सऊदी अरब हूती विद्रोहियों से राजधानी रियाद की हिफ़ाज़त क्यों नहीं कर पा रहा है?

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सऊदी अरब की राजधानी रियाद के एक हवाई अड्डे पर हुए हमले में कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई और 309 लोग घायल हुए हैं.
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कहा है कि शनिवार को पूर्वी सऊदी अरब के दम्माम शहर में किंग फ़हद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास भी एक मिसाइल गिरी है.
स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक़ कुछ दिनों पहले ही यमन के हूती विद्रोहियों ने इसी तरह के हमले करने का दावा किया था.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा है कि मक्का समझौते और दोनों देशों के बीच स्थायी भाईचारे के मुताबिक़ उनका देश सऊदी अरब की संप्रभुता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करता है.
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का समझौते का अहम पार्टनर है. इसके प्रावधानों के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा.
पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान हूती विद्रोही सऊदी अरब के हवाई अड्डों पर लगातार हमले कर रहे हैं.
सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने हमले का जवाब देने की कसम खाई है. गठबंधन ने इस हमले के लिए हूती विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया है और इसे 'युद्ध अपराध' बताया है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अमेरिका का सैन्य सहयोगी सऊदी अरब विशाल हथियार भंडार और अपार धन होने के बावजूद हूती विद्रोहियों के इन हमलों से अपनी राजधानी रियाद को क्यों नहीं बचा पा रहा है.
सहयोगियों का सीधी मदद से इनकार

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अमेरिकी न्यूज़ आउटलेट सीएनएन ने लिखा है कि यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की तेज़ बढ़त और सऊदी अरब पर उनके हमलों ने इस खाड़ी देश के सामने जवाबी कार्रवाई के सीमित विकल्प छोड़े हैं.
इनमें से हर विकल्प की उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
सीएनएन लिखता है, ''विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब व्यापक युद्ध नहीं चाहता. हालांकि हूती विद्रोहियों के बढ़ते हौसले सऊदी अरब को एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में खींच सकते हैं.''
यमन मामलों के विशेषज्ञ और वॉशिंगटन डीसी में रहने वाले रिस्क कंस्लटेंट मोहम्मद अल-बाशा ने सीएनएन से कहा, "सभी संकेत अब बड़े पैमाने पर सऊदी जवाबी कार्रवाई की ओर इशारा करते हैं और इसकी संभावना हर दिन बढ़ रही है."
हालांकि इस बीच इस बात की भी चर्चा है कि मक्का समझौते के बावजूद पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब के बचाव में आगे क्यों नहीं आ रहे हैं.
थिंक टैंक सॉफन सेंटर के मुताबिक़ ईरान के साथ युद्ध का दायरा बढ़ने से रोकने की कोशिश में सऊदी अरब के सबसे बड़े सुरक्षा सहयोगी अमेरिका ने उसे सीधा समर्थन देने से इनकार कर दिया है.
यही हाल पाकिस्तान और तुर्की का है, जिन्होंने कुछ दिनों पहले ही आपस में एक सैन्य समझौता किया था. इसके प्रावधानों में ये शामिल था कि गठबंधन में से किसी भी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा.
ऐसा लगता है कि क्षेत्रीय नेताओं और ट्रंप प्रशासन ने यह आकलन किया है कि यमन में हस्तक्षेप करने से ईरान और उसके करीबी ग़ैर-सरकारी सशस्त्र संगठन जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं.
पाकिस्तानी अधिकारियों ने अपने फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा है कि यमन में जारी लड़ाई मक्का समझौते से पहले से चला आ रहा संघर्ष है. इसलिए इस समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा करने के लिए बाध्य नहीं है.
ईरान की मदद से मजबूत बने हूती विद्रोही

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ईरान भले ही अभी अमेरिका के साथ युद्ध में फंसा हुआ है. लेकिन वह लंबे समय से हूती विद्रोहियों की मदद करता रहा है. उसकी मदद से हूती विद्रोही लगातार अपनी लंबी रेंज की ड्रोन और मिसाइलों के जखीरे को बढ़ाते और अपग्रेड करते रहे.
हूती विद्रोहियों की इस क्षमता ने उन्हें सऊदी अरब के भीतर मार करने में सक्षम बना दिया. हूती विद्रोहियों की क्षमता अब इतनी बढ़ गई है कि वो सऊदी अरब के काफ़ी अंदर हवाई अड्डों, शहरी इन्फ़्रास्ट्रक्चर और रियाद के रिहायशी इलाकों तक बड़े हमले कर सकते हैं.
सऊदी अधिकारियों के मुताबिक़, हूती विद्रोहियों ने दो दिनों के भीतर देश के दो बड़े हवाई अड्डों, रियाद और आभा, पर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए हैं. इन हमलों में तीन लोगों की मौत हुई और दर्जनों लोग घायल हुए.
ये हमले ऐसे समय हुए हैं, जब हूती विद्रोही अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस को सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने को लेकर 'आख़िरी चेतावनी' दे चुके हैं.
हूतियों की सेना के प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया है कि सऊदी अरब का हवाई क्षेत्र अब "उनकी सैन्य कार्रवाइयों का केंद्र" बन गया है.
हूतियों ने बुधवार और गुरुवार की रात रियाद के किंग ख़ालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एक और मिसाइल हमला करने का भी दावा किया.
डैनी यानी डेनिस सिट्रिनोविच मध्य पूर्व, ईरान और यमन के मामलों पर नज़र रखने वाले इंस्टीट्यूट फ़ॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ यानी आईएनएसएस में सीनियर रिसर्चर हैं.
उनके मुताबिक़, हूतियों का हवाई अड्डों को निशाना बनाना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं है.
यह उनकी राजनीतिक रणनीति और लोगों पर मानसिक दबाव बनाने की कोशिश का भी हिस्सा है.
डैनी ने बीबीसी उर्दू से बातचीत में हूतियों के पहले दिए गए एक बयान का ज़िक्र किया.
इस बयान में हूतियों ने कहा था, "अगर हमारे विमान सना एयरपोर्ट पर नहीं उतर सकते, तो किसी नागरिक एयरलाइन के विमान को भी सऊदी अरब में नहीं उतरना चाहिए."
डैनी के मुताबिक़, हूतियों के हवाई अड्डों पर हमला करने की मुख्य वजह यही है.
विशाल हथियार भंडार और अपार धन फिर भी लड़ने में कमजोर क्यों

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इनक्वायरर. नेट ने लिखा कि सऊदी अरब के पास अपार धन और अत्याधुनिक हथियार हैं, फिर भी एक दशक से अधिक समय से हूती विद्रोहियों को हराने में नाकाम क्यों हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक़ सऊदी अरब को इस समूह को रोकने में इसलिए संघर्ष करना पड़ा है क्योंकि जमीन पर उसके प्रॉक्सी असरदार नहीं हैं. ऊबड़-खाबड़ भूभाग और ईरानी समर्थन ने हूतियों की ताक़त बढ़ा दी है.
इनक्वायरर. नेट के मुताबिक़ प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सऊदी विशेषज्ञ बर्नार्ड हायकेल ने कहा कि सऊदी अरब को एक ऐसी सेना बनानी होगी जो लड़ने को तैयार हो. साथ ही उसे एक ऐसी आबादी भी तैयार करनी होगी कि उनके पास जो कुछ भी है उसे बचाने के लिए मरने को तैयार रहे. और फिलहाल उनके पास यह नहीं है.
दरअसल अमेरिकी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों समेत पश्चिमी हथियार विक्रेता कंपनियों से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद सऊदी अरब की रक्षा नीति बन गई है.
लेकिन जमीन पर लड़ने के लिए उनकी तरफ़ से कोई नहीं आ रहा है.

अपने विशाल हथियार भंडार के बावजूद सऊदी की सेना के पास जटिल युद्ध अभियानों का सीमित अनुभव है.
हालांकि एनपीआर के मुताबिक़ क्षेत्रीय अधिकारियों ने पिछले महीने एसोसिएटेड प्रेस को बताया था कि सऊदी अरब के पास मिसाइल इंटरसेप्टर की कमी हो रही है. उनसे फ़्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से क्षेत्र में हवाई रक्षा सहायता तैनात करने का अनुरोध किया है.
उनमें से एक अधिकारी ने यह भी बताया कि ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के पास भी मिसाइल इंटरसेप्टर का भंडार कम हो गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि तख़्तापलट की आशंका वाले क्षेत्र में तख्तापलट को रोकने के लिए राज्य की सैन्य ताकतें जानबूझकर छोटी और बंटी हुई रखी गई.
मध्य पूर्व के एक्सपर्ट टेकेह ने 2015 में एक संसदीय सुनवाई में कहा था, "सऊदी अरब एकमात्र ऐसी जगह है जहां राजशाही को सेना ने नहीं हटाया क्योंकि उन्होंने सेना को कमजोर रखा है."
एक दशक से चल रहा है संघर्ष

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हूती विद्रोहियों का कहना है कि वे यमन के गृहयुद्ध में सरकारी सेना का समर्थन करने के लिए सऊदी अरब को निशाना बना रहे हैं.
सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन का गठन 2015 में किया गया था. उस समय कई अरब देश यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को सत्ता से हटाने की हूती विद्रोहियों की कोशिश रोकने के लिए एकजुट हुए थे.
सालों तक चले हवाई हमलों और ज़मीनी लड़ाई में लाखों लोग प्रभावित हुए और कई हज़ार लोगों की मौत हुई.
इसके बाद 2022 में अस्थायी संघर्षविराम कराया गया. इस संघर्ष ने दुनिया के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक को जन्म दिया.
हालांकि बाद में यह अनौपचारिक संघर्षविराम टूटने लगा.
हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के ख़िलाफ़ 'समुद्री नाकाबंदी' की घोषणा की और सऊदी हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों तथा लाल सागर में तेल टैंकरों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए.
हूती विद्रोहियों का कहना है कि वे सऊदी अरब की ओर से वर्षों से लगाई गई नाकेबंदी और यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर हुए हवाई हमले के जवाब में ये कार्रवाई कर रहे हैं. सना पर हूती विद्रोहियों का नियंत्रण है.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सऊदी अरब पर हूतियों के "लगातार सीमा पार हमलों" की निंदा की है.
उन्होंने कहा है कि वह "लड़ाई में तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी को लेकर बेहद चिंतित" हैं.
हूतियों के हाल में आगे बढ़ने के बाद दोनों पक्षों के सैकड़ों लोगों के मारे जाने की ख़बरें हैं.
संयुक्त राष्ट्र ने बुधवार को कहा कि बिगड़ते हालात के कारण दो लाख से ज़्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है.
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