दिल्ली गैंगरेप: निर्भया ने कैसे बदली ये ज़िंदगियां

स्नेहा, पंकज, सीमा, बरखा और अरुण को नहीं मालूम था कि दिल्ली में चलती बस पर एक अनजान लड़की का बलात्कार और फिर मौत उनके जीवन को पलटकर रख देगी.
दिव्या आर्य

दस साल पहले, 16 दिसंबर 2012. वो रविवार की रात थी.
पांच आदमी और एक लड़का दक्षिणी दिल्ली की एक खाली बस में बैठ चुके थे.
तब दिल्ली के एक पीजी में कई और लड़कियों के साथ रह रही सीमा कोचिंग का होमवर्क पूरा कर रही थी.
बिहार के एक गांव में पंकज* अपने खेत से लौटकर, मां-बाप के साथ खाना खाने जा रहा था.
मुंबई के एक छोटे से फ्लैट में स्नेहा अकेली थीं.
अमरीका से दो साल पहले पुणे लौटी बरखा अकेले नगालैंड घूमने की तैयारी में थी.
दक्षिणी दिल्ली में उस बस में बैठे छह लोगों में से एक से कुछ ही घंटे पहले मिलने के बाद, अरुण* अपने मोहल्ले, रविदास कैम्प लौटा था.
जब 23 साल की एक छात्रा और उसके दोस्त ने हाथ देकर उस बस को रोका और उसमें चढ़ गए.
उसके बाद जो हुआ, उससे सब बदल गया. हिंसा की परिभाषा, उससे लड़ने के हथियार और उबरने के ज़रिए.
उस छात्रा का सामूहिक बलात्कार और गहरी चोटों से मौत के बाद मीडिया ने उसे नाम दिया - ‘निर्भया’. लेकिन निर्भया केस पर मीडिया की पैनी नज़र और उस पर उबले आम लोगों के गुस्से ने आप-हम को कितना निर्भय बनाया? इसी सवाल का जवाब ढूंढा मैंने सीमा, पंकज, स्नेहा, बरखा और अरुण की कहानियों में.
* पहचान गोपनीय रखने के लिए नाम बदल दिए गए है.

सीमा कुशवाहा
सीमा ने अखबार की वो कतरनें पिछले 10 साल से संभाल कर रखी हैं.
जब दिल्ली पुलिस के वॉटर कैनन की बौछार से बचने के लिए वो राष्ट्रपति भवन के सामने के लैम्प पोस्ट पर चढ़ गईं.

उत्तर प्रदेश के इटावा के एक गांव से सिविल सर्विसिस की पढ़ाई करने दिल्ली आईं सीमा के लिए ये एक बड़ा कदम था.
मुझे अखबार दिखाते हुए बोलीं:
“जो सब निर्भया के साथ हुआ, शरीर में बांस घुसाया गया, हाथ डालकर आंते खींच ली गईं, वो सब जानकर चुप कैसे रहती?”
दिसंबर 2012 में दिल्ली की सड़कों पर लड़के-लड़कियों का सैलाब उमड़ पड़ा था.
ना दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड ना पुलिस के आंसू गैस के गोले और पानी के कैनन उन्हें रोक पा रहे थे.






पर सीमा के पीजी में डर का माहौल था. बाकी लड़कियों को घर से मां-बाप के फोन आ रहे थे.
सीमा याद करती हैं:
“उनके परिवारवाले कहते, ‘क्या फायदा पढ़ाई का, घर आ जाओ’, ‘आईएएस तो तब बनोगी जब अपनेआप को सेफ रख पाओगी’.”
पीजी में रह रहीं 20 में से आधी लड़कियों को घर लौटना पड़ा. पर सीमा डटी रहीं.
सुरक्षा

छह भाई-बहनों में सबसे छोटी, वो शुरू से ही सवाल उठानेवालों में थी.
हाई स्कूल गांव से ढाई किलोमीटर दूर था. तो जब उन्होंने आठवीं से आगे पढ़ने की मांग की, तो गांव में पंचायत बैठाई गई. वो भी तब जब उनके पिता सरपंच थे.
ऐसी मांग करनेवाली वो गांव की पहली लड़की थीं. लड़कों और लड़कियों में ग़ैर-बराबरी की कई मिसालों में से ये उनका पहला तजुर्बा था.
अब जो दिल्ली की बस में हुआ था, और जो उनके पीजी में हो रहा था, उससे उनके मन में कई सवाल खड़े हो गए थे.
“दिल्ली की सड़कों से बचाने के लिए अगर लड़की को गांव भेज दिया जाए तो वो वहां सुरक्षित है? शादी कर दी जाए तो उसमें भी तो घरेलू हिंसा हो सकती है? मारा जा सकता है? तो सुरक्षा कहां है?”
ये सब सवाल बड़े पैमाने पर पूछे जा रहे थे. सरकार पर कुछ करने का दबाव था जिसके चलते रिटायर्ड जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई.
दशकों से संघर्ष कर रहे देशभर के महिला संगठनों और ऐक्टिविस्ट्स को मौका मिला और उन्होंने कमेटी के सामने अपनी बात रखी.
सरकार ने कुछ सुझाव माने और कानून में बदलाव कर औरतों के खिलाफ हिंसा की परिभाषा का दायरा बड़ा किया.
जांच के दौरान पुलिस और मेडिकल कर्मियों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए जुर्माने तय किए.

सरकार जघन्य यौन हिंसा के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान भी लाई. हालांकि कमेटी इसके खिलाफ़ थी और उसका मानना था कि ऐसा ज़रूरी नहीं कि कड़ी सज़ा का डर, अपराध करनेवाले को रोक दे.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस साल में औरतों के खिलाफ़ हिंसा की दर घटने के बजाय 54 फीसदी बढ़ गई है.
29 दिसंबर को निर्भया की मौत हो गई. देशभर में उसके दोषियों के लिए मौत की सज़ा की मांग तेज़ हो गई.
सीमा ने सिविल सेवा का रास्ता छोड़ वापस वकालत का रुख किया. निर्भया के मां-बाप से मिलीं. अदालत में बैठकर केस की सुनवाई देखने लगीं.






एक साल के भीतर ही फांसी की सज़ा का फैसला भी आ गया पर इस पर अमल होने में सात साल लग गए.
इस दौरान वकील के तौर पर तजुर्बा हासिल कर चुकीं सीमा का ज़्यादातर काम औरतों के खिलाफ़ हिंसा के मामलों पर केंद्रित होता गया.
उन्होंने निर्भया के वकीलों की टीम में जुड़ने का फैसला किया.
दोषियों के बार-बार अपील करने की वजह से केस अदालतों की सुनवाई में उलझा रहा.
आखिरकार साल 2020 में जब देर रात सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी अपील खारिज कर दी और फांसी दी गई, तब सीमा सीधा निर्भया के घर गईं.
भर्राई आवाज़ में सीमा ने बताया:
“मैंने निर्भया की तस्वीर के आगे सर झुकाया और बोली मैंने अपना वादा पूरा कर दिया है, और बस आंखों से आंसुओं की लड़ी बह निकली.”

मन में चैन था पर दुख भी. उनके मुताबिक फांसी होने में बहुत देर हो गई थी.
“निर्भया के केस पर सबकी नज़र थी, फांसी समय पर होती तो लोगों के मन में डर बैठता. इंसाफ़ की उम्मीद और कानून का डर फांसी की सज़ा से नहीं, सही समय पर सही सज़ा से होता है.”
दलित समुदाय की सीमा इस साल बहुजन समाज पार्टी में जुड़ गईं. इस उम्मीद में कि सत्ता में आईं तो कड़े कानून और नीतियों के अमल में और कारगर भूमिका निभा पाएंगी.
पंकज
सीमा की ही तरह पंकज (बदला हुआ नाम) को नहीं मालूम था कि उनकी ज़िंदगी के तार निर्भया से कैसे जुड़नेवाले हैं.
और इंसाफ के लिए उनकी लड़ाई का रास्ता बिहार के उनके गांव से निकलकर निर्भया की मां आशा देवी के घर से होकर निकलेगा.
निर्भया पर हमले से कई महीने पहले, साल 2012 की एक दोपहर में उनकी छोटी बहन का भी सामूहिक बलात्कार और फिर हत्या कर दी गई थी.
बहन को ढूंढते हुए जब पंकज घर के पास के खेत पहुंचे तो देखा कि उसके शरीर पर जगह-जगह चाकू घोंपा था, गुप्तांग भी खून से लथपथ थे और गले से बांस आर-पार कर दिया गया था.
बहन के उस हाल की तस्वीरें उन्होंने मुझे भी दिखाईं. मैंने मांगी नहीं थीं, पर पंकज ने दिखाने की ज़िद की ताकि मुझे उनकी बात पर भरोसा हो.
ऐसी तस्वीरें जिन्हें मेरी आंखे कभी अनदेखा नहीं कर पाएंगी.
पंकज ने कहा:
“मुझे गुस्सा क्या आता, मैं तो उसकी हालत देखकर डर गया, कि 13 साल की बच्ची के साथ ऐसा कौन कर सकता है.”
निर्भया पर हमला करनेवाले अनजान थे पर पंकज की बहन के बलात्कार और हत्या के आरोप में पुलिस ने जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया उनमें एक उनका पड़ोसी और एक बहन का टीचर था.
पिछले कई दशकों से सरकारी आंकड़े दर्शाते रहे हैं कि बलात्कार के 95 फ़ीसदी मामलों में अभियुक्त पीड़िता के जाननेवाले होते हैं – यानी पड़ोसी, परिवारवाले, सहकर्मी, टीचर इत्यादि.
पर आम समझ ये नहीं है.
पंकज को भी पहले यकीन नहीं हुआ, “मुझे लगा पुलिस से गलती हो गई है, क्योंकि एक गुरू अपने शिष्य के साथ ऐसा कैसे कर सकता है.”
फिर जब अभियुक्तों ने हमले में इस्तेमाल किया गया चाकू बरामद करवाया तब उनका दिल माना.
इंसाफ
चार साल बाद, 2016 में निचली अदालत ने अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई.
लेकिन अभियुक्त पुलिस को दिए जुर्म के इकबालिया बयान से पलट गए, औऱ उनकी अपील के बाद साल 2021 में हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.
हाई कोर्ट ने कहा, “अपराध भयानक है पर प्रॉसिक्यूशन आरोप साबित करने के लिए सबूत पेश करने में बुरी तरह से नाकाम रही है. इसलिए आरोपी बरी किए जाते हैं.”
पंकज हैरान थे:
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, क्या करूं, कहां जाऊं, चारों ओर अंधेरा लग रहा था, कैसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाऊं?”
पुलिस की सबूत जुटाने में नाकामी और बयान दर्ज करने में खामियां, बलात्कार के कई मामलों में रिहाई की वजह रही हैं.
हाल ही में छावला बलात्कार मामले में भी हाई कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सज़ा की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के अभियुक्तों को बरी करनेवाले फैसले की बिनाह यही थी.
इसका एक असर ये भी होता है कि रिहा हुए लोगों का सामना पीड़िता और उसके परिवार से हो सकता है.
जैसा पंकज के साथ हुआ.
उन्होंने बताया, “बरी होकर वो लोग गांव आए और भरे बाज़ार में धमकी दी कि हमने उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी है अब वो हमें भी जान से मार देंगे.”
फिर भी पंकंज ने हार नहीं मानी. अखबार की एक कतरन के साथ दिल्ली निकल पड़े.
उस कतरन में निर्भया की मां आशा देवी के बारे में एक लेख था. ना पता, ना फोन नंबर, बस उस तस्वीर के सहारे पंकज उन्हें ढूंढने निकले थे.
आशा देवी

पिछले सालों में आशा देवी के पास पंकज जैसे कई लोग मदद के लिए आते रहे हैं.
आठ साल की अपनी कानूनी लड़ाई के अनुभव बांटने के लिए उन्होंने अपनी बेटी के नाम पर ‘निर्भया ज्योति ट्रस्ट’ बनाई थी.
भारत के कानून के तहत बलात्कार पीड़िताओं और उनके परिवारवालों की पहचान गुप्त रखी जानी चाहिए पर साल 2015 में आशा देवी ने अपनी बेटी का नाम ये कहते हुए सार्वजनिक किया था कि, “जो लोग जघन्य अपराध करते हैं, उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए, ना कि पीड़िता और उनके परिवारवालों को.”
मैं उन्हें दिल्ली में उनके फ्लैट में मिली और जाना कि ट्रस्ट के ज़रिए वो आम लोगों की किस तरह मदद कर रही हैं.
आशा देवी ने बताया:
“कई बार तो बस उन्हें उम्मीद की ज़रूरत होती है, ताकि लड़ने की हिम्मत बनी रहे.”
“फिर न्यायपालिका के जटिल पहलू भी घबराहट पैदा करते हैं, तो मैं वो सब उनके साथ बांटती हूं जो हमने सीखा-समझा और हो सके तो कानूनी मदद भी दिलाती हूं.”

पंकज को उन तक पहुंचने में छह महीने लग गए पर आशा देवी से मुलाकात ने एक अहम् दरवाज़ा खोला. उनकी बेटी ज्योति का केस लड़नेवाले वरिष्ठ वकील जीतेंद्र झा ही अब पंकज की बहन का केस लड़ रहे हैं.
उनकी मदद से पंकज ने हाई कोर्ट के अभियुक्तों को बरी करनेवाले आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
पंकज को न्याय व्यवस्था पर विश्वास है, कहते हैं:
“मेरे बहन के कातिलों को फिर मौत की सज़ा दी जाएगी, वो बचेंगे नहीं.”
स्नेहा जावले
बलात्कार के मामलों में न्याय व्यवस्था से उम्मीद की एक वजह ये भी है कि जघन्य हिंसा पर मीडिया की नज़र और लोगों का गुस्सा जवाबदेही मांगने में मदद करता है.
पर उस हिंसा का क्या जो घर की चारदीवारी में होती है. जैसी स्नेहा जावले के साथ हुई.
जिसके बाद उनके परिवार ने उनका साथ देने की जगह रिश्तेदारों के सवालों से बचने के लिए उन्हें मरा बताना शुरू कर दिया.
जिससे सहम कर वो अपने में सिमटती रहीं जब तक निर्भया ने एक दूसरा रास्ता नहीं दिखाया.

साल 2000 की बात है. स्नेहा के मुताबिक उनके पति हर दूसरे दिन उनके साथ दहेज के लिए मारपीट करते थे.
स्नेहा ने बताया कि दिसंबर की एक रात हद पार हो गई जब उनके पति ने उन पर केरोसीन फेंका और माचिस की तीली जलाकर आग लगा दी.

अपना झुलसा हुआ चेहरा, सीना, हाथ और बाज़ू दिखाते हुए स्नेहा बताती हैं,:
“मैं जल रही थी और मेरा साढ़े तीन साल का बेटा ये सब देखते हुए चिल्ला रहा था – मम्मा को जलाया, मेरी मम्मा को जलाया.”
स्नेहा के मुताबिक वो नौबत ना आती अगर बार-बार उनके पापा अपने दामाद को खुश करने के लिए दहेज की बढ़ती मांगें पूरा ना करते जाते.
हमले के बाद भी परिवार ने उनका साथ नहीं दिया. स्नेहा के बताने के बावजूद उनके ‘रसूख़दार’ पति के खिलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं की.
सड़क पर अनजान लोगों के हाथ सामूहिक बलात्कार और घर की चारदीवारी में अपने ही पति का सालों तक पीटना और फिर जलाना.
साल 2012 में भारत में स्नेहा जैसी औरतों की तादाद निर्भया जैसे मामलों से चार गुणा थी. और ये तब जब घरेलू हिंसा के ज़्यादातर मामले पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. जैसे स्नेहा का नहीं पहुंच पाया.
दस साल बाद भी ये तस्वीर नहीं बदली है. औरतों के खिलाफ़ हिंसा के सबसे ज़्यादा मामले घरेलू हिंसा के ही हैं.
अस्पताल से घर लौटने के ढाई साल बाद स्नेहा के पति उनके बेटे को लेकर चले गए. वो अपने दर्द के साथ अकेली रह गईं.

फिर साल 2013 में उन्हें एक अंतर्राष्ट्रीय नाटक में काम करने का न्यौता आया.
‘निर्भया’ नाम के इस नाटक का मक़सद था चुप्पी तोड़ना. दिल्ली की घटना से शुरू हुई बहस को आगे ले जाते हुए औरतों पर होनेवाली कई तरह की हिंसा के खिलाफ़ आवाज़ उठाना.
इस नाटक में शामिल हर औरत को अपनी आपबीती बतानी थी. वो दर्द जो छिपा कर, दबा कर रखा था, उसे अनजान लोगों के सामने बार-बार बांटना था.
स्नेहा ने तय किया वो इसका हिस्सा बनेंगीं.
चार साल तक दक्षिण अफ्रीकी लेखक-निर्देशक येल फार्बर के इस नाटक के भारत के अलावा लंदन, एडिनबरा, न्यू यॉर्क समेत दुनियाभर के शहरों में 300 से ज़्यादा शो किए गए.
स्नेहा याद करती हैं, “हम रोज़ कई बार रो पड़ते थे, पर हमारी टीम ऐसी थी कि एक-दूसरे से बहुत हौसला मिलता था.”
नाटक के शो के बाद दर्शकों में से कई औरतें स्नेहा से मिलतीं और अपने साथ हुई हिंसा के बारे में बतातीं.
स्नेहा कहती हैं कि इन अनुभवों ने उन्हें बदल दिया:
“मुझे लगा अब मैं अकेली नहीं हूं”.
निर्भया नाटक ने उन्हें अपने से आगे देखने की ताकत भी दी. अब वो ‘बर्न सर्वाइवर्स’ के हकों के लिए काम कर रही हैं.
बरखा
इन सभी कहानियों में जो एक बात बार-बार सामने आई, वो थी हिंसा के सदमे से उबरने, मदद ढूंढने और इंसाफ के लिए लड़ने के सफर का अकेलापन.
बरखा बजाज के लिए भी शुरुआत डर से हुई.

मेन्टल हेल्थ और साइकॉलोजी की पढ़ाई करनेवाली बरखा, अमरीका में यौन हिंसा की शिकार हुई औरतों के साथ काम कर चुकी थीं.
लेकिन भारत लौटने के बाद निर्भया का बलात्कार उनके जीवन में एक नया मोड़ लेकर आया.
दिसंबर 2012 में वो नगालैंड में छुट्टी मनाने के लिए अकेली ट्रेन से सफर कर रही थीं.
निर्भया पर हमले की खबरें दिमाग में ताज़ा थीं और रेल के उनके डब्बे में वो अकेली औरत थीं.
पुणे से वीडियो चैट पर उन्होंने मुझे बताया कि वो घबरा गईं:
“मुझे डर लगने लगा, मैंने अपने साथ लाल मिर्च का पाउडर रखा, रात भर जूते पहने रही और सोई नहीं कि कहीं भागने ना पड़े.”

उस वक्त उन्हें अहसास हुआ कि अगर मुसीबत में पड़ीं तो कोई हेल्पलाइन नहीं है जहां वो मदद के लिए कॉल कर सकें.
बरखा के डर को एक मक़सद मिल गया और उन्होंने खुद एक हेल्पलाइन शुरू करने का फैसला किया.
हेल्पलाइन की शुरुआत तो बलात्कार की एक घटना और अनजान हमलावरों के डर से हुई लेकिन पिछले नौ सालों का अनुभव कुछ और ही रहा है.
बरखा की हेल्पलाइन पर कॉल करनेवालीं 95 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा से बच निकलने के लिए उन्हें संपर्क करती हैं.
अब भारत सरकार ने भी राष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली हेल्पलाइन – 1091 – शुरू की है. लेकिन ये काफी नहीं.

बरखा कहती हैं, “औरतों को हिंसक रिश्तों से बाहर निकलने के लिए कई तरह की मदद चाहिए होती है, रहने की सुरक्षित जगह, नौकरी, और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए वकील.”
इन सब पहलूओं पर सरकार काम कर रही है. औरतों के लिए शेल्टर बनाए गए हैं, मुफ्त कानूनी मदद का भी प्रावधान है. लेकिन बरखा के मुताबिक ये कम भी हैं और जो हैं उनके बहुत बेहतर होने की ज़रूरत भी है.
निर्भया पर हमला ऐसे प्रयासों की शुरुआत हो सकता है पर औरतों को हिंसा से उबरने के लिए कई और पहल चाहिए.
निर्भया की मां आशा देवी के अनुभव में भी पुलिस, वकील और अदालत का रास्ता पेचीदा है और आम नागरिक के लिए उसे समझना मुश्किल.
वो मानती हैं कि औरतों के खिलाफ़ हिंसा की चुनौती से निबटना आसान नहीं.
उन्होंने कहा, “हमने सोचा था कि हमारी लड़ाई से हम और लड़कियों के लिए बहुत बदलाव ले आएंगे, पर हम कुछ नहीं कर पाए.”
अरुण
अरुण (बदला हुआ नाम) निर्भया से नहीं, उस पर हमला करनेवालों में से एक से जुड़ा था.
उसके साथ स्कूल जाता था और 16 दिसंबर की उस रात की घटना से कुछ घंटे पहले ही उससे मिला था.
‘कोई कांड हो गया है’, इसकी खबर अरुण के मोहल्ले, रविदास कैम्प में सबसे पहले फैली. हमलावरों को ढूंढने और बस का पता लगाने के लिए पुलिस वहां आ पहुंची थी.
निर्भया का बलात्कार करनेवाले छह अभियुक्तों में से चार उसी मोहल्ले के रहनेवाले थे.
दिल्ली के रविदास कैम्प का नाम हमेशा के लिए निर्भया से जुड़ गया.
पास के एक मंदिर में जब मैं अरुण से मिली तो पहचान छिपाने की शर्त पर ही वो बात करने के लिए राज़ी हुए.
मैंने पूछा उस वक्त की क्या बातें याद है?
अरुण मुस्कुराए और बोले:
“सब कुछ. ये ज़िंदगी भर के लिए एक घाव है, ये कभी नहीं भूलेगा, ऐसा तमगा है जो यहां रहनेवाले हर लड़के पर लग गया है.”
हमले के बाद आम लोगों में फैलते रोश और नफरत को देखते हुए अरुण के मां-बाप ने उन्हें वापस गांव भेज दिया था.

देश की किसी भी बस्ती की ही तरह, रविदास कैम्प में भी बड़े शहरों में रोज़गार और एक बेहतर जीवन की तलाश के लिए गांवों और छोटे शहरों से आए परिवार रहते हैं.
कुछ महीने बाद जब अरुण लौटा तो पाया कि रविदास कैम्प में रहने का कलंक हर वक्त उसका पीछा करता था.
बलात्कारी मर्द
निर्भया की मौत के बाद बलात्कार के जघन्य मामलों में मौत की सज़ा का प्रावधान लाने का सरकार का फैसला कुछ हद तक आम लोगों के रोश को कम करने की मंशा से लिया गया था.
बलात्कार करनेवालों के बारे में आम मिथक ये भी है कि ऐसे मर्द, गरीब, अनपढ़ और बेरोज़गार होते हैं.
निर्भया का बलात्कार करनेवाले छह अभियुक्त इसी पृष्ठभूमि के थे - ड्राइवर, क्लीनर, हेल्पर, रेड़ी लगाने और जिम ट्रेनर का काम करते थे.
अरुण के मुताबिक रविदास कैम्प में रहनेवाले सब लड़के बुरे नहीं थे, पर क्योंकि वो यहां रहते थे, ये उन सबका सच बन गया था.
वो एक बेहतर ज़िंदगी चाहते थे लेकिन कैम्प छोड़ने का विकल्प भी नहीं था.
अरुण बताते हैं:
“जब मैं ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने गया तो क्लर्क ने ऊपर से नीचे तक घूरकर बोला तुम तो निर्भया को मारनेवाले राम सिंह के मोहल्ले में रहते हो ना?”
ऐसा बार-बार होता. आखिर में अरुण ने नौकरी के इंटरव्यू और आधिकारिक कागज़ात में अपना पता देते वक्त रविदास कैम्प की जगह ‘आरडीसी’ लिखना शुरू किया.

तरकीब काम की और दस साल बाद अब अरुण की शादी हो चुकी है और प्राइवेट नौकरी भी है.
पिछले दशक में कॉलोनी में बेहतरी आई है. घरों के बीच की गलियां साफ हैं, नालियां ढकी हुईं और ज़्यादातर घर पक्के हैं.
मोहल्ले की आंगनवाड़ी के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहां के ज़्यादातर बच्चे स्कूली पढ़ाई पूरी करते हैं.
अरुण के सरकारी स्कूल की टीचर बताती हैं कि अब वहां नियमित तरीके से सेक्स-एजुकेशन पर बातचीत होती है.
साल 2009 में भारत सरकार ने किशोरावस्था शिक्षा कार्यक्रम (एडोलोसेन्ट्स एजुकेशन प्रोग्राम) की शुरुआत की थी.
इसके तहत लड़के-लड़कियों को जेंडर और सेक्सुआलिटी के मिथक हटाने और किशोरावस्था के बारे में जानकारी दी जाती है.
पिछले दशक में इसे बड़े शहरों में बेहतर तरीके से लागू किया जा सका है पर गांवों में ये अभी भी एक चुनौती बना हुआ है.
सीमा के मुताबिक स्कूल-कॉलेज में लड़के-लड़कियों के साथ इन मुद्दों पर काम करना बहुत ज़रूरी है.
वो कहती हैं, "औरतों और मर्दों की बराबरी की लड़ाई जीतना ही औरतों के खिलाफ हिंसा कम करने के रास्ते का पहला कदम है."
निर्भया के मामले ने हिंसा पर खुलकर बातचीत की शुरुआत की है लेकिन हकों को हकीकत में बदलने का आगे का सफर एक दशक से कहीं लबा दिखता है.
बीबीसी संवाददाता: दिव्या आर्य
इलस्ट्रेशन: पुनीत कुमार बरनाला
शॉर्टहैंड प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी
अतिरिक्त रिसर्च: मेधावी अरोड़ा
कैमरा-एडिटिंग: काशिफ़ सिद्दीकी
फोटो: गेटी
इसे पब्लिश किया गया: 14दिसंबर 2022