दी. इन पर इल्ज़ाम है कि इन्होंने अमरीका पर सितंबर 2001 में 9/11 का आतंकवादी हमला किया था. तालिबान और अमरीका की अगुवाई वाली सेनाओं के बीच अफ़ग़ानिस्तान में पिछले 19 वर्षों से जंग चल रही है, जो अमरीका के इतिहास का सबसे लंबा युद्ध है.

इस साल सितंबर में ऐसा लग रहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तालिबान के बीच समझौता होने वाला है. लेकिन, जब काबुल में एक बम धमाके में एक अमरीकी सैनिक समेत 12 लोग मारे गए, और तालिबान ने इस धमाके की ज़िम्मेदारी ली, तो, ट्रंप ने अचानक ही शांति वार्ता को रद्द कर दिया.

अमरीका का कहना है कि अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में उसके कम से कम 13 हज़ार सैनिक तैनात हैं. तालिबान से चल रही शांति वार्ता के प्रस्तावित समझौते के तहत, अमरीका ने समझौता लागू होने के पांच महीने के भीतर, अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8 हज़ार 600 करने का वादा किया था. लेकिन, फिलहाल तो ये समझौता विचाराधीन भी नहीं है.

2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने ये वादा किया था कि वो राष्ट्रपति चुने गए तो अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला लेंगे.

लेकिन, बहुत से आलोचक मानते हैं कि बिना अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को शामिल किए हुए कोई भी शांति वार्ता सफल नहीं हो सकती. और अब तक शांति वार्ता में अफ़ग़ान सरकार को शामिल नहीं किया गया है. बिना अफ़ग़ान हुकूमत के अगर अमरीकी सेना वापस गई, तो देश में अराजकता फैल जाएगी.

काबुल की जेल के ब्लॉक 6 में चलते हुए आप को महसूस होता है कि आप तालिबान के इलाक़े में आ गए हैं. क़ैदख़ाने के लंबे गलियारे तालिबानी चरमपंथियों से भरे हुए हैं, जो वहां आराम से घूमते-बतियाते, हजामत बनाते, नहाते और खाना पकाते दिखते हैं.

मौलवी फ़ज़ल बारी के ये क़ैदी साथी अफ़ग़ानी समाज के हर तबक़े से आते हैं. वो पूर्व अध्यापक हैं, किसान हैं, कारोबारी हैं और ड्राइवर हैं, जिन्हें तालिबान से ताल्लुक़ रखने के जुर्म में मुक़दमा चला कर सज़ा सुनाई गई है. इन में से किसी पर तालिबान के लिए वसूली करने का इल्ज़ाम है, तो किसी पर हथियार उठाने का और किसी पर बम लगाने का आरोप है.

फ़ज़ल बारी जैसे पुराने क़ैदी, जेल की दिनचर्या तय करते हैं. इस दौरान दिन के कई घंटे इस्लामी किताबें पढ़ने और इबादत का काम चलता है. खाने और क़ैदियों के बाहर निकलने के तय वक़्त के दौरान बातचीत का मुख्य मुद्दा सियासत ही होता है.

बहुत से क़ैदी कहते हैं कि वो शुरुआत में बदला लेने की नीयत से तालिबान के साथ जुड़े थे. अक्सर वो हवाई हमलों का बदला लेने के इरादे से तालिबान से जुड़े.

फ़ज़ल बारी कहते हैं, "जब आज से 15 साल पहले अमरीकी सेनाओं ने मेरे गांव पर हवाई हमला किया था, तब मेरे पड़ोसी और उसकी दो बीवियों की मौत हो गई थी. लेकिन, उनका सबसे छोटा बेटा, रहमतउल्लाह बच गया था. मैंने उस बच्चे को अपना लिया और पढ़ाई करने में उसकी मदद करने लगा. लेकिन, जब भी कोई हेलीकॉप्टर हमारे गांव के ऊपर से गुज़रता था, तो वो बच्चा घबरा जाता था. चीखते हुए मेरी तरफ़ भागता था और कहता था कि वो मुझे मारने आए हैं."

फ़ज़ल बारी कहते हैं कि जब उन्होंने देखा कि उनके मुल्क में विदेशी आकर बहुत सी मस्जिदें तबाह कर रहे हैं. बच्चों और महिलाओं को मार रहे हैं, तो उन्होंने विदेशी ताक़तों के ख़िलाफ़ जंग लड़ने का फ़ैसला किया.

पुल-ए-चरखी के एक और बुज़ुर्ग क़ैदी हैं मुल्ला सुल्तान. सुल्तान का भी कहना है कि वो विदेशी फ़ौज के ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ खड़े होना चाहते थे. सुल्तान कहते हैं, "एक अफ़ग़ान नागरिक के तौर पर ये मेरा फ़र्ज़ है कि मैं इन विदेशी आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करूं. मैं कभी भी अपने मुल्क में इनका रहना मंज़ूर नहीं कर सकता."

A corridor in block 6 of the Taliban wing

पिछले एक दशक में अमरीका की अगुवाई वाले विदेशी सैनिकों को धीरे-धीरे वापस बुलाया जा रहा है. इसके बदले में हवाई हमले तेज़ हो रहे हैं. ये हमले अक्सर ग़लत ठिकानों पर होते हैं, जिससे बड़ी तादाद में बेगुनाह नागरिक मारे जाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, साल 2019 के पहले छह महीनों में, अमरीकी और अफ़ग़ानी सुरक्षा बलों के हाथों तालिबान के मुक़ाबले ज़्यादा आम लोग मारे गए.

हालांकि, संयुक्त राष्ट्र का ये भी कहना है कि पिछले एक दशक में तालिबान और दूसरे चरमपंथी संगठनों ने अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादा आम नागरिकों को मारा है.

अगर तालिबानी क़ैदी ये कहते हैं कि जंग के मोर्चे पर हो रही हलचलों की वजह से ही अफ़ग़ानी युवा तालिबान का दामन थाम रहे हैं. तो, ये भी एक हक़ीक़त है कि तालिबानी लड़ाके जेल में भी लोगों को भड़काते रहते हैं.

मौलवी फ़ज़ल बारी जैसे तजुर्बेकार लड़ाके अपने आक़ाओं से हुक्म पाते हैं. कई बार तो ये फ़रमान सीधे तालिबान के अमीर उल मोमिनीन शेख़ हिबातुल्लाह अख़ुंदज़ादा की तरफ़ से आते हैं. फिर वो इन आदेशों और सीधे क़ैदियों तक पहुंचाते हैं.

जब तालिबान और अमरीका में शांति वार्ता चल रही थी, तब इससे जुड़ी ख़बरों में भी क़ैदी ख़ूब दिलचस्पी लेते थे.

A Talib behind bars in block six

मुल्ला सुल्तान कहते हैं, "हमें पता है कि विदेशी थक गए हैं. हमें पता है कि वो अपने घुटनों पर हैं और जल्द ही वो अपने वतन लौट जाएंगे. तब हम सारे अफ़ग़ानी शरीयत की हुक्मरानी और इस्लामिक निज़ाम के झंडे तले मिल कर रहेंगे."

News image

News image

काबुल की जेल के ब्लॉक 6 में चलते हुए आप को महसूस होता है कि आप तालिबान के इलाक़े में आ गए हैं. क़ैदख़ाने के लंबे गलियारे तालिबानी चरमपंथियों से भरे हुए हैं, जो वहां आराम से घूमते-बतियाते, हजामत बनाते, नहाते और खाना पकाते दिखते हैं.

मौलवी फ़ज़ल बारी के ये क़ैदी साथी अफ़ग़ानी समाज के हर तबक़े से आते हैं. वो पूर्व अध्यापक हैं, किसान हैं, कारोबारी हैं और ड्राइवर हैं, जिन्हें तालिबान से ताल्लुक़ रखने के जुर्म में मुक़दमा चला कर सज़ा सुनाई गई है. इन में से किसी पर तालिबान के लिए वसूली करने का इल्ज़ाम है, तो किसी पर हथियार उठाने का और किसी पर बम लगाने का आरोप है.

फ़ज़ल बारी जैसे पुराने क़ैदी, जेल की दिनचर्या तय करते हैं. इस दौरान दिन के कई घंटे इस्लामी किताबें पढ़ने और इबादत का काम चलता है. खाने और क़ैदियों के बाहर निकलने के तय वक़्त के दौरान बातचीत का मुख्य मुद्दा सियासत ही होता है.

बहुत से क़ैदी कहते हैं कि वो शुरुआत में बदला लेने की नीयत से तालिबान के साथ जुड़े थे. अक्सर वो हवाई हमलों का बदला लेने के इरादे से तालिबान से जुड़े.

फ़ज़ल बारी कहते हैं, "जब आज से 15 साल पहले अमरीकी सेनाओं ने मेरे गांव पर हवाई हमला किया था, तब मेरे पड़ोसी और उसकी दो बीवियों की मौत हो गई थी. लेकिन, उनका सबसे छोटा बेटा, रहमतउल्लाह बच गया था. मैंने उस बच्चे को अपना लिया और पढ़ाई करने में उसकी मदद करने लगा. लेकिन, जब भी कोई हेलीकॉप्टर हमारे गांव के ऊपर से गुज़रता था, तो वो बच्चा घबरा जाता था. चीखते हुए मेरी तरफ़ भागता था और कहता था कि वो मुझे मारने आए हैं."

फ़ज़ल बारी कहते हैं कि जब उन्होंने देखा कि उनके मुल्क में विदेशी आकर बहुत सी मस्जिदें तबाह कर रहे हैं. बच्चों और महिलाओं को मार रहे हैं, तो उन्होंने विदेशी ताक़तों के ख़िलाफ़ जंग लड़ने का फ़ैसला किया.

पुल-ए-चरखी के एक और बुज़ुर्ग क़ैदी हैं मुल्ला सुल्तान. सुल्तान का भी कहना है कि वो विदेशी फ़ौज के ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ खड़े होना चाहते थे. सुल्तान कहते हैं, "एक अफ़ग़ान नागरिक के तौर पर ये मेरा फ़र्ज़ है कि मैं इन विदेशी आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करूं. मैं कभी भी अपने मुल्क में इनका रहना मंज़ूर नहीं कर सकता."

पिछले एक दशक में अमरीका की अगुवाई वाले विदेशी सैनिकों को धीरे-धीरे वापस बुलाया जा रहा है. इसके बदले में हवाई हमले तेज़ हो रहे हैं. ये हमले अक्सर ग़लत ठिकानों पर होते हैं, जिससे बड़ी तादाद में बेगुनाह नागरिक मारे जाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, साल 2019 के पहले छह महीनों में, अमरीकी और अफ़ग़ानी सुरक्षा बलों के हाथों तालिबान के मुक़ाबले ज़्यादा आम लोग मारे गए.

हालांकि, संयुक्त राष्ट्र का ये भी कहना है कि पिछले एक दशक में तालिबान और दूसरे चरमपंथी संगठनों ने अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादा आम नागरिकों को मारा है.

अगर तालिबानी क़ैदी ये कहते हैं कि जंग के मोर्चे पर हो रही हलचलों की वजह से ही अफ़ग़ानी युवा तालिबान का दामन थाम रहे हैं. तो, ये भी एक हक़ीक़त है कि तालिबानी लड़ाके जेल में भी लोगों को भड़काते रहते हैं.

मौलवी फ़ज़ल बारी जैसे तजुर्बेकार लड़ाके अपने आक़ाओं से हुक्म पाते हैं. कई बार तो ये फ़रमान सीधे तालिबान के अमीर उल मोमिनीन शेख़ हिबातुल्लाह अख़ुंदज़ादा की तरफ़ से आते हैं. फिर वो इन आदेशों और सीधे क़ैदियों तक पहुंचाते हैं.

जब तालिबान और अमरीका में शांति वार्ता चल रही थी, तब इससे जुड़ी ख़बरों में भी क़ैदी ख़ूब दिलचस्पी लेते थे.

मुल्ला सुल्तान कहते हैं, "हमें पता है कि विदेशी थक गए हैं. हमें पता है कि वो अपने घुटनों पर हैं और जल्द ही वो अपने वतन लौट जाएंगे. तब हम सारे अफ़ग़ानी शरीयत की हुक्मरानी और इस्लामिक निज़ाम के झंडे तले मिल कर रहेंगे."

तालिबान के उम्रदराज़ हो चुके लड़ाके मुल्ला सुल्तान (बाएं) और मौलवी फ़ज़ल बारी (दाहिने)

तालिबान के उम्रदराज़ हो चुके लड़ाके मुल्ला सुल्तान (बाएं) और मौलवी फ़ज़ल बारी (दाहिने)

तालिबान के उम्रदराज़ हो चुके लड़ाके मुल्ला सुल्तान (बाएं) और मौलवी फ़ज़ल बारी (दाहिने)

पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी क़ैदियों को दूसरे क़ैदियों के मुक़ाबले ज़्यादा सुविधाएं हासिल हैं. वो अपनी दिनचर्या का वक़्त ख़ुद तय करते हैं. जेल में वो अपना मदरसा चलाते हैं. उनकी सेहत और क़ानूनी मदद का भी बेहतर इंतज़ाम है.

तालिबानी क़ैदियों के बीच एकता और उनके अनुशासन की वजह से भी जेल में उनका दबदबा है. इसके नतीजे में कई बार वो सभी क़ैदियों की नुमाइंदगी करते हुए, जेल में ज़्यादा सुविधाओं की मांग उठाते हैं और उन्हें हासिल भी करते हैं.

जेल के सुरक्षाकर्मी भी मानते हैं कि तालिबानी क़ैदियों का मोर्चा बहुत मज़बूत है. और जैसा कि एक और तालिबानी लड़ाके, मौलवी मामूर कहते हैं कि वो एक-दूसरे के लिए जान भी देने को तैयार होते हैं.

सुरक्षाकर्मी कहते हैं कि तालिबानी चरमपंथी क़ैदियों के साथ उनका संबंध आपसी सहयोग वाला है.

28 बरस के गार्ड रहमुद्दीन, जो ब्लॉक 6 के कमांडर भी हैं, कहते हैं, "हमारे गार्डों और तालिबानी क़ैदियों के बीच में सहयोग की भावना ज़बरदस्त है. यहां क़रीब दो हज़ार तालिबानी चरमपंथी क़ैद हैं. ऐसे में तमाम समस्याओं के समाधान के लिए उनका सहयोग ज़रूरी होता है."

लेकिन, पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी चरमपंथियों की आए दिनों होने वाली हड़ताल से साफ़ है कि सुरक्षाकर्मियों से उनका ताल्लुक़ हमेशा दोस्ताना ही नहीं होता.

क़ैदियों ने बीबीसी को बताया कि वो अक्सर अपने होंठ सिल कर या साइकिल के पहियों की तीलियां होंठों में लगाकर जेल की बुरी हालत के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल करते हैं. क्योंकि क़ैदियों को अक्सर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं. उनके मुक़दमों की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है. और सुरक्षा कर्मी अक्सर क़ैदियों से बदसलूकी करते हैं.

कई बार ऐसी ख़बरें भी आई हैं कि तालिबानी क़ैदियों ने सुरक्षा कर्मियों पर हमला कर दिया या उन्होंने जेल के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया.

जब बीबीसी ने इन ख़बरों की तस्दीक़ के लिए अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक मंत्रालय से संपर्क किया, तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया. जबकि हर महीने अफ़ग़ान सरकार के आंतरिक मंत्रालय को जेल में हड़ताल की तस्वीरें भेजी जाती हैं और उनसे मदद की गुहार लगाई जाती है.

इस साल की शुरुआत में क़ैदियों और जेल के सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प में चार क़ैदी मारे गए थे. जबकि 33 लोग ज़ख़्मी हो गए थे. इन में 20 पुलिसकर्मी भी शामिल थे. अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक़, पुल-ए-चरखी जेल के क़ैदी ख़राब सेहत और स्वास्थ सुविधाओं की कमी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे, जब ये झड़प हुई.

लेकिन, आंतरिक मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि उस वक़्त जेल में ड्रग के इस्तेमाल को रोकने के लिए जांच चल रही थी. तभी ड्रग तस्करों ने क़ैदियों को सुरक्षाकर्मियों के ख़िलाफ़ भड़काया था.

पुल-ए-चरखी जेल की ऊपर से ली गई तस्वीर

पुल-ए-चरखी जेल की ऊपर से ली गई तस्वीर

पुल-ए-चरखी जेल की ऊपर से ली गई तस्वीर

ऐसे मुश्किल हालात में कई साल गुज़ारने की वजह से क़ैदियों का रवैया और भी सख़्त हो चला है.

इन में से कई को जेल से रिहा किया गया है, तो कुछ की रिहाई का जल्द ही नंबर आने वाला है. अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने इस साल जून में कहा था कि पुल-ए-चरखी और देश की दूसरी जेलों से 887 तालिबानी लड़ाकों को रिहा किया जाएगा.

ईद के मौक़े पर अक्सर अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति क़ैदियों की रिहाई का ऐलान करते हैं. लेकिन, जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी तादाद में तालिबानी चरमपंथियों को जेल से रिहा करने की घोषणा अभूतपूर्व है. शायद अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने ख़ुद को अमरीका और तालिबान के बीच शांति वार्ता से अलग रखे जाने पर अपनी ताक़त दिखाने के लिए ऐसा किया.

तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की सरकार से सीधे शांति वार्ता के लिए साफ़ इनकार कर दिया था. क्योंकि तालिबान इसे अवैध सरकार मानते हैं.

मौलवी फ़ज़ल बारी की सज़ा पूरी होने में अभी दो साल और बाक़ी हैं. लेकिन, वो इस बात पर अड़े हुए हैं कि जेल से रिहा होने के बाद वो दोबारा जिहाद जारी रखेंगे.

फ़ज़ल बारी कहते हैं, "जब मुझे यहां से रिहा किया जाएगा, तो मैं फिर से अपने साथियों के पास जाउंगा. पहले में जंग के प्रति केवल 20 फ़ीसद ही प्रतिबद्ध था. लेकिन अब में पूरी तरह से जिहाद के प्रति समर्पित हूं, ताकि अपने मुल्क की हिफ़ाज़त कर सकूं."

पुल-ए-चरखी जेल से रिहा किए गए तालिबानी चरमपंथियों में से एक मौलवी फ़ज़ल बारी के क़ैदी साथी क़ारी सैयद मुहम्मद हैं, जो तालिबान के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में रहते हैं.

Three Taliban elders walk around the prison perimeter

News image

News image

तालिबान के उम्रदराज़ हो चुके लड़ाके मुल्ला सुल्तान (बाएं) और मौलवी फ़ज़ल बारी (दाहिने)

तालिबान के उम्रदराज़ हो चुके लड़ाके मुल्ला सुल्तान (बाएं) और मौलवी फ़ज़ल बारी (दाहिने)

पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी क़ैदियों को दूसरे क़ैदियों के मुक़ाबले ज़्यादा सुविधाएं हासिल हैं. वो अपनी दिनचर्या का वक़्त ख़ुद तय करते हैं. जेल में वो अपना मदरसा चलाते हैं. उनकी सेहत और क़ानूनी मदद का भी बेहतर इंतज़ाम है.

तालिबानी क़ैदियों के बीच एकता और उनके अनुशासन की वजह से भी जेल में उनका दबदबा है. इसके नतीजे में कई बार वो सभी क़ैदियों की नुमाइंदगी करते हुए, जेल में ज़्यादा सुविधाओं की मांग उठाते हैं और उन्हें हासिल भी करते हैं. जेल के सुरक्षाकर्मी भी मानते हैं कि तालिबानी क़ैदियों का मोर्चा बहुत मज़बूत है. और जैसा कि एक और तालिबानी लड़ाके, मौलवी मामूर कहते हैं कि वो एक-दूसरे के लिए जान भी देने को तैयार होते हैं.

सुरक्षाकर्मी कहते हैं कि तालिबानी चरमपंथी क़ैदियों के साथ उनका संबंध आपसी सहयोग वाला है.

28 बरस के गार्ड रहमुद्दीन, जो ब्लॉक 6 के कमांडर भी हैं, कहते हैं, "हमारे गार्डों और तालिबानी क़ैदियों के बीच में सहयोग की भावना ज़बरदस्त है. यहां क़रीब दो हज़ार तालिबानी चरमपंथी क़ैद हैं. ऐसे में तमाम समस्याओं के समाधान के लिए उनका सहयोग ज़रूरीत होता है."

लेकिन, पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी चरमपंथियों की आए दिनों होने वाली हड़ताल से साफ़ है कि सुरक्षाकर्मियों से उनका ताल्लुक़ हमेशा दोस्ताना ही नहीं होता.

क़ैदियों ने बीबीसी को बताया कि वो अक्सर अपने होंठ सिल कर या साइकिल के पहियों की तीलियां होंठों में लगाकर जेल की बुरी हालत के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल करते हैं. क्योंकि क़ैदियों को अक्सर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं. उनके मुक़दमों की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है. और सुरक्षा कर्मी अक्सर क़ैदियों से बदसलूकी करते हैं.

कई बार ऐसी ख़बरें भी आई हैं कि तालिबानी क़ैदियों ने सुरक्षा कर्मियों पर हमला कर दिया या उन्होंने जेल के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया.

जब बीबीसी ने इन ख़बरों की तस्दीक़ के लिए अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक मंत्रालय से संपर्क किया, तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया. जबकि हर महीने अफ़ग़ान सरकार के आंतरिक मंत्रालय को जेल में हड़ताल की तस्वीरें भेजी जाती हैं और उनसे मदद की गुहार लगाई जाती है.

इस साल की शुरुआत में क़ैदियों और जेल के सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प में चार क़ैदी मारे गए थे. जबकि 33 लोग ज़ख़्मी हो गए थे. इन में 20 पुलिसकर्मी भी शामिल थे. अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक़, पुल-ए-चरखी जेल के क़ैदी ख़राब सेहत और स्वास्थ सुविधाओं की कमी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे, जब ये झड़प हुई.

लेकिन, आंतरिक मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि उस वक़्त जेल में ड्रग के इस्तेमाल को रोकने के लिए जांच चल रही थी. तभी ड्रग तस्करों ने क़ैदियों को सुरक्षाकर्मियों के ख़िलाफ़ भड़काया था.

News image

ऐसे मुश्किल हालात में कई साल गुज़ारने की वजह से क़ैदियों का रवैया और भी सख़्त हो चला है.

इन में से कई को जेल से रिहा किया गया है, तो कुछ की रिहाई का जल्द ही नंबर आने वाला है. अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने इस साल जून में कहा था कि पुल-ए-चरखी और देश की दूसरी जेलों से 887 तालिबानी लड़ाकों को रिहा किया जाएगा.

News image

ईद के मौक़े पर अक्सर अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति क़ैदियों की रिहाई का ऐलान करते हैं. लेकिन, जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी तादाद में तालिबानी चरमपंथियों को जेल से रिहा करने की घोषणा अभूतपूर्व है. शायद अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने ख़ुद को अमरीका और तालिबान के बीच शांति वार्ता से अलग रखे जाने पर अपनी ताक़त दिखाने के लिए ऐसा किया.

तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की सरकार से सीधे शांति वार्ता के लिए साफ़ इनकार कर दिया था. क्योंकि तालिबान इसे अवैध सरकार मानते हैं.

मौलवी फ़ज़ल बारी की सज़ा पूरी होने में अभी दो साल और बाक़ी हैं. लेकिन, वो इस बात पर अड़े हुए हैं कि जेल से रिहा होने के बाद वो दोबारा जिहाद जारी रखेंगे.

फ़ज़ल बारी कहते हैं, "जब मुझे यहां से रिहा किया जाएगा, तो मैं फिर से अपने साथियों के पास जाउंगा. पहले में जंग के प्रति केवल 20 फ़ीसद ही प्रतिबद्ध था. लेकिन अब में पूरी तरह से जिहाद के प्रति समर्पित हूं, ताकि अपने मुल्क की हिफ़ाज़त कर सकूं."

पुल-ए-चरखी जेल से रिहा किए गए तालिबानी चरमपंथियों में से एक मौलवी फ़ज़ल बारी के क़ैदी साथी क़ारी सैयद मुहम्मद हैं, जो तालिबान के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में रहते हैं.

तालिबान का इलाक़ा

बल्ख़

उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान

32 बरस के क़ारी सैयद मुहम्मद उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख़ सूबे में रहते हैं, जो तालिबान के क़ब्ज़े वाला इलाक़ा है. क़ारी सैयद ने पुल-ए-चरखी जेल में छह साल गुज़ारे हैं.

आज अपने परिवार के वो इकलौते मर्द हैं, जो ज़िंदा हैं. उनके अब्बा और दो भाई उस वक़्त मारे गए थे, जब क़ारी जेल में थे. अब अपने परिवार का बसर करने के लिए क़ारी सैयद को अपने गांव में रहकर खेती करनी ज़रूरी है.

क़ारी सैयद मुहम्मद का मानना है कि हाल ही में जेल से जो क़ैदी रिहा किए गए हैं, उन में से गिनती के ही ज़िंदा बचे हैं.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि हाल में जिन मुजाहिदीन को रिहा किया गया था, उनमें से ज़्यादातर दोबारा तालिबान की तरफ़ से जिहाद में शरीक हो गए थे, और ज़्यादातर मारे जा चुके हैं."

क़ारी के दोस्त फ़ज़ल बारी तो बदले के लिए तालिबान के साथ जुड़े थे. लेकिन ख़ुद क़ारी ने पुलिस के ज़ुल्म से बचने के लिए तालिबान का दामन थामा था. उस वक़्त उनकी उम्र केवल 18 बरस थी.

वो कहते हैं, "पुलिस के सितम, गांव की ज़िंदगी का अटूट हिस्सा हैं. अक्सर होता ये है कि किसी ने भी पुलिस को हमारे बारे में झूठ भी बोल दिया तो, वो हमें परेशान करते हैं. इसलिए हम ने सोचा कि अगर पुलिस हमें गिरफ़्तार ही कर लेगी, तो क्यों न हम अपनी क़िस्मत का फ़ैसला ख़ुद से करें."

अफ़ग़ानिस्तान की पुलिस के हिंसक बर्ताव और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बारे में कई बार मानवाधिकार संगठनों ने आवाज़ उठाई है.

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान के युवाओं के तालिबान से जुड़ने की कई वजहें होती हैं. ग़लत ठिकानों पर हवाई हमले, विदेशी सैनिकों की अंधाधुंध फ़ायरिंग, बेरोज़गारी, जंग में लूट के माल का लालच, जैसे कि हथियार, गाड़ियां और गोला-बारूद भी तालिबान से जुड़ने की वजह बनती हैं.

इन सामानों को वो बेच कर कुछ पैसे कमा लेते हैं कई बार दोस्तों और साथियों के दबाव में भी लोग तालिबान के जिहाद का हिस्सा बन जाते हैं.

क़ारी मुहम्मद जब तालिबान से जुड़े थे, तो शुरू में उनका काम पैसे वसूलना होता था. मोटरसाइकिल पर सवार होकर छह लोगों की टोली गांवों की तरफ़ निकलती थी और अफ़ीम की खेती करने वाले हर किसान से वसूली करती थी. तालिबान के इलाक़े में अफ़ीम की खेती क़ानूनन वैध है. क़ारी के ऊपर अफ़ग़ानिस्तान के चार ज़िलों में वसूली की ज़िम्मेदारी थी.

क़ारी कहते हैं कि इस काम के लिए उन्हें कोई तनख़्वाह नहीं मिलती थी. लेकिन, उनका सारा ख़र्च निकल आता था. उन्हें हथियारों, ईंधन और मोबाइल के लिए पैसे मिल जाते थे.

क़ारी कहते हैं कि तीन साल बाद जब पूरे मुल्क में जंग तेज़ हो गई, तब उनका इरादा बदल गया और वो विदेशी फ़ौजों के ख़िलाफ़ तालिबान के जिहाद में शामिल हो गए.

क़ारी बताते हैं, "जब मैंने पहली बार अपने कंधे पर बंदूक टांगी थी तब मेरी उम्र 21 बरस थी. मुझे आज भी याद है कि मैं ये सोचते हुए जंग के मोर्चे की तरफ़ चला था कि मैं काफ़िरों के ख़िलाफ़ जिहाद करने जा रहा हूं, ताकि इस्लाम की हिफ़ाज़त कर सकूं. वो ख़याल आज भी मेरे ज़ेहन में है और मरते दम तक रहेगा."

Two of Qari Sayed Muhammed's four daughters play on a homemade swing

एक जिहादी विचारधारा का पालन करने वाले क़ारी कहते हैं कि उन्हें जब भी अपनी मौत को लेकर दिल में डर उठता है, और परिवार की फ़िक्र होती है, तो वो ये कह कर दिल को समझाते हैं कि वो अल्लाह की ख़िदमत करते हुए मारे जाएंगे.

क़ारी सैयद एक मोर्चे पर जाने का क़िस्सा बताते हैं. जब उनकी टुकड़ी को एक गांव में घेर लिया गया था और रूसी मशीनगन से उन पर लगातार गोलियां बरसाई जा रही थीं.

क़ारी बताते हैं, "ऐसे मौक़ों पर आप का ज़हन बहुत तेज़ी से चलने लगता है. आप सोचने लगते हैं कि अगर आप की जान चली गई तो आप के परिवार का क्या होगा? मेरे बच्चों का क्या होगा? मेरी बीवी क्या करेगी? ये वो मौक़ा होता है, जब शैतान आप को दीन के रास्ते से भटकाने की कोशिश करता है, ताकि आप अपने परिवार के बारे में सोचने लगें. लेकिन, मैंने अपना सारा दिमाग़ इस बात पर लगाया कि मैं तो बस अल्लाह की ख़िदमत कर रहा हूं."

क़ारी सैयद मुहम्मद को 2013 में अफ़ग़ानिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ने गिरफ़्तार किया था. फिर उन्हें पुल-ए-चरखी जेल भेज दिया गया. क़ारी मानते हैं कि जिन 15 लोगों के साथ वो पहली बार अपना गांव छोड़ कर तालिबान के जिहाद में शामिल होने निकले थे, उन में से केवल दो लोग ही अब ज़िंदा बचे हैं.

News image

32 बरस के क़ारी सैयद मुहम्मद उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख़ सूबे में रहते हैं, जो तालिबान के क़ब्ज़े वाला इलाक़ा है. क़ारी सैयद ने पुल-ए-चरखी जेल में छह साल गुज़ारे हैं.

आज अपने परिवार के वो इकलौते मर्द हैं, जो ज़िंदा हैं. उनके अब्बा और दो भाई उस वक़्त मारे गए थे, जब क़ारी जेल में थे. अब अपने परिवार का बसर करने के लिए क़ारी सैयद को अपने गांव में रहकर खेती करनी ज़रूरी है.

क़ारी सैयद मुहम्मद का मानना है कि हाल ही में जेल से जो क़ैदी रिहा किए गए हैं, उन में से गिनती के ही ज़िंदा बचे हैं.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि हाल में जिन मुजाहिदीन को रिहा किया गया था, उन में से ज़्यादातर दोबारा तालिबान की तरफ़ से जिहाद में शरीक हो गए थे, और ज़्यादातर मारे जा चुके हैं."

क़ारी के दोस्त फ़ज़ल बारी तो बदले के लिए तालिबान के साथ जुड़े थे. लेकिन ख़ुद क़ारी ने पुलिस के ज़ुल्म से बचने के लिए तालिबान का दामन थामा था. उस वक़्त उनकी उम्र केवल 18 बरस थी.

वो कहते हैं, "पुलिस के सितम, गांव की ज़िंदगी का अटूट हिस्सा हैं. अक्सर होता ये है कि किसी ने भी पुलिस को हमारे बारे में झूठ भी बोल दिया तो, वो हमें परेशान करते हैं. इसलिए हम ने सोचा कि अगर पुलिस हमें गिरफ़्तार ही कर लेगी, तो क्यों न हम अपनी क़िस्मत का फ़ैसला ख़ुद से करें."

अफ़ग़ानिस्तान की पुलिस के हिंसक बर्ताव और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बारे में कई बार मानवाधिकार संगठनों ने आवाज़ उठाई है.

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान के युवाओं के तालिबान से जुड़ने की कई वजहें होती हैं. ग़लत ठिकानों पर हवाई हमले, विदेशी सैनिकों की अंधाधुंध फ़ायरिंग, बेरोज़गारी, जंग में लूट के माल का लालच, जैसे कि हथियार, गाड़ियां और गोला-बारूद भी तालिबान से जुड़ने की वजह बनती हैं.

इन सामानों को वो बेच कर कुछ पैसे कमा लेते हैं कई बार दोस्तों और साथियों के दबाव में भी लोग तालिबान के जिहाद का हिस्सा बन जाते हैं.

क़ारी मुहम्मद जब तालिबान से जुड़े थे, तो शुरू में उनका काम पैसे वसूलना होता था. मोटरसाइकिल पर सवार होकर छह लोगों की टोली गांवों की तरफ़ निकलती थी और अफ़ीम की खेती करने वाले हर किसान से वसूली करती थी. तालिबान के इलाक़े में अफ़ीम की खेती क़ानूनन वैध है.

क़ारी के ऊपर अफ़ग़ानिस्तान के चार ज़िलों में वसूली की ज़िम्मेदारी थी. क़ारी कहते हैं कि इस काम के लिए उन्हें कोई तनख़्वाह नहीं मिलती थी. लेकिन, उनका सारा ख़र्च निकल आता था. उन्हें हथियारों, ईंधन और मोबाइल के लिए पैसे मिल जाते थे.

क़ारी कहते हैं कि तीन साल बाद जब पूरे मुल्क में जंग तेज़ हो गई, तब उनका इरादा बदल गया और वो विदेशी फ़ौजों के ख़िलाफ़ तालिबान के जिहाद में शामिल हो गए.

क़ारी बताते हैं, "जब मैं ने पहली बार अपने कंधे पर बंदूक टांगी थी तब मेरी उम्र 21 बरस थी. मुझे आज भी याद है कि मैं ये सोचते हुए जंग के मोर्चे की तरफ़ चला था कि मैं काफ़िरों के ख़िलाफ़ जिहाद करने जा रहा हूं, ताकि इस्लाम की हिफ़ाज़त कर सकूं. वो ख़याल आज भी मेरे ज़ेहन में है और मरते दम तक रहेगा."

News image

एक जिहादी विचारधारा का पालन करने वाले क़ारी कहते हैं कि उन्हें जब भी अपनी मौत को लेकर दिल में डर उठता है, और परिवार की फ़िक्र होती है, तो वो ये कह कर दिल को समझाते हैं कि वो अल्लाह की ख़िदमत करते हुए मारे जाएंगे.

क़ारी सैयद एक मोर्चे पर जाने का क़िस्सा बताते हैं. जब उनकी टुकड़ी को एक गांव में घेर लिया गया था और रूसी मशीनगन से उन पर लगातार गोलियां बरसाई जा रही थीं.

क़ारी बताते हैं, "ऐसे मौक़ों पर आप का दिमाग़ बहुत तेज़ी से चलने लगता है. आप सोचने लगते हैं कि अगर आप की जान चली गई तो आप के परिवार का क्या होगा? मेरे बच्चों का क्या होगा? मेरी बीवी क्या करेगी? ये वो मौक़ा होता है, जब शैतान आप को दीन के रास्ते से भटकाने की कोशिश करता है, ताकि आप अपने परिवार के बारे में सोचने लगें. लेकिन, मैंने अपना सारा दिमाग़ इस बात पर लगाया कि मैं तो बस अल्लाह की ख़िदमत कर रहा हूं."

क़ारी सैयद मुहम्मद को 2013 में अफ़ग़ानिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ने गिरफ़्तार किया था. फिर उन्हें पुल-ए-चरखी जेल भेज दिया गया. क़ारी मानते हैं कि जिन 15 लोगों के साथ वो पहली बार अपना गांव छोड़ कर तालिबान के जिहाद में शामिल होने निकले थे, उन में से केवल दो लोग ही अब ज़िंदा बचे हैं.

अफ़ग़ान सरकार का इलाक़ा

कुनार

पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान

कई दशकों से चले आ रहे युद्ध की वजह से आज अफ़ग़ानिस्तान अलग-अलग ताक़तों के क़ब्ज़े में है. फ़ाउंडेशन फ़ॉर डिफ़ेंस ऑफ़ डेमोक्रेसीज़ के लॉन्ग वॉर जर्नल में छपे शोध के मुताबिक मुल्क का केवल 20-30 फ़ीसद इलाक़े पर ही अफ़ग़ान सरकार का निज़ाम चलता है.

आज तालिबान का क़ब्ज़ा 2001 में उनकी हुकूमत के दौर से ज़्यादा बड़े इलाक़े में है. ऐसे में युवाओं के लिए बहुत ही कम मौक़े उपलब्ध हैं. ऐसे में बहुत से लोगों के लिए जंग में शामिल होने के सिवा कोई और रास्ता नहीं होता. 

कोई व्यक्ति लड़ाई में किस की तरफ़ से शामिल होगा, ये बात अक्सर उसकी पैदाइश के ठिकाने से तय होती है. पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के कुनार सूबे के रहने वाले नेमतउल्लाह केवल 24 साल के थे, जब उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान की सेना में शामिल होने का फ़ैसला किया.

नेमतउल्लाह की कहानी, अफ़ग़ानिस्तान में फैली अराजकता की सटीक मिसाल है.

अपने खेत में नेमतउल्लाह

अपने खेत में नेमतउल्लाह

अपने खेत में नेमतउल्लाह

क़रीब तीन साल तक पूरे अफ़ग़ानिस्तान में सफ़र करते और जंग लड़ते हुए, नेमतउल्लाह और उनकी टुकड़ी को उरुज़गान सूबे के पहाड़ी इलाक़े चिनार्तू की अलग-थलग पड़ी चौकी की निगरानी के लिए भेजा गया.

नेमतउल्लाह की चौकी पर अक्सर तालिबान की छोटी टुकड़ियां हमला कर देती थीं. तब वो और उनके साथी सैनिक पलटवार में गोलीबारी करते थे और फिर तालिबानी टुकड़ी पीछे हट जाती थी. ये रोज़मर्रा की बात हो गई थी.

लेकिन, एक दिन तालिबानी चरमपंथियों ने बड़ी तादाद में नेमतउल्लाह की चौकी पर हमला कर दिया. लंबी लड़ाई चली. सुबह होने तक नेमतउल्लाह और उनके साथियों की गोलियां ख़त्म हो गई थीं.

तब तालिबानी लड़ाकों ने उन्हें पकड़ लिया और उनकी आंखों पर पट्टी बांध कर बंदूकों के बट से बुरी तरह पीटा, नेमतउल्लाह बताते हैं, "तालिबानी लड़ाके हमें काफ़िर कह कर गाली दे रहे थे. फिर वो हमें बांध कर वहां से ले गए. हर अगले क़दम पर मुझे लगता था कि मैं अपनी मौत की तरफ़ बढ़ रहा हूं."

कई दिनों बाद अफ़ग़ानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने नेमतउल्लाह के परिवार से संपर्क किया और बताया कि उनका बेटा जंग में शहीद हो गया है. वो आकर उसका शव मुर्दाघर से ले जाएं.

जब नेमतउल्लाह के परिवार को बंद ताबूत मिला, तो उसके कुछ घंटों बाद ही उनका जनाज़ा निकाल कर ताबूत को दफ़न कर दिया गया. अधिकारियों ने नेमतउल्लाह के परिवार वालों को ताबूत खोलने से मना कर दिया और कहा कि उनके बेटे का शव पहचाने जाने की हालत में नहीं है.

18 महीनों तक नेमतउल्लाह का परिवार और उनकी मंगेतर रोज़ उनकी क़ब्र पर जा कर फूल चढ़ाते और फ़ातिहा पढ़ते रहे.

News image

कई दशकों से चले आ रहे युद्ध की वजह से आज अफ़ग़ानिस्तान अलग-अलग ताक़तों के क़ब्ज़े में है. फ़ाउंडेशन फ़ॉर डिफ़ेंस ऑफ़ डेमोक्रेसीज़ के लॉन्ग वॉर जर्नल में छपे शोध के मुताबिक मुल्क का केवल 20-30 फ़ीसद इलाक़े पर ही अफ़ग़ान सरकार का निज़ाम चलता है. आज तालिबान का क़ब्ज़ा 2001 में उनकी हुकूमत के दौर से ज़्यादा बड़े इलाक़े में है.

ऐसे में युवाओं के लिए बहुत ही कम मौक़े उपलब्ध हैं. ऐसे में बहुत से लोगों के लिए जंग में शामिल होने के सिवा कोई और रास्ता नहीं होता. कोई व्यक्ति लड़ाई में किस की तरफ़ से शामिल होगा, ये बात अक्सर उसकी पैदाइश के ठिकाने से तय होती है.

पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के कुनार सूबे के रहने वाले नेमतउल्लाह केवल 24 साल के थे, जब उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान की सेना में शामिल होने का फ़ैसला किया. नेमतउल्लाह की कहानी, अफ़ग़ानिस्तान में फैली अराजकता की सटीक मिसाल है.

News image

क़रीब तीन साल तक पूरे अफ़ग़ानिस्तान में सफ़र करते और जंग लड़ते हुए, नेमतउल्लाह और उनकी टुकड़ी को उरुज़गान सूबे के पहाड़ी इलाक़े चिनार्तू की अलग-थलग पड़ी चौकी की निगरानी के लिए भेजा गया.

नेमतउल्लाह की चौकी पर अक्सर तालिबान की छोटी टुकड़ियां हमला कर देती थीं. तब वो और उनके साथी सैनिक पलटवार में गोलीबारी करते थे और फिर तालिबानी टुकड़ी पीछे हट जाती थी. ये रोज़मर्रा की बात हो गई थी.

लेकिन, एक दिन तालिबानी चरमपंथियों ने बड़ी तादाद में नेमतउल्लाह की चौकी पर हमला कर दिया. लंबी लड़ाई चली. सुबह होने तक नेमतउल्लाह और उनके साथियों की गोलियां ख़त्म हो गई थीं.

तब तालिबानी लड़ाकों ने उन्हें पकड़ लिया और उनकी आंखों पर पट्टी बांध कर बंदूकों के बट से बुरी तरह पीटा, नेमतउल्लाह बताते हैं, "तालिबानी लड़ाके हमें काफ़िर कह कर गाली दे रहे थे. फिर वो हमें बांध कर वहां से ले गए. हर अगले क़दम पर मुझे लगता था कि मैं अपनी मौत की तरफ़ बढ़ रहा हूं."

:

News image

कई दिनों बाद अफ़ग़ानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने नेमतउल्लाह के परिवार से संपर्क किया और बताया कि उनका बेटा जंग में शहीद हो गया है. वो आकर उसका शव मुर्दाघर से ले जाएं.

जब नेमतउल्लाह के परिवार को बंद ताबूत मिला, तो उसके कुछ घंटों बाद ही उनका जनाज़ा निकाल कर ताबूत को दफ़न कर दिया गया. अधिकारियों ने नेमतउल्लाह के परिवार वालों को ताबूत खोलने से मना कर दिया और कहा कि उनके बेटे का शव पहचाने जाने की हालत में नहीं है.

18 महीनों तक नेमतउल्लाह का परिवार और उनकी मंगेतर रोज़ उनकी क़ब्र पर जा कर फूल चढ़ाते और फ़ातिहा पढ़ते रहे.

Nematullah with his family at the graveside of the unknown solider buried in his place

उधर, उरुज़गन में नेमतउल्लाह को पहाड़ियों के बीच गुफ़ाओं से भरे एक इलाक़े में ले जाया गया था. उनके साथ 54 और लोगों को भी तालिबान ने पकड़ रखा था. उन्हें चट्टान को काट कर अपनी कोठरी ख़ुद ही बनानी पड़ी. क़रीब डेढ़ साल तक ख़ुद की बनाई इस कोठरी में नेमतउल्लाह, 11 और लोगों के साथ रहे.

ये सभी बंधक अफ़ग़ान सेना और पुलिस से ताल्लुक़ रखते थे. उनके हाथ और पैर हमेशा बंधे रहते थे. उन दिनों को याद करते हुए नेमतउल्लाह बताते हैं कि तालिबान उन्हें खाने के लिए बहुत कम रोटियां देते थे. रोज़ की ये क़ैद उनके लिए भूख जैसी परेशानी बन गई थी.

तभी एक रात को नेमतउल्लाह और उनके साथियों की नींद तेज़ धमाकों की आवाज़ से खुली. उनके पास ही हवाई हमला हुआ था. इससे हुई तबाही से नेमतउल्लाह और बाक़ी क़ैदियों को वहां से छूट कर भागने का मौक़ा मिल गया.

तालिबान की क़ैद से निकलने के बाद नेमतउल्लाह ने सब से पहले अपने पिता को फ़ोन किया. नेमतउल्लाह बताते हैं कि जब फ़ोन पर उन्होंने अपने अब्बा से कहा, "मैं नेमत बोल रहा हूं, तो मेरे पिता ने कहा कौन नेमत? मैंने कहा-आपका फ़रज़ंद (बेटा). लेकिन उन्हें मेरी बात पर यक़ीन नहीं हुआ."

इसके बाद उन्होंने अपनी कई सेल्फ़ी अब्बा को भेजीं, तब जाकर उन्हें यक़ीन हुआ कि उनका बेटा अभी ज़िंदा है.

Nematullah walks through the graveyard where the fallen solider is buried

नेमतउल्लाह, रमज़ान के पहले दिन कुनार स्थित अपने घर पहुंचे थे. पूरे गांव में उनके ज़िंदा होने की ख़बर पहले ही फैल चुकी थी. जश्न मनाया जा रहा था. लेकिन, उस में शरीक होने से पहले नेमतउल्लाह को एक अहम काम करना था. उन्होंने जाकर उस अनजान फ़ौजी की क़ब्र पर फूल चढ़ाए और फ़ातिहा पढ़ा, जिसे अपना बेटा समझ कर उनके परिजनों ने दफ़नाया था.

घर वापसी के बाद नेमतउल्लाह ने निकाह किया. वो और उनकी नई-नवेली दुल्हन अब भी उस अनजान फ़ौजी की क़ब्र पर नियमित रूप से जाते हैं. वो कहते हैं कि शहीद जवान अब उनका भाई है और उनकी ज़िम्मेदारी है कि वो उसकी क़ब्र की देख-रेख करें.

अफ़ग़ानिस्तान में शहीद जवानों की ग़लत शिनाख़्त की ऐसी घटनाएं आम हैं. बीबीसी को ऐसी कई घटनाओं के बारे में पता चला. जब अगवा अफ़ग़ानी सैनिक अपने घर पहुंचे, तो पता चला कि उनके परिवार ने किसी और की लाश को उनकी समझ कर दफ़ना दिया है. सरकार अक्सर ऐसे मामलों में सीलबंद ताबूत देती है.

इस बारे में पूछे जाने पर अफ़ग़ान सरकार ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

News image

उधर, उरुज़गन में नेमतउल्लाह को पहाड़ियों के बीच गुफ़ाओं से भरे एक इलाक़े में ले जाया गया था. उनके साथ 54 और लोगों को भी तालिबान ने पकड़ रखा था. उन्हें चट्टान को काट कर अपनी कोठरी ख़ुद ही बनानी पड़ी. क़रीब डेढ़ साल तक ख़ुद की बनाई इस कोठरी में नेमतउल्लाह, 11 और लोगों के साथ रहे. ये सभी बंधक अफ़ग़ान सेना और पुलिस से ताल्लुक़ रखते थे. उनके हाथ और पैर हमेशा बंधे रहते थे.

उन दिनों को याद करते हुए नेमतउल्लाह बताते हैं कि तालिबान उन्हें खाने के लिए बहुत कम रोटियां देते थे. रोज़ की ये क़ैद उनके लिए भूख जैसी परेशानी बन गई थी. तभी एक रात को नेमतउल्लाह और उनके साथियों की नींद तेज़ धमाकों की आवाज़ से खुली.

उनके पास ही हवाई हमला हुआ था. इससे हुई तबाही से नेमतउल्लाह और बाक़ी क़ैदियों को वहां से छूट कर भागने का मौक़ा मिल गया. तालिबान की क़ैद से निकलने के बाद नेमतउल्लाह ने सब से पहले अपने पिता को फ़ोन किया.

नेमतउल्लाह बताते हैं कि जब फ़ोन पर उन्होंने अपने अब्बा से कहा, "मैं नेमत बोल रहा हूं, तो मेरे पिता ने कहा कौन नेमत? मैंने कहा-आपका फ़रज़ंद (बेटा). लेकिन उन्हें मेरी बात पर यक़ीन नहीं हुआ."

इसके बाद उन्होंने अपनी कई सेल्फ़ी अब्बा को भेजीं, तब जाकर उन्हें यक़ीन हुआ कि उनका बेटा अभी ज़िंदा है.

News image

नेमतउल्लाह, रमज़ान के पहले दिन कुनार स्थित अपने घर पहुंचे थे. पूरे गांव में उनके ज़िंदा होने की ख़बर पहले ही फैल चुकी थी. जश्न मनाया जा रहा था. लेकिन, उस में शरीक होने से पहले नेमतउल्लाह को एक अहम काम करना था. उन्होंने जाकर उस अनजान फ़ौजी की क़ब्र पर फूल चढ़ाए और फ़ातिहा पढ़ा, जिसे अपना बेटा समझ कर उनके परिजनों ने दफ़नाया था.

घर वापसी के बाद नेमतउल्लाह ने निकाह किया. वो और उनकी नई-नवेली दुल्हन अब भी उस अनजान फ़ौजी की क़ब्र पर नियमित रूप से जाते हैं. वो कहते हैं कि शहीद जवान अब उनका भाई है और उनकी ज़िम्मेदारी है कि वो उसकी क़ब्र की देख-रेख करें.

अफ़ग़ानिस्तान में शहीद जवानों की ग़लत शिनाख़्त की ऐसी घटनाएं आम हैं. बीबीसी को ऐसी कई घटनाओं के बारे में पता चला. जब अगवा अफ़ग़ानी सैनिक अपने घर पहुंचे, तो पता चला कि उनके परिवार ने किसी और की लाश को उनकी समझ कर दफ़ना दिया है. सरकार अक्सर ऐसे मामलों में सीलबंद ताबूत देती है.

इस बारे में पूछे जाने पर अफ़ग़ान सरकार ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

News image

आम लोगों की बस्ती

काबुल

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी

कई दशकों के युद्ध और हिंसा ने बहुत से आम लोगों की ज़िंदगी को नरक बना दिया है. जिन लोगों के पास सबसे कम ताक़त है, वो ही आज अफ़ग़ानिस्तान में सब से कम महफ़ूज़ हैं. इन में महिलाओं और बच्चों की तादाद सब से ज़्यादा है.

जो महिलाएं सरकार के क़ब्ज़े वाले बड़े शहरों और क़स्बों में रहती हैं, उनकी ज़िंदगी तालिबान की हुकूमत के दौर से काफ़ी बदल गई है. अफ़ग़ानिस्तान में एक चुनी हुई सरकार के गठन के बाद और मित्र देशों की सेनाओं की मौजूदगी की वजह से इन शहरों में, देश के बाक़ी हिस्सों के मुक़ाबले ज़िंदगी ज़्यादा महफ़ूज़ है, बेहतर है. आज ज़्यादा संख्या में लड़कियां स्कूल जाती हैं. और कामकाजी महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है.

तालिबान के राज में पढ़ाई के लिए स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या कमोबेश सिफ़र थी. तब से लड़कियों के स्कूल जाने का औसत बढ़ कर 37 फ़ीसद हो गया है. हालांकि ये अब भी लड़कियों के तालीम हासिल करने के मामले में दुनिया का सबसे कम औसत है.

हालांकि, जो महिलाएं अभी भी तालिबान के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में रह रही हैं, उन्हें तालीम हासिल करने और काम करने के मौक़े बहुत ही कम मिलते हैं. बहुत सी महिलाओं को डर है कि अगर, देश में दोबारा तालिबान का राज हो गया, तो उनकी आज़ादी पर और भी सख़्त पहरा होगा.

आठ साल की सोला अपनी मां नर्गिस (दाहिने) के साथ

आठ साल की सोला अपनी मां नर्गिस (दाहिने) के साथ

आठ साल की सोला अपनी मां नर्गिस (दाहिने) के साथ

काबुल की रहने वाली नर्गिस स्कूल टीचर हैं और छह बच्चों की मां हैं. नर्गिस कहती हैं, "तालिबान हमें न पढ़ने देंगे और न ही काम करने देंगे. हमारे सारे हक़ छिन जाएंगे."

हालांकि तालिबानी चरमपंथी कहते हैं कि वो अब महिलाओं को अधिकार देने को प्रतिबद्ध हैं. लेकिन, बहुत से आलोचकों को इस बात पर संदेह है. नर्गिस भी इनमें से एक हैं, जो ये मानती हैं कि तालिबानी चरमपंथियों का बदलाव का दावा सही नहीं है.

वो कहती हैं, "मुझे इस बात पर शक है कि उनकी सोच बदल गई है. चूंकि वो अमन की बात कर रहे हैं, फिर भी धमाके होते रहते हैं. वो अपने मुस्लिम भाइयों और माताओं को मारते रहते हैं. ये किस क़िस्म का बदलाव है?"

नर्गिस बताती हैं कि जब देश में तालिबान की हुकूमत क़ायम हुई, और उसके बाद देश में अराजकता फैली, तो उनकी पढ़ाई छूट गई थी.

उन दिनों को याद कर के वो बताती हैं, "मैं उस वक़्त कक्षा चार में पढ़ रही थी, जब तालिबान, सत्ता पर काबिज़ हुए. जब लड़ाई शुरू हुई, तो स्कूल बंद कर दिए गए. लड़कियों को घर से निकलने से मना कर दिया गया. मैं उस वक़्त केवल दस साल की थी, जब मुझे बुर्क़ा पहना कर घर पर बिठा दिया गया. मैं डर के मारे कभी घर से बाहर नहीं निकलती थी. फिर हम पाकिस्तान चले गए. स्कूल पीछे छूट गया. घर लौटने के बाद मुझे अपने पढ़ाई वाले दिनों की बहुत याद आती है."

नर्गिस ने खुद से वादा किया है कि उनकी सबसे छोटी बेटी, आठ बरस की सोला को क़िस्मत की वैसी मार नहीं झेलनी पड़ेगी. सोला अभी स्कूल जाती है. अब तक उसने जो पढ़ा है, वो जंग और हिंसा का तजुर्बा ही रहा है. सोला ने हाल ही में एक तालिबानी आत्मघाती हमलावर को धमाके में ख़ुद को उड़ाते देखा था.

वो बताती हैं, "मैं ने देखा कि एक बम फट गया है. मैंने देखा कि जवान लोग मारे गए. मैं बहुत डर गई थी. मैं रोने लगी और अपनी अम्मी से लिपट गई. वो मुझे एक टैक्सी में बैठा कर घर ले आई थीं."

पूरे अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा रोज़ की बात है. ऐसे में शांति वार्ता से ही अमन की एक उम्मीद जगती है. लेकिन, अब सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि अमरीका और तालिबान दोबारा बातचीत की टेबल पर आएं. फिर इस शांति वार्ता में अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को भी शामिल किया जाए. फिलहाल तो ये बहुत बड़ी चुनौती लग रही है.

अफ़ग़ानिस्तान की सरकार का कहना है कि वो तालिबान से तभी बात करेंगे, जब सभी पक्ष एक महीने के लिए युद्ध विराम का एलान करें. इसके जवाब में तालिबान का कहना है कि वो सरकार के साथ बातचीत तभी करेंगे, जब अफ़ग़ानिस्तान से सभी विदेशी सैनिक वापस चले जाएं.

तो, शायद यही वजह है कि नर्गिस जैसे आम लोग अपने देश में अमन और तब्दीली को लेकर नाउम्मीद हैं.

नर्गिस कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि मेरे मुल्क में कभी शांति बहाल होगी. अफ़ग़ानिस्तान ऐसा कपड़ा बन गया है जिस हर कोई अलग-अलग सिम्त खींच रहा है. ऐसे में दोस्त और दुश्मन में फ़र्क़ करना बेहद मुश्किल हो गया है. वो अमरीकी हों, तालिबान हों या फिर हमारी सरकार हो. राज चाहे जिसका भी हो. हम केवल अमन चाहते हैं."

कुछ नाम बदल दिए गए हैं.

News image

कई दशकों के युद्ध और हिंसा ने बहुत से आम लोगों की ज़िंदगी को नरक बना दिया है. जिन लोगों के पास सबसे कम ताक़त है, वो ही आज अफ़ग़ानिस्तान में सब से कम महफ़ूज़ हैं. इन में महिलाओं और बच्चों की तादाद सब से ज़्यादा है.

जो महिलाएं सरकार के क़ब्ज़े वाले बड़े शहरों और क़स्बों में रहती हैं, उनकी ज़िंदगी तालिबान की हुकूमत के दौर से काफ़ी बदल गई है. अफ़ग़ानिस्तान में एक चुनी हुई सरकार के गठन के बाद और मित्र देशों की सेनाओं की मौजूदगी की वजह से इन शहरों में, देश के बाक़ी हिस्सों के मुक़ाबले ज़िंदगी ज़्यादा महफ़ूज़ है, बेहतर है. आज ज़्यादा संख्या में लड़कियां स्कूल जाती हैं. और कामकाजी महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है.

तालिबान के राज में पढ़ाई के लिए स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या कमोबेश सिफ़र थी. तब से लड़कियों के स्कूल जाने का औसत बढ़ कर 37 फ़ीसद हो गया है. हालांकि ये अब भी लड़कियों के तालीम हासिल करने के मामले में दुनिया का सबसे कम औसत है.

हालांकि, जो महिलाएं अभी भी तालिबान के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में रह रही हैं, उन्हें तालीम हासिल करने और काम करने के मौक़े बहुत ही कम मिलते हैं. बहुत सी महिलाओं को डर है कि अगर, देश में दोबारा तालिबान का राज हो गया, तो उनकी आज़ादी पर और भी सख़्त पहरा होगा.

News image

काबुल की रहने वाली नर्गिस स्कूल टीचर हैं और छह बच्चों की मां हैं. नर्गिस कहती हैं, "तालिबान हमें न पढ़ने देंगे और न ही काम करने देंगे. हमारे सारे हक़ छिन जाएंगे."

हालांकि तालिबानी चरमपंथी कहते हैं कि वो अब महिलाओं को अधिकार देने को प्रतिबद्ध हैं. लेकिन, बहुत से आलोचकों को इस बात पर संदेह है. नर्गिस भी इनमें से एक हैं, जो ये मानती हैं कि तालिबानी चरमपंथियों का बदलाव का दावा सही नहीं है.

वो कहती हैं, "मुझे इस बात पर शक है कि उनकी सोच बदल गई है. चूंकि वो अमन की बात कर रहे हैं, फिर भी धमाके होते रहते हैं. वो अपने मुस्लिम भाइयों और माताओं को मारते रहते हैं. ये किस क़िस्म का बदलाव है?"

नर्गिस बताती हैं कि जब देश में तालिबान की हुकूमत क़ायम हुई, और उसके बाद देश में अराजकता फैली, तो उनकी पढ़ाई छूट गई थी.

उन दिनों को याद कर के वो बताती हैं, "मैं उस वक़्त कक्षा चार में पढ़ रही थी, जब तालिबान, सत्ता पर काबिज़ हुए. जब लड़ाई शुरू हुई, तो स्कूल बंद कर दिए गए. लड़कियों को घर से निकलने से मना कर दिया गया. मैं उस वक़्त केवल दस साल की थी, जब मुझे बुर्क़ा पहना कर घर पर बिठा दिया गया. मैं डर के मारे कभी घर से बाहर नहीं निकलती थी. फिर हम पाकिस्तान चले गए. स्कूल पीछे छूट गया. घर लौटने के बाद मुझे अपने पढ़ाई वाले दिनों की बहुत याद आती है."

नर्गिस ने खुद से वादा किया है कि उनकी सबसे छोटी बेटी, आठ बरस की सोला को क़िस्मत की वैसी मार नहीं झेलनी पड़ेगी. सोला अभी स्कूल जाती है. अब तक उसने जो पढ़ा है, वो जंग और हिंसा का तजुर्बा ही रहा है. सोला ने हाल ही में एक तालिबानी आत्मघाती हमलावर को धमाके में ख़ुद को उड़ाते देखा था.

वो बताती हैं, "मैंने देखा कि एक बम फट गया है. मैंने देखा कि जवान लोग मारे गए. मैं बहुत डर गई थी. मैं रोने लगी और अपनी अम्मी से लिपट गई. वो मुझे एक टैक्सी में बैठा कर घर ले आई थीं."

पूरे अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा रोज़ की बात है. ऐसे में शांति वार्ता से ही अमन की एक उम्मीद जगती है. लेकिन, अब सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि अमरीका और तालिबान दोबारा बातचीत की टेबल पर आएं. फिर इस शांति वार्ता में अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को भी शामिल किया जाए. फिलहाल तो ये बहुत बड़ी चुनौती लग रही है.

अफ़ग़ानिस्तान की सरकार का कहना है कि वो तालिबान से तभी बात करेंगे, जब सभी पक्ष एक महीने के लिए युद्ध विराम का एलान करें. इसके जवाब में तालिबान का कहना है कि वो सरकार के साथ बातचीत तभी करेंगे, जब अफ़ग़ानिस्तान से सभी विदेशी सैनिक वापस चले जाएं.

तो, शायद यही वजह है कि नर्गिस जैसे आम लोग अपने देश में अमन और तब्दीली को लेकर नाउम्मीद हैं.

नर्गिस कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि मेरे मुल्क में कभी शांति बहाल होगी. अफ़ग़ानिस्तान ऐसा कपड़ा बन गया है जिस हर कोई अलग-अलग सिम्त खींच रहा है. ऐसे में दोस्त और दुश्मन में फ़र्क़ करना बेहद मुश्किल हो गया है. वो अमरीकी हों, तालिबान हों या फिर हमारी सरकार हो. राज चाहे जिसका भी हो. हम केवल अमन चाहते हैं."

कुछ नाम बदल दिए गए हैं.

A wall of graffiti in Kabul depicting instead of guns and bombs, love hearts

लेखक: औलिया अतराफ़ी और क्लेयर प्रेस

रिपोर्टर्स: इब्राहिम सफ़ी, ज़बिउल्लाह रहिमज़ई, नजीब पसून, ज़ुहल अहद, ज़मज़मा नियाज़ी

प्रोड्यूसर - क्लेयर प्रेस

फ़ोटोग्राफ़ी - एड राम, औलिया अतराफ़ी, इब्राहिम सफ़ी, क्लेयर प्रेस, डेरिक इवांस

संपादक: सारा बकली

News image

क्रेडिट

लेखक: औलिया अतराफ़ी और क्लेयर प्रेस

रिपोर्टर्स: इब्राहिम सफ़ी, ज़बिउल्लाह रहिमज़ई, नजीब पसून, ज़ुहल अहद, ज़मज़मा नियाज़ी

प्रोड्यूसर - क्लेयर प्रेस

फ़ोटोग्राफ़ी - एड राम, औलिया अतराफ़ी, इब्राहिम सफ़ी, क्लेयर प्रेस, डेरिक इवांस

संपादक: सारा बकली

प्रकाशन: नवंबर, 2019

News image