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दीप्ति नवल: बलराज साहनी के ऑटोग्राफ़ से यूं हुई फ़िल्मी सपनों की शुरुआत
- Author, इरफ़ान
दीप्ति नवल की मधुर और सहज शख़्सियत, जो उन्हें 'गर्ल नेक्स्ट डोर' का दर्जा देती है, स्क्रीन पर उनके किरदारों की तरह दिल को छू लेती है.
वो सार्वजनिक आयोजनों, मीडिया के ग्लैमर और विवादों से दूर रहती हैं. शायद यही वजह है कि उनके इंटरव्यू कम ही देखने को मिलते हैं.
पंजाब के अमृतसर में 1952 को जन्मीं दीप्ति के पिता न्यूयॉर्क की सिटी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थे. इसी के चलते वो 1971 में अमेरिका चली गईं.
अमेरिका में उन्होंने हंटर कॉलेज से फाइन आर्ट्स में पढ़ाई की. अभिनय के अलावा, दीप्ति नवल की लेखन और पेंटिंग में भी गहरी रुचि है.
फोटोग्राफी और पेंटिंग का टैलेंट
उनके कविता संग्रह 'लम्हा-लम्हा', 'ब्लैक विंड' और 'साइलेंट स्क्रीम', उनके काव्य व्यक्तित्व का आईना हैं और 'अ कंट्री कॉल्ड चाइल्डहुड' उनके लेखन की संवेदनशीलता को दर्शाती हैं, जिसमें उन्होंने अपने बचपन और किशोरावस्था का जीवंत वर्णन किया है.
दीप्ति ने कई फोटोग्राफी और पेंटिंग प्रदर्शनियां भी आयोजित की हैं. उन्होंने 1979 में फ़िल्म 'एक बार फिर' से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की. इसमें उन्होंने एक ऐसी महिला की भूमिका निभाई, जो अपने पति की बेवफाई के बाद अपनी पहचान और आत्मसम्मान की तलाश करती है.
इसके बाद उन्होंने चश्मे बद्दूर, कमला, मिर्च मसाला, अनकही, मैं ज़िंदा हूं, पंचवटी, लिसन अमाया, लीला और फ्रीकी चक्र जैसी 70 से अधिक फ़िल्मों में अभिनय किया.
फ़ारूक़ शेख़ के साथ उनकी जोड़ी, ख़ासकर 'चश्मे बद्दूर' और 'साथ-साथ में', दर्शकों की पसंदीदा रही.
हरिपुर में आर्ट स्टूडियो
अभिनय से इतर, दीप्ति को हिमाचल और लद्दाख के सुदूर पहाड़ों में ट्रैकिंग और एकांत काफी पसंद है. हिमाचल प्रदेश के नग्गर के पास हरिपुर में उनका एक आर्ट स्टूडियो है, जहां वो अक्सर समय बिताती हैं.
दीप्ति नवल सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं. उन्होंने अपने दिवंगत साथी के सम्मान में विनोद पंडित चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की, जो लड़कियों की शिक्षा के लिए समर्पित है.
दीप्ति नवल ना सिर्फ एक अभिनेत्री हैं, बल्कि एक कवयित्री, चित्रकार, फोटोग्राफर और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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