टीम नंबर वन या सर्वश्रेष्ठ टीम
दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध भारत को सेंचूरियन में मिली हार के कई पहलू हैं.
पहली पारी की बल्लेबाज़ी के बाद हार तो तय हो गई थी, देखना सिर्फ़ ये बच गया था कि हार कितने दिनों में मिलती है और पारी से मिलती है या विकेटों से.
वैसे इस हार के लिए भारत की बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी दोनों बराबर के ज़िम्मेदार हैं. भारतीय टीम शायद इस समय दुनिया की सबसे अनुभवी टीम है जहाँ वीरेंदर सहवाग, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ी उसका हिस्सा हैं.
इतने अनुभवी बल्लेबाज़ी क्रम का पहली पारी में लुढ़क जाना शर्मनाक था. वीरेंदर सहवाग पहली और दूसरी पारी में जिस शॉट पर आउट हुए वो ग़ैर-ज़िम्मेदाराना था.
ये ठीक है कि सहवाग का खेलने का अंदाज़ बिंदास है मगर खिलाड़ी में अनुभव के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है और वो ज़िम्मेदारी इस अहम दौरे पर सहवाग से अपेक्षित थी.
ये बात सिर्फ़ सहवाग ही नहीं दूसरे बल्लेबाज़ों पर भी लागू होती है जो 'तू चल मैं आता हूँ' कि तर्ज पर मैदान में जा रहे थे.
सुरेश रैना के बल्ले के रन क्यों सूख गए हैं ये समझ से बाहर हो गया है.
इसी तरह भारतीय गेंदबाज़ी का पैनापन पूरी तरह ग़ायब है. दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाज़ों ने इस टेस्ट में 20 विकेट झटके मगर भारतीय गेंदबाज़ सिर्फ़ चार खिलाड़ियों को पैवेलियन की राह दिखा पाए.
जहाँ टीम 20 विकेट लेना चाहती है वहाँ सिर्फ़ चार नियमित गेंदबाज़ों के साथ उतरने का क्या औचित्य है. जो काम छह विशेषज्ञ बल्लेबाज़ नहीं कर पाएँगे उसे सातवाँ बल्लेबाज़ अकेले दम पर कैसे कर दिखाएगा.
ये बात सही है कि सिर्फ़ एक हार के बाद टीम का सारा पिछला प्रदर्शन धो-पोंछकर नहीं रख सकते मगर विश्व की नंबर एक टीम से ऐसी बुरी हार की भी तो अपेक्षा नहीं की जा सकती.
ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के विरुद्ध जारी ऐशेज़ शृंखला के दूसरे मैच में हारने के बाद ऑस्ट्रेलिया ने ज़बरदस्त वापसी करते हुए तीसरा मैच जीता. वो जीत ऑस्ट्रेलिया का जज़्बा दिखाती है जो कभी भी हार को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती.
क्या भारतीय टीम नंबर एक के ताज को सिर्फ़ घरेलू शृंखलाओं के दम पर बचाना चाहती है या वास्तव में विदेशी पिच पर जीत हासिल करके श्रेष्ठ टीम होने का दावा ठोंक सकती है.
अगले दो टेस्ट में इसी का टेस्ट होगा.
