गौतम अदानी ने साइकिल पर कारोबार से कैसे बनाया सैकड़ों अरब का कारोबारी समूह

नरेंद्र मोदी कहते हैं कि वो अपने बचपन में रेलवे प्लेटफॉर्म पर चाय बेचा करते थे. गौतम अदानी अहमदाबाद में अपना माल बेचने साइकिल से घर-घर जाया करते थे.
अब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं. उनके क़रीबी दोस्त माने जाने वाले गौतम अदानी दुनिया के पाँच सबसे अमीर लोगों में शुमार किए जाते हैं. गौतम अदानी की संपत्ति में आए इस ज़बरदस्त उछाल को अक्सर उनके आलोचक नरेंद्र मोदी की सियासी तरक़्क़ी के साथ जोड़ते हैं. पहले वो गुजरात के सबसे ताक़तवर व्यक्ति बने, फिर भारत के.

उनके आलोचकों का दावा है कि नरेंद्र मोदी से नज़दीकी के कारण गौतम अदानी की असाधारण तरक़्क़ी हुई और वो बहुत कम समय में दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बन गए. इस पर सवाल भी उठते रहे हैं.
‘Gautam Adani Reimagining Business in India and the World’ के नाम से अदानी की जीवनी लिखने वाले मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और रिसर्चर आरएन भास्कर कहते हैं कि गौतम अदानी का जन्म एक ‘सीमित संसाधनों’ वाले परिवार में हुआ था.
गौतम अदानी की तरक़्क़ी का ये सफ़र बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत तो है लेकिन उनकी प्रगति विवादों से भी घिरी है. भारत के मीडिया और विपक्ष का एक तबक़ा, बार-बार गौतम अदानी पर ये आरोप लगाता रहा है कि उन्होंने कारोबार चमकाने के लिए सरकार में अपने संबंधों का इस्तेमाल किया. उन्होंने उद्योग लगाने के लिए क़ानून की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाते हुए मामूली क़ीमत पर ज़मीनें हासिल कीं.
हालांकि, गौतम अदानी ने इन सभी आरोपों को कई बार बेबुनियाद बताया है. लेकिन ये सवाल बना हुआ है कि आख़िर अदानी की कंपनियाँ, भारत की शीर्ष की कंपनियों की क़तार में कैसे खड़ी हो गईं? बड़ा सवाल ये है कि आख़िर वो कौन से कारण थे कि कॉलेज के पहले साल के बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले अदानी ने बड़े-बड़े ख़्वाब देखे और भारत के पहले centibillionaire यानी 100 अरब डॉलर से ज़्यादा की संपत्ति वाले उद्योगपति बन गए.
इसके अलावा, हाल के वर्षों में जिस तरह अदानी समूह की कंपनियों के शेयर आसमान छू रहे हैं, उसकी वजह क्या रही है? 31 दिसंबर 2019 को अदानी समूह की कंपनियों की मार्केट कैपिटल दो लाख करोड़ रुपये थी, जो सितंबर 2022 में तेज़ी से उछलकर 20.74 लाख करोड़ रुपये पहुँच गई थी यानी 2019 से 2022 के बीच दस गुना बढ़ोतरी.
बीबीसी के ज़ुबैर अहमद और अर्जुन परमार ने गुजरात और मुंबई जाकर इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.
जब गौतम अदानी 15-16 बरस के थे तो वो पहले साइकिल से और फिर स्कूटर से कपड़े बेचने जाया करते थे. उम्र के उसी दौर से गौतम अदानी के दोस्त रहे गिरीशभाई दानी को वो दिन अभी तक याद हैं. गिरीशभाई बताते हैं, ‘उन दिनों गौतम अदानी किसी फेरीवाले की तरह साइकिल से कपड़े बेचने घर-घर और दुकान-दुकान जाया करते थे. वो बहुत मेहनती थे.’
गौतम अदानी की इस ज़मीनी शुरुआत के सबूत आज भी अहमदाबाद के पुराने शहर में मिल जाते हैं. उनके पिता की दुकान ‘अदानी टेक्सटाइल्स’ के बोर्ड को ज़ंग भले लग गया हो, लेकिन वो अभी बचा हुआ है. स्थानीय दुकानदार कहते हैं कि अदानी परिवार ने इस दुकान को अपने पास ही रखा है. गौतम अदानी के पिता की ये दुकान, अहमदाबाद के बेहद भीड़ भरे बाज़ार में है, जहाँ कपड़ों और साड़ी की दुकानों की भरमार है. इस व्यस्त बाज़ार में अदानी के नाम से कई और दुकानें भी हैं, जिनमें से कुछ तो नई हैं. लेकिन, उनका ताल्लुक़ अदानी परिवार से नहीं है.






आसपास के दुकानदारों ने हल्की-फुल्की बातचीत के दौरान दार्शनिक अंदाज़ में कहा, ‘इस बाज़ार में सैकड़ों दुकानें हैं. इनमें से कई तो उस वक़्त की हैं जब गौतमभाई कपड़े के कारोबारी थे. उस समय किसी को ये कहाँ पता था कि अगले तीन चार दशकों में हमारे बीच का एक दुकानदार, दुनिया का दूसरा सबसे अमीर इंसान बन जाएगा.’

गौतम अदानी अपने लगातार फैलते हुए कारोबारी साम्राज्य को अहमदाबाद स्थित मुख्यालय से चलाते हैं. शेयर बाज़ार में लिस्टेड अदानी की सात कंपनियों का बाज़ार मूल्य 235 अरब डॉलर (नवंबर 2022 में) है, जो कई देशों की जीडीपी से ज़्यादा है.
अदानी समूह भारत में इन कारोबारी क्षेत्रों में सबसे आगे है:
1970 और 80 के दशक में किसी भी भारतीय उद्योगपति के लिए विदेश में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ चलाना लगभग असंभव था. गौतम अदानी, भारत के ऐसे पहले उद्योगपति बन गए हैं जो देश से बाहर ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, इसराइल और इंडोनेशिया जैसे कई देशों में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ चला रहे हैं. हालाँकि टाटा और एयरटेल जैसी भारतीय कंपनियां कई देशों में मोबाइल और वाहनों के कारोबार में हैं लेकिन विदेश में बुनियादी ढाँचे के बड़े प्रोजेक्ट्स चलाने की कामयाबी अदानी समूह ने हासिल की है.
अदानी समूह की वेबसाइट के मुताबिक़, ‘अदानी ऑस्ट्रेलिया, एबट प्वाइंट पोर्ट टर्मिनल की मालिक है और इसे चलाती है. ये टर्मिनल,ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड में पिछले 35 वर्षों से बड़ी ज़िम्मेदारी से कोयले का निर्यात कर रही है.'
इसी तरह अदानी माइनिंग, ऑस्ट्रेलिया के विवादित कार्माइकल कोयले की खान और एक रेल परियोजना की मालिक है. अदानी समूह के पास कोलंबो और इसराइल के हाइफ़ा शहर में एक-एक बंदरगाह भी है. अदानी समूह के पास इंडोनेशिया में भी कोयले की खान है. इसके अलावा अदानी समूह के नवीनीकरण योग्य ऊर्जा कारोबार ने स्वच्छ ऊर्जा बनाने के लिए अरबों डॉलर की रक़म ख़र्च करने का वादा किया है.
अदानी समूह की वेबसाइट के मुताबिक़, वित्त वर्ष 2021-22 में उसका राजस्व 70 हज़ार करोड़ रुपए का था.
अगर आज़ादी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था को टाटा और बिड़ला ने खड़ा किया था, तो 21वीं सदी में अदानी और अंबानी भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाई पर ले जा रहे हैं. अरबपति उद्योगपति मुकेश अंबानी की तुलना में गौतम अदानी अपने परिवार में पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं. इस वजह से उनकी कामयाबी और भी ख़ास बन जाती है.
लेकिन गौतम अदानी के आलोचक कहते हैं कि उनकी ये तरक़्क़ी उनके सियासी रिश्तों की वजह से मुमकिन हो सकी है.
दो फरवरी 2022 को कांग्रेस नेता राहुल गांधी संसद में दावा किया कि:

"अर्थव्यवस्था के संगठित क्षेत्र में एकाधिकार (monopoly) क़ायम किए जा रहे हैं. किसी भी सेक्टर पर नज़र डालिए और मैं आपको दो सबसे बड़े एकाधिकारवादी कारोबारियों के बारे में कुछ जानकारी दे दूं (कुछ सांसद अदानी और अंबानी का नाम लेते हैं). कोरोना की महामारी के दौरान, वायरस के डेल्टा और ओमिक्रॉन जैसे वैरिएंट सामने आए थे. लेकिन, हमारे भारत की लगभग पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था के भीतर डबल A वैरिएंट फैल रहे हैं. एक इंसान का- मैं उनका नाम नहीं लूंगा- भारत के सभी बंदरगाहों पर क़ब्ज़ा है. (कुछ सांसद बोलते हैं अदानी), सभी हवाई अड्डों पर क़ब्ज़ा है. बिजली, ट्रांसमिशन, खनन, ग्रीन एनर्जी, गैस वितरण, खाने के तेल. भारत में कुछ भी होता है तो हर जगह अदानी जी दिखाई दे जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ़ अंबानी जी पेट्रोकेमिकल, टेलीकॉम, रिटेल, ई-कॉमर्स के सेक्टर में हैं. इन कारोबारों में उनका पूरा क़ब्ज़ा. देश की पूरी संपत्ति मुट्ठी भर लोगों के क़ब्ज़े में है."
इस राजनीतिक बयान की कुछ बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही गई हैं. लेकिन, इनमें से कई दावे ज़मीनी हक़ीक़त से मेल खाते हैं. अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पटेल कहते हैं:
"इसमें कोई शक नहीं कि अदानी बहुत अक़्लमंद हैं लेकिन उन्हें जब भी सरकार से मदद दरकार होती थी, तो नरेंद्र मोदी उनकी भरपूर मदद करते थे. चिमन भाई (गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री) ने उन्हें कच्छ में ज़मीन दी थी. लेकिन अगर अदानी को सबसे ज़्यादा ज़मीनें किसी ने दी हैं, तो वो नरेंद्र मोदी हैं और वो भी बेहद सस्ते दाम पर. अगर मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते, तो अदानी को हवाई अड्डे और बंदरगाह क़तई नहीं मिल पाते. अहमदाबाद हवाई अड्डा जो बहुत मुनाफ़े में चल रहा था. उसे भी अदानी को दे दिया गया."
नविनाल गाँव, अदानी के मुंद्रा पोर्ट और विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) से बमुश्किल तीन किलोमीटर की दूरी पर है. वहाँ के किसान नारायण गढ़वी कहते हैं कि नविनाल उन 19 गांवों में से एक है, जो विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए ज़मीन अधिग्रहण से प्रभावित हुआ था. नारायण गढ़वी को सरकार से ढेर सारी शिकायतें हैं. नारायण गढ़वी को सरकार से ढेर सारी शिकायतें हैं. गढ़वी बताते हैं:
"लोग कहते हैं कि केंद्र सरकार या उसके मुखिया उद्योगपतियों के बहुत क़रीबी हैं. सच तो ये है कि वो लगातार उद्योगपतियों की मदद करते रहते हैं. उन्हें टैक्स में रियायतें देते हैं और सस्ते दाम पर ज़मीनें आवंटित करते हैं.
ये सच है कि गौतमभाई भी उनके (सरकार के) बहुत क़रीबी हैं. आप देख सकते हैं कि 2019 से 2021 के बीच कोरोना के दौरान पूरी दुनिया में खेती और उद्योग पर बुरा असर पड़ा था. कोई विकास नहीं हो रहा था लेकिन अदानी ने ज़बरदस्त तरक़्क़ी की. ये सच है कि ये सरकार उन्हें बहुत-सी रियायतें देती है, जैसे कि हवाई अड्डे, रेल और रेलवे लाइनें. लेकिन गौतमभाई भी साहसी और जोखिम लेने वाले व्यक्ति हैं."
गौतम अदानी के दोस्त गिरीशभाई दानी नहीं मानते कि मोदी ने कभी उनके अरबपति दोस्त की मदद की है. गिरीशभाई कहते हैं, "हर कोई मोदी जी के बारे में बात करता है. लेकिन जहाँ तक मैं जानता हूं मोदी जी ऐसे आदमी नहीं हैं जो किसी से पक्षपात करते हैं
मैं सियासत में नहीं हूँ. हो सकता है कि मोदी जी अदानी की कुछ मदद करते हों. आख़िर ताली तो दोनों हाथों से बजती है."
अदानी के आधिकारिक जीवनीकार आरएन भास्कर उन्हें 2005 से जानते हैं. भास्कर मानते हैं कि ‘उद्योगपतियों को राजनेताओं की उतनी ही ज़रूरत होती है, जितनी नेताओं को कारोबारियों की. ये ऐसा तालमेल है जो हर जगह देखने को मिल जाता है.’

लेकिन क्या गौतम अदानी, मोदी के उतने ही क़रीबी हैं, जितने किसी और नेता के? इस सवाल के जवाब में भास्कर कहते हैं:
"जब 2001 में मोदी गुजरात की सत्ता में आए तो अदानी जिस तरह बाक़ी मुख्यमंत्रियों से दोस्ताना ताल्लुक़ रखते थे, उसी तरह वो मोदी के भी दोस्त बन गए. मोदी 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. ऐसे में ज़ाहिर है दोनों के बीच नज़दीकियां बढ़ी ही होंगी. जब मोदी प्रधानमंत्री बन गए, तो ज़ाहिर है कि अदानी से उनका परिचय तो पहले से था. एक दूसरा कारण भी है. जब भी कोई सरकार सियासी, सामाजिक या आर्थिक वजह से कोई काम तुरंत कराना चाहती है तो वो हमेशा ऐसे उद्योगपति को चुनती है जो सबसे असरदार तरीक़े से उसे लागू कर सके. मैं ऐसा काम किसी ऐसे आदमी को नहीं देना चाहूँगा जो काम ख़राब करके मेरी बदनामी कराए."
गौतम अदानी को ज़्यादा रियायतें दिए जाने के आरोपों से कई विवाद भी खड़े हुए हैं. हम इनमें से कुछ पर नज़र डालते हैं.
तीन बड़ी विवादित परियोजनाएँ
मुंद्रा बंदरगाह और विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)

मुंद्रा बंदरगाह, गुजरात के कच्छ ज़िले के पश्चिमी तट पर स्थित है. इसे अदानी समूह की तरक़्क़ी में मील का पत्थर कहा जाता है.

इस बंदरगाह की अहमियत बताते हुए आरएन भास्कर अपनी किताब में लिखते हैं कि ‘गौतम भाई ने अपने करियर का जो सबसे बड़ा कारोबारी सौदा किया वो शायद मुंद्रा पोर्ट से जुड़ा था.’ वो आगे लिखते हैं कि ‘ये कहा जा सकता है कि मुंद्रा बंदरगाह के बिना अदानी के बहुत से कारोबार तो शायद शुरू ही न हो पाते.’
भास्कर के मुताबिक़, मुंद्रा बंदरगाह और विशेष आर्थिक क्षेत्र लिमिटेड (MPSEZ) के तहत अदानी समूह के पास 15,665 एकड़ ज़मीन का मालिकाना हक़ है. इसके अलावा, उन्हें अभी लगभग 16,688 एकड़ ज़मीन और सौंपे जाने की प्रक्रिया चल रही है.
गौतम अदानी और उनके समूह पर अक्सर ये आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने मुंद्रा बंदरगाह के लिए ‘बाज़ार भाव से बेहद कम दाम पर ज़मीन हासिल की’. बहुत से मीडिया संगठनों ने अदानी समूह को मिट्टी के मोल ज़मीन बेचने के लिए उस वक़्त की गुजरात सरकार की आलोचना की थी.
हालांकि, गौतम अदानी ने अप्रैल 2014 में NDTV के साथ इंटरव्यू में इन आरोपों का खंडन किया था.
इस इंटरव्यू में गौतम अदानी कहते हैं, "मुंद्रा पोर्ट के विकास के लिए जो ज़मीन दी गई, वो उपजाऊ नहीं थी; ये ज़मीन सस्ते दाम पर हासिल करने का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता."
अदानी उन आरोपों को भी ग़लत बताते हैं कि उन्होंने जिस क़ीमत पर ज़मीन ली, वो ‘बाज़ार भाव के एक तिहाई से भी कम थी.’ गौतम अदानी इस इंटरव्यू में कहते हैं, "ये आरोप बेबुनियाद हैं. जब हमने मुंद्रा में अपना काम शुरू किया था, तब गुजरात में चिमनभाई पटेल की सरकार थी. 1993 में हमें दस पैसे प्रति वर्ग मीटर की दर से इस काम के लिए ज़मीन आवंटित की गई थी; उस वक़्त ये पूरी तरह से बंजर, ख़राब और पानी में डूबी हुई ज़मीन थी."
अदानी आगे कहते हैं, "1993 में जब हम सरकार के निर्देश पर कच्छ के विकास के लिए वहाँ गए, तो उस वक़्त वहाँ कुछ भी नहीं था; आप इस बात की तस्दीक़ किसी से भी कर सकते हैं कि जब हम मुंद्रा गए, तो ज़मीन की क़ीमत महज़ 400 रुपए एकड़ थी; अगर हमने अपने स्तर पर लोगों से पांँच हज़ार रुपए प्रति एकड़ की दर से ज़मीन लेने का विकल्प चुना होता, तो लोग आसानी से तैयार हो जाते; लेकिन हमने उस वक़्त दस गुना ज़्यादा दाम चुकाकर ज़मीन हासिल की थी.’
अपनी किताब में आरएन भास्कर ने भी इन आरोपों का ज़िक्र किया है, वो लिखते हैं, ‘सरकार ने ये ज़मीन बेचकर मुनाफ़ा कमाया. ज़मीन के मालिकों और नमक के मज़दूरों को भी फ़ायदा हुआ. लोगों को जो क़ीमत मिली, उससे वो ख़ुश थे. इसीलिए आज जब आलोचक ये कहते हुए गौतम भाई की आलोचना करते हैं कि उन्होंने सोने सरीखी ज़मीन, मिट्टी के मोल हासिल की तो वो ये भूल जाते हैं कि उस वक़्त उस ज़मीन का भाव माटी के बराबर ही था.’
जब बीबीसी ने अदानी समूह को मुंद्रा पोर्ट के विकास के लिए दी गई ज़मीन का उस समय का बाज़ार भाव जानने के लिए सूचना के अधिकार के तहत गुजरात सरकार से जानकारी माँगी, तो सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया.
दिलीप पटेल एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और गुजरात की राजनीति के जानकार हैं. वो गौतम अदानी की तूफ़ानी तरक़्क़ी का श्रेय ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुंद्रा बंदरगाह’ को देते हैं. बीबीसी के साथ बातचीत में दिलीप पटेल कहते हैं:
‘इसमें कोई शक नहीं कि मुंद्रा बंदरगाह के लिए ज़मीन के आवंटन का काम चिमनभाई पटेल की सरकार के समय शुरू हुआ था; लेकिन अदानी को ज़्यादा ज़मीन तो नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में दी गई थी; और वो भी कौड़ियों के दाम पर.’
अदानी समूह पर मुंद्रा में पर्यावरण के नियम तोड़ने का आरोप भी लगा है. भारत के मीडिया ने जानकारी दी है कि कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने 2013 में मुंद्रा बंदरगाह पर पर्यावरण के नियम तोड़ने पर अदानी समूह पर 200 करोड़ का जुर्माना लगाया था. लेकिन, जब केंद्र में बीजेपी की सरकार आई, तो उसने ये जुर्माना रद्द कर दिया.
ये जानकारी, बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार ने सूचना के अधिकार के तहत अर्ज़ी दाख़िल करके हासिल की थी.
मुंद्रा बंदरगाह के क़रीब स्थित गाँव के किसान नारायण गढ़वी ने बीबीसी को बताया, "हमने आधुनिकीकरण का विरोध नहीं किया. निश्चित रूप से इससे रोज़गार पैदा होंगे और देश के विकास को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन ये तरक़्क़ी स्थानीय लोगों की रोज़ी-रोटी की क़ीमत पर नहीं होनी चाहिए; पर्यावरण पर बुरा असर नहीं पड़ना चाहिए और किसी भी क़ीमत पर स्थानीय मछुआरों के रोज़ी-रोज़गार नहीं छिनने चाहिए.’
हमने इन आरोपों पर अदानी समूह का पक्ष जानने के लिए उनसे ई-मेल के ज़रिए संपर्क किया था. लेकिन अब तक उनका जवाब हमें नहीं मिला है.
हवाई अड्डों की नीलामी में कामयाबी

जब अदानी समूह ने 2019 में देश के छह हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण और उन्हें चलाने के ठेके हासिल किए, तो उस पर भी सवाल उठे थे. क्योंकि, तब अदानी समूह के पास एयरपोर्ट चलाने का कोई तजुर्बा नहीं था. एक बार फिर अदानी समूह पर आरोप लगे थे कि ठेकों की नीलामी में उसे तरजीह दी गई और अदानी समूह को फ़ायदा पहुंचाने के लिए नियमों में फेरबदल किए गए. ये हवाई अड्डे--अहमदाबाद, लखनऊ, मेंगलुरु, जयपुर, गुवाहाटी और तिरुवनंतपुरम--हैं.
इन हवाई अड्डों के अधिग्रहण के साथ ही अदानी समूह एयरपोर्ट का संचालन करने वाली देश की तीसरी सबसे बड़ी कंपनी बन गई, जो GMR और GVK समूह से थोड़ा ही पीछे थी. और, बाद में GVK समूह से मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नियंत्रण हासिल करने के बाद, देश के हवाई अड्डों से आने जाने वाले मुसाफ़िरों के 25 फ़ीसद हिस्से पर अदानी समूह का क़ब्ज़ा हो गया. इसके अलावा अदानी समूह के हवाई अड्डों से होकर देश का 33 फ़ीसद एयर कार्गो ढोया जाता है.
मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग ने किसी भी एक कंपनी को दो से ज़्यादा हवाई अड्डों के प्रबंधन का अधिकार देने के ख़िलाफ़ सलाह दी थी. लेकिन, उस पर ध्यान नहीं दिया गया. ये आरोप बेहद गंभीर थे और केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय को इस पर सफ़ाई देनी पड़ी थी. सरकार ने प्रेस में जारी एक बयान में कहा था, "ये आरोप तथ्यात्मक रूप से ग़लत हैं कि सरकार ने अपने ही विभागों के ऐतराज़ पर ध्यान नहीं दिया." सरकार ने अपने बयान में ये बात भी ज़ोर देकर कही कि ‘इस मामले को देखने के लिए बनाई गई समिति ने बहुत सोच-समझकर ये फ़ैसला लिया कि किसी कंपनी को दिए जाने वाले हवाई अड्डों की संख्या को सीमित न किया जाए. क्योंकि ये छह हवाई अड्डे बहुत छोटे हैं और इनसे होकर देश के महज़ 9.5 प्रतिशत हवाई मुसाफ़िर गुज़रते हैं.’

मंंत्रालय के मुताबिक़ इस समिति ने ही हवाई अड्डे चलाने के अनुभव की शर्त अनिवार्य न बनाने का फ़ैसला किया था, ताकि बोली लगाने की प्रक्रिया में होड़ और बढ़े और हवाई अड्डों के प्रबंधन में किसी एक कंपनी या समूह का एकाधिकार न हो जाए.
बीबीसी ने 2005 के सूचना के अधिकार क़ानून के तहत सरकार से इन छह हवाई अड्डों की नीलामी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देने की गुज़ारिश की थी. भारत के हवाई अड्डा प्राधिकरण ने इस RTI के जवाब में जो दस्तावेज़ मुहैया कराए थे, उनके मुताबिक़, सभी छह हवाई अड्डों की बोली में अदानी समूह ने बोली लगाने वाली बाक़ी सभी कंपनियों को पछाड़ दिया था.
RTI के ज़रिए हासिल किए गए दस्तावेज़ों का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चला कि छह हवाई अड्डों के प्रबंधन के अधिकार हासिल करने के लिए अदानी एंटरप्राइज़ लिमिटेड ने जो बोली लगाई थी वो 115 से 177 रुपए प्रति पैसेंजर के बीच थी.

गुवाहाटी हवाईअड्डे के घरेलू यात्री शुल्क के लिए बोली
गुवाहाटी हवाईअड्डे के घरेलू यात्री शुल्क के लिए बोली
भले ही अदानी समूह ने हवाई अड्डों की नीलामी में बाक़ी सभी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया लेकिन अगर बोली लगाने में हवाई अड्डे चलाने के ‘पहले से अनुभव’ की शर्त हटाई नहीं जाती, तो इस नीलामी में अदानी समूह को कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड और जीएमआर एयरपोर्ट्स लिमिटेड से कड़ी टक्कर मिलने वाली थी.
सरकार की हिस्सेदारी वाले नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड (एनआईआईएफ़) ने भी गुवाहाटी, अहमदाबाद और जयपुर हवाई अड्डों के लिए बोली लगाने में दिलचस्पी दिखाई थी. एनआईआईएफ़ की वेबसाइट पर बताया गया है कि वो मूलभूत ढाँचे के क्षेत्र में निवेश करती है. इन हवाई अड्डों के लिए एनआईआईएफ़ की कई बोलियों की बारीकी से पड़ताल करने पर पता चला कि उसकी और अदानी एंटरप्राइज़ की बोलियों में 5 से 31 रुपए प्रति पैसेंजर तक का ही अंतर था यानी एनआईआईएफ़ की बोली अदानी से केवल 5 से 31 रुपए प्रति पैसेंजर ही कम थी.
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गोड्डा का थर्मल पावर प्लांट

इस साल सितंबर में जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना भारत आई थीं, तो गौतम अदानी ने उनसे मुलाक़ात की थी. इसके बाद अदानी ने एक ट्वीट में ‘गोड्डा में 1600 मेगावाट क्षमता वाली कोयले पर आधारित बिजली परियोजना शुरू करके, 16 दिसंबर 2022 तक वहाँ से बांग्लादेश तक बिजली पहुँचाने की लाइन चालू करने की प्रतिबद्धता’ दोहराई थी.
इसके साथ ही, झारखंड के गोड्डा ज़िले के बिजलीघर और उससे जुड़े विवाद फिर से चर्चा में आ गए थे. मीडिया रिपोर्ट में आरोप लगे हैं कि अदानी समूह और झारखंड सरकार ने ये बिजलीघर लगाने के लिए तय प्रक्रिया का पालन किए बग़ैर किसानों से उनकी उपजाऊ ज़मीनें ले लीं. गोड्डा प्रशासन ने 11 पेज का एक नोट जारी किया था जिसमें सरकार को अदानी समूह की परियोजना के लिए 917 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण का सुझाव दिया गया था.
स्थानीय किसान और ज़मीनों के मालिकों ने ज़मीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया को झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी. इन किसानों के वकील सोनल तिवारी ने बीबीसी को बताया कि
"ये ज़मीन अधिग्रहण का मामला है. याचिकाकर्ता इस मक़सद से अपनी ज़मीन लिए जाने का विरोध कर रहे हैं. इस मामले में ज़मीन अधिग्रहण जनहित के उस सिद्धांत के ख़िलाफ़ है, जिसका हवाला 'राइट टू फेयर कंपनसेशन एंड ट्रांसपैरेंसी इन लैंड एक्वेज़िशन रिहैबिलिटेशन एंड रिसेटेलमेंट एक्ट 2013' में दिया गया है. मैं इस मामले में किसानों की नुमाइंदगी कर रहा हूँ."
झारखंड के मोतिया गाँव के रहने वाले 73 साल के रिटायर्ड अध्यापक चिंतामणि साहू ने गोड्डा बिजली घर के लिए ज़मीन के अधिग्रहण का विरोध किया था. जब हमने उनसे बात की तो वो निराश नज़र आए. उन्हें समय पर इंसाफ़ मिलने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती. चिंतामणि साहू कहते हैं कि किसानों ने हाई कोर्ट में अर्ज़ी भले दे रखी हो, लेकिन कोयले से चलने वाला ये बिजलीघर बनाने का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है.
बीबीसी से बात करते हुए चिंतामणि कहते हैं:
"इस बिजलीघर के लिए हमारी पाँच एकड़ पुश्तैनी ज़मीन ले ली गई; और वो भी जनहित का बहाना बनाकर; यहाँ बिजली हमारी ज़मीन, पानी और सस्ती मज़दूरी से तैयार होगी और फिर उसे बांग्लादेश को दे दिया जाएगा; इससे अदानी और अमीर बनेंगे; इसमें जनहित कहाँ है?"
चिंतामणि साहू आरोप लगाते हैं कि 2016 में जब ज़मीन अधिग्रहण के मसले पर बातचीत के लिए पंचायत बुलाई गई थी, तो ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करने वाले ग्रामीणों के एक गुट को उसमें शामिल ही नहीं होने दिया गया. अदानी समूह और प्रशासन ने ज़मीन अधिग्रहण के लिए गाँव वालों की सहमति हासिल करने की शर्त का पालन ही नहीं किया. हालांकि, कंपनी ने ये ज़रूर किया कि काग़ज़ पर सब कुछ सही हो. ऐसा लगे कि कंपनी ने अधिग्रहण की सभी शर्तें पूरी की हैं. साहू आरोप लगाते हैं कि प्रशासन भी अदानी समूह की मदद कर रहा था. यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि 2014 से 2019 के बीच झारखंड में रघुबर दास की अगुवाई वाली बीजेपी की सरकार थी.
चिंतामणि साहू आगे आरोप लगाते हुए कहते हैं, "ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करने वालों पर दबाव बनाने के लिए फ़र्ज़ी आपराधिक मुक़दमे दर्ज किए गए. इनमें मेरा नाम भी है; बिजलीघर के लिए ली गई ज़्यादातर ज़मीन उपजाऊ थी. मोतिया, डांका, माली और पटवा गांवों की ज़मीनें ली गई हैं. हमने विरोध किया. मगर कुछ हुआ नहीं फिर भी मैंने अपना विरोध जारी रखा. मैंने अपनी ज़मीन के अधिग्रहण की रज़ामंदी नहीं दी है, न ही मैंने उसके बदले में मुआवज़ा लिया है.’
2013 के ज़मीन अधिग्रहण क़ानून के तहत, ‘जनहित के मक़सद’ से किसी निजी कंपनी या फिर सरकारी और निजी कंपनी की साझा परियोजना के लिए भी ज़मीन का अधिग्रहण किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए कुछ प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य बनाया गया है. क़ानून की धारा 4 में दर्ज प्रक्रिया के मुताबिक़, ज़मीन अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव का अध्ययन किया जाना चाहिए. इसके अलावा, इस क़ानून के तहत ज़मीन अधिग्रहण किए जाने पर, दूसरी अनुसूची के प्रावधान भी लागू होते हैं, जिनके मुताबिक़, ज़मीन अधिग्रहण किए जाने से बेदख़ल होने वालों के पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए.
इसके अलावा, एक प्रावधान ये भी है कि पुनर्वास की योजना पर चर्चा के लिए ग्राम सभा के अंतर्गत एक सार्वजनिक सुनवाई होनी चाहिए और उस दौरान उठाए गए सभी ऐतराज़ों को दर्ज करके ज़िले के कलेक्टर को सूचित किया जाना चाहिए.
बीबीसी ने इस मामले पर झारखंड सरकार की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की, लेकिन अब तक उनका कोई जवाब हमें नहीं मिला है.
शुरुआती दौर

जब फोर्ब्स पत्रिका ने सितंबर में गौतम अदानी को दुनिया का दूसरा सबसे अमीर शख़्स घोषित किया, तो वो अचानक पूरी दुनिया में सुर्ख़ियों में आ गए. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस बात की होड़ लग गई कि गौतम अदानी की शख़्सियत और उनके कारोबार के बारे में और ज़्यादा जानकारी जुटाई जाए.
कोरोना वायरस की महामारी के दौरान जब दुनिया में करोड़ों लोग गरीबी के गर्त में चले गए, तो अदानी की संपत्ति में तूफ़ानी रफ़्तार से इज़ाफ़ा हुआ था. लेकिन, इस रहस्यमय उद्योगपति के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटाने की ये दिलचस्पी उनकी संपत्ति तक ही सीमित नहीं थी. लोग वास्तव में उस इंसान के बारे में जानना चाहते हैं कि आख़िर वो शख़्स कौन है, जिसने 70 देशों में 100 से ज़्यादा ठिकानों पर अपने कारोबार का विस्तार कर लिया, और फिर भी वो लंबे वक़्त से दुनिया की नज़रों से छिपा रह गया.
तो आख़िर गौतम अदानी कौन हैं, जिनका दख़ल हर उस चीज़ में है, जो हम आज इस्तेमाल करते हैं. फिर चाहे वो बिजली हो, बंदरगाह हो या हवाई अड्डे? क्या उनके कारोबार का कोई ख़ास तरीका है? कामयाबी का कोई मंत्र है? या बिज़नेस का कोई ऐसा मॉडल है, जो शर्तिया कामयाबी दिलाता है? जिसने 1970 के दशक में हीरे के एक मामूली व्यापारी रहे शख़्स को इस हैसियत में पहुंचा दिया, जहां वो मुकेश अंबानी के साथ मिलकर भारत की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाले मुख्य किरदार बन गए हैं.
60 बरस के गौतम अदानी ने मीडिया को बहुत कम इंटरव्यू दिए हैं और सार्वजनिक भाषण तो उन्होंने और भी कम दिए हैं. गौतम अदानी, कॉरपोरेट जगत की चमक-दमक और ग्लैमर से दूर रहते हैं. वो ख़ुद के प्रचार से बचते हैं. हमने उन्हें इंटरव्यू देने के लिए एक गुज़ारिश की थी. लेकिन, हमें ये बताया गया कि गौतम अदानी के पास अगले कुछ महीनों तक वक़्त नहीं है. गौतम अदानी आम तौर पर कॉरपोरेट कम्युनिकेशन विभाग के ज़रिए ही बात करते हैं.

गौतम अदानी के बारे में हमें सबसे ज़्यादा जानकारी रिसर्चर और पत्रकार आरएन भास्कर की किताब से ही मिल पाती है. जब हमने भास्कर से पूछा कि आख़िर गौतम अदानी के बारे में कुछ विवादित सौदों से इतर कुछ ज़्यादा जानकारी क्यों नहीं है, तो आरएन भास्कर इस सवाल के जवाब में दो बातें बताते हैं. ‘पहला ये कि गौतम अदानी को मीडिया कवरेज की बहुत ज़्यादा परवाह है नहीं. वो शर्मीले हैं और किसी अन्य कारोबारी की तरह दिखावा नहीं करते. गौतम भाई इंटरव्यू देने में हिचकिचाते हैं और उनकी तस्वीरें लेनी हों तो उन्हें मजबूर करना पड़ता है.’
भास्कर आगे कहते हैं, "दूसरा कारण ये है कि जब आप गौतम अदानी जैसे शख़्स हों, तो आप अपनी हर रणनीति के बारे में बात नहीं करते. इसके लिए सब्र की ज़रूरत होती है. इसमें कई बरस लग जाते हैं."
शुरुआती संकेत
अहमदाबाद के जिस इलाक़े में अदानी परिवार की दुकान थी, वहाँ दिनेश वोरा की भी कपड़ों की थोक दुकान है. दिनेश वोरा की शोहरत की वजह ये है कि उनकी चचेरी बहन प्रीति, गौतम अदानी की पत्नी हैं. वो कहते हैं कि शादी के वक़्त गौतम अदानी में ऐसी कोई असाधारण क़ाबिलियत नहीं नज़र आई थी कि एक दिन वो इतने बड़े कारोबारी हो जाएँगे.

दिनेश वोरा
दिनेश वोरा
दिनेश वोरा का अदानी परिवार से मिलना-जुलना अब बहुत कम होता है. वो कहते हैं , "हम अब वहाँ बहुत कम जाते हैं. हम सिर्फ़ शादी ब्याह और दूसरे पारिवारिक आयोजनों में ही उनके यहां जाते हैं. ऐसा नहीं है कि हम जब चाहें वहां जा नहीं सकते. लेकिन हमें ख़ुद लगता है कि बिना मतलब के वहां जाएंगे तो उनका वक़्त ही बर्बाद करेंगे."
गौतम अदानी की तरह उनके क़रीबी दोस्त अब भी अहमदाबाद में रह रहे हैं, जो अब एक बड़ा शहर बन चुका है. लच्छू भाई के नाम से पुकारे जाने वाले, लक्ष्मण चौधरी, हमसे मुलाक़ात होने पर सबसे पहले बड़े गर्व से ये बताते हैं कि वो गौतम अदानी के पुराने दोस्त हैं. वो कहते हैं, "मैं गौतमभाई को 40 साल से, यानी 1982 से जानता हूँ."
जब हमने लच्छू भाई से पूछा कि क्या, नौजवानी के दिनों में गौतम अदानी में उन्हें कुछ ऐसा नज़र आता था कि एक दिन वो इतनी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे? जवाब में लक्ष्मण चौधरी कहते हैं, "शुरू से ही उनकी सोच बड़े लोगों से नज़दीकी बढ़ाने, अच्छे रिश्ते बनाने की रही थी. जब बात काम के प्रति ईमानदारी की हो, तो उनके जैसा कोई और नहीं था."
कारोबार और ज़िंदगी के बेहतर अनुभव के लिए गौतम अदानी मुंबई चले गए थे. वहाँ वो हीरे के कारोबार से जुड़ गए. तब गौतम अदानी, प्रसाद चैंबर्स नाम की एक बहुमंज़िला इमारत में काम करते थे. वो इमारत आज भी मुंबई के बेहद व्यस्त ओपेरा हाउस इलाक़े में शान से खड़ी है.
स्कूल में गौतम अदानी एक औसत छात्र थे. उनका दिल पढ़ाई से ज़्यादा कारोबार में लगता था. इसीलिए, कॉलेज में पहला साल पूरा करने के बाद उन्होंने पढ़ाई पूरी तरह छोड़ दी थी.
क्या उस वक़्त उनमें दुनिया का सबसे अमीर इंसान बनने के कोई लक्षण दिखते थे? क्या उनके पास पैसे कमाने का कोई हुनर छुपा हुआ था? आरएन भास्कर कहते हैं, "वो किसी भी दूसरे सामान्य बच्चे की तरह ही थे. लेकिन किसी भी क्रिएटिव बच्चे की तरह उनमें ज़बरदस्त ऊर्जा थी और जैसा कि मैंने अपनी किताब में लिखा है कि बचपन से ही वो ‘तूफ़ानी’ थे. जब मैं उनके भैय्या और भाभी से मिला तो उन्होंने बताया कि गौतम तो हमेशा से एक तूफ़ानी बच्चा था और उसका बचपन उधम मचाने में गुज़रा था."
भास्कर आगे कहते हैं कि गौतम अदानी का ध्यान बस एक ही चीज़ पर था यानी कारोबार पर. वो बताते हैं कि, ‘किशोर उम्र में गौतम अदानी अपनी उम्र के बाक़ी लोगों से इस तरह से अलग थे कि वो फ़िल्मी पत्रिकाएं नहीं पढ़ते थे. उनके ज़हन में हमेशा सवाल कुलबुलाते रहते थे कि चीज़ें कैसे काम करती हैं? काम कैसे हो सकता है?’
पुश्तैनी घर

गौतम अदानी, गुजरात के एक औसत मध्यमवर्गीय जैन परिवार से आते हैं. उनके पिता कपड़े के एक छोटे-से कारोबारी थे. वो उत्तरी गुजरात के भीड़ और धूलभरे क़स्बे थराड के रहने वाले थे. आज भी वहां पर अदानी परिवार का पुश्तैनी घर मौजूद है. अब उस घर की देखभाल आनंद बारोट करते हैं. ख़ुशी से चहकते हुए बारोट ने हमें बताया कि ‘गौतम अदानी यहाँ सात-आठ महीने पहले अपनी टीम के साथ आए थे. उन्होंने हमसे बातें कीं. और ड्रोन कैमरे से इमारत की तस्वीरें लीं.’
गौतम अदानी के अपने पुश्तैनी घर जाने की ख़बर की पूरे थराड क़स्बे में ख़ूब चर्चा हुई. क्योंकि उसके कई महीने बाद जब हम वहाँ पहुँचे, तो हर कोई उनके इस ‘नायाब दौरे’ की बात करने में सबसे अधिक दिलचस्पी दिखा रहा था. थराड में एक जैन मंदिर है. वहां के पुजारी ने बड़े गर्व से बताया कि गौतम ने वहाँ दर्शन और पूजा करने के लिए ‘एक घंटे’ बिताए थे.
अपना परिचय गौतम अदानी के भतीजे के तौर पर कराने के बाद सुरेश हीरालाल अदानी ने हमें बताया कि जिस दिन गौतम भाई थराड आए थे, तो वो क़स्बे से बाहर थे. सुरेश ने कहा:
"मैं उनसे मुलाक़ात नहीं कर पाया. मैं क़स्बे से बाहर था और जब मैंने सुना कि अदानी मेरे पुश्तैनी घर आए हैं तो मैं अगले दिन भागकर पहुंचा, लेकिन तब तक वो जा चुके थे. मैंने उनसे अहमदाबाद में मिलने की कोशिश की थी. लेकिन, ये इतना आसान नहीं है."
सुरेश हीरालाल, गौतम अदानी के उन गिने-चुने रिश्तेदारों में से हैं, जिन्होंने अपना पुश्तैनी क़स्बा कभी नहीं छोड़ा और गरीबी से भी उनका पीछा नहीं छूटा है.
थराड पुराने भारत की नुमाइंदगी करता है- गड्ढों वाली सड़कें, रिहायशी मकानों की बेतरतीब क़तारें और उसकी संकरी सड़कों पर बेलगाम दौड़ता ट्रैफिक. भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक गौतम अदानी ने भले ही तड़क-भड़क वाले कई शहर और शीशे की चमकीली ऊंची इमारतें बनाई हैं. लेकिन, थराड क़स्बे की तस्वीर उसके ठीक उलट है. स्थानीय लोग कहते हैं कि गौतम अदानी ने उनके यहाँ एक मंदिर बनवाने का वादा किया है और पानी की एक टंकी बनवाई है. इसके लिए वो अदानी के शुक्रगुज़ार हैं. हालांकि क़स्बे के बाशिंदों की ख़्वाहिश है कि गौतम अदानी उनके क़स्बे को एक आधुनिक शहर के तौर पर विकसित करें.

गौतम अदानी के पिता शांतिलाल अदानी ने थराड क़स्बा छोड़ दिया था और वो अहमदाबाद में बस गए थे. गौतम अदानी 1962 में अहमदाबाद में ही जन्मे. उनके सात भाई बहनों और उनके बच्चों का परिवार एक दूसरे के बेहद क़रीब है और अदानी समूह का हिस्सा है. अदानी के एक भाई दुबई में रहते हैं.
गौतम अदानी के दोस्तों और परिजनों से बात करने पर ये बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि एक नौजवान के तौर पर औसत व्यक्ति के तौर पर ही जाने जाते थे और उनमें कोई अनूठी बात नहीं दिखती थी लेकिन अपनी युवावस्था में भी अदानी की निगाह ऊँचे मक़सद पर रहती थी और वो हमेशा अगले बेहतर मौक़े की तलाश में रहा करते थे. उनकी ये ख़ूबियां उस वक़्त खुलकर सामने आईं, जब वो मुंबई से अहमदाबाद लौटे और अपने बड़े भाई मनसुखभाई अदानी के प्लास्टिक का व्यापार करने वाली कंपनी, 'इज़ी पैकेजिंग' से जुड़ गए.
आरएन भास्कर कहते हैं, "गौतम भाई सिर्फ़ व्यापार करके ख़ुश नहीं थे. अपने भाई के धंधे से जुड़ने के बाद सबसे पहले उन्होंने उस कारोबार को बढ़ाया. अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए, उन्होंने सप्लाई के सस्ते से सस्ते स्रोत की तलाश की. उन्होंने ये पता लगाने की कोशिश की कि माल के असली सप्लायर कौन हैं. फिर वो उनसे मिलने (विदेश) गए और भारी मात्रा में सामान ख़रीदा. गौतम अदानी को पता था कि वो ये माल भारत में कई लोगों को बेच सकते हैं. उनमें जोखिम लेने का साहस था. लेकिन, इस साहस के साथ जुड़े ख़तरों से निपटने का हुनर भी उन्हें ख़ूब आता था.’
1986 में जब गौतम 24 बरस के हुए तो उनकी शादी कर दी गई. अदानी की पत्नी प्रीति अदानी एक डेंटिस्ट हैं. वो भी जैन समुदाय से आती हैं और उनके पिता से अदानी परिवार की अच्छी जान-पहचान थी.
गौतम के दोस्त लच्छू भाई कहते हैं कि शादी का इंतज़ाम उन्होंने ही किया था. लच्छू भाई कहते हैं, "शादी की सारी व्यवस्था मैंने ही की थी. वो शुरुआती दिन थे. तो शादी में कोई तड़क-भड़क नहीं थी.शादी में परिवार के नज़दीकी लोग और दोस्त ही शामिल हुए थे. ये एक पारंपरिक जैन शादी समारोह था."
उस समय तक गौतम अदानी का इम्पोर्ट का धंधा ख़ूब चल निकला था और वो बड़े पैमाने पर कारोबार कर रहे थे. 1988 से 1992 के दौरान गौतम अदानी का इम्पोर्ट का कारोबार 100 टन से कई गुना बढ़कर 40 हज़ार टन पहुँच गया था. जल्दी ही अदानी ने निर्यात में भी हाथ आज़माना शुरू कर दिया और बहुत जल्द वो बड़े एक्सपोर्टर बन गए, जो लगभग हर सामान का निर्यात करते थे.
मुंद्रा बंदरगाह से आया निर्णायक मोड़?
एक व्यस्त एक्सपोर्टर और इम्पोर्टर के तौर पर गौतम अदानी अक्सर बंदरगाह पर सामान उतारने और चढ़ाने में बेवजह की देरी और अकुशलता को भुगत चुके थे. इससे उन्हें हर साल 10 से 12 करोड़ रुपए का नुक़सान होता था. इसी वजह से उन्होंने अपना निजी बंदरगाह बनाने का फ़ैसला किया, जो उन्होंने मुंद्रा में बनाया. ये वो वक़्त था, जब भारत की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हो रहा था. गुजरात सरकार ने निजी कारोबारियों की मदद से 10 बंदरगाह विकसित करने का फ़ैसला किया था. इसमें मुंद्रा भी शामिल था. मुंद्रा बंदरगाह की गहराई, पड़ोस के सरकारी बंदरगाह कांडला से कहीं ज़्यादा थी इसलिए क़ुदरती तौर पर यहां बड़े जहाज़ आ-जा सकते थे.

मुंद्रा बंदरगाह पर कारें
मुंद्रा बंदरगाह पर कारें
गौतम अदानी के कारोबार के विस्तार में मुंद्रा बंदरगाह मील का एक पत्थर साबित हुआ. गौतम अदानी के बचपन के दोस्त गिरीशभाई के शब्दों में कहें तो, ‘उन्होंने मुंद्रा में बंजर ज़मीन ख़रीदी थी. आज वो जन्नत में तब्दील हो चुकी है.’ बंदरगाह बनने के बाद वहां, 2014 में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किया गया. आज वहां कारोबारी गतिविधियों की भरमार है, और अदानी पावर, टाटा पावर और अदानी विल्मर जैसी कई कंपनियां वहां सक्रिय हैं.
जब हमने विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के आस-पास के गांवों का दौरा किया, तो ये बात बिल्कुल साफ़ दिखी कि वहां मानों अदानी की हुकूमत है. वहाँ उन्हीं का फ़रमान चलता है. जब हमने कुछ गांववालों से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने हमसे बात करने से मना कर दिया. वो नहीं चाहते थे कि अदानी के आदमी उन्हें हमसे बात करते हुए देखें. यहाँ इस बात का ज़िक्र करना उपयोगी होगा कि मुंद्रा पहुँचने से पहले हमने एक चर्चित स्थानीय कार्यकर्ता से संपर्क किया था. उस व्यक्ति ने पहले यहां बंदरगाह और विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए थे. हमने उस व्यक्ति से गुज़ारिश की थी कि वो हमारा परिचय कुछ ऐसे गाँव वालों से कराए, जिन्हें हो सकता है कि ज़मीन अधिग्रहण को लेकर कोई शिकायत हो. इसके बजाय उसने हमारी बातचीत रिकॉर्ड करके अदानी के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन विभाग को सौंप दी. उस विभाग के पास ऐसे लोगों की अपनी एक लिस्ट थी. वो चाहते थे कि हम उन्हीं लोगों से बात करें. हमने एक और एक्टिविस्ट से मुलाक़ात की. वो हमारे सवालों के जवाब देने को तैयार नहीं हुआ. हालांकि उसने हमें कुछ दस्तावेज़ ज़रूर दिए. निश्चित रूप से वहाँ ऐसा माहौल था मानो अदानी के मामले में कोई मुँह नहीं खोलना चाहता.
हालांकि एक और स्थानीय किसान नारायण गढ़वी ने हमसे बातचीत का साहस दिखाया और मज़बूती से अपना पक्ष भी रखा. नारायण गढ़वी कई वर्षों से किसानों के हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं और उन्होंने अभी भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है. वो बताते हैं कि विशेष आर्थिक क्षेत्र में 19 गांव जोड़े गए थे. उनका इस्तेमाल आस-पास के किसान अपने जानवर चराने के लिए करते थे. नारायण गढ़वी कहते हैं कि 1960 और 1970 के दशक में स्थानीय और राज्य सरकारों ने ये ज़मीनें किसानों को दी थीं. वो आरोप लगाते हैं कि विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए उनकी सारी की सारी ज़मीनें छीन ली गईं और उसका मुआवज़ा भी नहीं दिया गया. हालांकि, बात में थोड़ी नरमी लाते हुए नारायण गढ़वी आगे कहते हैं, "अदानी ने विशेष आर्थिक क्षेत्र को विकसित किया है. यहां बहुत सारी कंपनियां आई हैं. यहां टाटा की भी एक बिजली परियोजना है, जो एक अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट है. हम इन कंपनियों के ख़िलाफ़ नहीं हैं. हमारी एक ही मांग है कि सरकार या अदानी या तो हमारे जानवरों के लिए चारा दे, या हमारी ज़मीन लौटा दे. या फिर सरकार हमें जानवर चराने के लिए अलग से ज़मीन दे."
लेकिन, इसमें कोई शक नहीं है कि बंदरगाह और विशेष आर्थिक क्षेत्र मिलकर, भारत की अर्थव्यवस्था के पावरहाउस हैं
‘पूंजीवादी भ्रष्टाचार’ और उनके कारोबारी सामंत

राहुल गांधी और कई अन्य विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी पर पूंजीवाद के घनघोर समर्थक होने का आरोप लगाते हैं और अदानी-अंबानी उनके कारोबारी सामंत के तौर पर देखे जाते हैं. मगर, आरएन भास्कर कहते हैं:
"विकासशील देश ख़ुद-ब-ख़ुद एक ही व्यक्ति के संरक्षण की ओर झुक जाते हैं, राजनेता और उद्योगपति आपसी तालमेल से काम करते हैं. इसी तरह, अदानी भी ज़मीन से ऊपर उठे. पहले के दौर में बिड़ला ने इसी तरह से तरक़्क़ी की थी."
भास्कर इसे एक वैश्विक चलन के तौर पर देखते हैं और कहते हैं, "अगर आप सरकार हैं, तो आपको ये सुनिश्चित करना होगा कि कोई एक इंसान इतना बड़ा न बन जाए कि फिर आप उसे नाकाम होने न दे सकें. लेकिन दुनिया भर में विकासशील देशों में लोग ऐसे ही बहुत बड़े उद्योगपति बन गए हैं. आप अमेरिका में रॉकफेलर की मिसाल देखिए. एक ज़माने में अमेरिका का सारा का सारा तेल उद्योग उन्हीं का था. मोनोपोलीज़ कमीशन को उनका एकाधिकार ख़त्म करने में 20 साल लग गए थे और कंपनी को 34 हिस्सों में बांट दिया गया था. फिर भी वो सारी 34 कंपनियां धनवान थीं. आप रेलवे लाइन बिछाने वाले उद्योगपतियों को देख लीजिए. रेल से जुड़ी सारी रियायतें एक ही इंसान को मिलती थीं. आख़िर क्यों? आप रॉथ्सचाइल्ड को ही लीजिए, जिनका विदेशी मुद्रा के लेन-देन के कारोबार पर एकाधिकार था."
भारत में गौतम अदानी के दोस्त उनके बचाव में कहते हैं कि टाटा, बिड़ला और बजाज जैसे मुट्ठी भर उद्योगपतियों को नेहरू तरजीह देते थे. वो पूछते हैं कि क्या वो ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म नहीं था?’
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस वक़्त गौतम अदानी के कारोबारी विजय रथ तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है. भारत में मूलभूत ढांचे के विकास का एक बड़ा हिस्सा उनके हाथ में है. गैस और बिजली के वितरण का ज़्यादातर कारोबार उनकी कंपनियां करती हैं. लेकिन, बहुत से लोगों को लगता है कि ये तो बस शुरुआत है. भारत में बुनियादी ढांचे के विकास में अपार संभावनाएं हैं. विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़, अपनी तेज़ी से बढ़ रही शहरी आबादी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए भारत को, 2036 तक हर साल 55 अरब डॉलर की रक़म शहरी बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश करनी होगी.
भारत में विश्व बैंक के निदेशक ऑगस्ट तानो कोउआमे कहते हैं कि भारत में निजी क्षेत्र की पूंजी की सख़्त ज़रूरत है. वो कहते हैं कि, ‘हरित, स्मार्ट, समावेशी और टिकाऊ शहरीकरण के लिए भारत के शहरों को भारी मात्रा में पूंजी दरकार है. शहरी स्थानीय निकायों (ULB) और ख़ास तौर से बड़े और क़र्ज़ देने लायक़ निकाय निजी स्रोतों से अधिक से अधिक क़र्ज़ ले सकें, इसके लिए लिए उचित माहौल बनाना आवश्यक है, तभी शहर अपनी तेज़ी से बढ़ रही आबादी के रहन सहन में टिकाऊ तरीक़े से सुधार कर पाएंगे.’
अभी तक बुनियादी ढांचे के विकास की ज़्यादातर परियोजनाओं में या तो केंद्र सरकार पैसे लगाती है या फिर राज्यों की सरकारें. इस क्षेत्र में निजी निवेश पांच प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ सका है. तो ज़ाहिर है कि निजी निवेशकों और उद्यमियों के पास बुनियादी ढांचे के विकास की बड़ी परियोजनाओं को हाथ में लेने की काफ़ी संभावनाएं हैं.
इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार सार्वजनिक रूप से देश की संपत्ति बढ़ाने वालों को अधिक सम्मान देने की मांग की है और इस बात पर ज़ोर दिया है कि राष्ट्र के प्रति उनकी विशाल सेवाओं को मान्यता दी जानी चाहिए. नरेंद्र मोदी, आगे भी संपत्ति निर्माण करने वालों को बढ़ावा देते ही रहेंगे, और ज़ाहिर है कि इसका सबसे ज़्यादा लाभ अदानी, अंबानी और कुछ दूसरे उद्योगपतियों को मिलता रहेगा.
गौतम अदानी के दोस्त गिरीशभाई कहते हैं कि आम आदमी की नज़र में मुट्ठी भर लोग अमीर होते जाते हैं. लेकिन उनकी नज़र में इसकी ठोस वजह है. वो कहते हैं, " हाँ अमीर और ग़रीब के बीच बड़ी खाई है. लेकिन मोदी की बात सही है. वो उन लोगों के बारे में सोच रहे हैं, जो रोज़गार पैदा करेंगे. जो बुनियादी ढांचे का विकास करेंगे और मोदी को उन पर ही यक़ीन करना चाहिए."




गौतम अडानी के साथ गिरीशभाई दानी
गौतम अडानी के साथ गिरीशभाई दानी

गौतम अडानी के साथ गिरीशभाई दानी
गौतम अडानी के साथ गिरीशभाई दानी

गौतम अडानी के साथ गिरीशभाई दानी
गौतम अडानी के साथ गिरीशभाई दानी
आरएन भास्कर मानते हैं कि प्रधानमंत्री को सिर्फ़ मुट्ठी भर उद्योगपतियों के प्रति सम्मान का इज़हार नहीं करना चाहिए. वो कहते हैं कि:
"मैं मोदी से दो मामलों में असहमत हूं. 2014 से लेकर अब तक लगभग 35 हज़ार अमीर भारतीय (HNI) भारत छोड़कर जा चुके हैं. तो ज़ाहिर है सरकार कुछ न कुछ तो ऐसा ज़रूर कर रही है संपत्ति के निर्माता देश छोड़कर जा रहे हैं. भारत में कामयाब होने के लिए आपको फौलादी बनना पड़ेगा. और अगर आप पिछले साल के लोकसभा के आंकड़े देखें तो 1.6 लाख लोगों ने एक साल में भारत की नागरिकता छोड़ दी थी. लोग अपना वतन छोड़कर क्यों जा रहे हैं, अगर रोज़गार की बेहतर संभावनाएं होंगी?. कारोबार के लिए अच्छा माहौल होगा, तो वो देश छोड़कर नहीं जाएंगे. भारत को ऐसे मौक़े बनाने की ज़रूरत है. आप क़ाबिलियत को ऐसे नहीं जाने दे सकते हैं."
अदानी का साम्राज्य- क़र्ज़ का पहाड़?

क़र्ज़ पर रिसर्च करने वाली कंपनी क्रेडिटसाइट्स की अगस्त की रिपोर्ट में अदानी के कारोबारी साम्राज्य को क़र्ज़ में गहरे डूबा हुआ कहा गया था. रिपोर्ट में अदानी के कारोबार से जुड़े दूसरे जोखिमों पर से भी पर्दा उठाया गया था. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अदानी कंपनी के शेयर काफ़ी गिर गए थे. अदानी समूह की ये डरा देने वाली समीक्षा उस वक़्त आई थी, जब उनकी कंपनियां टेलीकॉम, सीमेंट और बुनियादी ढांचे के विकास की लंबी अवधि वाली परियोजनाओं में निवेश कर रही थीं. क्रेडिटसाइट्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, अदानी की कंपनियों पर क़र्ज़ का भारी बोझ उनके समूह के लिए बहुत बड़ा जोखिम है. लेकिन, अदानी समूह ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज करते हुए कहा था, "अदानी समूह अपना क़र्ज़ लगातार कम करता जा रहा है. ब्याज, टैक्स और नुक़सान से पहले की आमदनी (Ebitda) और कुल क़र्ज़ के बीच का अनुपात, पिछले नौ वर्षों में 7.6 गुने से घटकर 3.2 गुना ही रह गया है."
मार्च 2022 में अदानी समूह पर कुल 1.88 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ था. 2015-16 में जहां अदानी समूह के कुल क़र्ज़ में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत थी, वहीं 2021-22 में कुल ऋण में सरकारी बैंकों का क़र्ज़ घटकर 21 प्रतिशत ही रह गया था.
गुजरात में अदानी के विरोधियों समेत बहुत से लोग उनकी कंपनियों पर लदे ‘क़र्ज़ के अधिक बोझ’ से ज़्यादा चिंतित नहीं लगे. वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पटेल कहते हैं कि गुजरात में कोई भी धंधा चलाने या कोई नया कारोबार शुरू करने में अपने पैसे नहीं लगाता है. गिरीशभाई कहते हैं कि हमें अदानी के क़र्ज़ को लेकर फ़िक्र नहीं करनी चाहिए. वो कहते हैं, "अदानी कभी भी अपना क़र्ज़ चुका पाने में नाकाम नहीं रहे हैं. उनके शेयरों को देखिए. लोग उनके शेयर इसीलिए ख़रीदते हैं क्योंकि वो उन पर भरोसा करते हैं."
क्रेडिटसाइट्स रिपोर्ट में अदानी समूह की एक बड़ी कमी की ओर ध्यान दिलाया था और वो चिंता का विषय होनी चाहिए. रिपोर्ट में कहा गया था कि अदानी समूह में 'एक ही व्यक्ति पर निर्भरता बहुत ज़्यादा' है. इससे पता चलता है कि गौतम अदानी की ग़ैर-मौजूदगी में सीनियर मैनेजमेंट की क्षमता शायद समूह को चलाने के लिए अपर्याप्त हो. यहां तक कि गौतम अदानी के क़रीबी दोस्त भी यही मानते हैं कि अदानी समूह एक ही इंसान के भरोसे चल रहा है. गिरीशभाई कहते हैं, "ये वन मैन शो है. गौतम अदानी ही बॉस हैं. उनकी जानकारी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता. लेकिन तमाम ज़िम्मेदारियों के बीच अगर आप उनके पास बैठें, तो वो बिल्कुल शांत नज़र आते हैं."
कोयला बनाम स्वच्छ ईंधन का विरोधाभास

गौतम अदानी ने धरती का तापमान कम करने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन, पवनचक्की और सौर उर्जा के पैनल में 70 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है. विश्लेषक मानते हैं कि उनका ये क़दम सराहनीय है. लेकिन वो उन्हें ये विडम्बना ही लगती है कि जो इंसान भारत में कोयले का सबसे बड़ा आयातक है, वही पर्यावरण को साफ़ करने में सबसे बड़े निवेश का वादा कर रहा है. पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में अदानी के 70 अरब डॉलर के निवेश का स्वागत किया है. लेकिन वो ये भी चाहते हैं कि अदानी वो समय-सीमा भी बताएँ जब वो धीरे धीरे कोयले और खनन के धंधे को समेट लेंगे. ऐसा उन्होंने अब तक नहीं किया है.
लच्छू भाई और गिरीश भाई जो गौतम अदानी को अच्छे से जानते हैं, उन्हें ये यक़ीन है कि भारी निवेश के वादे के बाद अदानी का कारोबारी साम्राज्य नई ऊँचाइयों पर पहुंचेगा. वो कहाँ जाकर रुकेंगे? इस सवाल के जवाब में दोनों ये मानते हैं कि गौतम अदानी ने अपना कारोबारी साम्राज्य अगली पीढ़ी को सौंपने की तैयारी कर ली है. उनके बड़े बेटे करन अभी सीमेंट का कारोबार देख रहे हैं. वहीं छोटे बेटे जीत समूह चलाने में बहुत संजीदगी से जुड़े हुए हैं. इसके अलावा भी दूसरी पीढ़ी के कई और रिश्तेदार हैं, जो अदानी समूह का अटूट हिस्सा हैं.
गिरीश भाई और लच्छू भाई, दोनों ही ज़ोर देकर ये कहते हैं गौतम अदानी की शानदार कामयाबी की वजह न तो मोदी हैं और न ही कोई और राजनेता. उनका कहना है कि अदानी की तरक़्क़ी की मुख्य वजह ये है कि ये सब उनकी क़िस्मत में ही लिखा था. हालांकि आरएन भास्कर, गौतम अदानी की कामयाबी को थोड़े अलग नज़रिए से देखते हैं. वो कहते हैं:
"क़िस्मत भी उसी का साथ देती है, जो दिमाग़ी तौर पर कामयाबी के लिए सबसे ज़्यादा तैयार हो."
और उनके अनुसार गौतम अदानी कामयाबी के लिए दिमाग़ी तौर पर सबसे अधिक तैयार थे.
बीबीसी संवाददाता: ज़ुबैर अहमद और अर्जुन परमार
शॉर्टहैंड प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
फोटो: गेटी
इसे पब्लिश किया गया: 5 दिसंबर, 2022