आज़ादी के 75 साल: नाम जिनसे झलकता है भारत का इतिहास  

आम तौर पर एकदम अनोखे नाम वाले शख़्स कम ही मिलते हैं. 

 भारतीय मां-बाप अपने बच्चों के नाम भगवानों के नाम, खेल कूद की दुनिया के सितारों के नाम, फिल्म स्टार और प्रसिद्ध कार्टूनों के नाम पर रखते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने बच्चों के नाम की प्रेरणा कहीं और से मिलती है.  

 भारत आज़ादी के 75 साल पूरे कर रहा है, ऐसे में बीबीसी ने देश भर के छह लोगों से मुलाकात की, जिनके नाम ऐतिहासिक घटनाक्रम की गवाही देते हैं.  

आज़ाद कपूर 

आज़ाद कपूर का जन्म 15 अगस्त, 1947 यानी ब्रिटिश शासन से भारत की आज़ादी के दिन हुआ.  

 “जब मेरा जन्म हुआ तो परिवार में जश्न मनाया गया. लोगों ने कहा कि मदर इंडिया आ गयी है और हमारी लिए आज़ादी लायी है.”

आज़ाद, बचपन में अपने नाम से बहुत ख़ुश नहीं थीं क्योंकि उन्हें यह लड़कों का नाम लगता था. लेकिन समय के साथ उन्हें अपने नाम की ख़ासियत का अंदाज़ा हो गया.  

उन्होंने बताया:

“कोई मेरा जन्म दिन नहीं भूलता. जो लोग मुझे जानते हैं वो 15 अगस्त को याद करते हैं. मेरे दोस्त मज़ाक़ करते हैं कि पूरा देश तुम्हारा जन्म दिन मना रहा है.” 

 ब्रिटिश शासन से आज़ाद होने के बाद भारत दुनिया भर में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का देश बना.  

इमरजेंसी यादव 

भारत में इमरजेंसी लागू होने के अगले ही दिन यानी 26 जून, 1975 को इमरजेंसी यादव का जन्म हुआ था.

उन्होंने बताया:

“मेरे पिता ने मुझे बताया था कि उन्होंने यह नाम इसलिए रखा ताकि लोग भारतीय इतिहास के उदास और अंधेरे वाले समय को भूल नहीं सकें.”

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रेडियो पर घोषणा करके बताया था कि ‘आंतरिक गड़बड़ी’ से राष्ट्रीय सुरक्षा पर ख़तरे को देखते हुए वह इमरजेंसी लागू कर रही हैं.

इस दौरान देश के लोगों के संवैधानिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे. प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लग गया था और कई विपक्षी नेता जेल में बंद कर दिए गए थे.

इमरजेंसी यादव के पिता राम तेज यादव भी विपक्षी राजनीतिक दल के नेता थे, उन्हें बेटे के जन्म से कुछ ही घंटे पहले गिरफ़्तार कर लिया गया था. 22 महीने जेल में बिताने के बाद जब 1977 में आपातकाल हटा तब वे अपने बेटे से पहली बार तब मिल पाए थे.

“अगर किसी देश में आपातकाल लागू है तो इसका मतलब है देश पीछे की ओर बढ़ रहा है. मुझे उम्मीद है कि हमें ऐसी स्थिति दोबारा देखने को नहीं मिलेगी.”

कारगिल प्रभु

कारगिल प्रभु का जन्म 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल संघर्ष के दौरान हुआ था. इन्हें लंबे समय तक अपने नाम के महत्व का पता नहीं था.

उन्होंने बताया:

“मेरा नाम कारगिल युद्ध पर रखा गया था. लेकिन मैं इस बारे में ज़्यादा नहीं जानता था. बड़े होने के बाद गूगल करने पर मुझे इसके बारे में पता चला. जब मेरी उम्र बहुत कम थी, तभी मेरे पिता का निधन हो गया था. वे मुझे मेरे नाम का मतलब नहीं बता पाए थे.”

कारगिल इन दिनों चेन्नई में वीडियो एडिटर के तौर पर काम करते हैं. वे अब तक कारगिल या कश्मीर घाटी तक नहीं गए हैं. लेकिन वे जिन जगहों की यात्रा करने चाहते हैं उनमें कारगिल का नाम सबसे ऊपर है.

“युद्ध में मेरा विश्वास नहीं है. लेकिन मेरा मानना है कि भारत को कारगिल युद्ध में अपना बचाव करना ही चाहिए था और वह एक सही फ़ैसला था.”

भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध के दौरान 527 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. पहले तो पाकिस्तान, भारतीय सीमा में किसी घुसपैठ से इनकार करता रहा था. लेकिन यह युद्ध क़रीब तीन महीने तक चला और भारत को विजेता घोषित किया गया.

सुनामी रॉय  

सुनामी की मां की आँखें बेटे के जन्मदिन को याद करते हुए चमकने लगती हैं. अंडमान द्वीप समूह में एक द्वीप में एक छोटी सी पहाड़ी की चोटी पर शरण लेने के दौरान मौनिता गर्भवती थीं, 2004 की विनाशकारी सुनामी से यह पहाड़ी भी क्षतिग्रस्त हो गई थी.

"मैं ने अपने पति को बड़े बेटे के साथ वहां से निकल जाने को कहा. मुझे गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ बच पाने की कहीं कोई उम्मीद नहीं थी. रात के 11 बजे, मैं ने पहाड़ी के अंधेरे में बेटे को बिना किसी मदद और दवाईयों को बेटे को जन्म दिया. उसके बाद मेरा स्वास्थ्य कभी पहले जैसा नहीं रहा."
- मौनिता रॉय (सुनामी की मां)

स्कूल में, कई बच्चे सुनामी के नाम का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहते यह तबाही लाने वाले तूफ़ान का नाम है. लेकिन सुनामी की मां के लिए यह नाम उम्मीद और अस्तित्व से जुड़ा है.

“मेरा बेटा हम सब के लिए लिए उम्मीद की तरह आया. हर कोई परिवार वालों के खोने के दुख में डूबा था, उस दिन एक मात्र अच्छी बात ये हुई कि मेरे बेटे का जन्म हुआ था.”
- मौनिता रॉय (सुनामी की मां)

हिंद महासागर में 26 दिसंबर, 2004 को उठे सुनामी तूफ़ान के चलते दो लाख लोगों की मौत हुई थी, जिसमें दस हज़ार भारतीय शामिल थे.

खजांची नाथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के कुछ सप्ताह बाद खजांची का जन्म उत्तर प्रदेश में पंजाब नेशनल बैंक की एक ब्रांच में हुआ.

खजांची की मां, सर्वेशा देवी, बैंक से अपना पैसा निकालने के लिए पांच दिनों तक लाइन में खड़ी रही थीं. 500 और 1000 रुपये के नोट चलन से हटाने के फ़ैसले के बाद आम लोगों से लेकर बैंकों तक में, नकद पैसों की काफ़ी कमी हो गई थी.

“नोटबंदी के दौरान इसका जन्म बैंक में हुआ था, इसलिए हर किसी ने कहा इसका नाम खाजांची होना चाहिए.”
- सर्वेशा देवी (खजांची की मां)

आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट को चलन से हटाने की घोषणा की थी. इसके महज चार घंटे के भीतर भारतीय अर्थव्यवस्था के 85 फ़ीसदी के नोट चलन से बाहर हो गए थे

लेकिन खजांची का नाम उनके परिवार के लिए लकी साबित हुआ. उत्तर प्रदेश में विपक्ष के नेता अखिलेश यादव ने 2022 के विधान सभा चुनाव में खजांची को अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में किसी स्टार की तरह शामिल किया.

“वह हमलोगों के लिए पैसा और संपत्ति लेकर आया. हर कोई हमारी मदद कर रहा है. इसके नाम की बदौलत अब हमारे पास बेहतर घर और पर्याप्त पैसा है.”
- सर्वेशा देवी (खजांची की मां)

सरकार ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए कहा था कि इसके ज़रिए काले धन, कर चोरी और आर्थिक घपलों को रोकने में मदद मिलेगी लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इससे आम लोग और छोटे कारोबार सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए.

लॉकडाउन काकंडी 

2020 में कोविड संक्रमण के चलते लगाए गए लॉकडाउन की घोषणा के एक सप्ताह बाद उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव खुखुंडू में जन्मे लॉकडाउन अपने गांव के सेलिब्रेटी हैं.

“मेरे बेटे का जन्म तब हुआ जब हर तरफ़ लॉकडाउन लगा था. पत्नी को अस्पताल तक ले जाने के लिए वाहन तलाशना मुश्किल था. ढेरों डॉक्टर, रोगियों को देखने से इनकार कर रहे थे. लेकिन मेरे बेटे के जन्म में कोई मुश्किल नहीं हुई.”
- पवन कुमार (लॉकडाउन के पिता)

गांव ही नहीं बल्कि आस-पास के गांवों में लोग लॉकडाउन के घर को जानते हैं और लोग उनसे मिलने के लिए आते रहते हैं.

“कई बार लोग उसका मज़ाक़ भी उड़ाते हैं लेकिन हर कोई याद भी रखता है. मैं चाहता हूं कि लोगों ने उस वक्त जो झेला था, उसकी याद इसका नाम दिलाता रहे.”
- पवन कुमार (लॉकडाउन के पिता)

कुछ ही घंटों की नोटिस के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च, 2020 को देश भर में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी. लॉकडाउन लगाने के कुछ सप्ताह बाद देश भर में रोज़मर्रा ज़रूरत के सामानों की भारी कमी हो गई थी. इसके अलावा बड़े पैमाने पर, ख़ासकर असंगठित क्षेत्र में, लोगों की नौकरियां चली गईं.

तस्वीर और स्टोरी: जाल्टसन ए सी
शॉर्टहैंड प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी