नक्सलवाद के ख़िलाफ़ मोर्चे पर तैनात DRG का आंखों देखा हाल और आदिवासियों की आपबीती- ग्राउंड रिपोर्ट
भारत में हथियारबंद माओवादी संघर्ष का इतिहास पुराना है. कई इसकी जड़ें आज़ादी से पहले भी तलाशते हैं.
हालाँकि, 60 के दशक में पश्चिम बंगाल में नक्सल आंदोलन का उभार हुआ. तब से अब तक इसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं.
गृह मंत्रालय के मुताबिक, दिसंबर 2024 में देश के नौ राज्यों के कई इलाक़े नक्सली हिंसा की गिरफ़्त में थे.
इनमें भी सबसे ज़्यादा इलाक़े छत्तीसगढ़ में थे.
हालांकि, सरकार का कहना है कि नक्सलवाद के ख़िलाफ़ उसकी लड़ाई 31 मार्च 2026 तक समाप्त हो जाएगी.
इस दावे की वजह बताते हुए सरकार अपनी नीतियों और नक्सलियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों का हवाला देती है.
छत्तीसगढ़ में इस कार्रवाई को ख़ास तौर से पुलिस का एक संगठन अंजाम दे रहा हैं.
इसका नाम है, डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड यानी डीआरजी. राज्य सरकार के मुताबिक बाकी सुरक्षा बलों की तुलना में डीआरजी की भूमिका अलग और अहम है.
बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित और सेराज अली ने छत्तीसगढ़ में हालात को क़रीब से जानने के लिए डीआरजी की अलग-अलग टीमों के साथ काफ़ी वक़्त गुज़ारा.
यही नहीं, इन सबके बीच वहाँ रहने वाले आदिवासियों का हाल भी जाना. पेश है यह ग्राउंड रिपोर्ट.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित



